पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६५
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६५
वायु है तो एक भाग अग्नि है] वह वह्नि भी वास्तव पदार्थ
नहीं है, वह भी वायु में कल्पित है। पुराणों के कथनानुसार
इन पांचों भूतों में १/१० भाग के अनुसार क्रम से न्यूनाधिक
भाव है।
वह्निरुष्णः प्रकाशात्मा पूर्वानुगतिरत्र च ।
अस्ति वह्निः स निस्तत्वः शब्दवान् स्पर्शवानपि॥८९॥
वह्नि उष्ण है और प्रकाशस्वरूप है। इस में भी वायु
की तरह पूर्वानुगति अर्थात् कारण के धर्मों की अनुगति हो ही
रही है। जभी तो कहा जाता है कि वह्नि है। वह निस्तत्व
[मिथ्या] है शब्द और स्पर्श भी उस में रहते हैं।
सन्मायाव्योमवाय्वंशैर्युक्तस्याग्नेर्निजो गुणः ।
रूपं, तत्र सतः सर्वमन्यद् बुद्ध्या विविच्यताम्॥९०॥
सत् माया आकाश तथा वायु के अंशों से युक्त जो अग्नि
है, उस का अपना गुण तो 'रूप' ही है। उन में से सद्वस्तु को
छोड़ कर और जितने भी धर्म हैं वे सब मिथ्या हैं। इस बात
का विवेचन [पृथक्करण] बुद्धि के अवष्टम्भ से कर लेना चाहिये।
सतो विविक्ते वह्नौ मिथ्यात्वे सति वासिते ।
आपो दशांशतो न्यूनाः कल्पिता इति चिन्तयेत् ॥९१॥
सत् से वह्नि के विविक्त कर लेने पर और वह्नि के
मिथ्यात्व के वासित हो जाने पर फिर यह चिन्तन करना
चाहिये कि जल भी वह्नि से दशांश कम है और वह भी
कल्पित किंवा मिथ्या ही है ।
सन्त्यपोऽमूः शून्यतत्त्वाः सशब्दस्पर्शसंयुताः ।
रूपवत्योऽन्यधर्मानुवृत्त्या स्वीयो रसो गुणः ॥९२॥
६६ पञ्चदशी
दूसरों के धर्मों की अनुवृत्ति के कारण कहा जाता है कि 'यह
जल है' 'यह शून्यतत्व है' यह शब्द, स्पर्श तथा रूप वाला है।
इसका अपना गुण तो केवल 'रस' ही है ।
सतो विवेचितास्वप्सु तन्मिथ्यात्वे च वासिते ।
भूमिं दशांशतो न्यूना कल्पिताप्स्विति चिन्तयेत् ॥९३
विवेक और ध्यान से जल के मिथ्यात्व का निश्चय करके
फिर यह निश्चय करे कि भूमि भी जल से दस भाग कम है
और वह भी जल में कल्पित किंवा मिथ्या ही है ।
अस्ति भूस्तत्त्वशून्यास्यां शब्दस्पर्शी सरूपकौ ।
रसश्च परतो गन्धो नैजः, सत्ता विविच्यताम् ॥९४॥
भूमि है, वह निस्तत्व है, इस में शब्द, स्पर्श, रूप तथा
रस ये गुण दूसरों से आये हैं [क्योंकि कारणों के धर्म कार्य में
आया करते हैं] । गन्ध इसका निज गुण है । उन सब में से
सत्ता का विवेक अथवा पृथक्करण कर डालना चाहिये ।
पृथक्कृतायां सत्तायां भूमिर्मिथ्याऽवशिष्यते ।
भूमे दशांशतो न्यूनं ब्रह्माण्डं भूमिमध्यगम् ॥९५॥
सत्ता के पृथक् कर लेने पर भूमि नाम का पदार्थ मिथ्या
हो जाता है [अब आगे भौतिक ब्रह्माण्डादियों से सत् का
विवेक कैसे करें ? वह दिखाया जाता है कि] भूमिमध्यग
अर्थात् आकाश में घूमते रहने वाले भूमि के खण्डों [परमा-
णुओं] से बना हुआ यह ब्रह्माण्ड भूमि से दस भाग
कम है ।
ब्रह्माण्डमध्ये तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश ।
भुवनेषु वसन्त्येषु प्राणिदेहा यथायथम् ॥९६॥
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६७
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६७
उस ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन निवास करते हैं। इन भुवनों
में ही प्राणियों के देह अपनी अपनी व्यवस्था के अनुकूल
निवास कर रहे हैं।
ब्रह्माण्डलोकदेहेषु सद्वस्तुनि पृथक्कृते ।
असन्तोऽण्डादयो भान्तु तद्भानेऽपीह का क्षतिः ॥९७॥
ब्रह्माण्ड लोक तथा देहों में से सद्वस्तु के पृथक् कर लेने
पर भी यदि असत् अण्डादियों का भान होता रहे, तो होता
रहो। उन का वैसा [ असद्रूप से ] भान होते रहने पर भी
फिर कुछ हानि नहीं होती।
भूतभौतिकमायानामसत्त्वेऽत्यन्तवासिते ।
सद्वस्त्वद्वैतमित्येषा धीर्विपर्येति न क्वचित् ॥९८॥
भूत [आकाशादि] भौतिक [ब्रह्मांड आदि] तथा माया
[जिस ने इन भूत भौतिकों को बनाया है] के मिथ्यात्व की
वासना [विवेक और ध्यान के द्वारा] जब चित्त में दृढ रीति
से वासित हो जाय तब फिर 'सद्वस्तु अद्वैत ही है' [वह कभी
द्विधाभाव को प्राप्त नहीं होती है, वह वैसी की वैसी ही रहती है]
यह बुद्धि कभी भी विपरीत नहीं हो सकती [फिर इस बुद्धि
का विघात कभी भी नहीं होता है ।]
सदद्वैतात् पृथग्भूते द्वैते भूम्यादिरूपिणि ।
तत्तदर्थक्रिया लोके यथा दृष्टा तथैव सा ॥९९॥
भूमि आदि रूपधारी यह द्वैत, जब सत् अद्वैत से पृथक्
कर लिया जाता है, तब फिर लोक में विशेष विशेष प्रयोजन
के लिये जो जो काम जैसे जैसे देखे जाते हैं [जैसे जल से
प्यास की शान्ति, भोजन से भूख की निवृत्ति] वे वैसे के वैसे .
