पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
यही विधिमुख से किया हुआ प्रतिपादन माना जाता है ।
२५४ पञ्चदशी
करा देता है । दूसरे उस ब्रह्म के साक्षात् वाचक शब्दों का ही
कथन कर दिया जाय—जैसे कि 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इत्यादि ।
यही विधिमुख से किया हुआ प्रतिपादन माना जाता है ।
अहमर्थपरित्यागादहं ब्रह्मेति धीः कुतः ।
नैवमंशस्य हि त्यागो भागलक्षणयोदितः ॥८८॥
[जब वेदान्तों को अतद्व्यावृत्ति रूप से ब्रह्म का बोधक
मानोगे तब] 'अहं' शब्द का अर्थ जो कूटस्थ है, उसका भी
त्याग जब हो जायगा तब 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा ज्ञान कैसे उत्पन्न
हो सकेगा ? इसका उत्तर यह है कि—हम ऐसा सर्वत्याग
मानते ही नहीं । हम तो 'भागलक्षणा' किंवा 'जहदजहल्लक्षणा'
से अहंशब्द के अर्थ जडभागरूपी एकदेश का ही त्याग करते
हैं [अहं के दूसरे अर्थ कूटस्थ अंश का त्याग हम ने नहीं
माना है । ऐसी अवस्था में 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान हो ही
सकता है]
अन्तःकरणसं त्यागादवशिष्टे चिदात्मनि ।
अहं ब्रह्मेतिवाक्येन ब्रह्मत्वं साक्षिणीक्ष्यते ॥८९॥
अन्तःकरण का पूर्ण त्याग कर देने पर [अपने आत्मराज्य
में से अन्तःकरण को धक्का दे देने पर] जो चिदात्मा शेष रह
जाता है, 'अहं ब्रह्मास्मि' यह महावाक्य उसी शेष रहे हुए चेतन
साक्षी में ब्रह्मत्व का ज्ञान कराता है ।
स्वप्रकाशोऽपि साक्ष्येव धीवृत्त्या व्याप्यतेऽन्यवत् ।
फलव्याप्यत्वमेवास्य शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् ॥ ९० ॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २५५
[Header]
तृप्तिदीपप्रकरणम् २५५
[Main Text]
प्रत्यगात्मा को बुद्धिवृत्तियाँ कैसे विषय करेंगी ? इस प्रश्न का
उत्तर यह है कि] स्वयंप्रकाश भी वह साक्षी अन्य घटादियों
के समान धीवृत्तियों से व्याप्त तो हो ही जाता है [तभी तो
'मैं स्वयंप्रकाश हूँ' ऐसी बुद्धिवृत्ति का होना सम्भव हो गया
है ] यह बात हम सिद्धान्त से बाहर की नहीं कह रहे हैं क्योंकि
शास्त्रकारों ने यही तो कहा है कि फल [अर्थात् वृत्ति में प्रति-
विम्बित चिदाभास] इस आत्मा को व्याप्त नहीं करता [क्योंकि
वह तो स्वयं ही स्फुरणरूप होता है । आत्मा की वृत्ति की
व्याप्ति को तो पूर्वाचार्य भी मानते ही हैं। वे तो केवल फल
की व्याप्ति का निषेध करते हैं]
बुद्धितत्स्थचिदाभासौ द्वावपि व्याप्तुतो घटम् ।
तत्राज्ञानं धिया नश्येदाभासेन घटः स्फुरेत् ॥९१॥
[जब हमें घट दीखता है तब] बुद्धि भी और उसमें पड़ा
हुआ चिदाभास भी दोनों ही घट को व्याप्त किया करते हैं
[दोनों के व्याप्त करने के फल भी पृथक् पृथक् देख लो कि]
उन दोनों में से बुद्धिवृत्ति से तो अज्ञान नष्ट हो जाता है—
[क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है] तथा
दूसरा जो चिदाभास है उस से घट की स्फूर्ति हुआ करती है
[क्योंकि जड होने के कारण घट में स्वयं स्फुरण की योग्यता
नहीं होती]
ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ।
स्वयंस्फुरणरूपत्वान्नाभास उपयुज्यते ॥९२॥
[प्रत्यगात्मा और ब्रह्म की जो एकता थी उसको अज्ञान
ने आवृत कर रक्खा था] ब्रह्म में के उस अज्ञान का नाश करने
२५६ पञ्चदशी
के लिये वृत्ति की व्याप्ति तो अपेक्षित होती है— [महावाक्यों
को सुनकर 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी जो एक बुद्धिवृत्ति उत्पन्न हुआ
करती है, वह वृत्ति ब्रह्म को व्याप्त करले, केवल यही बात
आवश्यक है] परन्तु स्वयं स्फुरणरूप होने के कारण, उसकी
स्फूर्ति कराने के लिये, फिर चिदाभास का कुछ भी उपयोग नहीं
रह जाता [ऐसी अवस्था में वह चिदाभास भले ही ब्रह्म से
युक्त हो भी जाता हो तो भी उसमें उसका कुछ भी उपयोग नहीं
