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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 726 में से

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पृष्ठ 275

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तृप्तिदीपप्रकरणम् २५५

[Main Text]
प्रत्यगात्मा को बुद्धिवृत्तियाँ कैसे विषय करेंगी ? इस प्रश्न का
उत्तर यह है कि] स्वयंप्रकाश भी वह साक्षी अन्य घटादियों
के समान धीवृत्तियों से व्याप्त तो हो ही जाता है [तभी तो
'मैं स्वयंप्रकाश हूँ' ऐसी बुद्धिवृत्ति का होना सम्भव हो गया
है ] यह बात हम सिद्धान्त से बाहर की नहीं कह रहे हैं क्योंकि
शास्त्रकारों ने यही तो कहा है कि फल [अर्थात् वृत्ति में प्रति-
विम्बित चिदाभास] इस आत्मा को व्याप्त नहीं करता [क्योंकि
वह तो स्वयं ही स्फुरणरूप होता है । आत्मा की वृत्ति की
व्याप्ति को तो पूर्वाचार्य भी मानते ही हैं। वे तो केवल फल
की व्याप्ति का निषेध करते हैं]
बुद्धितत्स्थचिदाभासौ द्वावपि व्याप्तुतो घटम् ।
तत्राज्ञानं धिया नश्येदाभासेन घटः स्फुरेत् ॥९१॥
[जब हमें घट दीखता है तब] बुद्धि भी और उसमें पड़ा
हुआ चिदाभास भी दोनों ही घट को व्याप्त किया करते हैं
[दोनों के व्याप्त करने के फल भी पृथक् पृथक् देख लो कि]
उन दोनों में से बुद्धिवृत्ति से तो अज्ञान नष्ट हो जाता है—
[क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है] तथा
दूसरा जो चिदाभास है उस से घट की स्फूर्ति हुआ करती है
[क्योंकि जड होने के कारण घट में स्वयं स्फुरण की योग्यता
नहीं होती]
ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ।
स्वयंस्फुरणरूपत्वान्नाभास उपयुज्यते ॥९२॥
[प्रत्यगात्मा और ब्रह्म की जो एकता थी उसको अज्ञान
ने आवृत कर रक्खा था] ब्रह्म में के उस अज्ञान का नाश करने