वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context४६ प्रशस्तपादभाष्यम्
समवाय
समवाय नाम का एक षष्ठ पदार्थ भी महर्षि ने माना है । संयोग की तरह
समवाय भी सम्बन्धरूप है; क्योंकि यह भी विशेष्यविशेषणभाव का नियामक है ।
संयोग सम्बन्ध से समवाय सम्बन्ध में यह अन्तर है कि यह अपने आधार और
आधेय इन दोनों में से एक के विनष्ट होने तक बना रहता है । संयोग में यह
बात नहीं है । यह अपने आधार और आधेय दोनों के बने रहने पर भी विनष्ट
हो जाता है । आधार या आधेय के सत्ता-पर्यन्त समवाय का रहना ही वस्तुतः
समवाय की नित्यता है । यद्यपि आकाशादि की तरह समवाय की नित्यता का भी
उपपादन किया गया है ।
विशेष्यविशेषणभाव का नियामक ही सम्बन्ध है । 'घटवद्भूतलम्' इत्यादि स्थल
में घट का संयोग भूतल में है, अतः घट विशेषण है । एवं भूतल विशेष्य इसलिए
है कि भूतलानुयोगिक संयोग घट में है । इसी प्रकार महर्षि कणाद ने समवाय का
लक्षण करते हुए लिखा है कि 'इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः सम्बन्धः स
समवायः' (७।२।२६) ।
'इह कुण्डे दधि', 'इह कुण्डे बदराणि' इत्यादि प्रतीतियों में जिस प्रकार कुण्ड
और दही एवं कुण्ड और बेर इन विशेष्य और विशेषणों को छोड़कर दोनों के
संयोग सम्बन्ध भी विषय होते हैं, उसी प्रकार 'इह तन्तुषु पटः', 'इह वीरणेषु
कटः', 'इह द्रव्ये द्रव्यगुणकर्माणि', 'इह गवि गोत्वम्', 'इहात्मनि ज्ञानम्', 'इहाकाशे
शब्दः' इत्यादि प्रतीतियों में भी तन्तु आधारों और पट प्रभृति आधेयों से अतिरिक्त
कोई सम्बन्ध अवश्य ही भासित होता है; क्योंकि कोई भी विशिष्ट- बुद्धि विशेष्य
और विशेषण के सम्बन्ध के बिना उत्पन्न ही नहीं हो सकती । 'इह तन्तुषु पटः'
इत्यादि प्रतीतियों का नियामक यह सम्बन्ध संयोग हो नहीं सकता; क्योंकि संयोग
तो अन्यतरकर्मज होगा, अथवा उभयकर्मज होगा किं वा संयोगज होगा । प्रकृत में
तन्तु प्रभृति में पट प्रभृति के सम्बन्ध की उत्पत्ति उक्त कर्मादि से नहीं होती है ।
दूसरी बात यह है कि जिन दो वस्तुओं का संयोग होता है, उन दोनों का विभाग
भी अवश्य होता है; किन्तु तन्तु प्रभृति का घटादि के साथ कभी विभाग नहीं
होता । जब तक पट की सत्ता रहेगी, तब तक वह तन्तु के साथ सम्बद्ध ही रहेगा ।
अतः संयोग से भिन्न समवाय नाम का भी सम्बन्धात्मक एक स्वतन्त्र पदार्थ
वैशेषिक लोग मानते हैं । वैशेषिक सम्प्रदाय से भिन्न नैयायिक और मीमांसक
(प्रभाकर) भी इसे मानते हैं; किन्तु इसके स्वरूप में कुछ मतभेद है । जैसे कि
वैशेषिकगण इसे अतीन्द्रिय और नित्य मानते हैं; किन्तु नैयायिक इसे नित्य मानते
हुए भी प्रत्यक्षवेद्य मानते हैं; प्रभाकर इसकी नित्यता को ही अस्वीकार करते हैं ।
वेदान्ती और सांख्यदर्शन के अनुयायी इसके कट्टर विरोधी हैं ।