पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 600, कुल 726 में से
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पंचभूतविवेक का संक्षेप
पंचभूतविवेक नाम के दूसरे प्रकरण में बताया गया है कि
वर्षा ऋतु में पर्वत से ही उत्पन्न होने वाले तिनके जिस प्रकार पर्वत
को ही ढक लेते हैं, इसी प्रकार ये पांचभूत उसी (सत् अद्वैत
तत्व) से उत्पन्न हुए हैं परन्तु इन्होंने उसे ही छिपा डाला है। अब
हम साधकों का यह परम कर्त्तव्य है कि इन पांचों भूतों का
विश्लेषण करके, छिपे हुए उस तत्व को फिर दुबारा पहचान लें।
पहचानने की रीति यह है कि ग्यारह इन्द्रियों से युक्तियों से
और शास्त्रों से जिस पसारे को हम देख रहे हैं वह पसारा सृष्टि
बनने से पहले नहीं था। तब एक सत् ही सत् था। वह सत्
क्योंकि निरवयव तत्व है इस कारण पेड़ में जैसे पत्र पुष्प और
फलादियों से होने वाला स्वगत भेद रहता है वह भी तब नहीं
था। एक पेड़ का दूसरे पेड़ से जैसे सजातीय भेद होता है वैसा
सजातीय भेद भी तब नहीं था। एक पेड़ का विजातीय पत्थर
आदि से जैसे भेद होता है वैसा विजातीय भेद भी तब नहीं था।
यों स्वगत स्वजातीय और विजातीय भेद से हीन एक तत्व तब
था। कई लोगों को तो यह एक तत्व की बात बड़ी ही असह्य
प्रतीत होती है। जैसे समुद्र में डूबने से स्थलचारी का दम घुटता
है, इसी प्रकार अखण्ड एकरस तत्व को सुन कर और मन के
प्रचार के लिये अवकाश न पाकर, वे लोग वहां की गम्भीर शान्ति
से घबरा उठते हैं। दूषित वायु में रहने के आदी जैसे सुगन्ध
वायु से नाक सकोड़ते हैं और घबराते हैं इसी प्रकार बहुव्याकुल-