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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 726 में से

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पृष्ठ 465

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३
मय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुमय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, आपो-
मय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतजोमय, काममय
अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय आदि] आकारविशेषों से युक्त
था, वही अब लय के कारण [विज्ञान आदि उपाधियों के विलीन
हो जाने के कारण] एकरूप हो जाता है। मानो बहुत से चावलों
को पीस कर उन की एक पिष्ठी बना ली गयी हो । [इसी को
उसका एकीभाव कहते हैं ]
प्रज्ञानानि पुरा बुद्धिवृत्तयोऽथ घनोऽभवत् ।
घनत्वं हिमबिन्दूना मुदग्देशे यथा तथा ॥७०॥
[उस श्रुति के प्रज्ञानघन शब्द का अर्थ यह है कि]—पुरा
अर्थात् पहले जाग्रदादि के समय घटादि को विषय करने वाली
प्रज्ञान नाम की जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थीं, अब [सुषुप्ति-
काल के आजाने पर जब कि कोई भी घटादि विषय नहीं रहते
तब] उन सब वृत्तियों का एक घन हो जाता है [अब उनका
केवल एक चिद्रूप ही हो जाता है] जैसे कि उत्तर दिशा में बरफ़
की बहुत सी बूंदों का घनाकार पिण्ड हो गया हो ।
तद्घनत्वं साक्षिभावं दुःखाभावं प्रचक्षते ।
लौकिकास्तार्किका यावद्दुःखवृत्तिविलोपनाव् ॥७१॥
यह जो वेदान्तों में साक्षी कहाने वाली प्रज्ञानघनता है उसी
को तो लौकिक लोग [जिन्हें शास्त्र का संस्कार ही नहीं है] तथा
तार्किक आदि लोग, दुःखाभाव कहते हैं या समझते हैं। क्योंकि
उस समय जितनी भी दुःखवृत्तियां होती हैं उन सभी का विलय
हो जाता है [वे लोग इसी बात को न समझ कर उस प्रज्ञान-
घनता को ही दुःखाभाव समझ बैठते हैं]