वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
About this granth
The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.
This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.
The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.
३६ प्रशस्तपादभाष्यम्
निर्णीत नहीं है । अतः ऐसे स्थलों में सपक्ष न मिलने के कारण सपक्ष में साध्य
और हेतु का सामानाधिकरण्य सम्भव न होने से व्याप्ति सम्भव नहीं होगी । अतः
शब्दत्व हेतु में भी सव्यभिचार हेत्वाभास होगा; किन्तु नित्यत्व रूप साध्य का
अभाव निर्णीत है घटादि अनित्य वस्तुओं में, यहाँ शब्दत्व भी नहीं है । अतः पूर्व
कथित व्यभिचार दोष यहाँ सम्भव नहीं है । सुतरां यहाँ नित्यत्व हेतु का केवल
पक्ष में रहना, किसी सपक्ष या विपक्ष में न रहना ही व्याप्ति का विघटक है ।
इसको 'असाधारण' नाम का व्यभिचार कहते हैं; क्योंकि यह हेत्वाभास साध्य के
अधिकरण और साध्याभाव के अधिकरण दोनों में साधारण रूप से (सामान्य रूप
से) नहीं है, जैसे कि साधारण हेत्वाभास रहता है । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्द-
रूप पक्ष में ही है, अतः उक्त शब्दत्व हेतु 'असाधारण' नाम का सव्यभिचार है ।
इसी प्रकार जिस स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष होंगे-जैसे 'सर्वमभिधेयं
प्रमेयत्वात्', ऐसे स्थलों के हेतु में भी उक्त सामानाधिकरण्य संभव नहीं होगा;
क्योंकि प्रकृत स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष के अन्तर्गत आ गये हैं । सपक्ष
के लिए कोई नहीं बचा है । सपक्ष को पक्ष से भिन्न होना चाहिए । अतः ऐसे
स्थलों में भी हेतु के व्यापक साध्य का किसी सपक्ष में हेतु के साथ रहना सम्भव
नहीं होगा । अतः इस प्रकार के हेतुवों में भी व्याप्ति नहीं रह सकती । फलतः
व्यभिचार रहेगा; किन्तु कथित साधारण या असाधारण व्यभिचार यहाँ सम्भव
नहीं है । अतः 'अनुपसंहारी' नाम का अतिरिक्त ही व्यभिचार दोष माना गया है।
जिससे उक्त हेतु 'अनुपसंहारी' नाम का तीसरा सव्यभिचार होगा ।
अतः तत्त्वचिन्तामणिकार ने अपने सव्यभिचार प्रकरण में लक्षण करने से भी
पहले 'सव्यभिचारस्त्रिविधः संधारणासाधारणानुपसंहारिभेदात्' यह विभाग वाक्य
ही लिखा है । यद्यपि सूत्र-भाष्यादि में इस त्रैविध्य की चर्चा नहीं है ।
फलितार्थ यह है कि सव्यभिचार (१) साधारण, (२) असाधारण और (३)
अनुपसंहारी भेद से तीन प्रकार का है । इनमें जो हेतु साध्य और साध्याभाव
दोनों के साथ रहे, उसे साधारण कहते हैं । जैसे कि 'धूमवान् वह्नेः' का वह्नि हेतु ।
वह्नि हेतु धूम के साथ भी महानसादि में है और धूमाभाव के साथ भी तप्त
अयःपिण्डादि में है । जो हेतु केवल पक्ष में ही रहे, सपक्ष या विपक्ष में जो न रहे,
उस हेतु को 'असाधारण' सव्यभिचार कहते हैं । जैसे कि 'शब्दो नित्यः शब्दत्वात्'
इस अनुमान का शब्दत्व हेतु । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्दरूप पक्ष में ही है । न
आकाशादि सपक्षों में है और न घटादि विपक्षों में । अतः शब्दत्व हेतु
'असाधारण' सव्यभिचार है । जिस धर्म का सभी वस्तुओं में केवल अन्वय ही
रहे, व्यतिरेक या अभाव किसी भी वस्तु में न रहे, उस धर्म को केवलान्वयि धर्म
कहते हैं, केवलान्वयि धर्म जिस पक्ष का विशेषण (अवच्छेदक) हो उस पक्ष के
भूमिका ३७
अनुमान का हेतु भी 'व्यभिचारी' है; क्योंकि इस अनुमान में भी कोई सपक्ष नहीं
हो सकता, चूँकि सभी पदार्थ पक्ष के अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः उक्त अनुमान
के हेतु का व्यापकत्व साध्य में रहने पर भी व्यापकीभूत वह साध्य किसी स पक्ष
में हेतु के साथ नहीं रह सकता; क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है।
जो हेतु साध्य के बदले साध्याभाव के साथ ही नियमित रूप से रहे, उस हेतु
को 'विरुद्ध' हेत्वाभास कहते हैं। अर्थात् हेतु का साध्याभाव के साथ नियमित
रूप से रहना 'विरोध' नाम का हेतुदोष है, जिस दोष से युक्त हेतु 'विरुद्ध' नाम
का हेत्वाभास है। 'वि' अर्थात् विशेष रूप से साध्य की अनुमिति को जो 'रुन्ध'
करे, अर्थात् साध्य के साथ नियत रूप से न रहकर साध्याभाव के साथ ही
नियमित होकर व्यतिरेकव्याप्ति को विघटित करते हुए जो अनुमिति को विघटित
करे, वही विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है। नियमतः साध्य के साथ ही रहनेवाले
हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही 'विरोध' दोष है, यह विरोध दोष से युक्त हेतु ही
'विरुद्ध' नाम का हेत्वाभास है। जैसे कि 'ह्रदो वह्निमान् जलात्' इस अनुमिति का
जल हेतु 'विरुद्ध' हेत्वाभास है; क्योंकि जलरूप हेतु वह्निरूप साध्य के साथ न
रहकर वह्नि के अभाव के साथ ही नियमित रूप से रहता है। अतः जलरूप हेतु
का अभाव वह्नि का व्यापकीभूतत अभाव है, इस अभाव का प्रतियोगित्व कथित
जल-हेतु में है।
जिस प्रकार हेतु के साथ साध्य का नियमित रूप से रहना व्याप्ति का
प्रयोजक है, उसी प्रकार साध्याभाव के साथ हेत्वभाव का नियमित रूप से रहना
भी व्याप्ति का एक प्रयोजक है, जिसे व्यतिरेक व्याप्ति कहते हैं। साध्याभाव के साथ
नियमित रूप से रहनेवाले (साध्याभाव-व्यापकीभूत) हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही
व्यतिरेकव्याप्ति है। इस व्याप्ति के शरीर में साध्याभावव्यापकीभूताभाववाला जो
अंश है, उसी को विरोध दोष अपने साध्याव्यापकीभूताभाववाले अंश के द्वारा
विघटित कर व्यतिरेक व्याप्ति को विघटित कर देता है। इस विरोध दोष के प्रसङ्ग
में एवं विरुद्ध हेत्वाभास के प्रसङ्ग में बाद में भी अधिक परिवर्तन नहीं हुआ।
जिस हेतु के प्रयोग करने पर 'प्रकरण' की अर्थात् परस्पर विरुद्ध दो पक्षों
की 'चिन्ता' अर्थात् संशय ही उपस्थित हो, उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष
का निर्णय संभव न हो, वह हेतु अगर उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष
के निर्णय के लिए प्रयुक्त हो, तो वह हेतु 'प्रकरणसम' नाम का हेत्वाभास होगा।
शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए नैयायिक अगर 'नित्यधर्मानुपलब्धि' को
हेतु रूप से उपस्थित करें तो उनका यह हेतु 'प्रकरणसम' नाम का हेत्वाभास होगा;
क्योंकि प्रतिपक्षी मीमांसक भी तुल्य युक्ति से शब्द में नित्यत्व साधन के
'अनित्यधर्मानुपलब्धि' हेतु को उपस्थित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में शब्द में
३८ प्रशस्तपादभाष्यम्
अनित्यत्व या नित्यत्व का निर्णय नहीं होगा; किन्तु शब्द में नित्यत्व और अनित्यत्व
का संशय ही होगा । अतः उक्त 'नित्यधर्मानुपलब्धि' या 'अनित्यधर्मानपलब्धि' रूप
हेतु प्रकरणसम हेत्वाभास होगा । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि उक्त विवरण