होता। वह तो सूरज के सामने लाये हुए दीपक की तरह ब्रह्म-
तत्व के सामने निकम्मा हो जाता है, या उस ही में लीन
हो कर एक हो जाता है। यों वह उसे देख नहीं पाता।]
चक्षुर्दीपावपेक्ष्येते घटादेर्दर्शने यथा।
न दीपदर्शने किन्तु चक्षुरेकमपेक्ष्यते ॥९३॥
[अन्धेरे से ढके हुए] घटादि को देखने में चक्षु और दीपक
दोनों ही अपेक्षित होते हैं। परन्तु दीपक को देखने में तो वैसा
नहीं होता। किन्तु एक चक्षु ही चक्षु अपेक्षित होती है [इसी
प्रकार ब्रह्म में अज्ञान का नाश करने के लिये वृत्ति की व्याप्ति
तो मान लेनी चाहिये किन्तु उसके स्फुरण के लिये आभास का
कुछ उपयोग नहीं होता]
स्थितोऽप्यसौ चिदाभासो ब्रह्मण्येकीभवेत् परम्।
न तु ब्रह्मण्यतिशयं फलं कुर्याद् घटादिवत् ॥९४॥
जो वृत्तियाँ ब्रह्म को विषय किया करती हैं, उनमें भी
यद्यपि चिदाभास रहता है, परन्तु वह ब्रह्म से पृथक् होकर
नहीं भासता। किन्तु [प्रचण्ड धूप में जलते हुए दीपप्रकाश
के समान] ब्रह्म के साथ एकीभाव को प्राप्त हो जाता है।
[Header] चित्रदीपप्रकरणम् २५७
[Header] चित्रदीपप्रकरणम् २५७
फिर वही चिदाभास घटादि की तरह ब्रह्म में स्फूर्ति रूपी अति-
शय को उत्पन्न नहीं कर सकता ।
अप्रमेय मनादिं चेत्यत्र श्रुत्येदमीरितम् ।
मनसैवेदमाप्तव्यमिति धीव्याप्यता श्रुता ॥९५॥
ब्रह्म में वृत्ति की व्याप्ति तो है परन्तु फल की व्याप्ति ब्रह्म में
नहीं होती, यह बात हम अप्रामाणिक नहीं कहते हैं देखो कि-
निर्विकल्पमनन्तं च हेतुदृष्टान्तवर्जितं। अप्रमेयमनादिं च यज्ज्ञात्वा मुच्यते
बुधः ॥ अमृतबिन्दु उपनिषत् की इस श्रुति के अप्रमेय शब्द
का तात्पर्य यही है कि उसमें फल की व्याप्ति नहीं होती, और
यों वह अप्रमेय ही रह जाता है तथा मनसैवेदमाप्तव्यं नेहना-
नास्ति किंचन (कठ० २-४-११) इस श्रुति में ब्रह्म की वृत्ति-
व्याप्यता की बात सुनी गयी है ।
आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति वाक्यतः ।
ब्रह्मात्मन्याक्ति मुल्लिख्य यो बोधः सोऽभिधीयते॥९६॥
[सत्यज्ञानादि स्वरूपवाले] ब्रह्म से अभिन्न आत्मा को जब
कोई अधिकारी विषय कर लेता है, उस समय जो बोध
किंवा अपरोक्ष ज्ञान उसे उत्पन्न हुआ करता है, उसी बोध का
वर्णन श्रुति के आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मि (बृ० ४-४-१२)
'आत्मा को यदि पहचान ले कि मैं तो ऐसा महान् तत्व हूँ'
इतने वाक्यखण्ड ने किया है ।
अस्तु बोधो ऽपरोक्षोत्र महावाक्यात् तथाप्यसौ ।
न दृढः श्रवणादीनामाचार्यैः पुनरीरणात् ॥९७॥
इस ब्रह्मात्मता के विषय में महावाक्यों से
२५८ पञ्चदशी
बार सुनकर विचार करने पर ] अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है
यह तो हम माने लेते हैं , परन्तु ऐसा बोध दृढ तो नहीं होता
क्योंकि श्रीमच्छङ्कराचार्य ने वाक्यार्थ ज्ञान के उत्पन्न हो जाने
के बाद भी श्रवण आदि की आवृत्ति करने को कहा है ।
[ वह उन्होंने ज्ञान की दृढता के ही लिये तो कहा है । इसी
से समझते हैं कि महावाक्य से हुआ अपरोक्ष ज्ञान टिकाऊ
नहीं होता ]
अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थबोधो यावद् दृढीभवेत् ।
शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकम् ॥९८॥
आचार्य ने कहा है कि—जब तक किसी को अपने
ब्रह्मभाव का दृढ निश्चय न हो जाय, तब तक शमदमादि से
युक्त होकर, श्रवणादि का अभ्यास किया ही करे।
बाढं सन्ति ह्यदार्ढ्यस्य हेतवः श्रुत्यनेकता ।
असंभाव्यत्वमर्थस्य विपरीता च भावना ॥९९॥
जो कि शब्दप्रमाण से उत्पन्न हुआ ज्ञान दृढ नहीं होता,
उसका कारण एक तो श्रुतियों की अनेकता होती है [ कोई
श्रुति कुछ कहती है, दूसरी श्रुति कुछ और ही बता देती है ]
दूसरे अलौकिक होने के कारण अखण्डैकरस अद्वितीय ब्रह्म-
