पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७१
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७१
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था इति शास्त्रतः ।
ब्रह्मलोके स कल्पान्ते ब्रह्मणा सह मुच्यते ॥५२॥
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः ते
ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे । ब्रह्मणा सह ते सर्वे
संप्राप्ते प्रतिसंचरे परस्यान्ते कृतात्मनः प्रविशन्ति परं पदम् । (मु० ३-
२-६) इस शास्त्र के कथनानुसार वे ब्रह्मलोक में जाते हैं । वहाँ
उन्हें तत्त्व का साक्षात्कार होता है । कल्पान्त के समय ब्रह्म
के साथ वे भी मुक्त हो जाते हैं [ यों उनकी क्रममुक्ति
होती है ] ।
केषांचित् स विचारोपि कर्मणा प्रतिबध्यते ।
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्य इति श्रुतेः ॥५३॥
[तत्वविचार करते हुए भी किसी प्रतिबन्ध के कारण, इस
जन्म में कइयों को साक्षात्कार नहीं हो पाता । दूसरे जन्मों में
साक्षात् होता है] परन्तु कई ऐसे भी लोग होते हैं कि-उनके
पाप कर्मों से विचार में भी रुकावट पड़ जाती है । उनको तो
विचार का अवसर भी नहीं मिलता है । श्रवणायापि बहुभिर्यो न
लभ्यः (क० २-७) इस श्रुति में भी यही कहा गया है कि वह
परमात्मतत्त्व बहुत से पापियों को तो सुनने को भी नसीब
नहीं होता ।
अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद् वा सामग्र्या वाप्यसंभवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥५४॥
बुद्धि के अति मन्द होने के कारण, अथवा ज्ञान की सामग्री
[गुरु या अध्यात्म शास्त्र या अनुकूल देश कालादि के] न मिलने
से,जो विचार न कर सकता हो
प्रकरण के २८ वें श्लोक में यही बात संक्षेप से कही है । ]
३७२ पञ्चदशी
हो] वह प्रति क्षण ब्रह्म की उपासना ही किया करे । [ इस
प्रकरण के २८ वें श्लोक में यही बात संक्षेप से कही है । ]
निर्गुणब्रह्मतत्त्वस्य न ह्युपास्ते रसम्भवः ।
सगुणब्रह्मणीवात्र प्रत्ययावृत्तिसंभवात् ॥५५॥
गुणरहित होने के कारण निर्गुण ब्रह्मतत्त्व की उपासना हो
नहीं सकती है, ऐसा विचार ठीक नहीं है । क्योंकि सगुण ब्रह्म
में जैसे प्रत्यय की आवृत्ति हो सकती है, वैसी आवृत्ति, इस
निर्गुण ब्रह्म में भी हो ही सकती है [यों निर्गुण तत्त्व की उपा-
सना संभव हो जाती है । ]
अवाङ्मनसगम्यं तन्नोपास्यमिति चेत् तदा ।
अवाङ्मनसगम्यस्य वेदनं न च संभवेत् ॥५६॥
वाणी और मन से अज्ञेय होने के कारण वह निर्गुण ब्रह्म
यदि तुम्हारी समझ में उपास्य न हो सकता हो, तो फिर यों
तो वाणी और मन से अगम्य उस तत्त्व का ज्ञान भी नहीं हो
सकेगा ।
वागाद्यगोचराकार मित्येवं यदि वेत्त्यसौ ।
वागाद्यगोचराकार मित्युपासीत नो कुतः ॥५७॥
यदि कहा जाय कि 'इस ब्रह्म का आकार वागादि के
गोचर होने वाला नहीं है' इस रूप से उसे जान तो सकते हैं।
तो हम कहेंगे कि फिर इसी [वागादि के अगोचर] रूप से ही
उसकी उपासना क्यों नहीं हो सकती है ? [हम तो कहेंगे कि
उस रूप से ही उसकी उपासना भी की जा सकती है ।]
सगुणत्व मुपास्यत्वाद्यदि, वेद्यत्वतोऽपि तत् ।
वेद्यं चेल्लक्षणावृत्त्या लक्षितं समुपास्यताम् ॥५८॥
यदि तुमको उपास्य होने से सगुणता का भय प्रतीत होता
हो तो, वह भय तो वेद्य होने से भी होगा ही। यदि कहो कि
वह वेद्य तो लक्षणा वृत्ति से होता है [इसीलिए सगुण नहीं
होता] तो हम कहेंगे कि उपासना भी लक्षणा से ही कर डालो।
ब्रह्म विद्धि तदेव त्वं न त्विदं यदुपासते ।
इति श्रुते रुपास्यत्वं निषिद्धं ब्रह्मणो यदि ॥५९॥
'यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं
यदिदमुपासते' ( केन १-५ ) यह श्रुति, जो उपास्य है उसके ब्रह्म
होने का निषेध कर रही है। यह कहती है — जो मन वाणी
का अगम्य तत्व है, उसी को तुम ब्रह्म समझो ! संसार के लोग
