पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
५६६ पञ्चदशी
प्रकाश भासने लग पड़ता है तब फिर यह दीखने वाली त्रिपुटी
नहीं रह जाती। यही कारण है कि उस को 'भूमानन्द' कहा
जाता है।
ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे पंचमोध्याय ईरितः ।
विषयानन्द एतेन द्वारेणान्तः प्रविश्यताम् ॥३४॥
ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में विषयानन्द नाम का पांचवां
अध्याय समाप्त हुआ। मन्दाधिकारी लोग इसी को द्वार बना
कर आत्ममन्दिर में घुस बैठें ।
प्रीयाद्धरिर्हरोऽनेन · ब्रह्मानन्देन सर्वदा ।
पायाच्च प्राणिनः सर्वान् स्वाश्रिताञ्छुुद्धमानसान्॥३५॥
इस ब्रह्मानन्द नाम की पुस्तक से हरि और हर प्रसन्न हो
जांय । [ अपना प्रसन्न रूप साधकों को दिखाने पर उतारू हो
जांय ]। शुद्ध मन वाले जितने भी प्राणी उनके आश्रय में पड़े
हैं वे उन सब का पालन करें [ उन्हें इस संसार सागर से पार
कर दें । ]
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां
ब्रह्मानन्दे विषयानन्दः समाप्तः
[ पंचदशी समाप्ता ]
Summary of 15 Chapters
ओम्
पंचदशी के प्रत्येक प्रकरण के
भावपूर्ण
संक्षेप
श्लोकों को पढ़ने से पूर्व यदि इन संक्षेपों को
पढ़ लिया जायगा तो प्रकरण का
भाव समझने में बहुत
सहायता मिलेगी ।
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1. Tattvaviveka
ओम्
[ १ ]
तत्त्वविवेक का संक्षेप
जिन को जिस बात की आवश्यकता हो और उसको ग्रहण
करने में समर्थ भी हों, तो वे उसके 'अधिकारी' कहाते हैं । जो
जिस बात के अधिकारी नहीं होते, वे यदि उस बात को सुनें भी
तो वे उसे न समझने के कारण उससे कुछ भी लाभ नहीं उठा
सकते । जिनके चित्त रागादि दोषों से रहित हो चुके हों, जिन्हें
संसार की सच्ची स्थिति का पूर्ण परिज्ञान हो चुका हो, जिन पर माया
का मोहक प्रभाव पड़ना बन्द होगया हो, जिनका ज्ञाननेत्र खुलना
चाहता हो, वसन्त ऋतु के आने पर सर्वतः अंकुरित पौधे के समान
ज्ञानाङ्कुर जिनके अन्दर से फूट निकलने की तैयारी कर चुका हो,
संक्षेप में यों कहो कि जो नित्यानित्य वस्तुओं को पहचान चुके हों,
इसी कारण इस लोक और परलोक के भोगों से जिन्होंने मुंह मोड़
लिया हो, जिनकी इन्द्रियाँ भी निगृहीत होगयी हों, जिनके मन के
पांव में शम की भारी शंखला पड़ गयी हो, जिनके लिये अब केवल
एक मुक्ति का ही दर्वाज़ा खुला रह गया हो, उन लोगों को सरलता
से तत्वज्ञान कराने के लिये इस प्रकरण का निर्माण किया गया है,
वे ही इसको पढ़ने के अधिकारी हैं । इससे उनको तत्व अर्थात्
अनारोपित रूप की पहचान हो जायगी कि वह कौनसा है ?
४ पञ्चदशी
ब्रह्म का जो सच्चिदानन्द स्वरूप शास्त्र में बताया गया है ठीक
वही लक्षण इस जीव में भी पाया जाता है। पहले 'सत्ता' को ही
देख लें। सभी कहते हैं कि 'मैं हूँ' अर्थात् मेरी सत्ता है [मैं सत्
हूँ] मैं एक त्रिकाल में रहने वाला पदार्थ हूँ। अब ज्ञान के विषय
में भी विचार करें—जागरण काल में हमें शब्दस्पर्शादि के अन-
गिनत ज्ञान होते हैं। उन ज्ञानों में, ज्ञान के विषय, शब्द या
स्पर्श आदि, भले ही पृथक् पृथक् होते जायें, परन्तु उन सब
विषयों को प्रकाशित करने वाला 'ज्ञान' तो सदा एकरूप ही
रहता है। इस ज्ञान में जो कि भेद प्रतीत होने लगा है, वह
शब्दस्पर्शादि उपाधियों के कारण ही है। जागरण और स्वप्न के
ज्ञानों का विचार भी इसी प्रक्रिया से कर लेना चाहिये। जागरण
और स्वप्न भले ही भिन्न भिन्न होते जायं, परन्तु उभयवर्ती सूत्र-
रूप जो ज्ञान है, वह तो अखण्ड ही रहता है। सोते समय जो