रूपी अर्थ की संभावना ही साधारण प्राणी के हृदय में नहीं
हो पाती। तीसरे विपरीत भावनाओं ने भी प्राणियों के हृदय
पर पूर्णाधिकार जमा रक्खा है, [ कर्तृत्व भोक्तृत्व के वृथा
अभिमान से प्राणियों को इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि
वे अपने ब्रह्मत्व का किंवा अपने असंग रूप का कभी विचार
भी कर सकें ] ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २५९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २५९
शाखाभेदात् कामभेदाच्छ्रुतं कर्मान्यथाऽन्यथा ।
एवमत्रापि मा शङ्कीत्यतः श्रवणमाचरेत् ॥१००॥
[ श्रुतियों के नाना होने से यदि यह ज्ञान दृढ न होता हो,
तो उसका उपाय इस श्लोक में बताया गया है ] शाखा के
भिन्न भिन्न होने से कर्म भिन्न भिन्न हो जाता है । इसी प्रकार
कामना के भिन्न भिन्न होने से भी कर्मों में भेद आ जाता है ।
ऐसा ही कोई भेद ज्ञानकाण्ड में भी होता होगा, इस शंका
[ भेदशंका ] को हटाने के लिये बार बार श्रवण करते रहो ।
वेदान्तानामशेषाणामादिमध्यावसानतः ।
ब्रह्मात्मन्येव तात्पर्यमिति धीः श्रवणं भवेत् ॥१०१॥
आदि मध्य और अन्त में कहीं से भी विचार करने पर
सब वेदान्तों [ किंवा उपनिषदों ] का परम निष्कर्ष ब्रह्म को
प्रत्यगात्मारूप बताने में ही है,ऐसा निश्चय 'श्रवण' कहाता है ।
समन्वयाध्याय एतत् सूक्तं,धीस्वास्थ्यकारिभिः ।
तर्कैः संभावनार्थस्य द्वितीयाध्याय ईरिता ॥१०२॥
व्यास मुनि ने इसी 'श्रवण'को वेदान्त दर्शन के समन्वय
नाम के प्रथमाध्याय में भली रीति से वर्णन किया है । प्रमेय
को समझने में जो जो अड़चनें हों, उन सब को हटाकर,
बुद्धि का सन्तोष कर देने वाले तर्कों किंवा युक्तियों से, अर्थ
की संभावना करना [ कि श्रवण किया हुआ अर्थ यों यों
संभव है ] 'मनन' कहाता है । इस मनन का निरूपण उन्होंने
द्वितीयाध्याय में किया है ।
बहुजन्मदृढाभ्यासाद् देहादिष्वात्मधीः क्षणात् ।
पुनः पुनरुदेत्येवं जगत्सत्यत्वधीरपि ॥१०३॥
२६० पञ्चदशी
विपरीता भावनेयमैकाग्र्यात् सा निवर्तते ।
तत्त्वोपदेशात् प्रागेव भवत्येतदुपासनात् ॥१०४॥
अनन्त जन्मों का दृढ अभ्यास हो गया है, उसके कारण
देहादि को जो आत्मा समझने के और जगत् को सत्य सम-
झने के वृथा विचार फिर फिर उत्पन्न हुआ करते हैं, बस यही
तो 'विपरीत भावना' कहाती है । यह विपरीत भावना एका-
ग्रता से नष्ट हो जाती है । यह एकाग्रता तो ब्रह्मोपदेश से पहले
पहले ही उपासना से कर लेनी चाहिये ।
उपास्तयोऽतएवात्र ब्रह्मशास्त्रेऽपि चिन्तिताः ।
प्रागनभ्यासिनः पश्चाद् ब्रह्माभ्यासेन तद् भवेत् ॥१०५॥
यही कारण है कि उपासनाओं की चिन्ता ब्रह्म शास्त्र
[ वेदान्त शास्त्र ] में भी की गयी है । जिसने तो ब्रह्म ज्ञान
होने से पहले एकाग्रता का अभ्यास नहीं किया होता, उसको
तो ब्रह्माभ्यास करते रहने से ही एकाग्रता हो जाती है ।
तच्चिन्तनं तत्कथन मन्योऽन्यं तत्प्रबोधनम् ।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः ॥१०६॥
ब्रह्म का ही चिन्तन करने को, उसी की बात करने को,
एक दूसरे को उसी को समझाने को तथा सदा केवल तन्निष्ठ
हो जाने को ही ज्ञानी लोग ब्रह्माभ्यास कहते हैं । [ ऐसा
ब्रह्माभ्यास करते करते ज्ञानी का चित्त एकाग्र हो जाता है ]
तमेव धीरो विज्ञायः प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् ॥१०७॥
धीर [अर्थात् ब्रह्मचर्यादिसाधन से युक्त] ब्राह्मण [ अर्थात्
ब्रह्मभाव चाहने वाले मुमुक्षु ] को उचित है कि उसी प्रत्यग्रूप
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६१
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६१
परमात्मा को पूर्ण रूप से जान ले [ जिससे उसमें किसी प्रकार
का संशयादि न रह जाय] इतना कर चुकने पर फिर प्रज्ञा
किंवा एकाग्रता को करले [ अर्थात् ब्रह्मात्मैकता के ज्ञान की