जिसको 'यह' समझकर उपासना कर रहे हैं उसको ब्रह्म मत
समझो। यह शंका यदि किसी को हो तो—
विदितादन्यदेवेति श्रुते र्वेद्यत्वमस्य न ।
यथा श्रुत्यैव वेद्यं चेत्तथा श्रुत्याप्युपास्यताम् ॥६०॥
उसका उत्तर यह है कि—अन्यदेव तद्विदितादयो अविदिता-
दधि (केन १-३) इस श्रुति ने तो इसके वेद्य होने का भी
निषेध किया है। यदि श्रुति के कथनानुसार ब्रह्म को विदित
और अविदित से अनोखा ही मान लेना चाहिये तो श्रुति के
कथनानुसार वैसे ही की उपासना भी कर लेनी चाहिये ।
अवास्तवी वेद्यता चेदुपास्यत्वं तथा न किम् ।
वृत्तिव्याप्ति र्वेद्यता चेदुपास्यत्वेऽपि तत्समम् ॥६१॥
यदि कहो कि—वेद्यता तो ब्रह्म में वास्तव नहीं है। तो
हम कहेंगे कि—उसमें उपास्यता भी वास्तव नहीं है। यदि
कहा जाय कि—वेदन पक्ष में वृत्ति ब्रह्माकार हो सकती है तो
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हम कहेंगे उपास्य पक्ष में भी [ शब्द प्रमाण के बल से ] वृत्ति
ब्रह्माकार हो ही सकती है । वृत्ति का ब्रह्माकार होना दोनों ही
पक्षों में समान हो सकता है ।
का ते भक्ति रुपास्तौ चेत् कस्ते द्वेषस्तदीरय ।
मानाभावो न वाच्योऽस्यां बहुश्रुतिषु दर्शनात् ॥६२॥
यदि मुझ पर यह युक्ति-शून्य उलहना दो, कि उपास्ति में
तुम्हें इतनी भक्ति क्यों है ? तो हम पूछेंगे कि तुम्हें उपासना
से ही इतना द्वेष क्यों होगया है ? निर्गुण ब्रह्म की उपासना
करने के प्रमाण नहीं मिलते यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि
अनेक श्रुतियों में निर्गुण ब्रह्म की उपासना देखी ही गयी है ।
उत्तरस्मिंस्तापनीये शैब्यप्रश्नेऽथ काठके ।
माण्डूक्यादौ च सर्वत्र निर्गुणोपास्तिरीरिता ॥६३॥
निर्गुणोपासना को बताने वाली बहुत सी श्रुतियाँ भी देख
लो—शैब्य के प्रश्न करनेपर तापनीय उपनिषत् में निर्गुणो-
पासना का कथन किया गया है । प्रश्न उपनिषत् के पाँचवें प्रश्न
में ‘यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्यनेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत’ ( प्रश्न
५-५ ) में निर्गुणोपासना का वर्णन आया है । कठोपनिषत् में
‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ ( कठ २-१५ ) से प्रारम्भ करके ‘एत-
द्ध्येवाक्षरं ब्रह्म’ ( कठ-२-१६ ) ‘एतदालम्बनं श्रेष्ठम्’ ( कठ-२-१७)
इत्यादि से प्रणवोपासना कही गई है । माण्डूक्य उपनिषत् में
‘ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्’ इत्यादि से तीनों अवस्थाओं से परे
रहनेवाले चतुर्थ तत्व की उपासना बतायी गयी है । तैत्तिरीय
मुण्डक आदि में भी निर्गुणोपास्ति का वर्णन आया ही है ।
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७५
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७५
अनुष्ठानप्रकारोऽस्याः पञ्चीकरण ईरितः ।
ज्ञानसाधनमेतच्चेनेति केनात्र वारितम् ॥६४॥
इस निर्गुणोपासना को कैसे करें ? यह बात श्रीमच्छंकरा-
चार्य के 'पंचीकरण' नाम के ग्रन्थ में कही है। यदि कहो कि
यह उपासना मुक्ति का साधन नहीं है, यह तो ज्ञान का ही
साधन है । तो हम कहेंगे कि हम इस बात का निषेध नहीं
करते । यह तो हमें स्वीकार ही है।
नानुतिष्ठति कोप्येतदिति चेन्मानुतिष्ठतु ।
पुरुषस्यापराधेन किमुपास्तिः प्रदुष्यति ॥६५॥
यदि कहो कि सगुणोपासना करने वाले तो बहुत से पाये
जाते हैं, निर्गुणोपासना तो कोई भी करता नहीं दीखता । तो
हम कहेंगे कि—भले ही कोई निर्गुणोपासना न करो, यह तो
करनेवाले पुरुषों की कमी है। पुरुष की कमी से उपासना का
क्या बिगड़ता है ?
इतोऽप्यतिशयं मत्वा मन्त्रान् वश्यादिकारिणः ।
मूढा जपन्तु तेभ्योऽतिमूढाः कृषिमुपासताम् ॥६६॥
सगुणोपासना से भी सुकर देखकर मूढ लोग वशीकरण
आदि मन्त्रों का जप करें, उनसे भी मूर्ख लोग खेती करलें तो
भी मुमुक्षु लोग निर्गुणोपासना को कैसे छोड़ देंगे ?