हमें अज्ञान का ज्ञान रहता है, वह ज्ञान भी एक अखण्ड तत्व
ही है। कहने का तात्पर्य यही है कि दिन पर दिन, मास पर
मास, वर्ष पर वर्ष, युग पर युग और कल्प पर कल्प बीत गये
और बीतते चले जायेंगे; परन्तु यह ज्ञानदेव लुहार के ऐरन के
समान, वैसे के वैसे ही स्वयंप्रकाश बन कर डट रहे हैं और
डटें रहेंगे। इन ज्ञानदेव ने इस त्रिभुवन को व्याप्त कर रक्खा है।
यदि अरबों कोस दूर अपने मन को भेजें या अनन्त कोटि
सूर्यों का चक्कर लगाने का अपने मन को आदेश दे दें, तो भी
यह ज्ञानदेव वहां पहले से ही बैठे पाये जाते हैं। सृष्टि बनने से
पहले भी ये थे और नष्ट हो जाने के पश्चात् भी रहेंगे ही। ये
न हों तो उन दोनों अवस्थाओं को कैसे जानें ? बस. ये व्यापक
(देश और काल में व्यापक) ज्ञान ही आत्मा हैं। अब इनकी
तत्वविवेक का संक्षेप ५
तत्वविवेक का संक्षेप ५
परमानन्दरूपता का भी थोड़ा विचार करें। हरएक प्राणी अपने
को ऐसा आशिष देता है कि मैं तो सदा ही बना रहूँ। जानते
हो ऐसी आशंसा का गुप्त कारण क्या है ? इसका कारण आत्मा
की सामान्य आनन्दरूपता नहीं है, किन्तु आत्मा की परमानन्द-
रूपता ही ऐसी सर्वहृदयेश्वरी अभिलाषा का मुख्य कारण है।
इस आत्मप्रेम को परमानन्दरूप कह देने का साहस हमने यों
किया है कि यह प्रेम अपने स्वार्थ से तो दूसरों में भी हो जाता
है, परन्तु दूसरों के स्वार्थ से अपने में प्रेम होने की बात कहीं
देखी नहीं गई।
यों जो (सत् चित् आनन्द) लक्षण ब्रह्म में बताये जाते हैं
वे सभी इस आत्मा में भी पाये जाते हैं। अब जिसको अधिकारी
देखते हैं, उससे वेदान्त और आचार्य यह महावार्ता कह देते हैं
कि ओ दिङ्मूढ प्राणी! आत्मा और ब्रह्म ये दो पदार्थ नहीं हैं।
ये तो एक ही वस्तु के दो नाम रख लिये गये हैं।
आत्मा की जिस परमानन्दरूपता का वर्णन ऊपर किया है,
वह ऐसी विचित्र परिस्थिति में फँस गई है कि वह ज्ञात भी रहती
है और अज्ञात भी बनी रहती है। आत्मा की इस परमानन्द-
रूपता को अंशतः छिपा लेने वाली अविद्या के ही 'माया' और
'अविद्या' नाम के दो बड़े भेद हैं। इन्हीं से ईश्वर, प्राज्ञ, आकाश
आदि पांच भूत, पांच ज्ञानेन्द्रियें, मन, बुद्धि, पांच कर्मेन्द्रियें,
पांच प्रकार के प्राण, ये सब कुछ उत्पन्न हो जाते हैं। इनसे फिर
तैजस और हिरण्यगर्भ का जन्म होता है। फिर इन पांचों भूतों
को स्थूल रूप में लाने के लिये इनका मिश्रण किया जाता है,
जिसे 'पंचीकरण' कहते हैं। उन पंचीकृत भूतों से ब्रह्माण्ड
भुवन तथा अनेक प्रकार के स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है।
६ · पञ्चदशी
कारण और सूक्ष्म शरीर तो सम्पूर्ण प्राणियों के एक समान ही
होते हैं केवल स्थूल शरीरों में ही भिन्नता है । 'वैश्वानर' और
'विश्व' की कल्पना भी इन ही स्थूल शरीरों के आधार से की
जाती है । विश्व कहाने वाले इन देवता पशु पक्षी और मनु-
ष्यादियों को, अन्दर के गुप्त तत्व का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है ।
तमाशा देखने वाले बालक जैसे द्वारों पर खड़े रहते हैं, उसी
तरह ये अपने अज्ञान के कारण सदा ज्ञानेन्द्रिय द्वार पर खड़े
रहते हैं और कर्मेन्द्रिय रूपी मज़दूरों से कुछ उलट पुलट कराया
करते हैं । इनकी बेसमझी को कहां तक कहा जाय, ये ऐसे
चक्कर में फंसे हैं, ये ऐसे भंवर में पड़ गये हैं कि इनका निस्तार
होना ही कठिन हो गया है ।
ये काम करते हैं इसलिये कि कुछ भोग [ मज़ा ] करेंगे ।
ये भोगते हैं इसलिये कि कुछ काम करेंगे । कर्म करने के कारण
तो इनको उस कर्म का फल भोगना आवश्यक हो जाता है । भोग