ही [स्वप्न की तरह] बने रह सकते हैं [तात्पर्य यह है कि विवेक
६८ पञ्चदशी
ही [स्वप्न की तरह] बने रह सकते हैं [तात्पर्य यह है कि विवेक
के द्वारा मिथ्यात्व का निश्चय हो जाने पर भी वह विवेक
भूमि आदि के स्वरूप का उपमर्दन नहीं कर देता है । इस से
व्यवहार के सहसा लुप्त हो जाने का प्रसंग नहीं आता है ।
विवेक व्यवहार को रोकता नहीं है, विवेक तो केवल सर्वात्म्य
को जगाता है । जो काम क्षुद्र देहाभिमान की प्रेरणा से होते
थे वे अब सर्वात्म्य की दृष्टि से होने लग पड़ेंगे । यही विवेक
हो जाने की पहचान है ।]
सांख्यकाणादबौद्धाद्यैर्जगद्भेदो यथा यथा ।
उत्प्रेक्ष्यते ऽनेकयुक्त्या भवत्वेष तथा तथा ॥१००॥
सांख्य, काणाद तथा बौद्धादि दार्शनिक लोग जिस जिस
रीति से जगद्भेद की उत्प्रेक्षा अनेकानेक युक्तियों से करते हैं,
यह जगत् वैसा ही रहो [ वैसा वैसा व्यावहारिक भेद तो हम
भी मानते ही हैं। इस कारण उन के खण्डन करने का प्रयत्न
हम नहीं करते । ]
अवज्ञातं सदद्वैतं निःशङ्कैरन्यवादिभिः ।
एवं का क्षतिरस्माकं तद्द्वैत मवजानताम् ॥१०१॥
प्रमाणसिद्ध सत् अद्वैत की अवज्ञा, अन्य सांख्यादि
वादियों ने निःशङ्क होकर की ही है । फिर [ श्रुति युक्ति और
अनुभव के बल से चलने वाले ] हम लोग यदि उन के द्वैत
की अवज्ञा करते हैं तो इस से हमारी क्या हानि है ?
द्वैतावज्ञा सुस्थिता चेदद्वैते धीः स्थिरा भवेत् ।
स्थैर्ये तस्याः पुमानेष जीवन्मुक्त इतीर्यते ॥१०२॥
[ प्रत्युत उस अवज्ञा से एक महालाभ यह होता है कि ]
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९
द्वैत की अवज्ञा जब पूर्ण रूप से स्थित हो जाती है, तब साधक
की बुद्धि अद्वैत में स्थिर हो जाती है । इस बुद्धि के स्थिर हो
जाने पर फिर यह [ स्थिर बुद्धि वाला ] पुरुष 'जीवन्मुक्त'
कहाने लगता है । [अर्थात् जीवन्मुक्ति रूपी प्रयोजन के विद्य-
मान होने के कारण यह द्वैतापमान कोई निष्प्रयोजन बात
नहीं है । हां, उन लोगों का अद्वैतापमान उन के कल्याण मार्ग
का घातक अवश्य ही है ] ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥१०३॥
['जीवन्मुक्ति ही नहीं विदेहमुक्ति भी इसी द्वैतावज्ञा का फल
है' यह बात भगवद्गीता (२-७२) में कही गई है ] हे पार्थ, यहां
तक ब्रह्मनिष्ठा का वर्णन किया गया। [परमेश्वर की आराधना
से शुद्ध अन्तःकरण का] मनुष्य जब इस स्थिति को पा लेता है,
तब फिर वह कभी संसारमोह को प्राप्त नहीं होता है । यदि
अन्तकाल में भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में
निर्वाण किंवा लय को पा लेता है । [अथवा मरते समय क्षण
भर के लिये भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में निर्वाण
किंवा विदेहमुक्ति को पा लेता है, फिर जो पुरुष बचपन से ही इस
स्थिति में रहने लगा हो तो उस का कहना ही क्या है ? ]
सदद्वैतेऽनृतद्वैते यदन्योन्यैकवीक्षणम् ।
तस्यान्तकालस्तद्भेदबुद्धिरेव न चेतरः ॥१०४॥
[भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक में अन्तकाल शब्द से क्या
अभिप्राय है सो अब बताया जाता है] 'सद्रूप अद्वैत' तथा
'अनृतरूप द्वैत' में जो अब तक अन्योन्यैकवीक्षण
अन्योन्याध्यासरूपी ऐक्यज्ञान ] हो रहा था उस भ्रमज्ञान का
अन्तकाल तो यही है कि उनकी भेदबुद्धि उत्पन्न हो जाय
[अर्थात् उन अद्वैत और द्वैत को क्रम से सत्य और अनृत
समझ लिया जाय]। इस श्लोक में अन्तकाल शब्द का अभि-
प्राय वर्तमान देहपात से नहीं है ।
यद्वान्तकालः प्राणस्य वियोगोऽस्तु प्रसिद्धितः।
तस्मिन् कालेऽपि न भ्रान्तेर्गतायाः पुनरागमः॥१०५॥
अथवा लोकप्रसिद्धि के अनुसार प्राणों के वियोग को ही
अन्तकाल मान लो । उस में भी कोई दोष नहीं है । क्योंकि
जो भ्रान्ति उस समय नष्ट हो जायगी वह भ्रान्ति फिर कभी
भी लौट कर आने वाली नहीं है ।
