पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० पञ्चदशी
उसकी अवधि इस श्लोक में बतायी गयी है ]—विचार से
उत्पन्न होने वाली विद्या दो प्रकार की है—एक 'परोक्ष' दूसरी
'अपरोक्ष'। जब अपरोक्ष विद्या की प्राप्ति किसी को हो जाती
है, तभी विचार की यह खटपट बन्द हो जाती है।
अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद परोक्षज्ञानमेव तत् ।
अहं ब्रह्मेति चेद् वेद साक्षात्कारः स उच्यते ॥१६॥
यदि कोई [किसी के समझाने से] यह समझ जाय कि
'ब्रह्म तत्व है' बस इसी को 'परोक्ष ज्ञान' समझा जाता है।
जब तो किसी को यह दृढ विश्वास हो जाय कि 'मैं ही ब्रह्म हूँ'
इसी को 'साक्षात्कार' कहते हैं।
तत्साक्षात्कारसिद्धयर्थ मात्मतत्वं विविच्यते ।
येनायं सर्वसंसारात् सद्य एव विमुच्यते ॥१७॥
जिस साक्षात्कार के प्रभाव से यह मनुष्य सब संसार से
तुरन्त ही [साक्षात्कार होते ही] मुक्त हो जाता है,उसी साक्षा-
त्कार को सिद्ध करने के लिये अब हम आत्मतत्त्व का विवेचन
करते हैं।
कूटस्थो, ब्रह्म, जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।
घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥
जैसे एक ही आकाश घटाकाश, महाकाश, जलाकाश,
तथा मेघाकाश चार प्रकार का होता है, इसी प्रकार एक ही
चेतन कूटस्थ, ब्रह्म, जीव तथा ईश भेद से चार प्रकार का है।
घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः ।
साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