कर जब इन्हें कुछ क्षुद्र मज़ा हाथ आ जाता है तब ये दुगने
उत्साह से फिर-फिर कर्मजाल में फँस जाते हैं। यों कर्म से भोग
और भोग से कर्म की उत्पत्ति होती रहती है । इन कर्म और
भोगों का पार ही इनके हाथ नहीं आता । इनके मन में कभी
यह सवाल ही पैदा नहीं होता कि क्या हम सदा इस कर्म और
भोग की श्रृंखला में ही जकड़े रहेंगे ? या कभी हमको इससे
छुट्टी भी मिलेगी ? बेद्वार के दर्वाजे में बन्द किये अन्धों की तरह
ये जन्मजन्मान्तरों में चक्कर लगाते रहते हैं। इन्हें कभी भी सुख
के दर्शन नहीं होते । इनकी हालत नदी में बहते हुए उन कीड़ों
की सी होती है जो एक भंवर से निकल कर दूसरे में फँस जाते
हैं, उसमें से निकल कर तीसरे में जा गिरते हैं। जब कभी किसी
तत्वविवेक का संक्षेप ७
तत्वविवेक का संक्षेप ७
के कोटि पुण्यों का उदय होता है तब उसे संसार के गहन तत्व
के पारखी गुरु के दर्शन मिल जाते हैं ।
संसार में जल के अथाह समुद्र भर पड़े हैं परन्तु मेघ के
द्वारा आया हुआ जल ही पेय होता है । इसी प्रकार आत्मतत्व
इस संसार में अनन्त रूप से परिपूर्ण हो ही रहा है, परन्तु वह
हमारा उपयोगी तो गुरु के द्वारा हीं होता है । गाय के शरीर में जो
घी रहता है वह उसके शरीर को पुष्ट नहीं करता । जब तो
उसी को दुहकर बिलोकर फिर उस गाय को खिलाते हैं तब
उसके शरीर की पुष्टि होती है । इसी प्रकार जो हमारा मथन करके
आत्मसर्पि निकाल कर हमें ही खिला सके, वैसे गुरु की आव-
श्यकता रहती ही है । गुरु की आवश्यकता पर कबीर के शब्द
बड़े ही हृदयग्राही हैं:—
वस्तु कहीं ढूँढे कहीं केह विध आवे हाथ ।
कहे कबीर तब पाइया जब भेदी लीना साथ ॥
भेदी लीना साथ कर दीना वस्तु लखाय ।
कोटि जनम का पन्थ था क्षण में पहुँचा जाय ॥
उस आचार्य के उपदेश से पांच कोशों में छिपे हुए आत्मा
की सम्भावना मन में दृढतापूर्वक बैठ जाती है । जब यह आत्मा
पांचों कोशों से छिप जाता है तब आत्मविस्मरण होकर इसे
संसार में फंसना पड़ जाता है ।
मूँज में से जैसे तुली को निकाल लेते हैं इसी प्रकार आचार्यों
की बताई युक्ति से जब धीर लोग इन तीनों शरीरों में रमे हुए
आत्मतत्व का उद्धार कर चुकते हैं, तब उस उद्धृत आत्मा में वे
ही लक्षण स्पष्ट दीखने लगते हैं जो कि ब्रह्म में बताये गये हैं ।
लक्षण की एकता को देख कर तब साधक को कहना पड़ जाता
८ पञ्चदशी
है कि मैं तो परब्रह्म तत्व 'ही हूँ'। इतने से पर और अपर
आत्मा की एकता की सम्भावना तो पाठकों के हृदय में बैठ ही
जाती है। तत्वमसि आदि जो महावाक्य हैं वे इसी एकता
की साक्षी देकर चले जाते हैं। अधिकारी लोग इन वाक्यों को
जब विधिपूर्वक सुनते हैं तब उन्हें अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्म की
दिव्य सूचना मिल ही जाती है।
श्रवण और मनन के प्रताप से जब इस परमार्थ में की
विचिकित्सार्यें भाग जाती हैं और इसी परमार्थ में चित्त को ठहरा
कर, तैल की धारा के समान एकाकार वृत्ति का प्रवाह बहा दिया
जाता है, तब बस यही 'निदिध्यासन' कहाता है। इस निदि-
ध्यासन की जब परिपाकावस्था आती है तब उसके माहात्म्य
का क्या वर्णन करें। तब तो ध्याता और ध्यान दोनों ही खोये
जाते हैं। उस समय के ध्येयैकगोचर चित्त की अलौकिक
अवस्था को तो ऐसा समझो जैसा कि वायुरहित प्रदेश में जलता
हुआ या चित्र में खींचा हुआ कोई दीपक ही हो। ऐसी अवस्था
जब किसी के चित्त की हो जाय तब उसे समझ लेना चाहिए
कि 'समाधि' होने लगी है। इस समाधि का महाद्भुत प्रताप यह
है कि हमने अनादिकाल से जो अनन्त कर्मों के कूड़े इकट्ठे कर
रक्खे हैं वे सब के सब इस समाधि से नष्ट हो जाते हैं। शुद्ध
