वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१३
न्यायकन्दली
पुरुषस्य तस्य लिङ्गदर्शनप्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यां लिङ्गदर्शनम्, यत्र धूमस्तत्राग्निरित्ये-
वंभूतायाः प्रसिद्धेरनुस्मरणं च । ताभ्यां यथाऽतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानं तथा शब्दा-
दिभ्योऽपीति । नावद्धि शब्दो नार्थं प्रतिपादयति यावदयमस्याव्यभिचारीत्येवं नावगम्यते,
ज्ञाते त्वव्यभिचारे प्रतिपादयन् धूम इव लिङ्गं स्यात् ।
अत्राह कश्चित्— अनुमाने साध्यधर्मविशिष्टो धर्मी प्रतीयते, शब्दार्थानुमाने को
धर्मी ? न तावदर्थः, तस्य तदानीमप्रतीयमानत्वात् । शब्दो धर्मीति चेत् ? किमस्य
साध्यम् ? अर्थवत्त्वं चेत् ? न पर्वतादेरिव वह्न्यादिना शब्दस्यार्थेन सह संयोगसम-
वायादिलक्षणः कश्चित् सम्बन्धो निरूप्यते, येनायमर्थविशिष्टः साधनीयः ।
प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव एव हि तयोः सम्बन्धः, सोऽर्थप्रतीत्युत्तर-
अनुमान रूप से ही प्रमाण है । 'यथा' इत्यादि से कथित 'समानविधि' का प्रदर्शन
करते हैं । 'प्रसिद्धः समयो यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष को समय
(व्याप्ति) पूर्व से ज्ञात है, वही पुरुष 'प्रसिद्धसमय' शब्द का अर्थ है ।
'लिङ्गदर्शनप्रसिद्धयनुस्मरणाभ्याम्' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि
लिङ्गदर्शन (अर्थात् पक्षधर्मताज्ञान) और 'जहाँ धूम है वहाँ वह्नि भी अवश्य ही है'
इस प्रकार की 'प्रसिद्धि' अर्थात् व्याप्ति का स्मरण, इन दोनों से उक्त
'प्रसिद्धसमय' पुरुष को जिस प्रकार इन्द्रियों के द्वारा अज्ञेय वस्तु का ज्ञान होता
है, उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों से भी कथित पुरुष को ही ज्ञान होता है (अतः
शब्दादि प्रमाण भी वस्तुतः अनुमान ही है) । शब्द तब तक अर्थ के बोध का
उत्पादन नहीं कर सकता, जब तक कि अर्थ के साथ उसका अव्यभिचार
(व्याप्ति) गृहीत न हो जाय, ज्ञात अव्यभिचार (व्याप्ति) के द्वारा ही जब (धूम की
तरह) शब्द भी अर्थ का ज्ञापक है, तो फिर धूम की तरह वह भी ज्ञापक लिङ्ग
(अनुमान) ही होगा ।
यहाँ कोई (शब्द को अलग स्वतन्त्र प्रमाण माननेवाले) यह विचार उठाते
हैं कि अनुमान में तो साध्य रूप धर्म से युक्त धर्मी की प्रतीति होती है, किन्तु
शब्द से जो अर्थ का अनुमान होगा उसमें धर्मी रूप से किसका भान होगा ?