सगुणोपासना का फल भी बहुत दिनों बाद मिलता है।
इस कारण ऐहिकफल देने की अधिकता को देखकर, मूढ लोग
वशीकरणादि मन्त्रों का जप करें। परन्तु उन्हें देखकर विवेकी
लोग सगुणोपासना को छोड़ नहीं देते हैं। अथवा उनसे भी
अतिमूर्ख लोग, किसी भी नियम में न बँधने की स्वतन्त्रता
३७६ पञ्चदशी
देखकर खेती की उपासना करने लगे। परन्तु उन्हें देखकर
मन्त्रों का जप करनेवाले लोग अपने मन्त्रानुष्ठान को छोड़ नहीं
बैठते हैं। इसी प्रकार जिन्हें सांसारिक फलों की चाह लगी
हुई है, वे अगर निर्गुणोपासना का अनुष्ठान नहीं करते हैं, तो
भी मुमुक्षु लोग निर्गुणोपासना को नहीं छोड़ सकते हैं।
तिष्ठन्तु मूढाः प्रकृता निर्गुणोपास्तिरीर्यते ।
विद्यैक्यात् सर्वशाखास्थान् गुणानत्रोपसंहरेत् ॥६७॥
मूढ लोगों की बातों को यहीं छोड़कर, अब प्रकृत निर्गुणो-
पासना का कथन किया जाता है। ['सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्य-
विशेषात्' (वेदान्त ३-३-१) जो जो उपासनायें जहां तहां वेदान्तों
में बिखरी पड़ी हैं, क्योंकि चोदना सब जगह एक सी ही है,
इस कारण उन उपासनाओं में कोई भी भेद नहीं है]।
इस व्याससूत्र के अनुसार निर्गुणोपासना नाम की विद्या
तो एक ही है। इस कारण भिन्न-भिन्न शाखाओं में वर्णित उन
उन सब उपास्य गुणों को, इसी उपासना में इकट्ठे करके उपा-
सना करनी चाहिये ।
आनन्दादेर्विधेयस्य गुणसङ्घस्य संहृतिः ।
आनन्दादय इत्यस्मिन् सूत्रे व्यासेन वर्णिता ॥६८॥
वे गुण दो प्रकार के हैं—एक 'विधेय' दूसरे 'निषेध्य' ।
उनमें आनन्द, [विज्ञान, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्य, मुक्त, निर-
ञ्जन, विभु, अद्वितीय, आनन्द, पर, प्रत्यगेकरस ] इत्यादि जो
जो भी विधेय गुण हैं, उन सबका उपसंहार इस उपासना में
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कर लेना चाहिए । यह बात 'आनन्दादयः प्रधानस्य' ( वेदान्त
३-३-११) [ प्रधान जो ब्रह्मतत्व है उसके जो आनन्द आदि
धर्म हैं उनका उपसंहार सभी जगह कर लेना चाहिए ] इस
सूत्र में व्यासदेव ने कही है।
अस्थूलादेर्निषेध्यस्य गुणसंघस्य संहृतिः ।
तथा व्यासेन सूत्रेऽस्मिन्नुक्ताऽक्षरधियां त्विति ॥६९॥
अस्थूल [ अनणु, अह्रस्व, अद्देश्य, अग्राह्य, अशब्द, अस्पर्श,
अरूप, तथा अव्यय ] आदि जो भी निषेध्य गुण हैं, जो जहां
तहां अध्यात्मशास्त्र में कहे गये हैं, उन सब का भी उपसंहार
इस उपासना में कर लेना चाहिये। यह बात 'अक्षरधियां त्ववरोधः
सामान्यतद्भावाभ्या मौपसदनवत्तदुक्तम् (वेदान्त ३-३-३३) इस
सूत्र में व्यासदेव ने कही है। अक्षर ब्रह्म में द्वैत का निषेध
करने वाली जो बुद्धियां हैं उनको सब ही निषेधों में उपसंहार
कर डालना चाहिये ।
निर्गुणब्रह्मतत्वस्य विद्यायां गुणसंहृतिः ।
न युज्येतेत्युपालम्भो व्यासं प्रत्येव मां न तु ॥७०॥
'निर्गुण ब्रह्म की विद्या में गुणों का उपसंहार तो ठीक ही
नहीं है। क्योंकि गुणों का उपसंहार निर्गुण विद्यापन का विरोधी
है' यह आक्षेप व्यासदेव पर ही करना चाहिये,मुझ पर नहीं।
मैंने तो केवल उनके कहे गुणोपसंहार का कथन कर दिया है।
हिरण्यश्मश्रुसूर्यादिमूर्तीनामनुदाहृतेः ।
अविरुद्धं निर्गुणत्वमिति चेत् तुष्यतां त्वया ॥७१॥
हिरण्यश्मश्रु युक्त सूर्य आदि सगुण मूर्तियों का कथन न
होने से, इस अस्थूलता आदि के होने पर भी निर्गुणता में कोई
३७८ पंचदशी
विरोध नहीं है [ निर्गुणता में विरोध तो किसी सगुण मूर्ति
से होता । इससे यह निर्गुणोपासना ही है] ऐसा यदि तू समझं
गया है तो तू सन्तोष कर [ तुझे तत्व का ज्ञान हो चुका है ]
गुणानां लक्षकत्वेन न तत्वेऽन्तः प्रवेशनम् ।
इति चेदस्त्वेवमेव ब्रह्मतत्वमुपास्यताम् ॥७२॥
आनन्दादि या अस्थूलादि जो गुण हैं वे तो वस्तु के लक्षक
होते हैं [ वे वस्तु की तरफ को संकेत ( इशारा ) भर कर