धर्म की वृद्धि होने लगती है, जिससे कार्यसहित अविद्या को
मार भगाने वाला साक्षात्कार आ धमकता है। इस समाधि को
करते करते जब सम्पूर्ण वासनाजाल विनष्ट हो चुके हों, जब
पुण्य पाप नाम के कर्मों के ढेर का समूल उन्मूलन हो चुका हो,
तब कहीं जाकर 'तत्वमसि' आदि वाक्यों का सच्चा अर्थ समझ
में आया करता है। ऐसी उदार अवस्था के आने से पहले पहले
तत्त्वविवेक का संक्षेप ९
तत्त्वविवेक का संक्षेप ९
हमें जो कि आत्मविषयक ज्ञान होता है उसे तो परोक्ष ज्ञान ही
समझना चाहिए। परन्तु यह जो अपरोक्ष ज्ञान है यह जब किसी
को होता है तब उसका संसार का कारण मूलाज्ञान भी जल-
भुन कर खाक हो जाता है।
ऐसा तत्वविवेक जब कोई कर लेगा और अपने मन को
इसी लक्ष्य की महादीक्षा भी दे देगा, तब उसे अपरोक्ष ज्ञान
होकर ही रहेगा। उसका संसार-बन्धन टूट फूट कर शतधा
विदीर्ण हो जायगा। फिर परम पद को पाने में उसे क्षण भर
का भी विलम्ब नहीं होगा। चाह तो उसे यह भी कह सकते हैं
कि वह सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म ही हो जायगा।
गंभीर सूचना
जो तत्त्व है अर्थात् जो अनारोपित ( अकल्पित ) वस्तु है उस
का दिग्दर्शन इस प्रकरण में कराया गया है। इस प्रकरण का
गंभीर अभिप्राय यह है कि एक ही स्थान पर दो अकल्पित पदार्थ
रह ही नहीं सकते हैं। एक स्थान पर अकल्पित पदार्थ तो एक
ही ठहर सकता है यह एक सर्वमान्य नियम है। जहां एक
अकल्पित ( सच्ची ) रस्सी पड़ी है, वहां ही पर दूसरा अकल्पित
(सच्चा) सांप भी हो यह हो ही नहीं सकता। हां, यह तो हो
सकता है कि जहां पर सच्ची रस्सी हो वहीं पर कल्पित सांप भी
रह रहा हो। सच्चे और कल्पित का एक साथ होना तो भ्रमस्थल
में प्रत्यक्ष देखते ही हैं। जहाँ जहाँ भी हमको कल्पित पदार्थ
प्रतीत हुआ करते हैं वहाँ-वहाँ उनका तत्त्व अर्थात् उनका अनारोपित
स्वरूप उनके साथ तो रहता ही है परन्तु वह उस समय छिप सा
जाता है। उस पदार्थ के तत्त्व को यदि हम जान लें, तो कल्पित
१० पञ्चदशी
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पदार्थ, सपने के पदार्थों की तरह, क्षण भर में अदृश्य (गुम.) हो
जाते हैं। इसी प्रकार यह समझें कि इस संसार का भी जो तत्त्व
है, अर्थात् जो इस संसार का अनारोपित स्वरूप है वह तो एक
ही है और वह भी छिप सा रहा है। वह 'सत्य' 'ज्ञान' और
'परमानन्द' स्वरूप है। परन्तु इस तत्त्व के ऊपर जो अनेक
प्रकार के आरोप होगये हैं, इस तत्त्व के आधार से जो कि अनेक
कल्पित देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा अन्य भूत भौतिक पदार्थ
प्रतीत होने लग पड़े हैं, उन्होंने हमारा सारा ही ध्यान अपनी
ओर खींच लिया है और अब हमें सर्वत्र 'असत्य' 'अज्ञान' और
दुःखों के ढेर ही ढेर दिखाई पड़ रहे हैं। जैसे रस्सी का सांप,
सारा ध्यान अपनी ओर खींचकर रस्सी को प्रतीत होने ही नहीं
देता है, इसी प्रकार इन कल्पित पदार्थों ने तत्त्व की प्रतीति को
रोक दिया है और स्वयं हमारे सामने आकर खड़े हो गये हैं।
सांप को देखकर जैसे भय और कम्प आदि हो जाते हैं; इसी
प्रकार इन देहादि पदार्थों को देखने से अब तो जन्म मरण आदि
का चक्र चल पड़ा है। हम अभागे प्राणी जन्मने के लिये मरते
हैं और मरने के लिये जन्म लेते हैं। भोग के लिये कर्म करते
हैं और कर्म करने के लिये भोगते हैं। यों हम अज्ञानोपहत होकर
मूर्ख बालकों की तरह इस चक्कर को निरन्तर घुमाते ही जाते
हैं। जब पुण्यपरिपाक से किसी तत्त्व के पारखी से भेंट हो
जाती है और वह कृपा करता है तब इन कल्पित चीज़ों की
पहचान होकर, अकल्पित सच्चिदानन्द वस्तु पर साधक की
