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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 726 में से

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पृष्ठ 267

तृप्तिदीपप्रकरणम् २४७
किञ्चन मिषत्' (ऐत० १-१) इस वाक्य से तो पहले ब्रह्म को
लक्षित किया गया, फिर 'स ईक्षत लोकान्नु सृजा' (ऐत० १-१)
इत्यादि रीति से प्रारम्भ करके 'तस्य त्रय आवसथा स्त्रयः स्वप्ना
अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथः' (ऐत० ३-१२) तक जगत् के
आरोप की रीति बतायी गयी। फिर 'स जातो भूतान्यभिव्यैक्षत
किमिहान्यं वावदिषत्' (एते० ३-१३) इसमें आरोपित किये हुए का
अपवाद (खण्डन) किया गया। उस के पश्चात् 'स एतमेव पुरुषं
ब्रह्म ततमपश्यदिदमदर्शमिति' (ऐत० ३-१३) इस वाक्य में प्रत्य-
गात्मा के रूप में ब्रह्मस्वरूप को प्रत्यक्ष देखा गया। उस के
अनन्तर 'पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो जायते' (ऐत० ४-१) इत्यादि
वाक्यों में ज्ञान के साधन वैराग्य को उत्पन्न करने के लिये
गर्भवासादि के दुःखों का प्रदर्शन कराया गया। फिर 'कोय-
मात्मेति वयमुपास्महे' (ऐत० ५-१) इत्यादि विचार के द्वारा 'तत्'
'त्वं' पदार्थ का परिशोधन करने के पश्चात् प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐत०५-१)
इस महावाक्य के द्वारा प्रज्ञानरूप आत्मा की ब्रह्मता का प्रद्-
र्शन किया गया है।
अवान्तरेण वाक्येन परोक्षा ब्रह्मधीर्भवेत् ।
सर्वत्रैव महावाक्यविचारादपरोक्षधीः ॥६९॥
[इन ही उपनिषदों में नहीं और भी] सब शास्त्रों में
अवान्तर वाक्यों से तो परोक्ष ब्रह्मज्ञान कराया जाता है
तथा महावाक्यों के द्वारा अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ब्रह्मज्ञान किया
जाता है।
ब्रह्मापरोक्ष्यसिद्धयर्थं महावाक्यमितीरितम् ।
वाक्यवृत्तावतो ब्रह्मापरोक्ष्ये विमतिर्नहि ॥७०॥