सकते हैं—वे उसके स्वरूप नहीं होते हैं ] वे उपास्य तत्व के
अन्दर तक प्रवेश नहीं करते हैं, ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे
कि हां ठीक है । ऐसे लक्षित ब्रह्म की ही उपासना किया करो
कि गुण उस के अन्दर तक नहीं प्रविष्ट होते हैं [ यों तुम लक्षित
ब्रह्म की ही उपासना किया करो ]
आनन्दादिभि रस्थूलादिभिश्चात्मात्र लक्षितः ।
अखण्डैकरसः सोहमस्मीत्येव मुपासते ॥७३॥
उपासना की रीति यह है—इन श्रुतियों में जो अखण्डैकरस
आत्मा आनन्द आदि तथा अस्थूल आदि गुणों से लक्षित किया
गया है, मुमुक्षु लोग उस की उपासना 'सोऽहमस्मि' वही मैं हूँ
इस रूप में किया करते हैं ।
बोधोपास्त्यो र्विशेषः क इति चेदुच्यते शृणु ।
वस्तुतन्त्रो भवेद् बोधः कर्तृतन्त्रमुपासनम् ॥७४॥
बोध और 'उपासना' में जो भेद है वह भी हमसे सुन लो—
ज्ञान तो ज्ञेय वस्तु के अधीन हुआ करता है । उसके विपरीत
उपासना कर्ता के अधीन होती है ।
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७९
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७९
विचाराज्जायते बोधोऽनिच्छा यं न निवर्तयेत् ।
स्वोत्पत्तिमात्रात् संसारे दहत्यखिलसत्यताम् ॥७५॥
बोध तो विचार से उत्पन्न हुआ करता है, मुझे बोध न हो
यह चाहने पर भी उस बोध को कोई रोक नहीं सकता । वह
बोध ज्यों ही उत्पन्न हो जाता है त्यों ही इस संसार की सत्यता
को जला देता है [ नष्ट कर देता है ]
तावता कृतकृत्यः सन्नित्यतृप्तिमुपागतः ।
जीवन्मुक्ति मनुप्राप्य प्रारब्धक्षयमीक्षते ॥७६॥
तत्वज्ञान के उत्पन्न हो जाने से ही नित्यतृप्ति अर्थात् सर्वा-
धिक सुख को पाकर, जीवन्मुक्ति का महालाभ करके, अपने
प्रारब्ध क्षय की बाट जोहने लगता है ।
आप्तोपदेशं विश्वस्य श्रद्धालु रविचारयन् ।
चिन्तयेत् प्रत्ययैरन्यै रनन्तरितवृत्तिभिः ॥७७॥
गुरु के उपदेश पर [ जिनमें उसने उपास्य के स्वरूप का
प्रतिपादन किया हो ] विश्वास करके, स्वयं उस पर कुछ भी
विचार न करके, अपने उपास्यतत्व का निरन्तर चिन्तन करे ।
ध्यान न रहे कि—इस चिन्तन के बीच में अन्य किसी भी
विषय का विचार न आने पाये ।
यावच्चिन्त्यस्वरूपत्वाभिमानः स्वस्य जायते ।
तावद् विचिन्त्य, पश्चाच्च तथैवामृति धारयेत् ॥७८॥
ऐसा चिन्तन कब तक करते जायें सो भी सुनो—चिन्तन
करते करते ऐसी अवस्था आ जायगी, कि तुम्हें स्वयं ही यह
भाव होने लगेगा कि यह चिन्त्य स्वरूप तो स्वयं मैं ही हूँ। बस
३८० पञ्चदशी
यहीं चिन्तन को समाप्त कर दो और मरणपर्यन्त इस धारणा
को बनाये रक्खो ।
ब्रह्मचारी भिक्षमाणो युतः संवर्गविद्यया ।
संवर्गरूपतां चित्ते धारयित्वा ह्यभिक्षत ॥७९॥
उपासक भी उपास्य रूप का अभिमान कर लेता है यह
बात शास्त्र में देखी गयी है—संवर्ग गुणवाले प्राण की उपासना
करने वाला कोई ब्रह्मचारी, जब भिक्षा करने चला तो उसने
अभिप्रतारि राजा के सामने अपने आप को संवर्ग रूप मानकर
ही भिक्षा की थी । यह बात छान्दोग्य में है ।
पुरुषस्येच्छया कर्तु मकर्तुं कर्तुमन्यथा ।
शक्योपास्तिरतो नित्यं कुर्यात् प्रत्ययसन्ततिम् ॥८०॥
उपासना तो पुरुष की इच्छा पर निर्भर रहती है । वह चाहे
करे, चाहे न करे, चाहे तो उलट पुलट कर डाले । इस लिये
उपासना तो सदा ही करनी चाहिये । [ उसे मरण-पर्यन्त
छोड़ना नहीं चाहिये ]
वेदाध्यायी ह्यप्रमत्तोऽधीते स्वप्नेऽधिवासतः।
जपिता तु जपत्येव तथा ध्यातापि वासयेत् ॥८१॥
जो सावधान वेदपाठी है, या जो सदा जप करता रहता
है, वह दृढ वासना के कारण सुपने में भी वेदपाठ या जप किया
ही करता है । इसी प्रकार उपासक लोग भी उपासना की
वासना को इतना दृढ करें कि सुपने आदि में भी उसी का
ध्यान आने लग पड़े ।
विरोधिप्रत्ययं त्यक्त्वा नैरन्तर्येण भावयन् ।
लभते वासनावेशात् स्वप्नादावपि भावनाम् ॥८२॥
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८१
