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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

महावाक्यविवेकप्रकरणम् ११९

महावाक्यविवेकप्रकरणम् ११९

अस्वादु रस पहचाने जाते हैं, एवं और भी सकलेन्द्रियों तथा
अन्तःकरण की भिन्न भिन्न वृत्तियों से जिस चैतन्य की सूचना
तत्वदर्शी को जब तब मिला करती है, उसी चैतन्य को इस
महावाक्य में 'प्रज्ञान' कहा गया है।
चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु ।
चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥२॥
अब ब्रह्म शब्द का अर्थ बताया जाता है [ उत्तम कहाने
वाले] चतुर्मुख इन्द्र तथा देवों में [मध्यम कहाने वाले] मनुष्यों
में तथा [अधम कहाने वाले ] घोड़े गाय आदि में [ एवं
आकाशादि भूतों में] जो एक चैतन्य व्याप्त हो रहा है [जिस से
इस जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो भी रहे हैं और प्रतीत
भी हो रहे हैं] वही ब्रह्मतत्व है। क्योंकि सब जगह रहने वाला
'प्रज्ञान' ही 'ब्रह्म' है। इसी से कहता हूँ कि मुझ में भी जो
'प्रज्ञान' है वह भी 'ब्रह्म' ही है [क्योंकि मेरे और उनके 'प्रज्ञान'
में कोई भी भेद नहीं है]।
परिपूर्णः परात्मास्मिन् देहे विद्याधिकारिणि ।
बुद्धेः साक्षितया स्थित्वा स्फुरन्नहमितीर्यते ॥३॥
[अब यजुः शाखा की बृहदारण्यक उपनिषद् के 'अहं ब्रह्मास्मि'
इस वाक्य के अर्थ को प्रकट करने के लिये इस श्लोक में 'अहं' शब्द
का अर्थ बताया जाता है] यों तो सभी देहों में परात्मा परिपूर्ण
हो रहा है और वह सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है, परन्तु
जब किसी अधिकारी देह में परिपूर्ण हुआ वह परमात्मा, बुद्धि
के साक्षीरूप में अधिकारी को भासने भी लग पड़ता है तब उसी
स्फूर्तियुक्त परात्मा को इस वाक्य में 'अहं' [मैं] कहा गया है।

३२० पञ्चदशी


यद्यपि परात्मतत्व समस्त देशों, सम्पूर्ण कालों, तथा सकल
वस्तुओं से अपरिच्छिन्न ही है, परन्तु वह इस मायाकल्पित
जगत् में माया की ओढ़नी ओढ़ कर छिप कर बैठ गया है।
जब तो वही परमात्मा शमदमादि साधनों से युक्त होने के
कारण, ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के योग्य बने हुए, और श्रवण मननादि
किये हुए, मनुष्यादि के अधिकारिशरीर में, बुद्धि किंवा सूक्ष्म
शरीर का भासक होकर फिर प्रकाशित होने लग पड़ता है—
अपनी माया की ओढ़नी को उतार कर फेंक देता है—इस महा-
वाक्य का 'अहं' शब्द उसी परात्मा की ओर को इशारा कर
रहा है।
स्वतः पूर्णः परात्ममात्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः ।
अस्मीत्यैक्यपरामर्श स्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥४॥
[अब इसी 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य में के ब्रह्म शब्द का
अर्थ बताया जाता है] स्वभाव से ही [देशकालादि के परि-
च्छेद में न आने वाले] परिपूर्ण परात्मा को इस महावाक्य में
'ब्रह्म' कहा गया है। इसी महावाक्य में जो कि 'अस्मि' [हूँ]
पद है, उस से जीव और ब्रह्म की एकता का परामर्श किया
गया है। जिस का यही सारांश होता है कि मैं ब्रह्म ही हूँ।
[मनुष्यादि देहों की दुर्बलताओं से दब कर मरने वाला—मनु-
ष्यादि देहों के परिच्छेद में आकर क़ैदी बना हुआ—इन
देहेन्द्रियादिरूपी उपनेत्र की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि से ही विचार
करने वाला—क्षुद्र प्राणी मैं नहीं हूँ]।
एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जितम् ।
सृष्टेः पुराधुनाप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ॥५॥