इस लोक तथा परलोक की सन्धि 'मृत्यु' होती है । मृत्यु
समय में जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में उस
की परलोकसामग्री जल कर भस्म बन जायगी। फिर उसे
विदेह मुक्ति मिल जानी अत्यन्त सुकर होगी ।
नीरोग उपविष्टो वा रुग्णो वा विलुठन् भुवि ।
मूर्च्छितो वा त्यजत्वेष प्राणान् भ्रान्तिर्न सर्वथा ॥१०६॥
[जिस पुरुष की द्वैतावज्ञा स्थित हो गयी हो अथवा जिसे
ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो फिर] वह चाहे तो नीरोग
होकर, चाहे बैठे बैठे, चाहे रोगी रहकर, या भूमि पर पड़े
पड़े, अथवा मूर्च्छा अवस्था में प्राणों का त्याग करदे, उसे फिर
कभी भी भ्रान्ति नहीं हो सकती [मूर्च्छा आदि में ब्रह्म-विषयक
बुद्धिवृत्ति न भी हो तो भी ब्रह्मज्ञान के संस्कार तो रहते ही हैं,
उन्हीं से मुक्ति मिलकर रहेगी।]
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ७१
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ७१
दिने दिने स्वप्नसुप्त्योरधीते विस्मृतेऽप्ययम् ।
परेद्युर्नानधीतः स्यात्तद्वद्विद्या न नश्यति ॥१०७॥
स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था के आने पर प्रतिदिन पढ़े हुए
पाठ के भूल जाने पर भी, अगले दिन जब वह पाठक उठता
है तब अनधीत [अनपढ़] नहीं हो जाता है । इसी प्रकार मरते
समय मूर्च्छादि के कारण तत्व का विचार न कर सकने पर भी,
ज्ञानी का ज्ञान नष्ट नहीं होता है । [वह संस्कार रूप से तो
रहता ही है ।]
प्रमाणोत्पादिता विद्या प्रमाणं प्रवलं विना ।
न नश्यति न वेदान्तात् प्रवलं मानमीक्ष्यते ॥१०८॥
जिस विद्या को प्रमाणों ने उत्पन्न किया है, वह किसी
प्रबल प्रमाण के बिना नष्ट नहीं हो सकेगी । वेदान्तों से प्रबल
प्रमाण तो कोई देखा ही नहीं जाता । [फिर यह ज्ञान मूर्च्छा
आदि में कैसे नष्ट हो सकेगा ?]
तस्माद् वेदान्तसंसिद्धं सदद्वैतं न वाध्यते ।
अन्तकालेऽप्यतो भूतविवेकान्निर्वृतिः स्थिता ॥१०९॥
इससे यही सिद्ध हुआ कि वेदान्तसिद्ध सत् अद्वैत की
बाधा अन्तकाल में भी नहीं होगी । इसी से यह कहना सर्वथा
ठीक है कि भूतविवेक कर लेने पर ही निर्वृत्ति [किंवा मुक्ति]
की स्थिरता हो जाती है ।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं पंचभूतविवेकप्रकरणं समाप्तम्
3. Pancha Kosha Viveka
ओम्
पञ्चकोशविवेकप्रकरणम्
गुहाहितं ब्रह्म यत्तत् पञ्चकोशविवेकतः ।
बोद्धुं शक्यं ततः कोशपंचकं प्रविविच्यते ॥१॥
गुहा में छिपा हुआ जो ब्रह्मतत्व है वह पंचकोशविवेक के
करने पर भी जाना जा सकता है । इसलिये पांचों कोशों का
विवेक किया जाता है ।
यह प्रकरण तैत्तरीय उपनिषत् के तात्पर्य का व्याख्यान रूप
है—'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा
विपश्चिता' जो गुहा में छिपे हुए ब्रह्म को पहचानता है, इस
श्रुति में जिस गुहाहित ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है उस
ब्रह्म का ज्ञान पांचकोश नामक गुहाओं के विवेक से ही हो
सकता है । इसी कारण उन पांचों कोशों को आत्मा से पृथक्
करके अब दिखाया जाता है ।
देहादभ्यन्तरः प्राणः प्राणादभ्यन्तरं मनः ।
ततः कर्ता ततो भोक्ता गुहा सेयं परम्परा ॥२॥
देह से अन्दर प्राण, प्राण से अन्दर मन, मन से अन्दर
बुद्धि, तथा बुद्धि से अन्दर आनन्द, बस यह परम्परा ही तो
'गुहा' कहाती है ।
देह [अन्नमय कोष] से प्राण [प्राणमय कोश] अन्दर है ।
प्राण से मन अर्थात् मनोमय अन्दर है । मनोमय से 'कर्ता'
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३
जिसको 'विज्ञानमय' भी कहते हैं अन्दर है । उस विज्ञानमय
से 'भोक्ता' अर्थात् 'आनन्दमय' अन्दर का है । सो यह 'अन्न-
मय' से लेकर 'आनन्दमय' तक की परम्परा ही 'गुहा'
कहाती है । इसी में ब्रह्म लुक छिप गया है । इन पांचों
कोशों का विवेक कर लेने पर फिर भी उस के शुद्ध रूप के