के अनुसार साध्यधर्म की अनुपलब्धि को ही अगर हेतु रूप से उपस्थित किया
जाएगा तो वह 'प्रकरणसम' हेत्वाभास होगा, और कोई हेतु प्रकरणसम नहीं होगा ।
किन्तु श्री वाचस्पति मिश्र ने तात्पर्यटीका में प्रकरणसम के उक्त लक्षण को
असम्पूर्ण ठहराया है और प्रकरणसम को सत्प्रतिपक्ष का नामान्तर कहा है । 'सन्
प्रतिपक्षो यस्य' इस व्यत्पत्ति के अनुसार जिस हेतु का प्रतिपक्ष अर्थात् विरोधी
दूसरा हेतु रहे वही हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त है । वादी अगर किसी पक्ष में
किसी साध्य की सिद्धि के लिए एक हेतु का प्रयोग करता है, उसके बाद ही कोई
प्रतिवादी अगर उसी पक्ष में उसी साध्य के अभाव की सिद्धि के लिए दूसरे हेतु
का प्रयोग करता है, तो फिर ये दोनों हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त समझे जायेंगे ।
अगर दोनों हेतु अर्थात् हेतु और प्रतिहेतु दोनों समान बल के हों । अर्थात् दोनों
में व्याप्ति और पक्षधर्मता समान रूप से रहे, तो वे दोनों सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रसित
होंगे और दोनों ही हेतु न होकर 'सत्प्रतिपक्ष' नाम के हेत्वाभास होंगे । इसी
बात को दृष्टि में रखकर 'समानबलौ सत्प्रतिपक्षौ' यह लक्षणवाक्य प्रचलित हैं ।
इन दोनों हेतुओं में से अगर एक हेतु व्याप्ति और पक्षधर्मता से युक्त होने के
कारण प्रबल रहेगा और दूसरा उन दोनों से रहित होने के कारण दुर्बल रहेगा तो
फिर वहाँ सत्प्रतिपक्ष दोष नहीं होगा । दुर्बल हेतु में केवल व्यभिचार या
स्वरूपासिद्धि दोष होगा और सबल हेतु से अभीष्ट अनुमिति ही जाएगी ।
प्राचीन नैयायिकों ने सत्प्रतिपक्ष को अनित्य दोष माना है । उन लोगों का
अभिप्राय है कि जब तक कि हेतुलिङ्गक परामर्श और प्रतिहेतुलिङ्गक परामर्श इन
दोनों में से किसी एक परामर्श के किसी भी अंश में भ्रमत्व का निश्चय नहीं हो
जाता, तब तक ही उक्त दोनों हेतु सत्प्रतिपक्षित रहेंगे, उक्त भ्रमत्व निश्चय के
बाद नहीं । अतः कुछ नियमित समय में ही रहने के कारण सत्प्रतिपक्ष अनित्य
दोष है । इस मत में सद्धेतु स्थल में भी अगर विरोधी प्रतिहेतु का भ्रमात्मक
परामर्श भी है, तो सद्धेतु भी तब तक सत्प्रतिपक्षित रहेगा, जब तक कि उक्त
भ्रमात्मक विरोधी परामर्श का भ्रमत्व ज्ञात नहीं हो जाता ।
नव्य नैयायिकों के मत से सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष हैं; क्योंकि किसी हेतु
को सत्प्रतिपक्षित होने के लिए इतना ही आवश्यक है कि प्रकृत हेतु से जिस पक्ष
में साध्य का साधन इष्ट है, उस पक्ष में उक्त साध्य के अभाव की व्याप्ति से
युक्त दूसरा (प्रतिहेतु) अगर विद्यमान है, तो वह पहला हेतु सत्प्रतिपक्षित होगा ।
जल में वह्नि के साधक सभी हेतु सत्प्रतिपक्षित होंगे; क्योंकि वह्नि के अभाव
भूमिका ३९
की व्याप्ति जलत्व में है एवं जल में वह्न्यभावव्याप्य जलत्व सर्वदा ही विद्यमान
है। अतः इस प्रकार का हेतु सदा ही सत्प्रतिपक्षित रहेगा। अतः सत्प्रतिपक्ष नित्य
दोष है।
महर्षि गौतम ने चौथे हेत्वाभास का नाम 'साध्यसम' कहा है और उसके
स्वरूप को समझाने के लिए 'साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः' यह सूत्र लिखा
है। पहले से जो सिद्ध नहीं रहता है वही 'साध्य' कहलाता है। हेतु के लिए यह
आवश्यक है कि वह पहले से 'सिद्ध' रहे। अर्थात् उसमें असाध्य की व्याप्ति
सिद्ध रहे। एवं (साध्यव्याप्ति से युक्त) हेतु स्वयं पक्ष में सिद्ध रहे; किन्तु जिस
अनुमान का हेतु पहले से सिद्ध नहीं है, वह हेतु साध्य के समान ही है, अतः उसे
'साध्यसम' कहा गया है। अगर कोई 'छाया द्रव्य है क्योंकि वह गतिशील है' इस
प्रकार से अनुमान का प्रयोग करे तो यहाँ 'गतिशीलत्व' हेतु 'साध्यसम' हेत्वाभास
होगा; क्योंकि 'छाया में गति है' यही पहले से सिद्ध नहीं है। अतः छाया में
द्रव्यत्व की सिद्धि की तरह छाया में गति की भी सिद्धि अपेक्षित है।
'साध्यसम' हेत्वाभास को ही नव्य नैयायिकों ने 'असिद्ध' शब्द से व्यक्त किया
है। एवं (१) आश्रयासिद्ध, (२) स्वरूपासिद्ध और (३) व्याप्यत्वासिद्ध इसके ये
तीन भेद किये हैं। जिसमें साध्य की सिद्धि अभिप्रेत हो उसे पक्ष कहते हैं। पक्ष
को ही 'आश्रय' भी कहते हैं। आश्रय अगर सिद्ध नहीं रहेगा तो अनुमान कहाँ
होगा ? अगर कोई साधारण फूलों के दृष्टान्त से आकाशकुसुम में गन्ध का
अनुमान करे, तो वहाँ के सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे। एवं स्वर्णमय पर्वत में
अगर कोई वह्नि का अनुमान करे तो वहाँ के भी सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे।
यद्यपि पर्वत असिद्ध नहीं है, किन्तु पर्वत में स्वर्णमयत्व असिद्ध है। अतः स्वर्णमय
पर्वतरूप विशिष्टपक्ष भी असिद्ध है।
हेतु यदि कथित पक्ष में विद्यमान न रहे तो वह हेतु 'स्वरूपासिद्ध' हेत्वाभास
होगा। जैसे कि जल में कोई धूम हेतु से भी वह्नि का अनुमान करना चाहेगा तो
वहाँ का धूमहेतु स्वरूपासिद्ध हेत्वाभास होगा; क्योंकि जल रूप पक्ष में धूम हेतु
नहीं है। भाष्यकार ने जो असिद्ध का उदाहरण दिया है, वह स्वरूपासिद्ध का ही
उदाहरण है; क्योंकि छाया या अन्धकार में गति रूप हेतु नहीं है। इससे ऐसा
भान होता है कि वात्स्यायनादि प्राचीन नैयायिकों ने केवल स्वरूपासिद्ध को ही
असिद्ध मानते थे। असिद्ध के और भेद बाद में किये गये।
हेतु में उसके विशेषणीभूत धर्म (हेतुतावच्छेदक) के अभाव और साध्य में
साध्यतावच्छेदक के अभाव को व्याप्यत्वासिद्ध दोष कहते हैं। इस दोष से युक्त
हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है। 'पर्वतो वह्निमान् काञ्चनमयधूमात्' इस अनुमान
के हेतु धूम में काञ्चनमयत्वरूप हेतुतावच्छेदक नहीं है। अतः वह (हेत्वप्रसिद्धि
४० प्रशस्तपादभाष्यम्
रूप) व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है । एवं 'पर्वतः काञ्चनमयवह्निमान् धूमात्' इस
अनुमान के साध्य वह्नि में काञ्चनमयत्वरूप साध्यतावच्छेदक नहीं है, अतः यह
हेतु (साध्याप्रसिद्ध रूप) व्याप्यत्वासिद्ध है । इसी प्रकार व्याप्ति में अनुपयोगी
(व्यर्थ) विशेषणादि से युक्त हेतु भी व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास ही है, जैसे कि
'पर्वतो वह्निमान् नीलधूमात्' इत्यादि स्थलों का नीलधूम रूप हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है;
क्योंकि धूम का नील विशेषण व्यर्थ है । यह ध्यान रहना चाहिए कि दोष जहाँ
कहीं भी रहे, किन्तु दुष्टता हेतु में ही आवेगी ।
पाँचवें हेत्वाभास को महर्षि ने 'कालातीत' की संज्ञा दी है और इसके परिचय
के लिए "कालात्ययापदिष्टः कालातीतः" इस सूत्र का निर्माण किया है ।
पक्ष में पूर्ण रूप से निश्चित साध्य के लिए अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती है
