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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 726 में से

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ध्यानदीपप्रकरणम् ३८३
हैं—उपमर्द [ निवारण ] ही नहीं करता है तब फिर इस ज्ञानी
का व्यवहार क्यों कर नहीं चलेगा ?
उपमृद्नाति चित्तं चेद् ध्यातासौ न तु तत्ववित् ।
न बुद्धिं मर्दयन् दृष्टो घटतत्वस्य वेदिता ॥९१॥
अगर कोई अपने चित्त का उपमर्द करता है तो वह ध्याता
[ उपासक ] है । वह तत्वज्ञानी नहीं है । लोक में भी देखते
हैं कि—घटतत्व का जाननेवाला पुरुष, बुद्धि का मर्दन [ किंवा
उसे एकाग्र ] करता हुआ कहीं भी नहीं देखा जाता ।
सकृत्प्रत्ययमात्रेण घटश्चेद् भासते सदा ।
स्वप्रकाशोऽयमात्मा किं घटवच्च न भासते ॥९२॥
यदि केवल एक बार के ही ज्ञान से घट का भास सदा के
लिये होजाता है [ और चित्त के निरोध की कोई जरूरत नहीं
रहती है ] तो भला स्वयं प्रकाश यह आत्मा—जो घट से बहुत
ही स्पष्ट है—घट की तरह ही क्यों नहीं भास सकता है ?
[ इस आत्मा के ज्ञान में चित्तनिरोध की कौन-सी आव-
श्यकता है ? ]
स्वप्रकाशतया किं ते तद् बुद्धिस्तत्ववेदनम् ।
बुद्धिश्च क्षणनाश्येति चोद्यं तुल्यं घटादिषु ॥९३॥
ब्रह्म यद्यपि स्वयं प्रकाश तो है, परन्तु ब्रह्म को विषय
करनेवाली बुद्धि ही तो तत्वज्ञान कहाती है, वह बुद्धि तो
क्षणिक है [ इस कारण वह चाहती है कि—उसकी स्थिति ब्रह्म
में बार बार की जांय, उसे बार बार उसमें लगाया जाय ] तो
भाई ! यह आशंका तो घटादियों में भी समान ही है ।