दर्शन मिल ही सकते हैं ।
पितृभुक्तान्नजाद् वीर्याज्जातोऽन्नेनैव वर्धते ।
देहः सोऽन्नमयो नात्मा प्राक् चोर्ध्वं तदभावतः ॥३॥
माता और पिता जिस अन्न को खाते हैं, उस से जो वीर्य
बनता है, उस से यह देह उत्पन्न होता है । उत्पन्न होने के
पश्चात् यह फिर अन्न से ही वृद्धि को पाने लगता है । सो यह
तो स्पष्ट ही अन्न का विकार है । इस कारण यह अन्नमय
देह आत्मा नहीं है । देखते हैं कि जन्म होने से पहले भी यह
देह नहीं था, तथा मरने के पश्चात् भी यह देह नहीं रहेगा ।
[तात्पर्य यह है कि घटपदादि के समान उत्पत्ति वाला होने से
यह देह आत्मा नहीं है]
पूर्वजन्मन्यसन्नेतज्जन्म संपादयेत् कथम् ।
भाविजन्मन्यसत् कर्म न भुञ्जीतेह संचितम् ॥४॥
यदि वह पूर्व जन्म में नहीं था तो इसने इस जन्म को
पाया ही कैसे ? यदि इसका भावि जन्म नहीं होगा तो यहाँ
संचित किये पुण्य पापों को नहीं भोग सकेगा । [ इस कारण
आत्मा को देह से पृथक् और नित्य मानना चाहिये । ]
जब आत्मा को देहरूप ही माना जाता है तब यह स्पष्ट
ही है कि यह पूर्वजन्म में नहीं था और इस जन्म को उत्पन्न
७४ पंचदशी
करने वाला अदृष्ट भी नहीं था । फिर इस जन्म की उत्पत्ति
इस देहरूप आत्मा ने स्वयं कैसे करली ? इस पक्ष में
तो 'अकृताभ्यागम' दोष आता है अर्थात् जो इस शरीरात्मा ने
किया नहीं था उसे अब यह विचारा भोग रहा है । यह देह-
रूप आत्मा तो भाविजन्मों में भी नहीं रहेगा । यह तो यहाँ
ही गाड़ डाला या जला दिया जायगा । तब इस जन्म में
किये भले-बुरे कामों के फल को भोगने वाला कोई न रहेगा ।
सो यह 'कृतविनाश' नाम का महादोष आजायगा । इन दोनों
दोषों के कारण आत्मा को कार्य किंवा उत्पत्ति वाला मानना
ठीक नहीं है ।
पूर्णो देहे बल यच्छन्नक्षाणां यः प्रवर्तकः ।
वायुः प्राणमयो नासावात्मा चैतन्यवर्जनात् ॥५॥
पैर से लेकर मस्तकपर्यन्त देह में पूर्ण होकर [ व्यानरूप से ]
बल किंवा सामर्थ्य को देता हुआ जो वायु, चक्षु आदि इन्द्रियों का
प्रेरक होता है, वह वायु ही 'प्राणमय' कोश कहाता है। चैतन्य
रहित किंवा जड होने के कारण वह भी तो आत्मा नहीं है ।
अहन्तां ममतां देहे गेहादौ च करोति यः ।
कामाद्यवस्थया भ्रान्तो नासावात्मा मनोमयः ॥६॥
देह में 'मैं' भाव और गृहादि में 'मेरेपन का अभिमान'
जो किया करता है वह मनोमय भी आत्मा नहीं है । क्योंकि
वह तो कामादि अवस्थाओं से भ्रान्त हुआ रहता है । [ काम
क्रोध आदि विकारों के कारण उस मनोमय का स्वभाव नियत
नहीं रहता है। वह तो विकारी हुआ रहता है। फिर वह आत्मा
कैसे हो । क्योंकि आत्मा तो निर्विकार तत्व है ।]
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७५
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७५
लीना सुप्तौ वपुर्बोधे व्याप्नुयादानखाग्रगा ।
चिच्छायोपेतधीर्नात्मा विज्ञानमयशब्दभाक् ॥७॥
चिच्छाया से युक्त जो बुद्धि, सुषुप्तिकाल में लीन होजाती
है, तथा जागने पर नखाग्र तक शरीर को व्याप्त किये रहती
है, वह विज्ञानमय कहाने वाली बुद्धि भी तो आत्मा नहीं है
[बताओ कि विलय आदि अवस्थाओं में फंस जानेवाली बुद्धि
आत्मा कैसे हो ? ]
कर्तृत्वकरणत्वाभ्यां विक्रियेतान्तरिन्द्रियम् ।
विज्ञानमनसी अन्तर्बहिःस्थैते परस्परम् ॥८॥
[मनोमय तथा विज्ञानमय का भेद इस श्लोक में बताया जाता
हैं] अन्दर की इन्द्रिय जिसे मन भी कहते हैं, कभी तो कर्त्ता-
रूप से तथा कभी करणरूप से परिणत होती रहती है। जब
कर्त्तारूप से परिणत होती है तब उसको 'विज्ञानमय कोश'
कहते हैं। जब करणरूप से परिणत होती है तब उस को
'मनोमय कोश' कहा जाता है। ये दोनों आपस में अन्दर
बाहर रहा करते हैं [बुद्धि अन्दर रहती है, मन बाहर रहता
है, उसी से एक के ही दो कोश हो गये हैं।]
काचिदन्तर्मुखा वृत्तिरानन्दप्रतिविम्बभाक् ।