एक निरन्तर धारा बहादे] अनात्मा को विषय करनेवाले
शब्दों का ध्यान [ और कथन दोनों ही] छोड़ दे। क्योंकि वह
ध्यान और वह कथन वाणी और मन की थकावट का ही तो
कारण होता है। [शब्दों का ध्यान करने से मन थकता है
तथा शब्दों को बोलने से वाणी को श्रम होता है। यों श्रुति
ने अपने मुख से इसी ब्रह्मनिष्ठता का वर्णन किया है।]
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥१०८॥
जो महापुरुष मुझसे अनन्य होकर मेरा चिन्तन करते
करते सदा मेरी ही उपासना किया करते हैं-[सदा मद्रूप ही
हुए रहते हैं] नित्य ही मुझमें लगे हुए [मेरे गम्भीर अन्तस्तल
तक पहुँचे हुए] उन उपासकों के भोजनाच्छादि का प्रबन्ध
और उनके धन की रक्षा का भार मेरे कन्धों पर रहता है।
क्योंकि उन्होंने तो मुझको ही अपना आत्मा समझ लिया
है। वे फिर अपने भोजनादि के प्रबन्ध की चिन्ता नहीं
करते । जिस प्रकार कोई ग्वाला किसी पशु को चराना छोड़
देता है तो उस पशु का स्वामी उसे नहीं छोड़ बैठता । फिर
तो वह स्वयं ही उसके खान पान की देखभाल किया करता
है। इसी प्रकार यदि कोई साधक ज्ञानावेश में आकर या
भक्ति के उद्रेक में फँस कर शरीर के निर्वाह की चिन्ता छोड़
देता है तो समष्टि का अभिमानी उसके निर्वाह को अपने जिम्मे
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ले लेता है। ईश्वर के संकल्प का ही दूसरा नाम प्रारब्ध है।
सो उस प्रारब्ध के प्रताप से किन्हीं भी लोगों के मन में ऐसी
प्रेरणायें हो जाती है कि अमुक को भोजनादि की आवश्य-
कता है चलो दे आवें। देखते हैं कि जब कोई अन्धा, जो अब
अपनी सहायता स्वयं नहीं कर सकता, हमारे सामने आकर
कुछ मांगता है तब हमारे मन में उसको भोजनाच्छादनादि
देने की अन्तः प्रेरणायें, जब तक उसे कुछ दे नहीं देते,तब तक
बार बार होती रहती हैं। यों इस मार्ग से असमर्थ की अपङ्ग
की, और भक्ति में गहरे डूवे हुए भक्तों की, चिन्ता ईश्वर [देने
लेने वाले दोनों के अन्तर्यामी ] स्वयं करते हैं। जो तो बहु-
र्मुख रहते हैं, अपना भार अपने ही ऊपर उठाये रहते हैं,
भगवान भी उनकी तरफ से निश्चिन्त बने बैठे रहते हैं।
इति श्रुतिस्मृती नित्यमात्मन्येकाग्रतां धियः ।
विधत्तो विपरीताया भावनायाः क्षयाय हि ॥१०९॥
ऊपर कही हुई ये श्रुति और स्मृतियें कहती हैं कि—विप-
रीत भावना की निवृत्ति करने के लिये आत्मा में सदा चित्त
को एकाग्र किये रहना चाहिये। [ऐसे लोग पेट कहाँ से पालें ?
बाल बच्चों को कहाँ से खिलायें ? इसी का उत्तर पहले श्लोक में
जिम्मेदारी की दस्तावेज लिखकर गीता में दिया है।
यद्यथा वर्तते तस्य तत्वं हित्वाऽन्यथात्वधीः ।
विपरीता भावना स्यात् पित्रादावरिधीर्यथा ॥११०॥
जो [शुक्ति आदि]पदार्थ जिस रूप का है, उसके उस रूप
को तो छोड़ दिया जाय और उसको अन्यथा [रजत आदि
रूप का] समझ लिया जाय, बस यही 'विपरीत भावना,कहाती
है [इसी को 'अतत्' को 'तत्' समझ लेना भी कहा जाता है]
जैसे कि पिता आदि हितैषियों को शत्रु समझ लिया जाता है
तो इसको भी विपरीत भावना ही कहते हैं ।
आत्मा देहादिभिन्नोयं मिथ्या चेदं जगत् तयोः ।
देहाद्यात्मत्वसत्यत्वधी र्विपर्ययभावना ।।१११।।
यह आत्मा वस्तुतः देहादियों से भिन्न ही है और यह
जगत् भी मिथ्या ही है । ऐसा होने पर भी आत्मा को तो
देहादि रूप मान लेना, तथा जगत् को सत्य समझ लेना, यही
इस प्रकरण की 'विपरीत भावना' है ।
तत्त्वभावनया नश्येत् सातो देहातिरिक्तताम् ।
आत्मनो भावयेत् तद्वन्मिथ्यात्वं जगतोऽनिशम्।।११२।।
[देहादि की आत्मता और जगत् की सत्यता बुद्धि वाली]
वह विपरीत भावना, तत्व भावना से [या यों समझना चाहिये
कि आत्मा तो देहादि से भिन्न है तथा यह जगत् मिथ्या है
ऐसा निरन्तर ध्यान करते रहने से ] नष्ट हो जाती है । इस
