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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

है उसका चलते रहना उन्हें पसन्द नहीं रहता। वे अपनी विवेक

२७४ पञ्चदशी
है उसका चलते रहना उन्हें पसन्द नहीं रहता। वे अपनी विवेक
की आंख से उसको बन्द हुआ देखना चाहते हैं ]
नायं क्लेशोऽत्र संसारतापः किन्तु विरक्तता ।
भ्रान्तिज्ञाननिदानो हि तापः सांसारिकःस्मृतः ॥१४५॥
उनके इस अनुताप रूप क्लेश को सांसारिक दुःख नहीं
समझना चाहिए। क्योंकि यह तो उनकी विरक्तता है [संसार
की अनासक्ति के कारण वे ऐसा अनुताप किया करते हैं ] सांसा-
रिक ताप को तो आचार्यों ने भ्रान्ति ज्ञान से उत्पन्न होने वाला
कहा है [यह ताप तो विवेक ज्ञान से उत्पन्न हुआ करता है।
इस कारण यह वैसा हेय नहीं है]।
विवेकेन परिक्लिश्यन्नल्पभोगेन तृप्यति ।
अन्यथानन्तभोगेऽपि नैव तृप्यति कर्हिचित् ॥१४६॥
[ सांसारिक ताप और विरक्तता का भेद भी सुन लो ]
विवेक से परिक्लिष्ट होता हुआ [ज्ञानी] थोड़े से भोग से ही तृप्त
हो जाता है। [उन भोगों को दूर से ही नमस्कार कर लेता है]
विवेक के न होने पर तो अनन्त भोगों के भोग लेने पर भी
कभी तृप्त नहीं हो पाता [यों कामनाओं का निवर्तक होने से,
यह क्लेश तो विवेकमूलक ही है]।
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥१४७॥
यह कामना कभी भी कामों के भोग से शान्त नहीं होती।
यह [कामना] तो घी से आग की तरह विषयाहुति से उत्तरोत्तर
बढ़ती ही जाती है। [भाव यह है कि—विवेकी की तरह,
अविवेकी लोग भोगों से तृप्त नहीं हो सकते। ऐसी अवस्था में