पुण्यभोगे, भोगशान्तौ निद्रारूपेण लीयते ॥९॥
जब हम किसी पुण्यकर्म के फल का अनुभव करते हैं,
तब कोई बुद्धिवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है और उस पर आनन्द
का प्रतिविम्ब पड़ जाता है, तथा भोगों के शान्त हो जाने पर
वही बुद्धिवृत्ति निद्रारूप से विलीन हो जाती है। [उस लीन
बुद्धिवृत्ति को ही 'आनन्दमय' कहा जाता है।]
७६ पंचदशी
कादाचित्कत्वतो नात्मा स्यादानान्दमयोऽप्ययम् ।
विम्बभूतो य आनन्द आत्मासौ सर्वदा स्थितेः॥१०॥
यह 'आनन्द' भी कादाचित्क[कभी कभी होने वाला=सदा
न रहने वाला] होने से [मेघ आदि कादाचित्क पदार्थों के
समान] आत्मा नहीं है। किन्तु बुद्धि आदि में प्रतिबिम्बित
होकर बैठे हुए आनन्दमय का बिम्बभूत अर्थात् कारणभूत जो
आनन्द है, वही तो सच्चा आत्मा है। क्योंकि वह सदा ही
बना रहता है [नित्य है]
ननु देहमुपक्रम्य निद्रानन्दान्तवस्तुषु ।
मा भूदात्मत्वमन्यस्तु न कश्चिदनुभूयते ॥११॥
अन्नमय देह से लेकर निद्रा तथा आनन्द पर्यन्त पदार्थों
में आत्मभाव नहीं है तो न सही, परन्तु इन के अतिरिक्त और
भी तो कोई वस्तु अनुभव में नहीं आती है [जिसे आत्मा
कहा जा सकता हो]।
बाढं, निद्रादयः सर्वेऽनुभूयन्ते न चेतरः ।
तथाप्येतेऽनुभूयन्ते येन तं को निवारयेत् ॥१२॥
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि—"निद्रानन्द से लेकर देह
पर्यन्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं और कुछ भी पदार्थ उपलब्ध नहीं
होता" तुम्हारा यह कहना तो बिलकुल ठीक है। परन्तु इन सब
पदार्थों का अनुभव जो करता है उस को कौन हटा सकता है।
[तात्पर्य यह है कि यह तो ठीक है कि इन के अतिरिक्त
और कोई उपलब्ध नहीं होता है परन्तु जिस अनुभव के बल
से इन सब आनन्दमयादि में उपलभ्यमानता आ गयी है उस
अनुभव की सत्ता का निषेध तुम कैसे कर सकते हो]
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७
[Header]
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७
स्वयमेवानुभूतित्वाद् विद्यते नानुभाव्यता ।
ज्ञातृज्ञानान्तराभावादज्ञेयो न त्वसत्तया ॥१३॥
स्वयं अनुभूतिरूप होने से वह तत्त्व किसी का अनुभाव्य
नहीं होता है । उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान
दूसरा न होने से वह अज्ञेय रहता है। उस के अज्ञेय होने का
कारण असत्ता नहीं होती ।
इन आनन्दमयादियों का जो साक्षी है वह क्योंकि अनु-
भव रूप है इसी से वह अनुभाव्य कभी नहीं होता है । उस
के 'अज्ञेय' होने का कारण उसकी असत्ता नहीं है । किन्तु
उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान कोई होता ही नहीं
है इस कारण से वह अज्ञेय बना हुआ है। ऐसी अवस्था में
केवल अनुपलब्ध होने से ही उसे असत् नहीं मान बैठना
चाहिये । उपलब्ध तो विषय हुआ करते हैं । वह किसी का
विषय नहीं है । इसी से वह किसी को उपलब्ध नहीं होता
है । वह तो उपलब्ध करने वालों का स्वयं आत्मा [आपा] ही
होता है ।
माधुर्यादिखभावानामन्यत्र स्वगुणार्पिणाम् ।
स्वस्मिंस्तदर्पणापेक्षा नो, न चास्त्यन्यदर्पकम् ॥१४॥
माधुर्य आदि स्वभाव वाले [गुडादि पदार्थ] जौ चने आदि
में, अपने माधुर्य आदि गुणों को डाल देते हैं, वे अपने आप
में तो उन मधुरता आदि की ज़रूरत ही नहीं रखते [वे गुडादि
यह कभी नहीं चाहते कि कोई हमको आकर मीठा कर दे ]
इसके अतिरिक्त गुडादि में मधुरता को उत्पन्न करने वाली
कोई वस्तु भी तो नहीं है ।
७८ पंचदशी
अर्पकान्तरराहित्येऽप्यस्त्येषां तत्स्वभावता ।
माभूत्तथाऽनुभाव्यत्वं बोधात्मा तु न हीयते ॥१५॥
उनमें माधुर्यादि पैदा करने वाले किसी दूसरे पदार्थ के
न होने पर भी इन गुडादियों में माधुर्यादिस्वभावता है ही ।
इसी प्रकार आत्मा भले ही [किसी के] अनुभव का विषय न
होता हो, परन्तु उसकी अनुभवरूपता तो रहती ही है । उसे
कौन हटा सकता है ?