कारण आत्मा की देहादि से भिन्नता तथा देहादि जगत् के
मिथ्यापन की भावना सदा ही किया करे ।
किं मन्त्रजपवन्मूर्तिध्यानवद् वात्मभेदधीः ।
जगन्मिथ्यात्वधीश्चात्र व्यावत्र्या स्यादुतान्यथा ।।११३।।
आत्मा के देहादि से भिन्न होने के ज्ञान को, तथा जगत् के
मिथ्या होने के विचार को, मन्त्र के जप की तरह, या देवता के
ध्यानादि की तरह नियम से करें ? या लौकिक कामों की तरह
नियम के बिना भी कर सकते हैं ? यह एक साधन मार्ग का प्रश्न है।
२६४ पञ्चदशी
अन्यथेति विजानीहि दृष्टार्थत्वेन भुक्तिवत् ।
बुभुक्षुर्जपवद् भुङ्क्ते न कश्चिन्नियतः क्वचित् ॥११४॥
यह तो बिना नियम ही करना चाहिये। क्योंकि यह मामला
तो भोजन आदि की तरह दृष्टार्थ ही है । भूख को हटाने के
लिये खाना चाहने वाला पुरुष जप करने वाले की तरह नियम
से नहीं खाता [किन्तु जिस तरह भी उसकी भूख शान्त हो
जाय उसी तरह भोजन करता है ।]
अश्नाति च नवाश्नाति भुङ्क्ते वा स्वेच्छयाऽन्यथा ।
येन केन प्रकारेण क्षुधामपनिनीषति ॥११५॥
भूख की शान्ति चाहने वाला पुरुष अन्न हो तो खाता है,
नहीं हो तो नहीं खाता, [बिना खाये ही दिन काट देता है]
आसन पर बैठकर चलते चलते मूढ़े या कुर्सी पर बैठकर अथवा
लेटे लेटे ही स्वेच्छा से खाया करता है । जिस किसी तरह
भूख को ही हटा देना चाहता है । [भाव यह है कि भोजन
तो भूख की शान्तिरुपी दृष्ट फल के लिये ही करना चाहिये।
उस में जो विशेष विशेष नियम लगा दिये गये हैं वे नियम
परलोक के लिये होते हैं ।]
नियमेन जपं कुर्यादकृतौ प्रत्यवायतः ।
अन्यथाकरणेऽनर्थः स्वरवर्णविपर्ययात् ॥११६॥
जप को तो नियम से ही करना चाहिये । जप को न करें,
तो पाप चढ़ता है । उस जप को यदि अविधिपूर्वक करें तो
स्वर और वर्ण के उलट पुलट हो जाने से अनर्थ हो जाता है ।
क्षुधेव दृष्टबाधाकृद् विपरीता च भावना ।
जेया केनाप्युपायेन नास्त्यत्रानुष्ठितेः क्रमः ॥११७॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६५
विपरीत भावना तो भूख की तरह से केवल दृष्टबाधा ही
किया करती है । [यह बात सब के अनुभव से सिद्ध हो रही
है] उस विपरीत भावना को किसी भी उपाय से जीत लेना
चाहिये । उसके जीतने में अनुष्ठान का कोई भी निश्चित क्रम
नहीं हो सकता ।
उपायः पूर्वमेवोक्त स्तच्चिन्ताकथनादिकः ।
एतदेकपरत्वेऽपि निर्वन्धो ध्यानवन्नहि ॥११८॥
एक सौ छःवें श्लोक में उसी की चिन्ता, उसी का कथन
आदि उपाय का वर्णन तो हमने पहले ही कर दिया है। यद्यपि
उसमें तदेकपरता का कथन है,परन्तु ध्यान की तरह का कठिन
वन्धन उसमें नहीं है ।
मूर्तिप्रत्ययसान्तत्य मन्यानन्तरितं धियः ।
ध्यानं, तत्रातिनिर्वन्धो मनसश्चञ्चलात्मनः ॥११९॥
बुद्धि को जो मूर्ति का ज्ञान हो रहा है, वह ज्ञान निरन्तर
धाराप्रवाह रूप से चलता रहे, कोई भी विजातीय प्रत्यय उस
के बीच में न आये, तो बस इसी को 'ध्यान' कहते हैं। [सदा
घूमते रहने वाले हाथी घोड़े आदि को जैसे एक ठूंठ आदि
में बाँध दिया जाता है इसी तरह] इस चंचलात्मा मन को
इसी ध्यान में बाँध देना चाहिये ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥१२०॥
गीता में भी कहा है कि—हे कृष्ण ! यह मन बड़ा ही
चंचल है, यह प्रमथनशील है [पुरुष को व्याकुल कर रखना
ही इसका स्वभाव है] यह बड़ा ही बल वाला है [इसका वश
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में करना कोई सुकर काम नहीं है] यह बड़ा ही दृढ है [यह
सच्चे या झूठे किसी भी विषय में दृढता से गड़ा रहता है ।
उसमें से इसे उखाड़ लेना अशक्य काम समझा जाता है] इस
कारण उस मन के निग्रह करने को मैं वायु को रोक रखने के
समान ही सुदुष्कर काम मानता हूँ ।
अप्यब्धिपानान्महतः सुमेरून्मूलनादपि ।
अपि वह्न्यशनात् साधो विषमश्चित्तनिग्रहः ॥१२१॥
योगवासिष्ठ में भी कहा है कि—समुद्र को पी डालने से
