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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 726 में से

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पृष्ठ 137

महावाक्यविवेकप्रकरणम् ११९

अस्वादु रस पहचाने जाते हैं, एवं और भी सकलेन्द्रियों तथा
अन्तःकरण की भिन्न भिन्न वृत्तियों से जिस चैतन्य की सूचना
तत्वदर्शी को जब तब मिला करती है, उसी चैतन्य को इस
महावाक्य में 'प्रज्ञान' कहा गया है।
चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु ।
चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥२॥
अब ब्रह्म शब्द का अर्थ बताया जाता है [ उत्तम कहाने
वाले] चतुर्मुख इन्द्र तथा देवों में [मध्यम कहाने वाले] मनुष्यों
में तथा [अधम कहाने वाले ] घोड़े गाय आदि में [ एवं
आकाशादि भूतों में] जो एक चैतन्य व्याप्त हो रहा है [जिस से
इस जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो भी रहे हैं और प्रतीत
भी हो रहे हैं] वही ब्रह्मतत्व है। क्योंकि सब जगह रहने वाला
'प्रज्ञान' ही 'ब्रह्म' है। इसी से कहता हूँ कि मुझ में भी जो
'प्रज्ञान' है वह भी 'ब्रह्म' ही है [क्योंकि मेरे और उनके 'प्रज्ञान'
में कोई भी भेद नहीं है]।
परिपूर्णः परात्मास्मिन् देहे विद्याधिकारिणि ।
बुद्धेः साक्षितया स्थित्वा स्फुरन्नहमितीर्यते ॥३॥
[अब यजुः शाखा की बृहदारण्यक उपनिषद् के 'अहं ब्रह्मास्मि'
इस वाक्य के अर्थ को प्रकट करने के लिये इस श्लोक में 'अहं' शब्द
का अर्थ बताया जाता है] यों तो सभी देहों में परात्मा परिपूर्ण
हो रहा है और वह सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है, परन्तु
जब किसी अधिकारी देह में परिपूर्ण हुआ वह परमात्मा, बुद्धि
के साक्षीरूप में अधिकारी को भासने भी लग पड़ता है तब उसी
स्फूर्तियुक्त परात्मा को इस वाक्य में 'अहं' [मैं] कहा गया है।