एवं पक्ष में जिस साध्य का अभाव ही पूर्णरूप से निश्चित है, उस साध्य के लिए
भी न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती है; किन्तु जो साध्य पक्ष में सन्दिग्ध रहता है, उस
साध्य को उस पक्ष में निश्चित रूप से समझाने के लिए ही न्याय का प्रयोग होता
है । हेतुवाक्य का प्रयोग भी न्याय के ही अन्तर्गत है ।
जिस समय जिस पक्ष में जिस साध्य का सन्देह वर्तमान है, वही समय हेतु-
प्रयोग के लिए उपयुक्त है । यदि उस समय उस पक्ष में उस साध्य का अभाव
दूसरे किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है, तो उस समय उस पक्ष में साध्य का
सन्देह नहीं रह सकता । साध्यसन्देह का समय पक्ष में साध्याभाव निश्चय के पूर्व
ही था, जो 'अतीत' हो चुका है । अतः जिस पक्ष में जिस साध्य का अभाव
किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है, उस पक्ष में उस साध्य की अनुमिति के लिए
अगर कोई हेतु का प्रयोग करे तो वह हेतु व्याप्ति-पक्षधर्मता प्रभृति से युक्त होने
पर भी 'कालातीत' नाम का हेत्वाभास होगा । उससे प्रमा अनुमिति नहीं हो
सकती । इसका 'अतीतकाल' नाम भी प्राचीन ग्रन्थों में है ।
नवीननैयायिक इस हेत्वाभास को ही 'बाधित' और उसके विशेषणीभूत दोष
को 'बाध' कहते हैं । पक्ष में बलवत् प्रमाण के द्वारा निश्चित साध्य के अभाव का
निश्चित रहना ही बाध है । फलतः पक्ष में साध्याभाव का रहना ही बाध दोष
है । जिस किसी भी सम्बन्ध के द्वारा इस बाध दोष से युक्त हेतु ही 'बाधित' नाम
का हेत्वाभास है ।
दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है 'दुष्ट हेतु' ।
दोषों से युक्त हेतु ही दुष्ट हेतु है । फलतः कथित दोष ही दुष्ट हेतुवों को
सद्धेतुवों से पृथक् करते हैं । अतः दुष्ट हेतुरूप हेत्वाभासों को समझने के लिए
हेतु के दोषों को समझना पहले आवश्यक है । दोषों को समझ लेने के बाद 'इस
दोष से युक्त ही दुष्ट हेतु है' इस प्रकार दुष्ट हेतुवों को समझना सुलभ हो जाता
भूमिका ४९
है। इसी दृष्टि से 'हेतोराभासा हेत्वाभासाः' इस व्युत्पत्ति से लभ्य हेतु के दोषों का
ही लक्षण आकर ग्रन्थों में किया गया है।
हेतुवों के ये दोष दो प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं। एक सीधे ही
अनुमिति को रोकते हैं। जैसे कि सप्रतिपक्ष और बाध। कुछ हेत्वाभास अनुमिति
के कारण व्याप्ति या पक्षधर्मता का विघटन करते हुए अनुमिति का प्रतिरोध
करते हैं, जैसे कि व्यभिचार एवं स्वरूपासिद्धि। कुछ हेत्वाभास ऐसे भी हैं जो
उक्त दोनों ही प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं, जैसे कि आश्रया- सिद्धि
एवं साध्याप्रसिद्धि।
हेत्वाभास की संख्याओं में और नामों में भी मतभेद देखा जाता है। जैसे कि
वैशेषिकदर्शन के सूत्र में इसके तीन ही भेद कहे गये हैं; किन्तु भाष्यकार ने उनमें
अनध्यवसित नाम को जोड़कर निम्नलिखित चार भेद किया है-(१) असिद्ध,
(२) विरुद्ध, (३) सन्दिग्ध और (४) अनध्यवसित। न्यायमत में (१) सव्यभिचार,
(२) विरुद्ध, (३) सप्रतिपक्ष, (४) असिद्ध और (५) बाध ये पाँच हेत्वाभास के
मुख्य भेद माने गये हैं। मीमांसकों ने महर्षि कणाद की रीति से इसके तीन ही
भेद किये हैं।
इस प्रकार ज्ञान के परिशोधन के अभिप्राय से आचार्यों ने हेतु की तरह
हेत्वाभासों को भी समझाने में बहुत श्रम किया है। जिसका लाभ हम लोगों को
उठाना चाहिए। एक पक्ष के स्थापन के लिए विरुद्ध पक्ष के हेतुवों में दोषों
का प्रदर्शन आवश्यक है। जो आज भी न्यायालयों की व्यवस्थाओं को सूक्ष्म दृष्टि
से देखने पर अवगत हो सकता है। प्राचीन समय की धर्मशास्त्रानुयायी
व्यवस्थाओं को देखने से तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है। जिसके लिए
भारतीय व्यवहार के द्वैतपरिशिष्टादि निबन्ध-ग्रन्थों के व्यवहारप्रकरणों को देखना
उपयोगी होगा।
सुख
जिस इच्छा के लिए और किसी इच्छा की आवश्यकता न हो, उसे 'सुख'
कहते हैं। सुख की इच्छा से ही चन्दनवनितादि सभी विषयों की इच्छा होती है।
अर्थात् चन्दनादि विषय चूँकि सुख के कारण हैं, इसीलिए उनकी इच्छा होती है।
सुख की इच्छा के लिए किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं होती। अतः
किसी और इच्छा के अनधीन इच्छा का विषय ही 'सुख' है।
दुःख
इसी प्रकार जिसमें द्वेष उत्पन्न होने के लिए मध्य में दूसरे विषयों के द्वेष की
अपेक्षा न हो, वही 'दुःख' है। मुख्यतः जीवों को दुःखों से ही द्वेष है। फिर 'ये
४२ प्रशस्तपादभाष्यम्
मुझे न मिलें' इस प्रकार की धारणा से जिनसे साक्षात् या परम्परा से दुःख मिलने
की सम्भावना समझ में आती है, उन सभी वस्तुओं से द्वेष उत्पन्न होता है ।
इच्छा
अपने लिए अथवा दूसरे के लिए किसी अप्राप्त वस्तु की 'मुझे यह मिले या
उसे यह मिले' इस प्रकार की जो प्रार्थना, उसे ही 'इच्छा' कहते हैं । काम,
अभिलाषादि इससे अनेक अवान्तर भेद हैं ।
द्वेष
आत्मा के जिस गुण के द्वारा जीव अपने को जलता-सा अनुभव करे, वही
'द्वेष' है । क्रोध-द्रोहादि इसी के अवान्तर भेद हैं ।
प्रयत्न
उत्साह को ही 'प्रयत्न' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है-(१) जीवनधारणो-
पयोगी (या जीवनयोनि), (२) इच्छा से उत्पन्न और (३) द्वेष से उत्पन्न । इनमें
जीवनयोनि यल से सोते हुए जीव के प्राणादि वायुओं की क्रियायें उत्पन्न होती हैं ।
एवं जागते हुए पुरुष का इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होता है । अपने अभीष्ट वस्तु
की प्राप्ति के लिए आवश्यक क्रिया का कारण ही इच्छाजनित 'प्रयत्न' है । इस
इच्छाजनित प्रयत्न के कारण ही शरीर का पतन नहीं होता । एवं अहित वस्तुओं
से बचने के लिए जो व्यापार होते हैं, उनका कारण भी प्रयत्न ही है, जो द्वेष से
उत्पन्न होता है ।
बुद्धि से लेकर प्रयत्न तक कहे गये ये १७ गुण ही महर्षि कणाद के सूत्रों के
द्वारा कहे गये हैं । गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म, अधर्म और शब्द इन सात
वस्तुओं में गुणत्व की व्यवस्था भाष्यकार प्रशस्तपाद ने की है और इसे कथित
सत्रह गुणों के विधायक सूत्र में पठित 'च' शब्द के द्वारा सूत्रकार का अनुमत
माना है ।
गुरुत्व
पृथिवी और जल का पहला पतन जिस गुण के कारण हो उसे 'गुरुत्व' कहते
हैं । यह 'गुरुत्व' नाम का गुण केवल पृथिवी और जल में ही रहता है । गुरुत्व से
पतन का सिद्धान्त पृथ्वी के मध्याकर्षणवाले आधुनिक सिद्धान्त से बिलकुल
विपरीत है ।
भूमिका ४३
स्नेह
जो केवल जल का ही विशेषगुण हो उसे 'स्नेह' कहते हैं । स्नेह के ही कारण
आटा प्रभृति पिसे हुए द्रव्यों की गोल आकृति बन सकती है । घृतादि जिन पार्थिव
द्रव्यों से उक्त आकृतियाँ बनती हैं, वहाँ भी घृतादि में जल सम्बन्ध के कारण ही