सुमेरु पर्वत को उखाड़ डालने से या फिर दहकते अंगारों को
सटक लेने से भी हे साधो ! इस चित्त का निग्रह कर लेना
कहीं कठिन ही है ।
कथनादौ न निर्बन्धः शृङ्खलाबद्धदेहवत् ।
किन्त्वनन्तेतिहासाद्यै र्विनोदो नाट्यवद्धियः ॥१२२॥
श्रृंखला से बांधे हुए देह का जैसा निर्बन्ध होता है, ऐसा
निर्बन्ध कथन तथा चिन्ता आदि का नहीं माना जाता [निर्बन्ध न
हो इतना ही नहीं] प्रत्युत अनन्त इतिहास, युक्ति, दृष्टान्त आदि
के द्वारा इससे बुद्धि का विनोद भी तो होता ही है। जैसे कि
नाट्य को देखकर किसी की बुद्धि का विनोद होता हो। [यही
राजयोग की विशेषता है]
चिदेवात्मा जगन्मिथ्येत्यत्र पर्यवसानतः ।
निदिध्यासनविक्षेपो नेतिहासादिभिर्भवेत् ॥१२३॥
उन इतिहासादि का पर्यवसान केवल इसी अर्थ में होता
है कि—आत्मा चिन्मात्र स्वरूप है [वह देहादि रूप नहीं है]
तथा यह जगत् मिथ्या है । जब किसी को ऐसा निश्चय हो
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६७
जाता है तब फिर इतिहासादियों से उस के निदिध्यासन में
विक्षेप नहीं पड़ता ।
कृषिवाणिज्यसेवाद्यौ काव्यतर्कादिकेषु च ।
विक्षिप्यते प्रवृत्त्या धीस्तैस्तत्वस्मृत्यसंभवात् ॥१२४॥
खेती, व्योपार, नौकरी, काव्य तथा तर्कादि का अनुशीलन
करने पर तो उनमें प्रवृत्ति के कारण बुद्धि विक्षिप्त हो ही
जाती है । क्योंकि इनके करते हुए तत्व की स्मृति असम्भव
है । [इस कारण कृषि आदि को छोड़कर उन इतिहासादि को
स्वीकार किया गया है]
अनुसन्दधतैवात्र भोजनादौ प्रवर्तितुम् ।
शक्यतेऽत्यन्तविक्षेपाभावादाशु पुनः स्मृतेः ॥१२५॥
[शरीर यात्रा के लिये अत्यावश्यक] भोजन आदि में तो
आत्मा का अनुसन्धान (स्मरण) करते हुए भी प्रवृत्ति हो
सकती है। क्योंकि भोजनादि अन्तरंग कामों से किसी को
अत्यन्त विक्षेप नहीं होता। उसका कारण यह है कि तत्व का
स्मरण फिर तुरन्त ही हो जाता है। [भोजनादि में हमारा
मन व्यग्र नहीं होता है, यह तो शरीर करता रहता है, भोज-
नादि के समय भी तत्वस्मृति रखी जा सकती है। हाँ, मनो-
राज्य जब होगा तब वह तत्व को उलटा समझा कर ही होगा ।]
तत्वविस्मृतिमात्रान्नार्थः किन्तु विपर्ययात् ।
विपर्येतुं न कालोऽस्ति झटिति स्मरतः क्वचित् ॥१२६॥
तत्व को भूल जाने मात्र से ही अनर्थ नहीं होता। किन्तु
अनर्थ तो विपरीत ज्ञान हो जाने से होता है । जब कोई पुरुष
१६८ पञ्चदशी
तुरन्त ही आत्मतत्व का स्मरण कर लेता है उसे विपरीत ज्ञान
होने का तो कोई अवसर ही नहीं मिलता ।
तत्त्वस्मृतेरवसरो नास्त्यन्याभ्यासशालिनः ।
प्रत्युताभ्यासघातित्वाद् बलात् तत्त्वमुपेक्ष्यते ॥१२७॥
जो पुरुष अनात्मपदार्थों का अभ्यास किया करता है,
उसको तो तत्त्वस्मरण का अवकाश [ मौक़ा=फुर्सत ] ही नहीं
मिलता । इतना ही नहीं प्रत्युत ऐसे अभ्यास ब्रह्माभ्यास के
विघातक होते हैं । उस समय तो स्मरण किया हुआ तत्व भी
बलात् भूल जाता है ।
तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ ।
इति श्रुतं तथान्यत्र वाचो विग्लापनं त्विति ॥१२८॥
तत्त्वस्मरण के विरोधी काव्यतर्कादि के अनुशीलन को
छोड़ने की बात 'तमेवैकं विजानीथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ
अमृतस्यैष सेतुः' (मुण्ड२५-२) इस श्रुति में तथा (नानुध्यायाद्बहूञ्शब्दा
न्वाचो विग्लापनं हि तत्) (बृह० ४-४-२१) इस श्रुति में कही
गयी है ।
आहारादि त्यजन्नैव जीवेच्छास्त्रान्तरं त्यजन् ।
किं न जीवसि, येनैवं करोष्यत्र दुराग्रहम् ॥१२९॥
भोजनादि का त्याग करके तो कोई जीवित नहीं रह
सकता । क्या तुम उसी तरह दूसरे अनात्मशास्त्रों का त्याग
करके जीवित नहीं रह सकते हो ? जिससे ऐसा दुराग्रह किये
जा रहे हो ।
जनकादेः कथं राज्यमिति चेद् दृढबोधतः ।
तथा तवापि चेत् तर्कं पठ यद्वा कृषिं कुरु ॥१३०॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६९