दृष्टि जा पड़ती है और बस तभी संसरण बन्द हो जाता है।
कारुणिक आचार्य तत्त्व (अकल्पित पदार्थ) का जो स्वरूप है
वह बता देते हैं। तब उस पर मनन चल पड़ता है और मनन
तत्त्वविवेक का संक्षेप ११
तत्त्वविवेक का संक्षेप ११
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करते करते, निःसन्दिग्ध हो जाने पर, चित्त को उसी तत्व में
जमा दिया जाता है। इस तत्व में, जमते जमते, जब मन की
अवस्था, तसवीर खिंचे हुए दीपक की सी शान्त हो जाय, तब यही
समाधि अवस्था कही जाती है। इस समाधि के हाथ लगने पर,
कर्मों के ढेर में आग लग जाती है और संसारबन्धन गल जाता है।
इस अवस्था में परमपद को साधक के पास आना ही पड़ता है।
दर्पण ठोस होता है, उसके अन्दर तिल धरने को भी कहीं
स्थान नहीं होता, परन्तु उसी के अन्दर, अनेक पदार्थों को अपने
पेट में लिये हुए, लम्बा चौड़ा आकाश व्यर्थ ही दीखा करता
है। इसी प्रकार, वह सच्चिदानन्द तत्व भी, सर्वत्र ठसाठस भरा
पड़ा है, यह शिला की तरह ठोस है, इसमें जरा सा भी कहीं
को छिद्र नहीं है, कि इसमें कहीं कोई तिनका तक भी समा
सके। परन्तु इस दुर्घटकारिणी माया के प्रताप से, अनन्त वस्तुओं
को अपने पेट में लिये हुए यह सारा जगत्, इसी निश्छिद्र सच्चि-
दानन्द में भ्रम से व्यर्थ ही प्रतीत हो रहा है। दर्पण के अन्दर
अनन्त आकाश को देखते हुए भी जैसे हम दर्पण की निर्मलता
को जानते ही रहते हैं और उस दर्शन पर विश्वास नहीं करते हैं,
इसी प्रकार सच्चिदानन्द के अन्दर अनन्त जगत् को देखते
हुए भी उसकी निर्मलता यदि हमारे मन पर चढ़ जाय, यदि
हमारे मन पर इस सच्चिदानन्द रूपी जल के चार छींटे आपड़ें
और मन को इस तत्व की महादीक्षा मिल जाय, मन इसी तत्व
में रम जाय और बाह्य दर्शन पर से विश्वास (आस्था) उठ जाय
तो समझिये कि अतत्व ( आरोपित ) चीजें हट गयीं और तत्व
[ अर्थात् अनारोपित ] चीज हाथ लग गयी है। इस तत्व को
पकड़ा देना ही तत्वविवेक नाम के प्रकरण का उद्देश्य है।
2. Pancha Mahabhuta Viveka
[ २ ]
पंचभूतविवेक का संक्षेप
पंचभूतविवेक नाम के दूसरे प्रकरण में बताया गया है कि
वर्षा ऋतु में पर्वत से ही उत्पन्न होने वाले तिनके जिस प्रकार पर्वत
को ही ढक लेते हैं, इसी प्रकार ये पांचभूत उसी (सत् अद्वैत
तत्व) से उत्पन्न हुए हैं परन्तु इन्होंने उसे ही छिपा डाला है। अब
हम साधकों का यह परम कर्त्तव्य है कि इन पांचों भूतों का
विश्लेषण करके, छिपे हुए उस तत्व को फिर दुबारा पहचान लें।
पहचानने की रीति यह है कि ग्यारह इन्द्रियों से युक्तियों से
और शास्त्रों से जिस पसारे को हम देख रहे हैं वह पसारा सृष्टि
बनने से पहले नहीं था। तब एक सत् ही सत् था। वह सत्
क्योंकि निरवयव तत्व है इस कारण पेड़ में जैसे पत्र पुष्प और
फलादियों से होने वाला स्वगत भेद रहता है वह भी तब नहीं
था। एक पेड़ का दूसरे पेड़ से जैसे सजातीय भेद होता है वैसा
सजातीय भेद भी तब नहीं था। एक पेड़ का विजातीय पत्थर
आदि से जैसे भेद होता है वैसा विजातीय भेद भी तब नहीं था।
यों स्वगत स्वजातीय और विजातीय भेद से हीन एक तत्व तब
था। कई लोगों को तो यह एक तत्व की बात बड़ी ही असह्य
प्रतीत होती है। जैसे समुद्र में डूबने से स्थलचारी का दम घुटता
है, इसी प्रकार अखण्ड एकरस तत्व को सुन कर और मन के
प्रचार के लिये अवकाश न पाकर, वे लोग वहां की गम्भीर शान्ति
से घबरा उठते हैं। दूषित वायु में रहने के आदी जैसे सुगन्ध
वायु से नाक सकोड़ते हैं और घबराते हैं इसी प्रकार बहुव्याकुल-
पंचभूत का संक्षेप १३