वैसा होता है ।
संस्कार
'संस्कार' नाम का भी एक गुण है, जिसके (१) वेग, (२) भावना और (३)
स्थितिस्थापक ये तीन भेद हैं । (१) वेग नामक संस्कार क्रिया से उत्पन्न होता है
और पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में रहता है । (२)
'भावना' नाम का संस्कार आत्मा में रहता है । इसी के बल से स्वयं तीसरे क्षण
में ही विनष्ट हो जाने पर भी पूर्वानुभव स्मृति को उत्पन्न करता है । (३) स्थिति-
स्थापक संस्कार के कारण ही बाँस प्रभृति द्रव्यों के अग्रभाग को बलात् नीचे से ले
आकर छोड़ देने बाद वे फिर अपनी पहले की स्थिति में आ जाते हैं ।
धर्म
जीव के उस गुण को धर्म कहते हैं, जिससे उसे सुख मिलता है, इसी का
दूसरा नाम पुण्य है । 'किन क्रियाओं से धर्म की उत्पत्ति होती है ?' इसको श्रुति,
स्मृति ही समझा सकते हैं । तदनुसार श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा निर्दिष्ट क्रियाओं से
उत्पन्न गुण ही 'धर्म' है, इस प्रकार 'विहितकर्मजन्यो धर्मः' धर्म का यह लक्षण
किया जाता है ।
अधर्म
अधर्म भी जीव का ही विशेष प्रकार का गुण है । जिससे जीवों को दुःख
मिलता है । शास्त्रों में निषिद्ध जीवहत्यादि क्रियाओं से इसकी उत्पत्ति होती है ।
शब्द
श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले गुण को ही शब्द कहते हैं । यह संयोग, विभाग
और शब्द से उत्पन्न होता है । दण्ड और भेरी के संयोग से शब्द की उत्पत्ति होती
है एवं बाँस प्रभृति के विभाग से भी शब्द की उत्पत्ति होती है; किन्तु संयोग और
विभाग से उत्पन्न शब्दव्यक्ति का श्रवण सम्भव नहीं है; क्योंकि प्रत्यक्ष के लिए
विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध आवश्यक है । शब्द रूप विषय का ग्राहक
श्रवणेन्द्रिय है । यह आकाश रूप है । आकाश अमूर्त होने के कारण कहीं जा
नहीं सकता । अतः शब्द की उत्पत्ति जिस देशावच्छिन्न आकाश में होती है, वहाँ
४४ प्रशस्तपादभाष्यम्
श्रवणेन्द्रिय जा नहीं सकता; किन्तु उस शब्द का प्रत्यक्ष तो होता है । इसलिए यह
कल्पना करनी पड़ती है कि संयोग या विभाग से जिस शब्दव्यक्ति की उत्पत्ति
होती है, उसी शब्द से उसी शब्द के सदृश दूसरे शब्द की उत्पत्ति अनन्तर प्रदेश
में होती है । इस प्रकार एक शब्द से दूसरे शब्द की उत्पत्ति और दूसरे शब्द से
तीसरे शब्द की उत्पत्ति की धारा जल की तरङ्गों की तरह चलती है । उस धारा
के अन्तर्गत जब किसी की उत्पत्ति कर्णवाले आकाश प्रदेश में होती है, तो उस
शब्द का प्रत्यक्ष होता है । अतः संयोग और विभाग की तरह शब्द से भी शब्द
की उत्पत्ति माननी पड़ती है ।
कर्म
सभी प्रकार के चलने को या गतियों को 'कर्म' कहते हैं । ऊपर की तरफ
उछालने की क्रिया को उत्क्षेपण एवं नीचे की तरफ गिराने की क्रिया को
'अपक्षेपण' कहते हैं । समेटने की क्रिया को 'आकुञ्चन' और सामने बाहर की
तरफ फैलाने की क्रिया को प्रसारण कहते हैं । शेष सभी क्रियाओं का 'गमन'
कहते हैं । क्रियाओं का ऐसा विशद एवं सूक्ष्म वर्णन और किसी दर्शन में नहीं
है । उसे इस मूल ग्रन्थ में देखा जा सकता है ।
सामान्य
सभी व्यक्तियों के कुछ असाधारण धर्म होते हैं, जो उसी व्यक्ति में रहते हैं ।
इसके द्वारा ही जगत् की और सभी वस्तुओं से उस व्यक्ति को अलग रूप में
समझा जाता है । इसी प्रकार कुछ ऐसे भी धर्म हैं, जिनके कारण पदार्थ व्यक्तिशः
भिन्न होते हुए भी एक आकार की प्रतीति के विषय होते हैं । जैसे सभी घट-
व्यक्तियाँ अलग-अलग हैं; किन्तु 'अयं घटः' इस एक ही प्रकार से सब की प्रतीति
होती है । विभिन्न व्यक्तियों की इस एक आकार की प्रतीति का कोई प्रयोजक
अवश्य है । उस प्रयोजक को ही 'सामान्य' कहते हैं । अतः जो समान
आकृत्यादिवाले विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति का कारण हो वही
'सामान्य' है । इसे जाति भी कहते हैं ।
बौद्धों का इस प्रसङ्ग में कहना है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने से भिन्न
और सभी व्यक्तियों से विभिन्न रूप में ही प्रतीत होता है । अतः घटव्यक्ति में घटों
से भिन्न पटादि सभी व्यक्तियों का जो भेद है, वही विभिन्न घटों में "यह घट है"
इस प्रकार की प्रतीति से भासित होता है; क्योंकि सभी घटों में घट से भिन्न और
सभी पदार्थों का भेद समान रूप से विद्यमान है । इस समानविषयक प्रतीति का
सम्पादक है यह तद्भिन्नभिन्नत्व या अपोह, इससे ही उक्त विभिन्न व्यक्तियों में समान
भूमिका ४५
आकार की प्रतीतियों का सम्पादन होता है । इसके लिए अलग जाति नाम के
भाव पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है ।
विशेष
'विशेष' नाम का भी एक पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । इसे केवल
वैशेषिक लोग ही मानते हैं । इसको मानने में वे इस युक्ति का प्रयोग करते हैं कि
जिस प्रकार घट-पटादि दृश्य पदार्थों में परस्पर भेद मानते हैं, उसी प्रकार उनके
उत्पादक परमाणुओं में और आकाश-कालादि विभु पदार्थों में भी भेद मानना होगा;
किन्तु घट-पटादि सावयव पदार्थों में परस्पर भेद के नियामक उनके अवयवों के
भेद हैं । अर्थात् घट पट से भिन्न इसलिए हैं कि घट के उत्पादक कपाल और पट
के उत्पादक तन्तु परस्पर भिन्न हैं । जिनके उत्पादक अवयव परस्पर भिन्न जाति
के होते हैं, वे सभी द्रव्य भी परस्पर भिन्न जाति के ही होते हैं; किन्तु निरवयव
परमाणु और आकाशादि के तो अवयव नहीं हैं । अवयवों के भेद से उनमें
परस्पर भेद का नियम नहीं किया जा सकता । अतः निरवयव द्रव्यों में परस्पर
भेद का नियामक कोई पदार्थ मानना पड़ेगा । इसी पदार्थ का नाम 'विशेष' है ।
अर्थात् जो अपने-अपने आश्रयीभूत द्रव्य को अपने से भिन्न सभी वस्तुओं से
'विशेष' रूप में या भिन्न रूप में समझावें वही 'विशेष' है । यह प्रत्येक निरवयव
द्रव्य में अलग-अलग है, फलतः अनन्त है ।
किन्तु इस प्रसङ्ग में यह समझना शेष रहता है कि एक परमाणु में एक विशेष
है, दूसरे परमाणु में दूसरा विशेष है । अतः एक परमाणु से दूसरा परमाणु भिन्न
है । फलतः दोनों परमाणुओं में रहनेवाले दोनों विशेषों के परस्पर भेद ही दोनों
परमाणु में परस्पर भेद के प्रयोजक हैं । किन्तु इन दोनों विशेषों में परस्पर भेद
है ? इसका ही कौन नियामक है ? इस प्रसङ्ग में वैशेषिकों का कहना है कि ये
विशेष 'स्वतः व्यावृत्त' हैं, इनमें परस्पर भेद के लिए किसी दूसरे नियामक की
आवश्यकता नहीं है ।
इस 'स्वतोव्यावृत्ति' वाली दुर्बलता के कारण ही नव्यवैशेषिकों ने 'विशेष'
पदार्थ को अस्वीकार कर दिया है । उन लोगों का कहना है कि अगर परमाणु
प्रभृति निरवयव द्रव्यों में रहनेवाले विशेषों को स्वतः व्यावृत्त मानते हैं, तो फिर
परमाणु प्रभृति सभी निरवयव द्रव्यों को ही स्वतोव्यावृत्त क्यों नहीं मान लेते ?
