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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 726 में से

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जायगा कि यह तो मुझे कुछ भी मालूम नहीं है। यही कारण
है कि महापुरुष इसको [पहली बार ही] इन्द्रजाल कह देते हैं।
एतस्मात् किमिवेन्द्रजालमपरं यद् गर्भवासस्थितं ।
रेतश्चेतति हस्तमस्तकपदप्रोग्भूतनानाङ्कुरम् ।
पर्यायेण शिशुत्व-यौवन-जरोवैपैरनेकैर्वृतं ।
पश्यत्यत्तिशृणोतिजिघ्रति तथा गच्छत्यथागच्छति।१४७
गर्भपात्र में पड़ा हुआ वीर्य, चेतन होजाता है। उसमें हाथ,
मस्तक, पैर आदि नाना अङ्कुर फूट आते हैं। वह फिर क्रम से कभी
बालपन, कभी यौवन, तथा कभी वार्धक्य नाम के अनेक वेषों
को ओढ़ा करता है और देखता, खाता, सुनता, सूंघता, तथा आने
जाने लगता है। बताओ तो इससे बड़ा इन्द्रजाल और क्या होगा ?
देहवद् वटधानादौ सुविचार्य विलोक्यताम् ।
क्व धाना कुत्र वा वृक्षस्तस्मान्मायेति निश्चिनु ॥१४८॥
देह के समान ही बढ़ आदि वृक्षों के क्षुद्र बीजों पर भी
भले प्रकार विचार कर देख लो कि—कहां तो वह विचारा क्षुद्र
सा बीज और कहां वह विशाल वृक्ष ? यह सब देखकर निश्चय
कर लो कि यह सब माया ही तो है।
निरुक्तावभिमानं ये दधते तार्किकादयः ।
हर्षमिश्रादिभिस्ते तु खण्डनादौ सुशिक्षिताः ॥१४९॥
तुम्हें ही नहीं और भी जो बड़े बड़े तार्किक इस संसार की
निरुक्ति का दम भरते हैं, खण्डन आदि ग्रन्थों में हर्षमिश्र आदि
ने उनकी खूब खबर ली है [ उनके उस अभिमान को प्रबल
युक्तियों से चूर्ण चूर्ण कर दिया है।]