[Header]
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८१
विरोधी विचारों का त्याग करके जब निरन्तर भावना की
जाती है तब संस्कारों की प्रबलता हो जाने से सपने आदि में
भी ध्यान होने लग जाता है ।
भुञ्जानोऽपि निजारब्धमास्थातिशयतोऽनिशम् ।
ध्यातुं शक्तो न संदेहो विषयव्यसनी यथा ॥८३॥
यदि किसी को अपने उपास्य में अधिक श्रद्धा हो तो अपने
प्रारब्ध को भोगते हुए भी विषयव्यसनी की तरह, निरन्तर उपा-
सना कर ही सकता है, इसमें सन्देह मत करो ।
परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मणि ।
तदेवास्वादयत्यन्तः परसंगरसायनम् ॥८४॥
लोक में भी देख लो कि—जिस नारी को परपुरुष का
व्यसन पड़ जाता है, वह घर के [लेपन संमार्जन आदि] कामों
में लगी रहने पर भी, अपने मन से उसी परसंगरसायन का
मज़ा चखा करती है ।
परसङ्गं स्वादयन्या अपि नो गृहकर्म तत् ।
कुण्ठीभवेदपि त्वेतदापातेनैव वर्तते ॥८५॥
परसंग का स्वाद लेने वाली उस नारी के घर के काम भी
बन्द नहीं हो जाते । वे भी बराबर चलते ही रहते हैं । उसके
ये काम तो ऊपर के मन से होते जाते हैं ।
गृहकृत्यव्यसनिनी यथा सम्यक् करोति तत् ।
परव्यसनिनी तद्वन्न करोत्येव सर्वथा ॥८६॥
अपने घर के कामों का ही जिस नारी को व्यसन है, वह
जैसे घर के काम भले प्रकार [जी लगाकर] करती है, परव्यस-
निनी नारी उसकी तरह घर के काम प्रेम से करती ही नहीं ।
एवं ध्यानैकनिष्ठोऽपि लेशाल्लौकिकमारभेत् ।
तत्ववित्त्वविरोधित्वाल्लौकिकं सम्यगाचरेत् ॥८७॥
उस नारी के समान ध्यानैकनिष्ठ पुरुष भी अपने लौकिक
कामों को अधूरे तौर पर करते रहते हैं । व्यवहार तत्वज्ञान का
विरोधी नहीं होता, इस कारण तत्वज्ञानी लोग तो लौकिक
कार्यों को भी भले प्रकार निभा ले जाते हैं [ ज्ञानी होते ही
लौकिक व्यवहार छुट जाता है, या छोड़ देना चाहिये, ऐसा
विचार भ्रमपूर्ण है । ज्ञानी लोगों के व्यवहार तो और लोगों
से उत्तम प्रकार के होने चाहियें । उनका व्यवहार दूसरों के
लिये आदर्श का काम दे, ऐसा होना चाहिये ] ।
मायामयः प्रपंचोऽय मात्मा चैतन्यरूपधृक् ।
इति बोधे विरोधः को लौकिकव्यवहारिणः ॥८८॥
जो तत्व ज्ञानी ऐसा समझकर लौकिक व्यवहार करता है
कि—यह प्रपंच तो मायामय है, आत्मतत्व तो केवल चैतन्य
रूप है, फिर बताओ कि उसे व्यवहार का विरोध कैसे होगा ?
अपेक्षते व्यवहृति र्न प्रपंचस्य वस्तुताम् ।
नाप्यात्मजाड्यं, किंन्त्वेषा साधनान्येव कांक्षति ॥८९॥
व्यवहार को न तो यही ज़रूरत है कि—'प्रपंच सच्चा ही
हो' न वह यही चाहता है कि 'आत्मा जड ही हो।' उसे तो
केवल साधनों की ही ज़रूरत होती है ।
मनोवाक्कायतद्वाह्यपदार्थाः साधनानि, तान् ।
तत्वविन्नोपमृद्नाति, व्यवहारोऽस्य नो कुतः ॥९०॥
जब कि तत्व ज्ञानी पुरुष मन, वाणी, काय तथा बाहर
के गृह-क्षेत्र आदि पदार्थों का—जो कि व्यवहार के साध-
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८३
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८३
हैं—उपमर्द [ निवारण ] ही नहीं करता है तब फिर इस ज्ञानी
का व्यवहार क्यों कर नहीं चलेगा ?
उपमृद्नाति चित्तं चेद् ध्यातासौ न तु तत्ववित् ।
न बुद्धिं मर्दयन् दृष्टो घटतत्वस्य वेदिता ॥९१॥
अगर कोई अपने चित्त का उपमर्द करता है तो वह ध्याता
[ उपासक ] है । वह तत्वज्ञानी नहीं है । लोक में भी देखते
हैं कि—घटतत्व का जाननेवाला पुरुष, बुद्धि का मर्दन [ किंवा
उसे एकाग्र ] करता हुआ कहीं भी नहीं देखा जाता ।
सकृत्प्रत्ययमात्रेण घटश्चेद् भासते सदा ।
स्वप्रकाशोऽयमात्मा किं घटवच्च न भासते ॥९२॥
यदि केवल एक बार के ही ज्ञान से घट का भास सदा के
लिये होजाता है [ और चित्त के निरोध की कोई जरूरत नहीं
रहती है ] तो भला स्वयं प्रकाश यह आत्मा—जो घट से बहुत
ही स्पष्ट है—घट की तरह ही क्यों नहीं भास सकता है ?