यदि यह पूछो कि—जनकादि तत्त्ववेत्ताओं ने राज्य का
पालन आदि कैसे किया था ? तो उसका उत्तर यह है कि वे
तो दृढबोध के कारण वैसा कर सके थे [उनका अपरोक्षज्ञान
बड़ा दृढ था। उससे उनकी प्रवृत्ति उनके आत्मचिन्तन में
बाधक नहीं होती थी] जनकादि जैसा ही दृढबोध यदि तुमको
भी हो चुका हो, तो तुम भी चाहे तो तर्क पढ़ो, या खेती करने
लगो। [पक्षी अपने नन्हे बच्चों को तभी तक अपने निवास
में रखते हैं, जब तक उनके पंख पक नहीं जाते। पंखों के
पक जाने पर तो वे उन्हें चोंचों से मार मार कर बाहर निकाल
देते हैं। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी को तभी तक सांसारिक कर्मों
से बचने को कहा जाता है जब तक उसका ज्ञान पक नहीं
जाता। पंखों के पक जाने पर पक्षियों के बच्चे चाहे जहां
उड़ें, इसी प्रकार ज्ञान के पक जाने पर ज्ञानी लोग चाहे जो
कुछ करें,फिर उनका ज्ञानदीपक बुझता नहीं। प्रत्युत उनका व्य-
वहार उनके ज्ञान को पकाता रहता है]
मिथ्यात्ववासनादार्थ्ये प्रारब्धक्षयकाङ्क्षया।
अक्लिश्यन्तः प्रवर्तन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ॥१३१॥
जिन लोगों की संसारमिथ्यात्व की वासना दृढ हो जाती
है [संसार की असारता को जानने वाले] वे तत्त्वज्ञानी भी
प्रारब्ध को क्षय करने की ही एक मात्र इच्छा से, बिना किसी
खेद के, अपने अपने कर्मों के अनुसार, प्रवृत्ति किया करते हैं
[क्योंकि प्रारब्ध का फल तो अवश्य ही मिलता है, उसका
क्षय तो केवल भोग से ही हो सकता है, इस विचार को लेकर
ज्ञानियों की प्रवृत्ति हुआ करती है। प्रारब्ध के अनुसार आये
२७० पञ्चदशी
सुख दुःखों को देखकर अज्ञानियों की तरह उन्हें कोई क्लेश
नहीं होता ]
अतिप्रसङ्गो मा शंक्यः स्वकर्मवशवर्तिनाम् ।
अस्तु वा केन शक्येत कर्म वारयितुं वद ॥१३२॥
ऐसे तो फिर ज्ञानी लोग अनाचार भी करेंगे, ऐसी शंका
न करनी चाहिए। या फिर अपने अपने प्रारब्ध कर्म के बस
में आकर अनाचार कर भी बैठे तो बताओ प्रारब्ध कर्म को
वारण कर देने का सामर्थ्य ही किसमें है ? [ प्रारब्ध तो ईश्वर
का संकल्प है वह हमारे संकल्पों से प्रबल होता है उसका
वारण कोई भी नहीं कर सकता । ]
ज्ञानिनोऽज्ञानिनश्चात्र समे प्रारब्धकर्मणी ।
न क्लेशो ज्ञानिनो धैर्यान्मूढः क्लिश्यत्यधैर्यतः ॥१३३॥
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही के प्रारब्ध कर्म समान होते
हैं। उनमें भेद केवल इतना ही है कि धैर्य के कारण ज्ञानो को
तो क्लेश नहीं होता। परन्तु अधीरता के कारण मूढ पुरुष दुःखी
हुआ है। [ इसी विषय पर एक भाषा कवि ने कहा
है—देह धरे का दण्ड है सब काहू को होय। ज्ञानी भुगते ज्ञान
सों मूरख भुगते रोय । ]
मार्गे गन्त्रोर्द्वयोः श्रान्तौ समायामप्यदूरताम् ।
जानन् धैर्याद् द्रुतं गच्छेद॒न्यस्तिष्ठति दीनधीः ॥१३४॥
मार्ग में जाने वाले दो यात्री जब थक जाते हैं और दोनों
की यात्रा समाप्त होने को होती है, उन दोनों यात्रियों में से,
यात्रा की समाप्ति को जानने वाला एक तो, धीरता के कारण
शीघ्र शीघ्र चलता ही जाता है। दूसरा तो
[Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् २७१
[Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् २७१
की अदूरता का ज्ञान नहीं होता] दीनबुद्धि होकर मार्ग में ही
बैठ रहता है ।
साक्षात्कृतात्मधीः सम्यगविपर्ययबाधितः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीर मनुसंज्वरेत् ॥१३५॥
आत्मा को साक्षात्कार कर लेने वाली बुद्धि, जिसके हाथ
लग गयी है, जो कभी भी विपरीत ज्ञान से बाधित नहीं होता
है [जो कभी भी देहादि को आत्मा नहीं समझता है ] ऐसा
महापुरुष बताओ तो सही कि किस वस्तु की चाह में फँसकर
तथा किसके लिये, मांस के ढेर इस शरीर के पीछे पीछे दुःखी