इसमें क्या लाभ है कि निरवयव पदार्थों में परस्पर भेद के लिए उनमें स्वतोव्यावृत्त
स्वभाववाले विशेषों की कल्पना की जाय ?
४६ प्रशस्तपादभाष्यम्
समवाय
समवाय नाम का एक षष्ठ पदार्थ भी महर्षि ने माना है । संयोग की तरह
समवाय भी सम्बन्धरूप है; क्योंकि यह भी विशेष्यविशेषणभाव का नियामक है ।
संयोग सम्बन्ध से समवाय सम्बन्ध में यह अन्तर है कि यह अपने आधार और
आधेय इन दोनों में से एक के विनष्ट होने तक बना रहता है । संयोग में यह
बात नहीं है । यह अपने आधार और आधेय दोनों के बने रहने पर भी विनष्ट
हो जाता है । आधार या आधेय के सत्ता-पर्यन्त समवाय का रहना ही वस्तुतः
समवाय की नित्यता है । यद्यपि आकाशादि की तरह समवाय की नित्यता का भी
उपपादन किया गया है ।
विशेष्यविशेषणभाव का नियामक ही सम्बन्ध है । 'घटवद्भूतलम्' इत्यादि स्थल
में घट का संयोग भूतल में है, अतः घट विशेषण है । एवं भूतल विशेष्य इसलिए
है कि भूतलानुयोगिक संयोग घट में है । इसी प्रकार महर्षि कणाद ने समवाय का
लक्षण करते हुए लिखा है कि 'इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः सम्बन्धः स
समवायः' (७।२।२६) ।
'इह कुण्डे दधि', 'इह कुण्डे बदराणि' इत्यादि प्रतीतियों में जिस प्रकार कुण्ड
और दही एवं कुण्ड और बेर इन विशेष्य और विशेषणों को छोड़कर दोनों के
संयोग सम्बन्ध भी विषय होते हैं, उसी प्रकार 'इह तन्तुषु पटः', 'इह वीरणेषु
कटः', 'इह द्रव्ये द्रव्यगुणकर्माणि', 'इह गवि गोत्वम्', 'इहात्मनि ज्ञानम्', 'इहाकाशे
शब्दः' इत्यादि प्रतीतियों में भी तन्तु आधारों और पट प्रभृति आधेयों से अतिरिक्त
कोई सम्बन्ध अवश्य ही भासित होता है; क्योंकि कोई भी विशिष्ट- बुद्धि विशेष्य
और विशेषण के सम्बन्ध के बिना उत्पन्न ही नहीं हो सकती । 'इह तन्तुषु पटः'
इत्यादि प्रतीतियों का नियामक यह सम्बन्ध संयोग हो नहीं सकता; क्योंकि संयोग
तो अन्यतरकर्मज होगा, अथवा उभयकर्मज होगा किं वा संयोगज होगा । प्रकृत में
तन्तु प्रभृति में पट प्रभृति के सम्बन्ध की उत्पत्ति उक्त कर्मादि से नहीं होती है ।
दूसरी बात यह है कि जिन दो वस्तुओं का संयोग होता है, उन दोनों का विभाग
भी अवश्य होता है; किन्तु तन्तु प्रभृति का घटादि के साथ कभी विभाग नहीं
होता । जब तक पट की सत्ता रहेगी, तब तक वह तन्तु के साथ सम्बद्ध ही रहेगा ।
अतः संयोग से भिन्न समवाय नाम का भी सम्बन्धात्मक एक स्वतन्त्र पदार्थ
वैशेषिक लोग मानते हैं । वैशेषिक सम्प्रदाय से भिन्न नैयायिक और मीमांसक
(प्रभाकर) भी इसे मानते हैं; किन्तु इसके स्वरूप में कुछ मतभेद है । जैसे कि
वैशेषिकगण इसे अतीन्द्रिय और नित्य मानते हैं; किन्तु नैयायिक इसे नित्य मानते
हुए भी प्रत्यक्षवेद्य मानते हैं; प्रभाकर इसकी नित्यता को ही अस्वीकार करते हैं ।
वेदान्ती और सांख्यदर्शन के अनुयायी इसके कट्टर विरोधी हैं ।
भूमिका ४७
सभी सम्बन्धों के प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं । तदनुसार इसके भी
प्रतियोगी और अनुयोगी हैं । द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इसके
प्रतियोगी हैं एवं द्रव्य, गुण और कर्म ये तीन ही इसके अनुयोगी हैं । अर्थात्
कथित द्रव्यादि पाँच पदार्थ ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं और द्रव्य, गुण और
कर्म में ही रहते हैं ।
संयोग सम्बन्ध को दृष्टान्त मानकर इसकी सिद्धि की गयी है । संयोग अपने
अनुयोगियों और प्रतियोगियों में समवाय सम्बन्ध से रहकर ही विशिष्ट बुद्धि का
सम्पादन करता है । अतः समवाय को अगर विशिष्टबुद्धि के नियामक रूप से
स्वीकार करते हैं, तो यह भी निर्णय करना होगा कि वह अपने प्रतियोगी और
अनुयोगी में किस सम्बन्ध से रहकर उक्त विशिष्टबुद्धियों का सम्पादन करेगा ?
समवायवादियों के ऊपर इसके विरोधी इसी प्रश्न के द्वारा अपना चरम प्रहार
करते हैं । विरोधियों का अभिप्राय है कि अगर समवाय के रहने के लिए किसी
दूसरे सम्बन्ध की कल्पना करेंगे तो फिर उस सम्बन्ध के रहने के लिए भी दूसरे
सम्बन्ध की कल्पना आवश्यक होगी, जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । यदि
स्वरूप सम्बन्ध से उसके प्रतियोगी और अनुयोगी में समवाय की सत्ता मानेंगे, तो
फिर द्रव्यादि जिन पाँच पदार्थों का समवाय सम्बन्ध मान रहे हैं, उनका स्वरूप
सम्बन्ध ही क्यों नहीं मान लेते ?
इस आक्षेप का उत्तर समवायवादी वैशेषिकादि इस प्रकार देते हैं कि घटादि
द्रव्यों में रूपादि गुण या क्रियादि का अगर स्वरूप सम्बन्ध से ही रहना मानें, तो
फिर यह निर्णय करना कठिन होगा कि ये सम्बन्ध किसके स्वरूप हैं ? क्योंकि
घटादि भी अनन्त हैं और उनमें रहनेवाले गुण एवं क्रियादि भी अनन्त हैं ।
सम्बन्ध को अनन्त पदार्थ स्वरूप मानना सम्भव नहीं है । हम लोग अगर इसके
लिए अलग समवाय नाम का सम्बन्ध मान लेते हैं, तो फिर इस प्रकार की कोई
भी आपत्ति नहीं रह जाती है; क्योंकि वह अपने सभी प्रतियोगियों और
अनुयोगियों में एक ही है और स्वाभिन्न स्वरूप सम्बन्ध से ही है । एवं समवाय में
रहनेवाला सम्बन्ध भी चूँकि समवाय रूप ही है, अतः आगे विभिन्न सम्बन्ध की
कल्पना की धारा ही रुक जाती है । अतः इस पक्ष में न अनवस्था दोष है और
न कल्पना का गौरवदोष है । अतः समवाय का मानना आवश्यक है ।
अभाव
अभाव पदार्थ को महर्षि कणाद के द्वारा उनके सूत्रों से स्वीकृत मानकर मैं
उसका विवरण दे रहा हूँ । इस प्रकरण के अन्त में 'अभाव पदार्थ भी महर्षि
कणाद को अभीष्ट था' इसकी उपपत्ति यथामति दे दी है ।
४८ प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रथमतः अभाव के (१) अन्योन्याभाव और (२) संसर्गाभाव ये दो भेद हैं ।
तादात्म्य नाम का एक सम्बन्ध है, जिसके द्वारा इस सम्बन्ध के प्रतियोगी का
अभेद उसके अनुयोगी में प्रतीत होता है । जैसे कि 'नरः सुन्दरः' इस बुद्धि में
भासित होनेवाले तादात्म्य सम्बन्ध के द्वारा 'नर' और 'सुन्दर' में अभेद प्रतीत
होता है । जिस अभाव की प्रतियोगिता इस तादात्म्य सम्बन्ध से नियमित हो या
अविच्छिन्न हो, उस प्रतियोगिता के आश्रयीभूत वस्तु का अभाव ही अन्योन्याभाव
है । इस अभिप्राय से ही 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽभावोऽन्योन्या-
भावः' अन्योन्याभाव का यह लक्षण प्रसिद्ध है । अन्योन्याभाव का ही दूसरा
नाम 'भेद' है ।
'अन्योन्यस्मिन् अन्योन्यस्याभावः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो अभाव जिस
