वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३३
न्यायकन्दली
गवयग्रहणे सत्यसन्निहितगोपिण्डावलम्बिनी सादृश्यप्रतीतिः सदृशदर्शनाभिव्यक्तसंस्कार-
जन्या स्मृतिरेव, न प्रमाणान्तरम् । दृष्टा च निर्विकल्पकगृहीतस्यापि स्मृतिविषयता,
अव्युत्पन्नैकपिण्डग्रहणे प्रथममविकल्पितस्य सामान्यस्य पिण्डान्तरग्रहणे प्रत्यभिज्ञानात् ।
येऽपि श्रुतातिदेशवाक्यस्य गवयदर्शने गोसादृश्यप्रतीत्या 'अस्य गवयशब्दो नामधेयम्'
इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतीतिमुपमानमिच्छन्ति, तेषामपि यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यं
तज्जनिता च 'लोके यः खलु गवय इति श्रूयते स गोसदृशः' इति बुद्धिरुपम एव । यदपि
गोसदृशस्य गवय- शब्दवाच्यत्वज्ञानं तदप्यनुमानम्, तत्र तच्छब्दप्रयोगात् । यः खलु शब्दो
यत्राभियुक्तैरविगानेन प्रयुज्यते स तस्य वाचकः । प्रयुज्यते चारण्यकेनाविगानेन गोसदृशे
गवयशब्द इति । तस्मात्
(उ.) गो और गवय दोनों में जो अनेक अवयवों की समानतायें हैं, वे ही दोनों में
रहने के कारण सादृश्य कहलाती हैं । ये समानतायें यदि गो और गवय इन दोनों
में से एकमात्र के ग्रहण से भी गृहीत होती हैं, तो फिर सादृश्य भी उसी प्रकार
गृहीत हो ही गया । तस्मात् प्रमाता पुरुष से दूर में रहनेवाले गोपिण्ड में जो गवय
के सादृश्य की प्रतीति होती है, वह स्मरण रूप ही है । केवल इतनी-सी बात है
कि वह स्मरण उस संस्कार से उत्पन्न होता है, जिसका उद्बोधन गोसदृश गवय के
दर्शन से होता है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत विषयों का भी स्मरण
उपलब्ध होता है, जैसे कि अव्युत्पन्न पुरुष के द्वारा एक पिण्ड के ग्रहण के समय
सविकल्पक ज्ञान के द्वारा अगृहीत सामान्य की भी उसी जाति के दूसरे पिण्ड के
ग्रहण के समय प्रत्यभिज्ञा होती है ।
नैयायिकों का कहना है कि जो प्रमाता पहले किसी आप्त पुरुष से 'गोसदृशो
गवयः' इस अतिदेश वाक्य को सुन लेता है, बाद में वही जब गवय को देखता है
तो उसे यह प्रतीति होती है कि 'इसी पिण्ड का नाम गवय है' । यह प्रतीति चूँकि
गवय शब्द रूप संज्ञा की गवय पिण्ड रूप संज्ञी में (वाच्यवाचकरूप) सम्बन्ध
विषयक है । ('अयं गवयपदवाच्यः' इस आकार की प्रतीति को संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध की
प्रतीति कहते हैं), अतः यही उपमान है; किन्तु नैयायिकों का भी यह कहना ठीक
नहीं है; क्योंकि यह भी वस्तुतः शब्द प्रमाण ही है; क्योंकि 'लोक में यह जो 'गवय'
का नाम सुनते हैं वह गोसदृश वस्तु का ही बोधक है' यह बुद्धि भी तो 'यथा
गौस्तथा गवयः' इस वाक्य से ही उत्पन्न होती है । एवं इससे गोसदृश पिण्ड में गवय
शब्द के अभिधेय होने का जो ज्ञान होता है, वह (उपमान न होकर) शब्द ही है;
क्योंकि गोसदृश पिण्ड में ही गवय शब्द का प्रयोग होता है, (अतः नैयायिक गण
जिसे उपमान कहते हैं, वह भी शब्दजनित होने के कारण अनुमान ही है) एवं
गोसदृश (गवय में) जो गवय शब्द की वाच्यता का ज्ञान होता है, वह भी
अनुमान ही है; क्योंकि (यहाँ अनुमान का यह आकार है कि) आप्तगण एक स्वर से