[ इस आत्मा के ज्ञान में चित्तनिरोध की कौन-सी आव-
श्यकता है ? ]
स्वप्रकाशतया किं ते तद् बुद्धिस्तत्ववेदनम् ।
बुद्धिश्च क्षणनाश्येति चोद्यं तुल्यं घटादिषु ॥९३॥
ब्रह्म यद्यपि स्वयं प्रकाश तो है, परन्तु ब्रह्म को विषय
करनेवाली बुद्धि ही तो तत्वज्ञान कहाती है, वह बुद्धि तो
क्षणिक है [ इस कारण वह चाहती है कि—उसकी स्थिति ब्रह्म
में बार बार की जांय, उसे बार बार उसमें लगाया जाय ] तो
भाई ! यह आशंका तो घटादियों में भी समान ही है ।
३८४ पञ्चदशी
तो घटादि भी यह चाहेंगे कि हम में भी बुद्धि को बार बार
लगाया जाय ] ।
घटादौ निश्चिते बुद्धिर्नश्यत्येव, यदा घटः ।
इष्टो नेतुं तदा शक्य इति चेत् सममात्मनि ॥९४॥
घटादि का निश्चय जब होजाता है तब घटज्ञान नष्ट तो हो
जाता है [ अथवा यों समझो कि घटादिज्ञान क्षणिक तो हैं ]
परन्तु फिर जब कभी घट की ज़रूरत हो तभी उस घट को
ले जा सकते हैं [उसमें चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत
नहीं होती ] तो हम कहेंगे कि—यही बात आत्मा के विषय
में भी समझ लो । [ उसमें भी चित्त को स्थिर कर रखने की
कोई आवश्यकता नहीं होती है ] ।
निश्चित्य सकृदात्मानं यदापेक्षा तदैव तम् ।
वक्तुं मन्तुं तथा ध्यातुं शक्नोत्येव हि तत्ववित् ॥९५॥
[ इस बात को आत्मा के विषय में यों समझो कि ] जब
एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय होजाता है, तब फिर
जब कभी अपेक्षा होती है तभी उसके विषय का कथन, मनन
या ध्यान ज्ञानी लोग कर ही सकते हैं ।
उपासक इव ध्यायन् लौकिकं विस्मरेद् यदि ।
विस्मरत्वेव सा ध्यानाद् विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥९६॥
तत्त्वज्ञानी लोग भी, ध्यान करते करते, यदि उपासकों के
समान ही, लौकिक बातों को भूलते हैं, तो भूल जायें । उनका
यह विस्मरण ध्यान की प्रबलता से है, यह विस्मरण ज्ञान के
कारण नहीं है ।
[Header: ध्यानदीपप्रकरणम् ३८५]
[Header: ध्यानदीपप्रकरणम् ३८५]
ध्यानं त्वैच्छिकमेतस्य वेदनान्मुक्तिसिद्धितः ।
ज्ञानादेव तु कैवल्यमिति शास्त्रेषु डिण्डिमः ॥९७॥
ध्यान करना तो तत्वज्ञानी की इच्छा पर निर्भर है [ वह
चाहे तो करे, न चाहे तो न करे] तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः
पन्था विद्यतेऽयनाय ( श्वे. ३-८ ) ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपापैः ( श्वे.
२-१५ ) इत्यादि शास्त्र तो डंके की चोट यह कह रहे हैं कि
कैवल्य तो अकेले ज्ञान से ही मिल जाता है [ उसके पाने के
लिये ध्यान आदि किसी की भी आवश्यकता नहीं है ]
तत्त्वविद् यदि न ध्यायेत् प्रवर्तेत तदा बहिः ।
प्रवर्त्ततां सुखेनार्यं को बाधोऽस्य प्रवर्त्तने ॥९८॥
'तत्वज्ञानी लोग यदि ध्यान न करेंगे तो फिर बाहर प्रवृत्ति
करेंगे ही' ऐसा यदि कोई कहे तो हम कहेंगे, तत्वज्ञानी लोग
सुख-पूर्वक बाह्य कामों में प्रवृत्ति करें । उनकी प्रवृत्ति में कोई
बाधा नहीं है ।
अतिप्रसङ्ग इति चेत् प्रसङ्गं तावदीरय ।
प्रसङ्गो विधिशास्त्रं चेन्न तत् तत्त्वविदं प्रति ॥९९॥
यदि कहो कि तत्वज्ञानी की बाह्यप्रवृत्ति मानने पर अति
प्रसङ्ग हो जायगा । तो हम कहते हैं कि [ तुम्हारी बात का
