Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८५

Page 550Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८५
न्यायकन्दली
तरपक्षे सपक्षे विपक्षे यथाऽचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्वयोः प्रत्येकं गुणव्यभिचारेऽपि समुदायितयोर्गुण-
व्यतिरेकेणान्यत्रासम्भवः । यद्यपि विरुद्धव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातोऽसाधारणो धर्मः, तथापि
संशयहेतुत्वमेव । व्यतिरेकिणो हि विपक्षादेवैकस्माद् व्यावृत्तिर्नियता, तेन पक्षे निर्णय-
हेतुत्वम् । असाधारणस्य तु व्यावृत्तिरनैकान्तिकी, विपक्षादिव सपक्षादपि तस्याः
सम्भवात् । तत्र यदि गन्धवत्त्वमनित्यव्यावृत्तत्यान्नित्यत्वं साधयति, नित्यादपि गगनाद्
व्यावृत्तेरनित्यत्वमपि साधयेत् ? न चास्त्युभयोः सिद्धिः, वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् ।
नाप्युभयोरसिद्धिः, प्रकारान्तराभावात् । अतो गन्धवत्त्वात् पृथिव्यां संशयो भवति किमियं
नित्या ? किं वानित्या ? इति । यदाहुर्भट्टमिश्राः –
यत्रासाधारणो धर्मस्तदभावमुखेन तु ।
द्वयासत्त्वविरोधाच्च मतः संशयकारणम् ॥
किसी भी सपक्ष में या किसी भी विपक्ष में सम्भव नहीं है । जैसे कि अचाक्षुषत्व
(आँखों से न देखे जाने योग्य) और प्रत्यक्षत्व इन दोनों में से अलग-अलग प्रत्येक
का गुण में व्यभिचार (गुण से भिन्न पदार्थ में विद्यमानत्व) है (क्योंकि गुण से भिन्न
आकाशादि द्रव्य चक्षु से नहीं देखे जाते एवं गुण से भिन्न होने पर भी घटादि
द्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है); किन्तु अचाक्षुषत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों मिलकर केवल
गुण में ही हैं (क्योंकि गन्धादि गुणों का चक्षु से ग्रहण न होने पर भी प्रत्यक्ष होता
है) । यद्यपि विरुद्धव्यभिचारी दो धर्मों का एक आश्रय में रहना असाधारण धर्म
है, फिर भी वह संशय का ही उत्पादक है (निर्णय का नहीं) । (अन्वय) व्यतिरेकी
हेतु में केवल विपक्ष में न रहना (विपक्षव्यावृत्ति) ही केवल निश्चित है
(सपक्षव्यावृत्ति नहीं), अतः वह हेतु पक्ष में साध्य के निश्चय का उत्पादन कर सकता
है । असाधारण हेतु में सपक्ष या विपक्ष इन दोनों में से किसी एक की भी
व्यावृत्ति नियमित नहीं है; क्योंकि विपक्ष की तरह सपक्ष में भी उसका न रहना
निर्णीत ही है । अतः गन्धवत्त्वरूप असाधारण हेतु सभी अनित्यों में न रहने के
कारण पृथिवी में नित्यत्व का अगर साधन कर सकता है, तो फिर गगनादि नित्य
पदार्थों में न रहने के कारण पृथिवी में अनित्यत्व का भी वह साधन कर ही
सकता है; किन्तु एक ही पृथिवी व्यक्ति में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की सिद्धि
नहीं हो सकती; क्योंकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है, दो प्रकार की
नहीं । (वस्तुओं का किसी एक ही प्रकार का होना निश्चित होने के कारण ही)
नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की असिद्धि भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि
किसी एक वस्तु का नित्यत्व और अनित्यत्व से भिन्न कोई तीसरा प्रकार हो
ही नहीं सकता । अतः पृथिवी में गन्ध के रहने के कारण यह संशय होता है
कि 'यह नित्य है अथवा अनित्य' ? जैसा कि भट्टमिश्र (कुमारिलभट्ट) ने कहा

Page 551Permalink

५८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणेऽनुमाने हेत्वाभास
प्रशस्तपादभाष्यम्
वक्ष्यामः । ननु शास्त्रे तत्र तत्रोभयथा दर्शनं संशयकारणमपदिश्यत
कारण असाधारण होते हैं, इसी प्रकार क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व ये
दोनों स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग मन से भिन्न वस्तुओं में रहते हुए भी
मिलित होकर केवल मनरूप पक्ष में ही हैं, अतः क्रियावत्त्व से युक्त
अस्पर्शवत्त्व असाधारण ही है, सन्दिग्ध नहीं । (सिद्धान्तपक्ष) हम आगे
कहेंगे कि कथित स्थिति में अचाक्षुषत्व विशिष्ट प्रत्यक्षत्व या क्रियावत्त्व-
विशिष्ट अस्पर्शवत्त्व 'अनध्यवसित' होगा, सन्दिग्ध नहीं ।
(पूर्वपक्ष) शास्त्र (वैशेषिक सूत्रों आ.२, आ.२, सू.१८ तथा १९) में
एक धर्मी में विरुद्ध दो धर्मों के ज्ञान को संशय का कारण कई स्थानों
में कहा गया है । अतः उक्त कथन शास्त्र के विरुद्ध है ।
न्यायकन्दली
यच्चाह न्यायवार्त्तिककारः - विभागजत्वं विभागजविभागासमवायिकारणकत्वं नर्ते
शब्दात् सम्भवतीति सर्वतो व्यावृत्तेः संशयहेतुरिति ।
अत्राह-ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्याम इति । विरुद्धयोः सन्निपातोऽसाधा-
रणोऽसाधारणत्वाच्चानध्यवसितोऽयमिति वक्ष्यामः । किमुक्तं स्यात् ? असाधारणो
धर्मोऽध्यवसायं न करोतीति वक्ष्याम इत्यर्थः ।
है कि (गन्धवत्त्वादि) असाधारण धर्म भी (पृथिवी में नित्यत्व एवं अनित्यत्व के)
संशय का कारण है । (उसकी रीति यह है कि) उक्त असाधारण धर्म किसी सपक्ष
में एवं किसी भी विपक्ष में न रहने के कारण पृथिवी में नित्यत्व का अभाव
अनित्यत्व और अनित्यत्व का अभाव नित्यत्व इन दोनों का साधन कर सकता है;
क्योंकि दो विरुद्ध धर्मों की सत्ता एक धर्मी में सम्भव नहीं है, अतः पृथिव्यादि में
गन्धवत्त्वादिरूप असाधारण धर्मों से नित्यत्वादि का संशय ही होता है ।
जैसा कि न्यायवार्त्तिककार (उद्योतकर) ने भी कहा है कि-विभागजत्व अर्थात्
विभागज विभागरूप असमवायिकारण से उत्पन्न होना शब्द से भिन्न किसी दूसरी
वस्तु में सम्भव नहीं है, अतः सपक्ष और विपक्ष इन दोनों में से किसी में भी न रहने
के कारण उक्त विभागजत्वरूप असाधारण धर्म शब्द में संशय का कारण है ।
इसी आक्षेप का समाधान 'ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्यामः' इस वाक्य के द्वारा
किया गया है । (अर्थात्) चूँकि विरुद्ध दो धर्मों का एक आश्रय में समावेश ही असाधारण
है, अतः इसी असाधारण्यके कारण वह 'अनध्यवसित' नाम का हेत्वाभास है, यह