होता फिरे ? [ऐसे ज्ञानी को तो दुःखी होने की कुछ आवश्य-
कता ही नहीं रह जाती]
जगन्मिथ्यात्वधीभावादाक्षिप्तौ काम्यकामुकौ ।
तयोरभावे सन्तापः शाम्येन्निःस्नेहदीपवत् ॥१३६॥
क्योंकि इस ज्ञानी को जगत् के मिथ्या होने की बुद्धि
उत्पन्न हो गयी है, इस कारण ज्ञानी की उदार दृष्टि में न तो
कामना करने का पदार्थ रहता है और न कामना करने वाला
ही, शेष रहता है। जब कि इस संसाररूपी गाड़ी को चलानेवाले
काम्य और कामुक नाम के ये दो पहिये ही न रहे तब बिचारा
सन्ताप इस प्रकार शान्त हो जाता है, मानो तेल के न रहने से
कोई दीपक ही बुझ गया हो ।
गन्धर्वपत्तने किंचिन्मैन्द्रजालिकनिर्मितम् ।
जानन् कामयते किन्तु जिहासति हसन्निदम् ॥१३७॥
ऐन्द्रजालिक की बनाई हुई समझ लेने के कारण, गन्धर्व-
नगर की किसी भी वस्तु की कामना, कोई नहीं करता। प्रत्युत
'यह तो झूठी है' इस प्रकार हँस कर उसे छोड़ देना चाहता
है [इस दृष्टान्त से यह समझ लो कि—जब काम्य पदार्थ नहीं
रहता तब कामना भी नहीं होती] ।
आपातरमणीयेषु भोगेष्वेवं विचारवान् ।
नानुरज्यति, किन्त्वेतान् दोषदृष्ट्या जिहासति ॥१३८॥
ऊपर के दृष्टान्त के अनुसार जो माला, चन्दन, स्त्री आदि
भोग केवल देखने में ही रमणीक मालूम होते हैं, उनको आपात-
रमणीक समझ लेने वाला पुरुष, उनमें आसक्ति नहीं करता ।
किन्तु वह तो दोषों को देख कर इनको छोड़ देना ही चाहता है ।
अर्थानामर्जने क्लेशस्तथैव परिपालने ।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान् क्लेशकारिणः ॥१३९॥
[विषयों के दोष तो ये हैं जिनको कि ज्ञानी देखा करता
है] सम्पत्ति के उपार्जन में साधारण कष्ट नहीं होता । उसकी
रक्षा करने में तो उससे भी अधिक दुःख भोगना पड़ जाता
है । वह सम्पत्ति जब अपनी आंखों के सामने नष्ट होती है या
व्यय होने लगती है तब उस दुःख को भी सभी जानते हैं ।
प्रत्येक अवस्था में दुःख देने वाले इन भोगों को धिक्कार ही है।
मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपंजरे ।
स्नाय्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियाः किमिव शोभनम् ॥१४०॥
नाड़ियों, हड्डियों और मांस के मोटे मोटे लोथड़ों वाली,
मांस की पुतली इस स्त्री के, यन्त्र की तरह के इस चंचल
शरीर रूपी पींजरे में खूबसूरत चीज़ ही क्या है ? [यही बात
विवेकी की समझ में नहीं आती] ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७३
तृप्तिदीपप्रकरणम् २७३
एवमादिषु शास्त्रेषु दोषाः सम्यक् प्रपंचिताः ।
विमृशन्ननिशं तानि कथं दुःखेषु मज्जति ॥१४१॥
इत्यादि शास्त्रों में विषयों के दोषों को भले प्रकार सम-
झाया गया है । उन दोषों का विमर्श दिन रात करता हुआ
साधक, दुःखों में फँस ही कैसे सकता है ?
क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं ह्यत्तुमिच्छति ।
मिष्टान्नध्वस्ततृड् जानन्नामूढस्तज्जिघत्सति ॥१४२॥
मूर्ख लोगों की बात हम नहीं कहते, किन्तु जो अमूढ हैं,
जिनकी तृष्णा एक बार मिष्टान्न भोजन से नष्ट हो चुकी है, वे
भूख से व्याकुल होने पर भी, 'यह विष है' यह जान लेने पर
उस विष को खाना नहीं चाहते ।
प्रारब्धकर्मप्राबल्याद्द्भोगेपिच्छा भवेद्यदि ।
क्लिश्यन्नेव तदाप्येष भुङ्क्ते विष्टिगृहीतवत् ॥१४३॥
प्रारब्ध कर्मों की प्रबलता से यदि ज्ञानी को भोगों की
इच्छा हो जाती है तो भी यह बेगार में पकड़े हुए मजदूरों की
तरह दुःखी होता हुआ ही, उन विषयों को भोगा करता है ।
[इच्छा होने पर भी वह कुछ चाव के साथ उन्हें नहीं भोगता]।
भुञ्जाना वा अपि बुधाः श्रद्धावन्तः कुटुम्बिनः ।
नाद्यापि कर्म नश्छिन्नमिति क्लिश्यन्ति सन्ततम् ॥१४४॥
लोक में देखते हैं कि—जो श्रद्धाशील गृहस्थी ज्ञानी होते
हैं, वे भोगों को भोगते हुए भी, सदा यही दुःख माना करते हैं,
कि ओहो ! अभी तक भी हमारे कर्म क्षीण नहीं हो पाये ।