अर्थ तो उस अनुमान का धर्मी (पक्ष) हो नहीं सकता, क्योंकि वह तब
तक अज्ञात है (पक्ष.को पहले से निश्चित रहना चाहिए) । शब्द को ही यदि
उस अनुमान का पक्ष मानें, तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इस
अनुमान का साध्य कौन होगा ? अर्थवत्त्व को साध्य मानना सम्भव
नहीं है; क्योंकि पर्वतादि पक्षों का वह्नि प्रभृति साध्यों के साथ जिस प्रकार का
संयोगसमवायादि सम्बन्ध है, शब्द के साथ अर्थ का उस प्रकार के किसी
सम्बन्ध का निर्वचन सम्भव नहीं है, जिस सम्बन्ध के द्वारा अर्थ से युक्त शब्द रूप
धर्मी का साधन किया जा सके । शब्द और अर्थ में प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध
ही केवल हो सकता है, किन्तु इस सम्बन्ध का ज्ञान तो शब्द से अर्थ-प्रतीति के
बाद ही होगा, अर्थ-प्रतीति के पहले नहीं । एवं वह्नि और धूम की तरह
५१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
कालीनो नार्थप्रतिपादनात् पूर्वं सम्भवति । नाप्यग्निधूमयोरिव शब्दार्थयो-
रस्त्यविनाभावनियमः, देशकालव्यभिचारात्; तद्व्यभिचारश्चासत्यपि युधिष्ठिरे कलौ
युधिष्ठिरशब्दप्रयोगात्, असत्यामपि लङ्कायां जम्बुद्वीपे लङ्काशब्दश्रवणात् । तस्मादनुमान-
सामग्रीवैलक्षण्याच्छब्दो नानुमानम्, देशविशेषेऽर्थव्यभिचारात् । न धूमो वह्निं क्वचिद्
व्यभिचरति, शब्दस्तु स्वार्थं व्यभिचरति । तथा हि चौर इति भक्ताभिधानं दाक्षिणात्यानाम्,
आर्यावर्तनिवासिनां तु तस्कराभिधानम् ।
यदि च शब्दोऽनुमानं त्रैरूप्यप्रतीत्याऽस्य प्रामाण्यनिश्चयः स्यात्, नाप्तोक्तत्वप्रतीत्या,
तत्प्रतीत्या तु निश्चीयमाने प्रामाण्येऽनुमानाद् व्यतिरिच्यत एव । एवं वैधम्र्यात् ।
अत्रोच्यते- यदूर्द्धीकृतायां तर्जन्यां देशकालव्यवहितेष्वर्थेषु दशसंख्यानुमानं
न तत्र संख्या धर्मिणी, अप्रतीयमानत्वात् । नापि तर्जनीविन्यासो धर्मी, तस्य
शब्द और अर्थ में 'अविनाभाव' (व्याप्ति) सम्बन्ध है भी नहीं; क्योंकि जिस देश या
जिस काल में शब्द या अर्थ है, उस देश और उस काल में अर्थ या शब्द अवश्य
रहता ही नहीं है; क्योंकि कलिकाल में युधिष्ठिर रूप अर्थ की सत्ता न रहने पर
भी युधिष्ठिर शब्द का प्रयोग होता है, एवं लङ्का नगरी की सत्ता जम्बूद्वीप में
वर्त्तमान काल में न रहने पर भी 'लङ्का' शब्द का प्रयोग होता है । अतः यह
मानना पड़ेगा कि शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न है, क्योंकि विशेष प्रकार के
कई देशों में शब्द के साथ अर्थ का व्यभिचार देखा जाता है । धूम का वह्नि के
साथ व्यभिचार कहीं नहीं देखा जाता; किन्तु शब्द के साथ अर्थ का व्यभिचार
देखा जाता है । जैसे कि एक ही 'चौर' शब्द का प्रयोग दाक्षिणात्य लोग भात के
अर्थ में करते हैं; किन्तु उसी 'चौर' शब्द को आर्य लोग 'तस्कर' (चोर) अर्थ में
प्रयोग करते हैं ।
दूसरी बात यह है कि शब्द यदि अनुमान रूप से ही प्रमाण होता तो उससे
अर्थबोध के लिए उसके (पक्षसत्त्वादि) तीनों रूपों से ज्ञान की ही अपेक्षा होती
(जैसे कि सभी अनुमानों में होता है), आप्तोक्तत्व निश्चय की नहीं । यदि शब्द में
आप्तोक्तत्व के निश्चय के बाद ही प्रामाण्य का निश्चय होता है, तो फिर अवश्य
ही शब्द अनुमान से भिन्न प्रमाण है; क्योंकि दोनों के स्वरूप भिन्न हैं ।
इस प्रसङ्ग में हम लोग कहते हैं कि (यह सङ्केत कर लेने पर कि यदि केवल तर्जनी
अङ्गुली को ऊपर उठावें तो उससे दश संख्या को समझना, इसके बाद तर्जनी अङ्गुली
को ऊपर उठाने पर उस सङ्केत को समझनेवाले को दश संख्या का अनुमान होता है,
जिस दश संख्या का आश्रयीभूत द्रव्य उस बोद्धा पुरुष के आश्रयीभूत देश और काल
से भिन्न देश और भिन्न काल का होता है । इस अनुमान में पक्ष कौन होता है ?