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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 716, कुल 726 में से

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पृष्ठ 716

१२८ पञ्चदशी
कहा है कि—हे अर्जुन जिस प्रकार प्रदीप्त अग्नि ईंधन को जला
देती है इस प्रकार [विधि पूर्वक सुलगाई हुई] यह ज्ञानाग्नि सब कर्मों
को राख कर देती है। जिस ज्ञानी को अहंकारयुक्त भाव नहीं रहता,
जिस ज्ञानी की बुद्धि संसार में लिप्त नहीं रहती, वह यदि इन सब
लोकों को भी मार दे तौ भी उसे मारने वाला मत समझो । इतने
गुरुतर अपराध से भी वह किसी बन्धन में नहीं आयेगा । इतने से
ज्ञानी को आमुष्मिक दुःख या परलोक की चिन्ता नहीं रहती वह
आप समझ गये होंगे ।
अब क्रमानुसार सर्वकामाप्ति का विचार करेंगे—जैसे ज्ञानी को
दुःखाभाव हो जाता है इसी प्रकार उसे सर्वकामाप्ति भी हो ही जाती
है । ऐतरेय श्रुति ने प्रायः इन्हीं शब्दों में कहा है कि—यह ज्ञानी
सब कामों को पाकर अमर हो चुका है। छान्दोग्य में कहा है कि—
खाता, खेलता, स्त्रियों से रमण करता, सवारियों पर बैठता तथा भोगों
को भोगता हुआ भी ज्ञानी शरीर को भूला रहता है । वह आत्म-
सागर में इतना रमा रहता है कि फल वाले पेड़ों को जैसे फल देने
का या नदी को बहने का ज्ञान नहीं होता इसी प्रकार उसे शरीर
की चेष्टाओं तक का भी ज्ञान नहीं रह जाता । उस समय उसका
प्राण ही उसके प्रारब्ध कर्मों के अनुसार उस शरीर को जीवित
रखता है। तैत्तिरीय में कहा है कि—ज्ञानी लोग संसार की सम्पूर्ण
कामनाओं को एक ही साथ पा लेते हैं। दूसरे अज्ञानियों की तरह
इसे कर्मों से जन्म लेना नहीं पड़ता। अज्ञानी लोग जैसे क्रमानुसार
भोगों को भोगा करते हैं, ज्ञानी को उस तरह भोग नहीं मिलते,
वह तो संसार के सब भोगों को एक साथ, बिना ही किसी क्रम
के, भोगा करता है। पूर्ण युवा हो, रूपवान् हो, विद्यावान् हो,
नीरोग हो, दृढ़चित्त हो, बड़ी सेनावाला हो, धन्यधान्य पूर्ण पृथिवी