सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् १२९

चित्रदीपप्रकरणम् १२९
नाप्रतीति स्तयोर्बाधः किन्तु मिथ्यात्वनिश्चयः ।
नो चेत् सुपुप्तिमूर्च्छादौ मुच्येतायततो जनः ॥१३॥
जीव और जगत् की प्रतीति के बन्द हो जाने को हम
उनका 'बाध' नहीं कहते हैं। किन्तु उन दोनों के मिथ्याभाव
का निश्चय कर लेना ही हमारे मत में 'बाध' कहाता है। यदि
तो प्रतीति न होने को ही बाध कहते हों तब तो सुपुप्ति या
मूर्च्छा आदि के समय [ जब कि स्वतः ही द्वैत की प्रतीति नहीं
होती ] तब बिना ही यत्न किये [ तत्त्वज्ञान का सम्पादन बिना
किये ही ] मनुष्य मुक्त हो जाया करें ।
परमात्मावशेषोऽपि तत्सत्यत्वविनिश्चयः ।
न जगद्विस्मृतिर्नो चेज्जीवन्मुक्तिर्न संभवेत् ॥१४॥
पिछले बारहवें श्लोक में जो कि 'स्वात्मैव शिष्यते' कहा गया
है उस स्वात्ममात्र शेष रहजाने का मतलब भी केवल उसी को
सत्य समझ लेने से ही है। 'परमात्मा से भिन्न सब जगत् को
भूल जाना उसका मतलब कदापि नहीं है। यदि स्वात्ममात्र
शेष रह जाने का अभिप्राय जगद्विस्मरण से हो तब तो जीवन्-
मुक्ति कोई चीज ही न रहे । [ जीवन्मुक्ति का मतलब यही
है कि—संसार की खटपट में भी बुद्धि स्थिर रह सके । गम्भीर
से गम्भीर और उत्तेजक से उत्तेजक अवस्था में भी परमात्म-
तत्व को याद रखते हुए उस पर मजबूत दृष्टि जमाये हुए
संसार की यात्रा की जाय ]
परोक्षा चापरोक्षेति विद्या द्वेधा विचारजा ।
तत्रापरोक्षविद्यासौ विचारोऽयं समाप्यते ॥१५॥

१३० पञ्चदशी

उसकी अवधि इस श्लोक में बतायी गयी है ]—विचार से
उत्पन्न होने वाली विद्या दो प्रकार की है—एक 'परोक्ष' दूसरी
'अपरोक्ष'। जब अपरोक्ष विद्या की प्राप्ति किसी को हो जाती
है, तभी विचार की यह खटपट बन्द हो जाती है।
अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद परोक्षज्ञानमेव तत् ।
अहं ब्रह्मेति चेद् वेद साक्षात्कारः स उच्यते ॥१६॥
यदि कोई [किसी के समझाने से] यह समझ जाय कि
'ब्रह्म तत्व है' बस इसी को 'परोक्ष ज्ञान' समझा जाता है।
जब तो किसी को यह दृढ विश्वास हो जाय कि 'मैं ही ब्रह्म हूँ'
इसी को 'साक्षात्कार' कहते हैं।
तत्साक्षात्कारसिद्धयर्थ मात्मतत्वं विविच्यते ।
येनायं सर्वसंसारात् सद्य एव विमुच्यते ॥१७॥
जिस साक्षात्कार के प्रभाव से यह मनुष्य सब संसार से
तुरन्त ही [साक्षात्कार होते ही] मुक्त हो जाता है,उसी साक्षा-
त्कार को सिद्ध करने के लिये अब हम आत्मतत्त्व का विवेचन
करते हैं।
कूटस्थो, ब्रह्म, जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।
घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥
जैसे एक ही आकाश घटाकाश, महाकाश, जलाकाश,
तथा मेघाकाश चार प्रकार का होता है, इसी प्रकार एक ही
चेतन कूटस्थ, ब्रह्म, जीव तथा ईश भेद से चार प्रकार का है।
घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः ।
साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