चित्तों को अनन्त शान्तिदायक अखण्ड एकरस तत्व भी भयानक
दीखता है। बालक जैसे जंगल में डरता है इसी तरह अखण्ड तत्व
से भी कई लोगों को भय लगता है। परन्तु उनके डरने का कोई
भी उचित कारण नहीं है। जब कोई समाधि करता है और जब
निश्चित हो जाने की गम्भीर अवस्था आती है और तूष्णींभाव
का उदय होता है, तब उस अखण्ड सद्वस्तु का अनुभव साधकों
को स्पष्ट ही होता है। 'उस समय तो कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा
विचार ठीक नहीं है, क्योंकि शून्य (कुछ नहीं) को जानने वाला
जो कोई तत्त्व है उसको 'कुछ भी नहीं' कहना अनुचित है। शून्य
को तो शून्य का ज्ञान होता ही नहीं है। जब हम निर्मनस्क
होते हैं, उस निर्मनस्क अवस्था का जो साक्षी है, वही तत्त्व सत्
पदार्थ है। इस सत् में इस पसारे को फैलाने की जो शक्ति रहती
है, वह न तो असत् ही है, क्योंकि प्रतीत होती है और न सत्
ही है, क्योंकि वह सदा नहीं रहती। उसकी बाधा हो जाती है।
देवदत्त में देवदत्त की शक्ति भी रहती है, परन्तु शक्ति को और
देवदत्त को दो नहीं गिना जाता। ये दोनों मिल कर एक ही गिने
जाते हैं। इसी तरह ब्रह्म और उसकी शक्ति दो तत्व नहीं गिने
जाते। कहने का तात्पर्य यह है शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता
है। जैसे शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता है, ठीक इसी तरह
शक्ति के जो स्थूल कार्य (पृथिव्यादि) हैं उनसे भी द्वैत की शंका
को अवकाश नहीं है। उस शक्ति से, सब से प्रथम आकाश
उत्पन्न हुआ। उसमें जो सत्ता है वह इस सत् से ही आई है। सत्
का ही आकाश बन गया है। 'आकाश की सत्ता' ऐसा कहना
दार्शनिक भूल है। यह सत्ता वायु आदि अगले भूतों में भी गई
है। आकाश उनमें नहीं गया, इसी कारण कहते हैं कि आकाश
१४ पंचदशी
और सत्ता भिन्न भिन्न तत्त्व है । आकाश में से सत्ता को पृथक्
कर लो फिर बताओ आकाश का क्या रूप रह गया है ? सत् से
भिन्न होने के कारण वह तो अब निश्चय ही असत् है। असत् होने
पर भी प्रतीत हो रहा है, यही तो माया का चमत्कार है। आकाश
तो कभी सत् हो ही नहीं सकता और सद्वस्तु में कहीं जरा सा
भी स्थान नहीं है कि उसके अन्दर आकाशादि अन्य पदार्थ समा
सकें। इसीलिये तत्त्वज्ञानी की दृष्टि जब आकाश पर पड़ेगी, तब
वह उसे निस्तत्त्व समझेगा और जब सद्वस्तु पर उसका ध्यान
जायगा तब वह उसे निश्छिद्र किंवा निरन्तर ही समझेगा। यों
प्रत्येक भूत और प्रत्येक भौतिक पदार्थ की असत्ता पर जब
बार बार विचार चलेगा, तब अद्वैत के सत्य होने की बात दृढ़तर
होती जायगी। परन्तु ध्यान रहे कि इस असत्यवासना का
प्रभाव व्यवहार पर कुछ भी नहीं पड़ेगा। वह तो पहले जैसा
ही चलता जायगा। व्यवहार को बन्द कर देने का जो एक वृथा
विचार नवीन साधकों को हो जाता है वह भूल होती है। होना
यह चाहिये कि जो व्यवहार अब तक अपने संकीर्ण दृष्टिकोण
से चल रहा था वही अब व्यापक जगदात्मा के दृष्टिकोण से
चलना चाहिये । इस ज्ञान से पदार्थों का स्वरूप बदल नहीं
जाता है। यह ज्ञान तो केवल हमारे दृष्टिकोण को बदलता है।
ज्ञानी के व्यवहार में अवश्य ही कुछ ऐसा चमत्कार आ जाना
चाहिये कि उसका व्यवहार आकर्षक हो, सदय हो, नमूने का
हो, अनुकरणीय हो, लोकहित में बाधा न डालता हो। ऐसा
जिसका व्यवहार हो वही ज्ञानी है। उस ज्ञानी की जिस परिमाण
से द्वैत की अवज्ञा (अनादर) दृढ़ होगी उसी परिमाण से अद्वैत में
बुद्धि ठहरेगी। यह बुद्धि जब ठहर चुकेगी और संसार समुद्र की
पंचभूतविवेक का संक्षेप १५
पंचभूतविवेक का संक्षेप १५
कूलंकष लहरें भी जब इस बुद्धि रूपी तट को तोड़ फोड़ नहीं