स्वयंज्योतिर्भवत्येष पुरोऽस्माद् भासतेऽखिलात् ।
तमेव भान्तमन्वेति तद्भासा भास्यते जगत् ॥१६॥
“अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति, अस्मादखिलात्पुरतः भासते,
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति”'काठ २-३-१५)
इत्यादि श्रुतियें आत्मा को स्वप्रकाश बता रही हैं ।
येनेदं जानते सर्वं तत् केनान्येन जानताम् ।
विज्ञातारं केन विन्द्याच्छक्तं वेद्ये तु साधनम् ॥१७॥
जिस से इस सब [पसारे] को जान रहे हैं, उस [ज्ञाता]
को दूसरे किस से जानें ? जानने वालों को किस से पहचानें ?
क्योंकि जानने के साधन भी तो वेद्य पदार्थ को ही जानने में शक्त हैं।
जिस साक्षिचैतन्य रूप आत्मा से, प्राणी इस समस्त दृश्य
जगत् को जानते हैं, उस साक्षी आत्मा को किस साक्ष्य जड
पदार्थ से जानें ? तात्पर्य यह है कि—इस दृश्य जगत् के
ज्ञाता को किस दृश्य से जाना जाय ? अर्थात् वह किसी से
भी नहीं जाना जा सकता । ज्ञान का साधन यह बिचारा मन
भी तो वेद्य पदार्थ में ही समर्थ है । ज्ञाता आत्मा में तो उस से
भी कुछ नहीं होता । देखो बृहदारण्यक ४–५–१५ ।
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७९
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७९
स वेत्ति वेद्यं तत्सर्वं नान्यस्तस्यास्ति वेदिता।
विदिताविदिताभ्यां तत् पृथग्बोधस्वरूपकम् ॥१८॥
आत्मा को स्वप्रकाश सिद्ध करने के लिये ‘स वेत्ति वेद्यं न
च तस्यास्ति वेत्ता’(श्वे० ३–१९)‘अन्यदेव तद्विदितादयो अविदितादधि’
(केन–१–३) इन दोनों वाक्यों के अर्थ का उल्लेख इस श्लोक
में किया गया है—वह आत्मा, जो भी कुछ वेद्य पदार्थ हैं,
उन सभी को जाना करता है। परन्तु उस आत्मा का ज्ञाता
और कोई भी नहीं है। ज्ञानस्वरूप वह ब्रह्म विदित् [ज्ञान से
विषय किये हुए] तथा अविदित [अज्ञान से ढके हुए] दोनों
से ही विलक्षण है। क्योंकि वह तो साक्षात् बोधस्वरूप ही
ठहरा। [विदित तो इसलिये नहीं कि वह बुद्धिवृत्ति का
विषय नहीं होता। अविदित इसलिये नहीं कि उस से भिन्न
और कोई जानने वाला ही नहीं है।]
बोधे ऽप्यनुभवो यस्य न कथंचन जायते।
तं कथं बोधयेच्छास्त्रं लोष्टं नरसमाकृतिम् ॥१९॥
जिस मूर्ख को तो [घटादि की प्रतीति रूपी] बोध का
अनुभव [साक्षात्कार] किसी प्रकार भी नहीं होता है, उस
मनुष्याकार ढेले को विचारा शास्त्र भी कैसे समझायेगा ?