उत्तर तो हम पीछे से देंगे पहिले ] तुम प्रसङ्ग का अभिप्राय
बताओ कि प्रसंग किसे कहते हैं ? यदि कहो कि विधि या
निषेध शास्त्र को प्रसङ्ग कहते हैं । तो हम कहेंगे कि विधि या
निषेध शास्त्र तो ज्ञानी के लिये होते ही नहीं [ वे तो अज्ञानी
पर ही लागू होते हैं ]
३८६ पञ्चदशी
वर्णाश्रमवयोवस्थाभिमानो यस्य विद्यते ।
तस्यैव च निषेधाश्च विधयः सकला अपि ॥१००॥
जिस बेसमझ को देह के वर्ण, देह के आश्रम, देह की
आयु, और देह की अवस्थाओं का अभिमान हुआ रहता है,
[जो अज्ञानी इन सब को अपने ही माना करता है] ये सब
विधि और निषेध शास्त्र केवल उसी के लिए होते हैं ।
वर्णाश्रमादयो देहे मायया परिकल्पिताः ।
नात्मनो बोधरूपस्येत्येवं तस्य विनिश्चयः ॥१०१॥
तत्वज्ञानी को तो ऐसा दृढ निश्चय हुआ रहता है कि—
इन वर्णाश्रमादि को माया ने देह में ही कल्पित कर लिया है ।
ज्ञानरूप आत्मा के तो कोई भी वर्ण या आश्रमादि नहीं होते हैं।
समाधिमथ कर्माणि मा करोतु करोतु वा ।
हृदयेनास्तसर्वास्थो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥१०२॥
जिसने अपने जी से सम्पूर्ण आसक्तियों को निकाल कर
फेंक दिया हो, जिसका आशय किंवा ज्ञान निर्मल हो चुका हो,
वह तो मुक्त ही है। ऐसा महापुरुष समाधि करे या न करे,
काम करे या न करे, [यह सब उसकी इच्छा पर ही निर्भर है।
इस बारे में शास्त्र की जुरत उससे कुछ कहने की नहीं होती है]
नैष्कर्म्येण न तस्यार्थ स्तस्यार्थोऽस्ति न कर्मभिः ।
न समाधानजप्याभ्यां यस्य निर्वासनं मनः ॥१०३॥
[औरों ने भी कहा है कि]—जिसका मन वासनाओं से
रहित हो चुका है, कर्म को छोड़ बैठने या करते जाने से फिर
उसे कुछ मतलब नहीं रहता । समाधि और जप से उसका कुछ
प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ।
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८७
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८७
आत्मासङ्गस्ततोऽन्यत् स्यादिन्द्रजालं हि मायिकम् ।
इत्यचंचलनिर्णीते कुतो मनसि वासना ॥१०४॥
आत्मा असंग पदार्थ है, उससे भिन्न सभी कुछ इन्द्रजाल
के समान मायिक है । ऐसा स्थिर निर्णय कर चुकने के बाद
मन में वासना कैसे उठेगी ? भाव यह है कि—तत्त्वज्ञानी के
मन में वासना नहीं उठती । फिर बताओ कि वह उस वासना
को हटाने के लिए ध्यान भी क्यों करेगा ?
एवं नास्ति प्रसङ्गोऽपि कुतोऽस्यातिप्रसञ्जनम् ।
प्रसङ्गो यस्य तस्यैव शङ्क्येतातिप्रसञ्जनम् ॥१०५॥
[प्रकृत बात तो इतनी ही है कि] इस प्रकार जब ज्ञानी
को प्रसङ्ग ही नहीं है तब फिर उसे अतिप्रसङ्ग कैसे हो जायगा ?
यह अतिप्रसङ्ग तो उसी को होता है जिसको कि प्रसङ्ग का
बन्धन हो। [प्रसङ्ग वाला पुरुष जब प्रसङ्ग की अवहेलना करता
है तब वह उसकी अतिप्रसक्ति कही जाती है ।]
विध्यभावान्न बालस्य दृश्यतेऽतिप्रसंजनम् ।
स्यात् कुतोऽतिप्रसङ्गोऽस्य विध्यभावे समे सति ॥१०६॥
[यह बात लोक में भी देखी जाती है] बालकों पर विधि-
शास्त्र नहीं चलता तो उनकी अतिप्रसक्ति भी नहीं मानी जाती।
ज्ञानी और बालक दोनों को ही विधि या निषेध शास्त्र का अभाव
समान है। फिर इस विचारे ज्ञानी को ही अतिप्रसङ्ग कैसे हो
जायगा ?