अनुयोगी में रहे, अगर उस अनुयोगी का अभाव भी प्रथमोक्त अभाव के
प्रतियोगी में रहे तो वह अभाव 'अन्योन्याभाव' है । जैसे कि 'घटो न' इस
आकार का अन्योन्याभाव पट में है । यतः अनुयोगीभूत इस पट का भी अन्योन्या-
भाव घट में है । अन्योन्याभाव के बोधक वाक्य में उसके प्रतियोगी के बोधक पद
और अनुयोगी के बोधक पद दोनों ही प्रथमान्त होते हैं, जैसे कि 'घटो न पटः' ।
किन्तु संसर्गाभाव के अभिलापक वाक्य में प्रतियोगि के बोधक पद तो प्रथमान्त
होते हैं; किन्तु अनुयोगी के बोधक पद प्रायः सप्तम्यन्त होते हैं, जैसे कि 'भूतले
घटो नास्ति' ।
अन्योन्याभाव को छोड़कर और सभी अभाव संसर्गाभाव कहलाते हैं । संसर्गा-
भाव के द्वारा अनुयोगी में प्रतियोगी के संसर्ग का ही प्रतिषेध होता है । 'भूतले
घटो नास्ति' यहाँ पर यद्यपि भूतल में घट के निषेध का ही व्यवहार होता है;
किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर वह प्रतिषेध भूतल में घटसंयोग का ही प्रतिषेध
प्रतिपन्न होता है; क्योंकि भूतल में यतः घट का संयोग है, अतः भूतल में संयोग
सम्बन्ध से घट की सत्ता है । सुतरां भूतल में घट संयोग की सत्ता ही घटसत्ता का
नियामक है । अतः भूतल में घट संयोग की असत्ता ही घट की असत्ता की
प्रयोजिका होगी ।
(१) प्रागभाव, (२) प्रध्वंसाभाव और (३) अत्यन्ताभाव भेद से संसर्गाभाव
तीन प्रकार का है । कार्य की उत्पत्ति से पहले उपादानकारण में कार्य के जिस
अभाव का व्यवहार होता है वह 'प्रागभाव' है । जैसे कि तन्तु में पट का
अभाव, दूध में दही का अभाव इत्यादि । यह यद्यपि अनादि है; किन्तु इसका
विनाश होता है; क्योंकि पट की उत्पत्ति के बाद तन्तु में पुनः इस अभाव की
प्रतीति नहीं होती है ।
भूमिका ४९
मुद्गरादि के प्रहार से घटादि के नाश को ही प्रध्वंस या ध्वंस कहते हैं।
इसकी उत्पत्ति तो होती है; किन्तु विनाश नहीं होता। ध्वंस का विनाश मानने पर
फूटे हुए घड़े की पुनः उत्पत्ति माननी पड़ेगी; क्योंकि घटादि के ध्वंस घटादि के
उत्पत्ति स्वरूप ही हो सकता है। अतः ध्वंस सादि होने पर भी अनन्त है।
संसर्गाभावों में जो अभाव नित्य हो उसे ही 'अत्यन्ताभाव' कहते हैं।
अत्यन्ताभाव की न उत्पत्ति होती है, न उसका विनाश ही होता है, जैसे कि वायु
में रूपादि का अभाव अत्यन्ताभाव है, भूतल में घटाभाव भी अत्यन्ताभाव ही है।
इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता है कि अत्यन्ताभाव यदि नित्य है तो वह अपने
आश्रयों में बराबर रहेगा। अतः भूतल में घट की सत्त्वदशा में भी घटाभाव की
प्रमा-प्रतीति होनी चाहिए; किन्तु भूतल में घट की स्थिति-दशा में घटाभाव की
प्रतीति को प्रमा नहीं स्वीकार किया जा सकता।
इसके दो उत्तर दिये जाते हैं- (१) कुछ लोगों का कहना है कि अत्यन्ताभाव
नित्य और अनित्य भेद से दोनों प्रकार का है। वायु में रहनेवाला रूप का
अत्यन्ताभाव नित्य है। एवं भूतलादि में रहनेवाला घटाभाव अनित्य है; क्योंकि
भूतल में घट के न रहने पर वह उत्पन्न होता है, पुनः घट के आ जाने पर वह
घटाभाव नष्ट हो जाता है। अतः उस समय भूतल में घटाभाव नहीं है।
(२) कुछ लोगों का कहना है कि सभी अत्यन्ताभाव नित्य हैं। अगर ऐसी
बात न हो, भूतल में घट के आ जाने पर घटात्यन्ताभाव का नाश मान लिया जाय
तो उस समय अन्यत्र भी घटात्यन्ताभाव की सत्ता न रह पायेगी। जिससे भूतल
की तरह और सभी आश्रयों में भी जहाँ कि उस समय घट की सत्ता नहीं है-
घटाभाव की प्रतीति प्रमा न हो सकेगी। अतः सभी अत्यन्ताभाव नित्य ही हैं।
भूतल में घट की स्थिति दशा में जो घटाभाव की प्रतीति-प्रमा नहीं होती है,
उसका कारण है उस समय भूतल में घटाभाव के सम्बन्ध का न रहना। सम्बन्ध
के रहने से ही सम्बद्ध वस्तुओं की सत्ता होती है। भूतल में घट का संयोग है,
अतः संयोग सम्बन्ध से भूतल में घट है। तन्तुओं में पट का समवाय सम्बन्ध है,
अतः समवाय सम्बन्ध से तन्तुओं में पट की सत्ता है। भूतल में घटाभाव की सत्ता
का प्रयोजक स्वरूप सम्बन्ध केवल साधारण भूतल स्वरूप नहीं है; किन्तु घट का
असमानकालिक जो भूतल, तत्स्वरूप है। जिस समय भूतल में घट की सत्ता रहती
है, उस समय का भूतल घट का समानकालिक है, असमानकालिक नहीं। अतः समय
भूतल में घटाभाव की सत्ता का उपयुक्त स्वरूप-सम्बन्ध नहीं है। सुतराम् उस
समय अन्यत्र घटाभाव की सत्ता रहते हुए भी भूतल में घटाभाव की सत्ता नहीं
है। अतः उस समय भूतल में होनेवाली घटाभाव की प्रतीति प्रमा नहीं होती है।
५० प्रशस्तपादभाष्यम्
सुतराम् किसी भी अत्यन्ताभाव को अनित्य मानने की आवश्यकता नहीं है । सभी
अत्यन्ताभाव उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं, अतः पूर्णरूप से नित्य हैं ।
अभाव के प्रसङ्ग में नव्य नैयायिकों ने इतना अधिक विचार किया है कि
उसके कुछ अंशों को भी जाने बिना अभाव का ज्ञान अधूरा ही रहेगा । अतः
तदनुसार मैं अभाव को प्रकृत रूप से समझने के लिए उससे सम्बद्ध कुछ विषयों
का परिचय देना आवश्यक समझता हूँ ।
जिस प्रकार संयोगादि सभी सम्बन्धों का एक प्रतियोगी और एक अनुयोगी
होता है, उसी प्रकार सभी अभावों के भी प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं ।
प्रतियोगी शब्द यहाँ प्रतिपक्षी का बोधक है । अतः जो अभाव जिसका विरोधी
अर्थात् प्रतिपक्ष होगा वही उसका प्रतियोगी होगा । फलतः अभाव जिस वस्तु का
होगा, वही वस्तु उस अभाव का प्रतियोगी होगा । जैसे कि 'घट का अभाव' पट
का अभाव, रूप का अभाव इत्यादि रीति से जिसके सम्बन्ध से युक्त होकर जिस
अभाव की प्रतीति होती है, वही उस अभाव का प्रतियोगी होता है । जैसे कि
जहाँ पर घटाभाव रहेगा, वहाँ घट नहीं रहेगा, अतः घटाभाव घट का विरोधी है ।
एवं घट का अभाव ही घटाभाव है, अतः घटाभाव का प्रतियोगी घट है एवं
पटाभाव का प्रतियोगी पट है, रूपाभाव का प्रतियोगी रूप है ।
जो अभाव जिस आश्रयीभूत वस्तु में रहेगा, वही वस्तु उस अभाव का
अनुयोगी होगा । जैसे कि वायु रूपाभाव का अनुयोगी है, घटादि जड़ पदार्थ
ज्ञानाभाव के अनुयोगी हैं ।
कथित प्रतियोगी में रहनेवाला धर्म ही प्रतियोगित्व या प्रतियोगिता है एवं
कथित अनुयोगी में रहनेवाला धर्म ही अनुयोगिता है ।
इस प्रसङ्ग में यह विशेष रूप से विचारणीय है कि एक स्थान में एक सम्बन्ध
से विद्यमान वस्तु का भी दूसरे सम्बन्ध से उसी स्थान में अभाव रहता है । जैसे
कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहने पर भी समवाय सम्बन्ध से भूतल में