सकेंगी तब यह पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहाने लगेगा। पाँचों भूत
या पाँचों भूतों से बना हुआ कोई भी पदार्थ 'जब दीखे तभी
उसके सत्य तत्त्व पर दृष्टि पड़ने लगे और उसमें ही जमने भी
लगे तो यही 'द्वैतावज्ञा' कहाती है। यही 'अद्वैत बुद्धि' कही
जाती है और उसे ही 'ब्राह्मी स्थिति' भी कह देते हैं। मरते समय
भी एक क्षण भर के लिये भी यदि किसी को ऐसी उदार स्थिति
हाथ लग जाय तो उसकी मुक्ति अवश्यंभाविनी है। फिर जो
बड़भागी बचपन से ही इस शुभ स्थिति में जमने लगा हो, उसके
विषय में तो पूछते ही क्या हो ? क्योंकि मरते समय जो भ्रान्ति
नष्ट हुई है वह भ्रान्ति फिर कभी भी लौट कर नहीं आयेगी।
मृत्यु को तो इस लोक और परलोक की मध्य सीमा मानते हैं।
उस सीमा पर जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में
उसकी परलोक यात्रा की पूँजी ही जल भुन कर राख हो जायगी।
जिस पुरुष को उपर्युक्त प्रकार की द्वैतावज्ञा स्थित हो गई हो,
जिसे ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो, वह महामना खाट पर
सड़ कर, भूमि पर लोट कर, पूर्ण स्वस्थ रह कर या मूर्च्छावस्था
में प्राणों का त्याग भले ही कर दे, उसे फिर भ्रान्ति कभी भी
नहीं होगी। मूर्च्छा आदि के कारण तत्व का विचार न कर सकने
पर भी ज्ञानी का ज्ञान नष्ट नहीं हो जाता है। क्या भला कहीं
पढ़ा लिखा आदमी नींद आ जाने से कुपढ़ा हो जाता है ? जिस
महाविद्या को प्रमाणों ने बड़े परिश्रम से जगाया है, वह विद्या
अब कभी भी नष्ट होने वाली नहीं है। क्योंकि वेदान्तों से प्रवल
तो कोई प्रमाण ही नहीं है। वेदान्तों के बताये जिस अद्वैत का
पूर्ण अनुमोदन साधक के अनुभव ने कर दिया है उस अद्वैत की
१६ पंचदशी
बाधा करने को दूसरा प्रमाण कहाँ से आयेगा ? अनुभव से-अपने
तजुर्बे से-बड़ा तो कोई प्रमाण ही नहीं होता। इस प्रकार सत्
जो अद्वैत है और अनृत जो द्वैत है, इन दोनों को हिलामिला
कर जो एक मिश्रण बना लिया गया है, इस मिश्रण को जब
सर्वथा अलगा दिया जाय, जब इन दोनों को अलग अलग समझ
लिया जाय, तो निर्वाण पद किसी के भी रोके रुक नहीं सकेगा।
सारांश यही हुआ कि पंचभूत विवेक करने पर जिस वेदान्त-
सिद्ध अद्वैत का ज्ञान होगा, उसकी बाधा अन्तकाल में भी नहीं
हो सकेगी और विदेहमुक्ति मिल कर ही रहेगी।
3. Pancha Kosha Viveka
[ ३ ]
पंचकोशविवेक का संक्षेप
पंचकोशविवेक नाम के तीसरे प्रकरण में बताया गया है
कि देह, देह से अन्दर प्राण, प्राण से अन्दर मन, मन से अन्दर
कर्ता [विज्ञान], कर्ता से अन्दर भोक्ता [ आनन्दमय ] बस यह
परम्परा ही तो आत्मा के छिपने की 'गुहा' कहाती है । इस
गुहा में जो ब्रह्म तत्व छिप सा गया है, उसे तो हम तभी जान
सकते हैं, जब कि पहले इन ऊपर के पांचों कोशों का विवेक कर
लें । इस लिये आइये अब नारियल के छिलकों की तरह उन
पांचों कोशों को ही छील कर फेंक दें और गुहाहित ब्रह्मतत्व के
दर्शन करें—
यों तो जैसे ये अन्न, प्राण, मन, बुद्धि और आनन्द नाम
के कोश, आत्मतत्व को ढके बैठे हैं, प्रकट नहीं होने दे रहे हैं,
ठीक उसी तरह ये उसका दर्शन कराने में साधन भी तो हैं । ये
बन्ध भी करते हैं और मोक्ष भी दिलाते हैं । नारियल का छिलका
जैसे नारियल को ढके रहता है, इसी प्रकार नारियल को पाने
की जगह भी तो वही है । जिन पंचकोशों ने आत्मतत्व पर
परदा डाला है, उस तत्व के दर्शन भी तो उन्हीं के अन्दर होते
हैं । यदि ये पंचकोश न हों, तो किसी को आत्मतत्व का ध्यान
भी नहीं आ सकता । उस ब्रह्मतत्व के दर्शन की रीति यह है
कि देह से लेकर आनन्द पर्यन्त जो भी पदार्थ दीख रहे हैं, वे