[तात्पर्य यह है कि “ज्ञात और अज्ञात पदार्थ ही अनुभव में
आते हैं। ज्ञान किंवा बोध तो कहीं भी दीखता नहीं है” ऐसी
यदि कोई शंका करे तो उस को कहना चाहिये कि, ज्ञात किंवा
विदित का विशेषण जो ज्ञान तथा वेदन है वही तो बोध है।
उस बोध का अनुभव जिस मूर्ख को न होगा, उस को
तो ज्ञात या विदित का भी अनुभव नहीं हो सकेगा।
८० पंचदशी
इस कारण बोध के अनुभव को तो अवश्य ही मानना
पड़ता है]।
जिह्वा मेऽस्ति न वेत्युक्ति र्लज्जायै केवलं यथा।
न बुध्यते मया बोधो बोद्धव्य इति तादृशी ॥२०॥
("मेरे जिह्वा है या नहीं" यह कहना जैसे केवल लज्जा के
लिये ही होता है [ऐसा कहने वाला मूर्ख समझा जाता है।
उस को कोई भी बुद्धिमान् नहीं मान सकता] क्योंकि जिह्वा
के बिना तो भाषण ही नहीं हो सकता। ठीक इसी प्रकार 'मैं
बोध को अब तक नहीं जानता, उस बोध को तो मुझे अभी
जानना है' (यह कथन भी वैसा ही) लज्जाजनक है।) क्योंकि
बोध के बिना तो यह बात भी नहीं कही जा सकती है।
यस्मिन्यस्मिन्नस्ति लोके बोधस्तत्तदुपेक्षणे।
यद् बोधमात्रं तद्ब्रह्मेत्येवंधीर्ब्रह्म निश्चयः ॥२१॥
लोक में जिन घटादि नाम वाले विषयों का ज्ञान होता
है, उन उन विषयों की उपेक्षा किंवा अनादर कर देने पर
[घटादि सभी पदार्थों में अनुस्यूत] जो केवल ज्ञानरूप एक
स्फूर्ति [शान्त भाव से विराजती हुई] दीखने लगती है वही
ब्रह्म तत्व है, ऐसा यदि किसी की बुद्धि को पता चल जाय, तो
हम इसी को 'ब्रह्मनिश्चय' कहते हैं [हम समझते हैं कि ऐसा
निश्चय कर लेने वाले को ब्रह्मज्ञान हो चुका है]।
पञ्चकोशपरित्यागे साक्षिबोधावशेषतः।
स्वस्वरूपं स एव स्याच्छून्यत्वं तस्य दुर्घटम् ॥२२॥
अन्नमयादि पांचों कोशों का परित्याग जब हम कर देते
हैं,
[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१
[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१
में से निकल बाहर होना जान जाते हैं] किंवा बुद्ध से उन
[पांचों कोशों] को अनात्मा समझ लेते हैं, तब इन कोशों का
साक्षी जो बोध शेष रह जाता है, वह साक्षिरूपी बोध ही तो
'निज रूप' अथवा 'ब्रह्म' है । उस साक्षिरूपी बोध को शून्य
[अर्थात् कुछ नहीं] कह देना हँसी खेल नहीं है । यह एक
बड़ा ही दुर्घट काम है ।
अस्ति तावत् स्वयं नाम विवादाविषयत्वतः ।
स्वस्मिन्नपि विवादश्चेत् प्रतिवाद्यत्र को भवेत् ॥२३॥
स्वयं [अपना आपा] नाम की कोई चीज तो, क्या लौकिक
और क्या वैदिक सभी के मत में है ही । क्योंकि वह कभी
विवाद का विषय ही नहीं होती है । अपने आपे में कभी
किसी को विप्रतिपत्ति नहीं होती कि मैं हूँ या नहीं हूँ ? यदि
किसी को अपने आपे में भी विप्रतिपत्ति होती हो, तो बताओ
कि इस विप्रतिपत्ति का प्रतिवादी कौन होगा ?
स्वासत्त्वं तु न कस्मैचिद्रोचते विभ्रमं विना ।
अतएव श्रुतिर्बाधं ब्रूते चासत्त्ववादिनः ॥२४॥
भ्रान्ति [पागलपन] को छोड़कर और किसी भी दशा में
अपना अभाव किसी को भी अच्छा नहीं लग सकता । यही
कारण है कि अगले श्लोक में उद्धृत श्रुति असत्त्ववादी का
बाध कह रही है ।
असद्ब्रह्मेति चेद्वेद स्वयमेव भवेदसत् ।
अतोऽस्य मा भूद्बोध्यत्वं स्वसत्त्वं त्वभ्युपेयताम् ॥२५॥
यदि कोई यह समझता है कि 'ब्रह्म असत् है' तो वह
[ ब्रह्म को असत् जानने वाला ] स्वयं भी असत् ही हो जाता
८२ पंचदशी
है [ क्योंकि वह स्वयं भी तो ब्रह्मरूप ही है। उसके 'ब्रह्म नहीं
है' इसे कहने का यही अभिप्राय होता है कि मैं स्वयं ही नहीं
हूँ।] इसलिये यह वेद्य तत्व भले ही न हो परन्तु अपनी सत्ता
तो तुम्हें मान ही लेनी चाहिये [ कि तुम्हीं ब्रह्म हो ] ।
कीदृक्तर्हीति चेत्पृच्छेदीदृक्ता नास्ति तत्र हि ।
यदनीदृगतादृक् च तत् स्वरूपं विनिश्चिनु ॥२६॥
जब यह आत्मा वेद्य भी नहीं है तब फिर वह कैसा है ?