घट का अभाव रहता है । इसी प्रकार एक स्थान में एक रूप से एक वस्तु की
सत्ता रहने पर भी दूसरे रूप से उसी वस्तु का अभाव उसी आश्रय में रहता है ।
जैसे कि किसी गृह में पटत्व रूप से शुक्ल पट के रहने पर भी नीलपट रूप
विशेष रूप से पट नहीं रहता, अतः उक्त शुक्लपट के आश्रय गृह में 'नीलपटत्वेन
पटो नास्ति' यह (विशेष रूप से सामान्याभाव) अभाव रहता है; क्योंकि शुक्ल पट
की सत्ता गृह में है, इससे नीलपट की सत्ता गृह में नहीं रह जाती । एवं वही पट
जब घर से बाहर रहता है, उस समय उसमें बहिर्वृत्तित्व रूप धर्म रहता है । इस
बहिर्वृत्तित्व रूप से पट कभी भी घट में नहीं रह सकता । अतः घट में पट की
भूमिका ५१
सत्त्व-दशा में पटत्वेन पट के रहते हुए भी बहिर्वृत्तित्वेन पट का अभाव रहता है ।
एवं जिस समय घट में पट तो है, किन्तु घट नहीं है, उस समय केवल घट के
रहने पर भी घट-पट दोनों नहीं हैं । अतः पटत्वेन पट की सत्ता घट में रहने पर
भी घटपटोभयत्वेन पट की सत्ता नहीं है; क्योंकि ऐसा तो नहीं कह सकते कि घट
है इसलिए घट और पट दोनों ही हैं । अतः उभयाभाव के एक प्रतियोगी के रहने
पर भी उभयत्वेन उसी प्रतियोगी का अभाव रहता है । इसको ही 'एकसत्त्वेऽपि
द्वयं नास्ति' इस वाक्य के द्वारा व्यवहार करते हैं । इस प्रकार सम्बन्ध के द्वारा
और धर्म के द्वारा अभावों में वैलक्षण्य होता है ।
किन्तु प्रतियोगिता के द्वारा ही अभावों में वैलक्षण्य आ सकता है । अतः यह
कहा जाता है कि अभाव की प्रतियोगितायें किसी सम्बन्ध से एवं किसी धर्म से
नियमित (अविच्छिन्न) होती हैं । जो प्रतियोगिता जिस सम्बन्ध से एवं जिस धर्म से
अविच्छिन्न (नियमित) होगी, वही सम्बन्ध और वही धर्म उस प्रतियोगिता का
अवच्छेदक होगा । जैसे कि 'समवायेन घटो नास्ति' इस अभाव की प्रतियोगिता
समवाय सम्बन्ध और घटत्व धर्म से अवच्छिन्न है । अतः उक्त अभाव का
प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध समवाय है और प्रतियोगितावच्छेदक धर्म घटत्व है ।
तदनुसार नवीन नैयायिक 'समवायेन घटो नास्ति' इस वाक्य का अर्थ करते हैं-
"समवायसम्बन्धावच्छिन्नघटत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावोऽस्ति" ।
सम्बन्ध को अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक मानने में यह युक्ति है कि
सामान्यतः किसी भी वस्तु का अभाव कहीं भी नहीं है । अन्ततः कालिक सम्बन्ध
से सभी वस्तुएँ सभी जगह वर्तमान हैं । अतः जब भी किसी वस्तु का अभाव
कहीं व्यवहृत होता है, तो उसके मध्य में कोई विशेष प्रकार का सम्बन्ध कार्य
करता रहता है । सम्बन्ध का यह कार्य प्रतियोगिता में वैलक्षण्य सम्पादन के द्वारा
ही हो सकता है और किसी प्रकार नहीं । जिस सम्बन्ध से जो वस्तु जहाँ नहीं है,
वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता में और अभाव की प्रतियोगिताओं से
वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अतः वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता
का 'अवच्छेदक' है । एवं वह प्रतियोगिता उस सम्बन्ध से अवच्छिन्ना होती है ।
जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए 'समवायेन घटो नास्ति' इस
प्रकार का जो अभाव रहता है, उस अभाव की प्रतियोगिता में समवाय सम्बन्ध
ही (संयोगसम्बन्धावच्छिन्नघटनिष्ठप्रतियोगिता की अपेक्षा) वैलक्षण्य का सम्पादन
करता है । अगर समवाय सम्बन्ध उक्त प्रतियोगिता में वैलक्षण्य का प्रयोजक न
हो, तो फिर घटनिष्ठ सभी प्रतियोगिताएँ समान रह जायेंगी । जिससे जिस प्रकार
भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए 'संयोगेन घटो नास्ति' यह प्रतीति
५२ प्रशस्तपादभाष्यम्
नहीं होती है, उसी प्रकार 'समवायेन घटो नास्ति' यह प्रतीति भी न हो सकेगी ।
अतः 'समवायेन घटो नास्ति' इस अभाव की प्रतियोगिता में और प्रतियोगि-
ताओं से वैलक्षण्य का सम्पादक समवाय सम्बन्ध को मानना पड़ेगा । सम्बन्धों
में प्रतियोगिताओं का यह 'विशेषकत्व' ही सम्बन्ध का प्रतियोगितावच्छेदकत्व
है ।
धर्म को प्रतियोगिता का नियामक (अवच्छेदक) मानने में यह युक्ति है कि
किस अभाव की प्रतियोगिता कहाँ-कहाँ है? एवं कहाँ नहीं ? इसके लिए
प्रतियोगिता का कोई ऐसा नियामक (अवच्छेदक) धर्म मानना पड़ेगा, जो सभी
प्रतियोगियों में रहे एवं अप्रतियोगिभूत वस्तुओं में न रहे । इसी नियामक धर्म को
प्रतियोगिता का 'अवच्छेदक धर्म' कहते हैं, जो इस नियामक के द्वारा नियमित
होता है, वह उस धर्म से 'अवच्छिन्न' होता है । जैसे कि घटाभाव की प्रतियोगिता
कहाँ-कहाँ है ? एवं कहाँ-कहाँ नहीं ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि घटत्व धर्म
जहाँ कहीं भी है, उन सभी स्थानों में अर्थात् सभी घटों में घटाभाव की
प्रतियोगिता है । एवं जिन सब स्थानों में घटत्व नहीं है, अर्थात् घट से भिन्न पटादि
सभी वस्तुओं में वह प्रतियोगिता नहीं है । अतः घटत्व ही घटाभाव की
प्रतियोगिता की स्थिति का नियामक है । एवं घटाभाव की प्रतियोगिता घटत्व से
नियम्य है । वस्तुतः नियामकत्व ही अवच्छेदकत्व है और नियम्यत्व ही अवच्छिन्नत्व
है । इस दृष्टि से यद्यपि 'अवच्छेदक' पद के स्थान में 'नियामक' पद का और
'अवच्छिन्न' पद के स्थान में नियम्य' पद का भी प्रयोग किया जा सकता है; किन्तु
'अवच्छेदक' पद ही उक्त अर्थ में परम्परा से प्रयुक्त है, अतः उसके स्थान में दूसरे
पदों की प्रयुक्ति से झटिति बोध में बाधा पहुँचेगी और अप्रयुक्तत्व दोष प्रयोक्ता के
ऊपर आ पड़ेगा ।
सप्तपदार्थी
इधर वैशेषिकदर्शन के मूर्द्धन्य प्रकरण ग्रन्थों के प्रभाव से विद्वानों की यह
धारणा चली आ रही है कि महर्षि कणाद और उनके अनुयायी द्रव्य, गुण, कर्म,
सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव इन सात पदार्थों की सत्ता मानते थे ।
किन्तु महर्षि कणाद ने "धर्मप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां
पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम्" (अ. १। आ. १। सू. ४) इस
पदार्थोद्देश्य सूत्र में पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं वैशेषिक दर्शन के सब
से प्रामाणिक भाष्यकार प्रशस्तपाद ने भी अभाव पदार्थ का उल्लेख नहीं किया
है । एवं विपक्षियों की-
धर्मं व्याख्यातुकामस्य षट्पदार्थोपवर्णनम् ।
सागरं गन्तुकामस्य हिमवद्गमनोपमम् ॥
सूत्रों में निम्नलिखित पाँच सूत्र ऐसे हैं, जिनसे अभाव पदार्थ का स्वातन्त्र्य और
