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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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५२ प्रशस्तपादभाष्यम्
नहीं होती है, उसी प्रकार 'समवायेन घटो नास्ति' यह प्रतीति भी न हो सकेगी ।
अतः 'समवायेन घटो नास्ति' इस अभाव की प्रतियोगिता में और प्रतियोगि-
ताओं से वैलक्षण्य का सम्पादक समवाय सम्बन्ध को मानना पड़ेगा । सम्बन्धों
में प्रतियोगिताओं का यह 'विशेषकत्व' ही सम्बन्ध का प्रतियोगितावच्छेदकत्व
है ।
धर्म को प्रतियोगिता का नियामक (अवच्छेदक) मानने में यह युक्ति है कि
किस अभाव की प्रतियोगिता कहाँ-कहाँ है? एवं कहाँ नहीं ? इसके लिए
प्रतियोगिता का कोई ऐसा नियामक (अवच्छेदक) धर्म मानना पड़ेगा, जो सभी
प्रतियोगियों में रहे एवं अप्रतियोगिभूत वस्तुओं में न रहे । इसी नियामक धर्म को
प्रतियोगिता का 'अवच्छेदक धर्म' कहते हैं, जो इस नियामक के द्वारा नियमित
होता है, वह उस धर्म से 'अवच्छिन्न' होता है । जैसे कि घटाभाव की प्रतियोगिता
कहाँ-कहाँ है ? एवं कहाँ-कहाँ नहीं ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि घटत्व धर्म
जहाँ कहीं भी है, उन सभी स्थानों में अर्थात् सभी घटों में घटाभाव की
प्रतियोगिता है । एवं जिन सब स्थानों में घटत्व नहीं है, अर्थात् घट से भिन्न पटादि
सभी वस्तुओं में वह प्रतियोगिता नहीं है । अतः घटत्व ही घटाभाव की
प्रतियोगिता की स्थिति का नियामक है । एवं घटाभाव की प्रतियोगिता घटत्व से
नियम्य है । वस्तुतः नियामकत्व ही अवच्छेदकत्व है और नियम्यत्व ही अवच्छिन्नत्व
है । इस दृष्टि से यद्यपि 'अवच्छेदक' पद के स्थान में 'नियामक' पद का और
'अवच्छिन्न' पद के स्थान में नियम्य' पद का भी प्रयोग किया जा सकता है; किन्तु
'अवच्छेदक' पद ही उक्त अर्थ में परम्परा से प्रयुक्त है, अतः उसके स्थान में दूसरे
पदों की प्रयुक्ति से झटिति बोध में बाधा पहुँचेगी और अप्रयुक्तत्व दोष प्रयोक्ता के
ऊपर आ पड़ेगा ।
सप्तपदार्थी
इधर वैशेषिकदर्शन के मूर्द्धन्य प्रकरण ग्रन्थों के प्रभाव से विद्वानों की यह
धारणा चली आ रही है कि महर्षि कणाद और उनके अनुयायी द्रव्य, गुण, कर्म,
सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव इन सात पदार्थों की सत्ता मानते थे ।
किन्तु महर्षि कणाद ने "धर्मप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां
पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम्" (अ. १। आ. १। सू. ४) इस
पदार्थोद्देश्य सूत्र में पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं वैशेषिक दर्शन के सब
से प्रामाणिक भाष्यकार प्रशस्तपाद ने भी अभाव पदार्थ का उल्लेख नहीं किया
है । एवं विपक्षियों की-
धर्मं व्याख्यातुकामस्य षट्पदार्थोपवर्णनम् ।
सागरं गन्तुकामस्य हिमवद्गमनोपमम् ॥