न किञ्चिद्वेत्ति बालश्चेत् सर्वं वेत्येव तत्त्ववित् ।
अल्पज्ञस्यैव विधयः सर्वे स्यु र्नान्ययोर्द्वयोः ॥१०७॥
यदि कहो कि बालक तो कुछ भी नहीं जानता ।
३८८ पञ्चदशी
अज्ञता उस पर विधि का जोर नहीं चलने देती] तो हम कहेंगे
कि ज्ञानी सब कुछ जानता है [उसकी सर्वज्ञता उस पर विधि
का अंकुश नहीं रखने देती] देखो विधि के अधिकार की बात
तो इतनी ही है कि—जो अल्पज्ञ है, उसी के लिए ये विधि
और निषेध शास्त्र बनाये गये हैं। अज्ञ और सर्वज्ञ के लिए
विधि या निषेध कुछ भी नहीं होता।
शापानुग्रहसामर्थ्यं यस्यासौ तत्वविद् यदि ।
तन्न, शापादिसामर्थ्यं फलं स्यात्तपसो यतः ॥१०८॥
यदि कहो कि—ऐसा भी क्या तत्वज्ञानी, जो किसी को
शाप या वरदान तक न दे सके ? जिसमें ये दोनों सामर्थ्य हों
लोक में तो उसी को तत्वज्ञानी [या पहुँचा हुआ महात्मा] सम-
झते हैं। यह विचार ठीक नहीं है। क्योंकि शापादि सामर्थ्य
तो उनके तप का फल है [यह कोई तत्वज्ञान का फल नहीं है]
व्यासादेरपि सामर्थ्यं दृश्यते तपसो बलात् ।
शापादिकारणा दन्यत् तपो ज्ञानस्य कारणम् ॥१०९॥
यदि कहो कि व्यास जैसे तत्वदर्शी में भी शापानुग्रह-
सामर्थ्य [ शाप और वरदान की शक्ति ] था तो हम कहेंगे कि
उनमें वह सामर्थ्य ज्ञान के कारण नहीं था। वह तो उनके
तपोबल से था। तप भी दो प्रकार का होता है—एक तप
तत्व ज्ञान का कारण है, दूसरे तप से शाप और अनुग्रह का
सामर्थ्य उत्पन्न होता है।
द्वयं यस्यास्ति तस्यैव सामर्थ्यज्ञानयोर्जनिः ।
एकैकं तु तपः कुर्वन्नेकैकं लभते फलम् ॥११०॥
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८९
ध्यानदीपप्रकरणम् ३८९
दोनों प्रकार के तप जिसने किये हों, उसी में सामर्थ्य और
ज्ञान दोनों पाये जा सकते हैं। जो तो अकेले अकेले तप को
करेगा! उसे तो एक ही एक फल मिल सकता है ।
सामर्थ्यहीनो निन्द्यश्चेद् यतिभि र्विधिवर्जितः ।
निन्द्यन्ते यतयोऽप्यन्यै रनिशं भोगलम्पटैः ॥१११॥
जिन ज्ञानी पुरुषों में शापादि का सामर्थ्य नहीं है और
[ ज्ञानी होने के नाते ] विधि से रहित हैं, तो ऐसे ज्ञानी को
विहित कर्मों का पालन करने वाले लोग निन्द्य समझते हैं।
इसका उत्तर यह है कि—यदि ऐसी निन्दा से डरोगे तो फिर
उन विध्यनुसारी लोगों की निन्दा भी तो विषयलम्पट लोग
सदा किया ही करते हैं [ वे तो कर्मी को पाखण्डी और पोप
नाम से पुकारते हैं। इस निन्दा से जैसे सच्चे कर्मी को कुछ
दुःख नहीं होता, इसी प्रकार कर्मी की निन्दा से सामर्थ्यहीन
ज्ञानी को दुःख नहीं हो सकता ]
भिक्षावस्त्रादि रक्षेयुर्यद्येते भोगतृप्तये ।
अहो यतित्वमेतेषां वैराग्यभरमन्थरम् ॥११२॥
यदि ये लोग भी भोग की तृप्ति के लिये भोजन वस्त्रादि
का उपार्जन करने लगें तो वह उनका यतिपन ही क्या हुआ ?
[ फिर उन्हें गृहस्थ आश्रम में ही कौनसी आफ़त थी । भाव
यह है कि यतिधर्म में दीक्षित पुरुष अपने व्यष्टि अहं के
लिये कुछ भी काम नहीं कर सकता है । उसे तो व्यष्टि अभि-
मान का पोषण करने वाली प्रत्येक बात से परहेज करना
चाहिये । नहीं तो उसका यतिधर्म नष्ट हो जाता है ]
वर्णाश्रमपरान् मूढा निन्दन्त्वित्युच्यते यदि ।
देहात्ममतयो बुद्धं निन्दन्त्वाश्रममानिनः ॥११३॥
यदि यह कहो कि मूढ [ अर्थात् विषयलम्पट और पामर ]
लोगों की निन्दा से वर्णाश्रम धर्म को पालने वाले [ कर्मी ]
की कुछ हानि नहीं होती है । फिर वे भले ही उनकी निन्दा
करते रहें, तो हम कहेंगे कि—देह को ही आत्मा मानने वाले,
आश्रमों का अभिमान करने वाले, कर्मी लोग तत्वज्ञानी की
निन्दा भी भले ही किया करें, उसकी भी उससे कुछ भी हानि
नहीं हो सकती ।
तदित्थं तत्वविज्ञाने साधनानुपमर्दनात् ।
ज्ञानिनाचरितुं शक्यं सम्यग् राज्यादि लौकिकम् ॥११४॥
[ प्रकृत बात तो यही हुई कि ] उक्त रीति से तत्वज्ञान हो
जाने के बाद लौकिक व्यवहार जिन मन आदि साधनों से
चलता है, उनका उपमर्द किंवा विनाश नहीं हो जाता, इस
लिये तत्वज्ञानी लोग लौकिक राज्य [ उस जैसे बड़े-बड़े काम
भी] भले प्रकार चला ही सकते हैं। [ज्ञानी होने का यह अभि-
प्राय कदापि नहीं है कि ज्ञानी पुरुष निकम्मा होकर क्षयरोगी
की तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाय या कहीं एकान्त गुफ़ा
में ही जा पड़े। जिन लोगों का विचार यह है कि ज्ञान हो जाने
पर तो कुछ काम हो ही नहीं सकता । वे तो तत्वज्ञान को
एक प्रकार का पक्षाघात रोग मानते हैं। ज्ञान तो मन की एक
उच्चतम अवस्था है । शरीर आदि के व्यापारों पर उसका कुछ
भी प्रभाव नहीं पड़ता । ज्ञान हो जाने पर भी शरीर आदि के
व्यापार ज्यों के त्यों चलते रह सकते हैं । ज्ञान होने पर केवल