भूमिका ५३
अर्थात् "धर्म की व्याख्या के लिए प्रवृत्त पुरुष के द्वारा छः पदार्थों का वर्णन
(वैसा ही अयुक्त है जैसा कि समुद्र की ओर जानेवाले पुरुष के लिए हिमालय पर
जाना अयुक्त है)"। इत्यादि उक्तियों से भी इस धारणा को बल मिला है कि
महर्षि कणाद द्रव्यादि छः भावपदार्थों को ही मूलतः मानते थे । पीछे आकर
उपपत्ति की दृष्टि से आवश्यक समझकर आचार्यों ने 'अभाव' की भी वैशेषिक
दर्शन के द्वारा अभिमत स्वतन्त्र पदार्थों में गणना कर ली और तब से ही
वैशेषिकदर्शन को सप्तपदार्थवादी माना जाने लगा । अतएव किरणावलीकार
उदयनाचार्य, न्यायकन्दलीकार श्रीधर भट्ट, न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य प्रभृति
वैशेषिकदर्शन के सभी प्रमुख आचार्यों को इसकी उपपत्ति देनी पड़ी है कि
"पदार्थोद्देश" सूत्र में अभाव पदार्थ की अनुक्ति से उसका महर्षि कणाद के द्वारा
अस्वीकृति का समर्थन नहीं किया जा सकता; किन्तु महर्षि कणाद के द्वारा निर्मित
सूत्रों में निम्नलिखित पाँच सूत्र ऐसे हैं, जिनसे अभाव पदार्थ का स्वातन्त्र्य और
उसके प्रागभावादि चार भेदों का स्पष्टतः उल्लेख है । एवं ये पाँच सूत्र उन सभी
सूत्र- व्याख्याताओं के द्वारा स्वीकृत हैं जो अभी तक उपलब्ध हैं । कणाद-सूत्र की
अभी तक तीन प्राचीन स्वतन्त्र टीकाएँ उपलब्ध हैं- (१) अनेकशः प्रकाशित
शङ्करमिश्र कृत उपस्कार टीका, (२) मिथिला विद्यापीठ के द्वारा प्रकाशित
अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान् की टीका एवं (३) बड़ौदा से प्रकाशित
चन्द्रानन्द पण्डित कृत टीका । इन सभी टीकाकारों के द्वारा ये पाँच सूत्र स्वीकृत
हैं और इनकी व्याख्या भी प्रायः उक्त सभी टीकाओं में एक-सी है । पं. जय-
नारायण तर्कपञ्चानन की विवृति और चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार के भाष्य- ये दो
वैशेषिक सूत्र की अर्वाचीन टीकाएँ हैं । इन दोनों में भी उक्त पाँच सूत्र हैं । इन
उपपत्तियों से अपने निर्णय पर पहुँचने के बाद मैंने चौखम्बा सीरीज से प्रकाशित
शङ्करमिश्र कृत 'कणादरहस्य' के अन्त में चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार महाशय कृत
वैशेषिक-दर्शनभाष्य की एक आलोचना छपी देखी है, आलोचक का नाम उसमें
नहीं है, इस आलोचना के अन्त में स्वतन्त्र रूप से इन पाँच सूत्रों का उल्लेख
किया गया है और व्याख्या लिखी गयी है । और उन्होंने लिखा है कि 'अभाव की
कणाद के द्वारा अस्वीकृति का जो आक्षेप किया जाता है, उसके निराकरण के
लिए ही मैंने इन.सूत्रों की व्याख्या की है' । अतः इन पाँच सूत्रों की प्रामाणिकता
में कोई सन्देह नहीं है । ये सूत्र हैं-
(१) क्रियागुणव्यपदेशाभावात् (९।१।१)। उत्पत्ति से पहले (घटादि कार्य)
असत् हैं; क्योंकि उस समय उनमें क्रियाओं का और गुणों का व्यवहार नहीं
होता ।
सूत्र हैं ही नहीं । अतः इस सूत्र का प्रामाण्य ही सन्दिग्ध है । अतः सन्दिग्ध
५४ प्रशस्तपादभाष्यम्
(२) सदसत् (९।१।२) । पहले से विद्यमान भी घटादि कार्य नाश के बाद
असत् हैं; (क्योंकि नाश के बाद भी उनमें गुणक्रियादि का व्यवहार नहीं होता) ।
(३) असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् । अविद्यमान पदार्थों में यतः
गुणक्रियादि का व्यवहार नहीं होता है, अतः अभाव पदार्थ द्रव्यादि भावपदार्थों से
भिन्न पदार्थ है ।
(४) सच्चासत् (९।१।४) सत् अर्थात् विद्यमान घटादि का भी प्रतिषेध होता है
(यह प्रतिषेध ही अन्योन्याभाव है) ।
(५) यच्चान्यदसत्तत्सदसत् (९।१।५) । कथित तीनों प्रकार के अभावों से भिन्न
अभाव भी हैं (यही अत्यन्ताभाव है) ।
इनमें तीसरे सूत्र से अभाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से भिन्न ठहराया गया है
और शेष चार सूत्रों में से पहला प्रागभाव का, दूसरा ध्वंस का, चौथा
अन्योन्याभाव का एवं पाँचवाँ अत्यन्ताभाव का ज्ञापक है । अतः इन सूत्रों के द्वारा
अभाव का द्रव्यादि छः पदार्थों से स्वातन्त्र्य है और उसके प्रागभावादि चारों भेद
सुव्यवस्थ हैं ।
सुतराम् उद्देश्य सूत्र में अभाव पदार्थ का पृथक् रूप से उल्लेख न रहने के
कारण सूत्रकार के ऊपर न्यूनता का ही आक्षेप कथञ्चित् हो सकता है । इससे
अभाव के प्रसङ्ग में उनकी असम्मति नहीं मानी जा सकती । उपसंहार सूत्रों के
अनुसार भी उपक्रम सूत्र में ह्रास-वृद्धि अनेक स्थानों में देखी जाती है ।
दूसरी बात यह है कि मिथिला विद्यापीठ से और बड़ौदा से जो वैशेषिकसूत्र
छपे हैं, उन दोनों में ही "द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानाम्" इत्यादि उद्देश्य-
सूत्र हैं ही नहीं । अतः इस सूत्र का प्रामाण्य ही सन्दिग्ध है । अतः सन्दिग्ध
प्रामाण्यवाले सूत्र के द्वारा किसी निश्चित परिणाम पर नहीं पहुँचा जा सकता ।
वैशेषिकदर्शन के प्रसङ्ग में षट्पदार्थ-प्रतिपादक और जितने भी वाक्य हैं, वे
सभी कथित वैशेषिक सूत्रों से दुर्बल ही हैं । अतः प्रवादों के बल पर अभाव की
वैशेषिकशास्त्रीय स्वीकृति काटी नहीं जा सकती है ।
इन सभी उपपत्तियों के अनुसार मेरी सम्मति में अभाव पदार्थ भी महर्षि-
कणाद के द्वारा स्वीकृत है ।
इस पुस्तक के पाठ के प्रसङ्ग में मैंने साधारणतः मुद्रित न्यायकन्दली का ही
अनुसरण किया है; किन्तु जहाँ कहीं मुझे ऐसे पाठ मिले, जिनसे प्रकृत अर्थ का
बोध ही संभव नहीं था, उनको यथामति संशोधन करके तदनुसार ही अनुवाद
किया है; किन्तु मूल में यथावत् प्रायः मुद्रित पुस्तक के पाठ को ही रहने दिया है ।
नीचे टिप्पणी में उपपत्ति सहित उन पाठभेदों का उल्लेख कर दिया है । विद्वान्
लोग इस पर अवश्य दृष्टिपात करें ।
भूमिका ५५
अनुवाद में मैंने अर्थ को स्पष्ट करने के अभिप्राय से कुछ अधिक शब्दों के
प्रयोग का स्वातन्त्र्य ग्रहण किया है । इतने बड़े आकार के ग्रन्थ में न्यूनता के
अतिरिक्त भ्रम और प्रमाद की पूरी सम्भावना है । अतः विद्वानों से क्षमा-याचना
पूर्वक प्रार्थना है कि ऐसे स्थलों से मुझे अवश्य अवगत करावें । जिससे अगर
इसका पुनः संस्करण संभव हुआ तो उन अवगतियों से लाभ उठाया जा सके ।
तद्विद्वांसोऽनुगृह्णन्तु चित्तश्रोत्रैः प्रसादिभिः ।
सन्तः प्रणयिवाक्यानि गृह्णन्ति ह्यनसूयवः ॥
आचार्य कुमारिल भट्ट के इस श्लोक के साथ मैं इस भूमिका को समाप्त
करता हूँ ।
दुर्गाधर झा
अनुसन्धान-सहायक
वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय
वाराणसी