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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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भूमिका ४९
है। इसी दृष्टि से 'हेतोराभासा हेत्वाभासाः' इस व्युत्पत्ति से लभ्य हेतु के दोषों का
ही लक्षण आकर ग्रन्थों में किया गया है।
हेतुवों के ये दोष दो प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं। एक सीधे ही
अनुमिति को रोकते हैं। जैसे कि सप्रतिपक्ष और बाध। कुछ हेत्वाभास अनुमिति
के कारण व्याप्ति या पक्षधर्मता का विघटन करते हुए अनुमिति का प्रतिरोध
करते हैं, जैसे कि व्यभिचार एवं स्वरूपासिद्धि। कुछ हेत्वाभास ऐसे भी हैं जो
उक्त दोनों ही प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं, जैसे कि आश्रया- सिद्धि
एवं साध्याप्रसिद्धि।
हेत्वाभास की संख्याओं में और नामों में भी मतभेद देखा जाता है। जैसे कि
वैशेषिकदर्शन के सूत्र में इसके तीन ही भेद कहे गये हैं; किन्तु भाष्यकार ने उनमें
अनध्यवसित नाम को जोड़कर निम्नलिखित चार भेद किया है-(१) असिद्ध,
(२) विरुद्ध, (३) सन्दिग्ध और (४) अनध्यवसित। न्यायमत में (१) सव्यभिचार,
(२) विरुद्ध, (३) सप्रतिपक्ष, (४) असिद्ध और (५) बाध ये पाँच हेत्वाभास के
मुख्य भेद माने गये हैं। मीमांसकों ने महर्षि कणाद की रीति से इसके तीन ही
भेद किये हैं।
इस प्रकार ज्ञान के परिशोधन के अभिप्राय से आचार्यों ने हेतु की तरह
हेत्वाभासों को भी समझाने में बहुत श्रम किया है। जिसका लाभ हम लोगों को
उठाना चाहिए। एक पक्ष के स्थापन के लिए विरुद्ध पक्ष के हेतुवों में दोषों
का प्रदर्शन आवश्यक है। जो आज भी न्यायालयों की व्यवस्थाओं को सूक्ष्म दृष्टि
से देखने पर अवगत हो सकता है। प्राचीन समय की धर्मशास्त्रानुयायी
व्यवस्थाओं को देखने से तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है। जिसके लिए
भारतीय व्यवहार के द्वैतपरिशिष्टादि निबन्ध-ग्रन्थों के व्यवहारप्रकरणों को देखना
उपयोगी होगा।
सुख
जिस इच्छा के लिए और किसी इच्छा की आवश्यकता न हो, उसे 'सुख'
कहते हैं। सुख की इच्छा से ही चन्दनवनितादि सभी विषयों की इच्छा होती है।
अर्थात् चन्दनादि विषय चूँकि सुख के कारण हैं, इसीलिए उनकी इच्छा होती है।
सुख की इच्छा के लिए किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं होती। अतः
किसी और इच्छा के अनधीन इच्छा का विषय ही 'सुख' है।
दुःख
इसी प्रकार जिसमें द्वेष उत्पन्न होने के लिए मध्य में दूसरे विषयों के द्वेष की
अपेक्षा न हो, वही 'दुःख' है। मुख्यतः जीवों को दुःखों से ही द्वेष है। फिर 'ये