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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 726 में से

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पृष्ठ 266

२४६ पञ्चदशी
सत्यं ज्ञान मनन्तं चेत्येवं ब्रह्मस्वलक्षणम् ।
उक्त्वा गुहाहितत्वेन कोशेष्वेतत् प्रदर्शितम् ॥६६॥
'सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह्म' (तै० २-१) इस वाक्य से ब्रह्म के
स्वरूप लक्षण को बता कर 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्'
(मुण्ड० २-१-१०) इस वाक्य के द्वारा पांचों कोशों रूपी
गुहाओं के अन्दर छिपे बैठे हुए, उसी को प्रत्यगात्मा कह दिया
है [अर्थात् सत्यादि स्वरूप वाले ब्रह्म ने ही प्रत्यग्रूप धारण कर
लिया है। ऐसा श्रुतियों का अभिप्राय है। वे प्रत्यगात्मा और
ब्रह्म में भेद नहीं समझती हैं]।
पारोक्ष्येण विबुध्येन्द्रो य आत्मेत्यादिलक्षणात् ।
अपरोक्षीकर्तुमिच्छंश्चतुर्वारं गुरुं ययौ ॥६७॥
'य आत्मा पहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकः' (छा०८-७-१)
इस वाक्य में बताये हुए लक्षण से इन्द्र ने आत्मा को पहले
परोक्षरूप से ही तो जान लिया था—फिर [तीनों शरीरों का
निराकरण करके] आत्मा को साक्षात् करने के लिये, चार बार
गुरु के पास गया था। [यह बात छान्दोग्य के आठवें अध्याय
में कही गयी है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि परोक्षज्ञान
के पश्चात् विचार करने पर ही साक्षात्कार हुआ करता है]
आत्मा वा इदमित्यादौ परोक्षं ब्रह्म लक्षितम् ।
अध्यारोपापवादाभ्यां प्रज्ञानं ब्रह्म दर्शितम् ॥६८॥
'आत्मा वा इदं' इत्यादि ऐतरेय में पहले लक्षणा द्वारा परोक्ष-
रीति से ब्रह्म का कथन किया गया। फिर अध्यारोप और
अपवाद के द्वारा प्रज्ञानरूप ब्रह्म को साक्षात् दिखाया गया।