बिना विरोध के जिस शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं वह शब्द उस अर्थ का
वाचक होता है, सभी आरण्यक आप्तजन गवय शब्द का प्रयोग उसी पिण्ड में
करते हैं जो गो के समान है । तस्मात् गो-सदृश उस पिण्ड का नाम अवश्य ही 'गवय'
है। एवं
५३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
दर्शनादर्थापत्तिर्विरोध्येव, श्रवणादनुमितानुमानम् ।
प्रमाणों के द्वारा ज्ञात अर्थ से अर्थों की जो अवगति (दृष्टार्थापत्ति)
होती है वह विरोधि (व्यतिरेकी) अनुमान ही है । वाक्य के श्रवण से
जो अर्थावगति (श्रुतार्थापत्ति) होती है, वह भी अनुमितानुमान ही है ।
न्यायकन्दली
सोऽपि गवयशब्दवाच्य एवेति सामान्येन ज्ञानमनुमानमेव । प्रत्यक्षे गवये सादृश्यज्ञानं
त्रैलोक्यव्यावृत्तपिण्डबुद्धिरपि प्रत्यक्षफलम् । यच्च तद्गतयेन संज्ञासंज्ञिसम्बन्धानुसन्धानम्,
तदपि सादृश्यग्रहणमभिव्यक्तपूर्वोेपजातसामान्यप्रवृत्तगोसदृशगवयशब्दवाच्यत्वज्ञानजनितसंस्का-
रजन्यादेकत्रोपजातसामान्यविषयसङ्केतज्ञानसंस्कारकृततज्जातीयपिण्डान्तरविषयतच्छब्दवाच्य-
त्वानुसन्धानवत् स्मरणमेव । एवं हि तदायमनुसन्धत्ते 'अस्यैव तन्मया पूर्वमेव तृतच्छब्द-
वाच्यत्वमवगतम्' इत्युपमानाभावः ।
दृष्टः श्रुतो वार्थोऽन्यथा नोपपद्यत इत्यर्थान्तरकल्पनाऽर्थापत्तिः । श्रुतग्रहणस्य पृथग-
भिधानसाफल्यमुपपादयता परेणार्थापत्तिरुभयथोपपादिता दृष्टार्थापत्तिः, श्रुतार्थापत्तिश्च ।
गवय में जो गोसादृश्य का ज्ञान अर्थात् 'यह गवय रूप पिण्ड संसार के और सभी
पिण्डों से भिन्न (स्वतन्त्र जीव) है' इस प्रकार का ज्ञान भी (उपमान से उत्पन्न न
होकर) प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ही उत्पन्न होता है । एवं 'गवय रूप यही अर्थ गवय
शब्द रूप संज्ञा का संज्ञी (वाच्य) है' इस प्रकार संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध का जो
अनुसन्धान होता है, वह भी स्मरण ही है (उपमान नहीं); क्योंकि 'गोसदृशो
गवयः' इस वाक्य के द्वारा पहले उत्पन्न ग्रहणरूप संस्कार से ही इसकी उत्पत्ति
होती है । यह संस्कार उक्त सादृश्यज्ञान से ही उद्बुद्ध होता है । जैसे कि किसी
एक ही घट व्यक्ति में घट पद का सङ्केत सामान्य रूप से गृहीत होने पर भी उससे
उत्पन्न संस्कार के द्वारा दूसरे घट व्यक्ति में भी घट शब्द की वाच्यता का इस
आकार का अनुसन्धान होता है कि 'इस व्यक्ति में जिस घटवाच्यता को मैं समझ
रहा हूँ, उसको मैं पहले जान चुका हूँ । इन सभी उपपत्तियों से यह सिद्ध होता है
कि उपमान नाम का कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है ।
शब्द या और किसी प्रमाण के द्वारा निश्चित अर्थ की उपपत्ति जिस दूसरे
अर्थ की कल्पना के विना न हो सके, उस दूसरे अर्थ को ही 'अर्थापत्ति' कहते
हैं । इस लक्षण में ('शब्द प्रमाण के द्वारा' इस अर्थ के बोधक) 'श्रुत' पद का
स्वतन्त्र रूप से साफल्य का उपपादन करते हुए मेरे प्रतिपक्षियों (मीमांसकों) ने
(१) दृष्टार्थापत्ति और (२) श्रुतार्थापत्ति इसके ये दो भेद किये हैं ।