सब इस प्रकरण में कही रीति से आत्मा नहीं है । किन्तु इन सब
को देखने वाला, स्वयं कभी भी न दीखनेवाला, जो तत्व है,
१८ पंचदशी
वही तो आत्मा है। आत्मा के न दीखने का यह कारण कदापि
नहीं है कि आत्मा नाम का कोई पदार्थ है ही नहीं, किन्तु उसके
न दीखने का कारण यह है कि वह तो स्वयं ही दीखनारूप है।
जैसे गुड़ को मीठा नहीं किया जा सकता, इसी प्रकार आत्मा
को भी देखा नहीं जा सकता। यों भले ही वह आत्मतत्व किसी
के अनुभव में न आता हो, परन्तु उसकी ज्ञानरूपता में तो लेश-
मात्र भी ठेस नहीं लग सकती है। जिस मूर्ख को तो सब के
जानने वाले उस ज्ञान का ही अनुभव किसी भी तरह न होता
हो, उस मिट्टी के ढेले को भला कौन समझा सकेगा ? जो मन्द
पुरुष ज्ञान को ही नहीं समझ रहा है,उसको ज्ञात [ज्ञान के विषयों ]
का अनुभव भी कैसे हो सकेगा ? “मेरे मुँह में जीभ नहीं है”
यह बात जितनी अयुक्त है, उतनी ही अयुक्त यह बात भी है
कि'मैं ज्ञान को नहीं जानता हूँ। विचार करो कि हमको कभी
घड़े का ज्ञान, कभी वस्त्र का ज्ञान और कभी रूपादि विषयों
का ज्ञान होता है, अपने योगयुक्त मन से ज्ञान के विषय इन
घड़े आदि पदार्थों की उपेक्षा [ अनादर ] कर दो, इन घटादि
सभी पदार्थों में, माला में सूत्र की तरह, जो ज्ञान या चैतन्य
शान्त भाव से अनुगत होकर विराज रहा है, उस शान्त ज्ञान
तक जब दृष्टि पहुँच जाय तब समझ लो कि यह ज्ञान ही ब्रह्म-
तत्व है। यह तत्व स्वयंप्रकाश भी है। इस सब पसारे के दीखने
से पहले यह दीखता है। जब यह आत्मा 'देखने की इच्छा'
नाम की अनुमति दे देता है, तब यह पसारा पीछे से दीखने
लगता है। बात तो यहां तक है कि यह पसारा उसके ही दीखने
से दीखता है। यह आत्मा स्वयं किसी को न दीखता हो [जैसा
कि सुषुप्ति में हो जाता है ] तो यह पसारा दीख ही नहीं सकता।
पंचकोशविवेक का संक्षेप १९
पंचकोशविवेक का संक्षेप १९
इस पसारे का दीखना सवा सोलह आने इसके दीखने के अधीन
है। यों इस सारे जगत् का साक्षी जो ज्ञानरूप आत्मा है वह
शुद्ध अवस्था में तब ही दीख सकेगा जब कि इन पांचों कोशों का
परित्याग पूर्णतया कर दिया जायगा। अर्थात् इनको आत्मा
समझना छोड़ दिया जायगा। इन सब कोशों को चमकाने वाला
जो ज्ञान नाम का प्रकाश है, वही तो हमारा अपना स्वरूप है।
अविचारपूर्ण दृष्टि के रहते रहते ही दीख पड़नेवाले देहादियों
को जब अनात्मा समझ लिया जाता है, तब विचारक के सामने
आत्मतत्व स्वयमेव आ खड़ा होता है। उस समय उसको चाहो
'तो 'कुछ नहीं' कह दो या 'आत्मा' कह दो या कुछ भी मत कहो।
आत्मतत्व का वर्णन करने में अध्यात्मशास्त्र ने 'नेति नेति' की
निराली भाषा का उपयोग इसी भाव से किया है। सम्प्रदायवाले
इस प्रकरण में एक गाथा कहा करते हैं—किसी मेले में कोई स्त्री
पुरुष बिछड़ गये थे। राज-पुरुषों ने सारे मेले को घेरकर एक द्वार
में से निकाला और द्वार पर खड़ी की हुई स्त्री से पूछते गये कि
क्या यह तुम्हारा पुरुष है? वह सब का निषेध करती गयी 'कि
यह मेरा पुरुष नहीं है।' जब तो उसका पुरुष आया, तब वह
कुछ भी न बोली किन्तु चुपचाप खड़ी रह गयी। कुछ न बोल
कर ही उसने अपने पुरुष को राजपुरुषों को बता दिया। इसी
प्रकार जितना कुछ निषेध किया जा सकता है, उस सब ही का
निषेध कर देने पर, जो तत्व शेष रह जाता है, वही तो आत्मा
है। यही 'नेति नेति' का सरल भाव भी है। यों यह तत्व सत्य
पदार्थ है यह सिद्ध हो चुका। इसकी ज्ञानरूपता भी सिद्ध की
जा चुकी। यही तत्व अनन्त भी है—औरों का तो कहना ही
क्या है, सबसे तीव्र गति वाली कल्पना को भी यदि हजारों वर्ष