ऐसा एक प्रश्न स्वभाव से उठ सकता है। इसका उत्तर यह है
कि उस आत्म तत्व में 'ईदृक्ता' अर्थात् 'ऐसापन' तो है ही
नहीं। [ यदि उसमें 'ऐसापन, मान लेंगे तो फिर उसे वेद्य
होने से कौन रोक सकेगा ? ] जो ऐसा भी नहीं और वैसा
भी नहीं उसी को आत्मा का [अपना] स्वरूप समझ लो ।
अक्षाणां विषयस्त्वीदृक् परोक्षस्तादृगुच्यते ।
विषयी नाक्षविषय स्वत्वान्नास्य परोक्षता ॥२७॥
जिसको इन्द्रियाँ विषय करती हैं, उसे तो 'ईदृक्' कहा
जाता है। जो तो परोक्ष अर्थात् इन्द्रियों की गति से बाहर
रह जाता है, उसे 'तादृक्' कहते हैं। विषयी अर्थात् ज्ञाता या
द्रष्टा आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं होता [इससे वह 'ईदृक्'
अर्थात् 'ऐसा' नहीं कहाता है ] तथा स्वयं वही होने से वह
परोक्ष भी नहीं होता, [ इससे उसे 'तादृक्' अर्थात् 'वैसा'
कहते भी नहीं बनता । इसी कारण से पहले श्लोक में आत्मा
के 'ऐसा' 'वैसा' होने का निषेध किया है । ]
अवेद्योप्यपरोक्षोतः स्वप्रकाशो भवत्ययम् ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं चेत्यस्तीह ब्रह्मलक्षणम् ॥२८॥
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८३
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८३
वह आत्मा अवेद्य होकर भी [अर्थात् इन्द्रियजन्यज्ञान का
विषय न होकर भी] अपरोक्ष रहता है इसी से वह स्वयं-
प्रकाश माना जाता है। श्रुति ने ब्रह्म का जो कि सत्य ज्ञान
तथा अनन्त लक्षण बताया है वह लक्षण इस आत्मा में
भी है। इस कारण उस स्वयंप्रकाश तत्व को ब्रह्म मान लेना
चाहिये।
सत्यत्वं बाधराहित्यं, जगद्बाधैकसाक्षिणः ।
बाधः किंसाक्षिको ब्रूहि, नत्वसाक्षिक इष्यते ॥२९॥
[सत्य और अबाध्य, मिथ्या और बाध्य ये सब पर्याय-
वाची शब्द हैं] सत्य उसी को कहते हैं जिसकी बाधा न होती
हो। [जिस के मिथ्यापन का निश्चय कभी न होता हो] इस
सकल जगत् की बाधा का जो एक मात्र साक्षी है, उस के
बाध का साक्षी कौन होगा उसे हमें बताओ ? क्योंकि विना
साक्षी का तो कोई बाध माना ही नहीं जाता।
तात्पर्य यह है कि सुषुप्ति, मूर्छा तथा समाधि के समय,
जब यह स्थूल सूक्ष्म शरीरादि नाम का जगत् नहीं रहता, उस
जगत् के न रहने को जो जानता है अथवा शास्त्रीय शब्दों में
यों कहो कि जो आत्मा इस बाध का साक्षी है, उस आत्मा
के बाध का साक्षी [उस आत्मा के न रहने को जानने वाला]
कौन होगा ? उसका तो कोई भी साक्षी नहीं हो सकता । बिना
साक्षी के ही आत्मबाध मान लेना ठीक नहीं है। अतिप्रसक्ति के
डर से साक्षिरहित बाध को कोई भी नहीं मानता है।
अपनीतेषु मूर्तेषु ह्यमूर्तं शिष्यते वियत् ।
शक्येषु बाधितेष्वन्ते शिष्यते यत्तदेव तत् ॥३०॥
८४ पञ्चदशी
मूर्त पदार्थों के हटा दिये जाने पर जैसे अमूर्त आकाश
शेष रह जाता है, इसी प्रकार वाधा करने योग्य पदार्थों की
बाधा कर देने पर पीछे से जो अबाध्य तत्व शेष रह जाता है,
वही ब्रह्म है ।
घर में रक्खे हुए घटादि मूर्त पदार्थ, जब उसमें से बाहर
निकाल दिये जाते हैं, तब जैसे हटाया न जा सकने वाला एक
आकाश ही घर में शेष रह जाता है । इसी प्रकार आत्मा से
भिन्न देहेन्द्रियादि मूर्त और अमूर्त पदार्थों के—जिनका कि
निराकरण हो सकता है—'नेति नेति' श्रुति से हटा दिये
जाने पर, पीछे से सम्पूर्ण निराकरणों [निषेधों] का साक्षी
जो भी बोध शेष रह जाता है, बाधरहित वही तत्व 'आत्मा'
कहाता है ।
सर्वबाधे न किञ्चिच्चेद्यन्न किंचित्तदेव तत् ।
भाषा एवात्र भिद्यन्ते निर्बाधं तावदस्ति हि ॥३१॥
'तुम्हारी कही विधि से सब की बाधा कर देने पर तो,
कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा यदि कोई कहने लगे, तो उस से
कहो कि जो 'कुछ भी नहीं है' उसी को ब्रह्म जान लो । 'न
किंचित्' इस शब्द से जिस चैतन्य का उल्लेख किया जाता है
उसी को ब्रह्म मान लेना चाहिये ।
तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य यह कहता है कि 'कुछ भी
शेष नहीं रहता' उस को सकलाभाव विषय का [सब कुछ
न होने का] ज्ञान तो अवश्य ही मानना होगा । बस तब हम
कहेंगे कि यह ज्ञान ही हमारे आत्मा का स्वरूप है । अरे भाई,
इस बाधसाक्षी प्रत्यगात्मा के विषय में 'न किंचित्' आदि