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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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भूमिका ५३
अर्थात् "धर्म की व्याख्या के लिए प्रवृत्त पुरुष के द्वारा छः पदार्थों का वर्णन
(वैसा ही अयुक्त है जैसा कि समुद्र की ओर जानेवाले पुरुष के लिए हिमालय पर
जाना अयुक्त है)"। इत्यादि उक्तियों से भी इस धारणा को बल मिला है कि
महर्षि कणाद द्रव्यादि छः भावपदार्थों को ही मूलतः मानते थे । पीछे आकर
उपपत्ति की दृष्टि से आवश्यक समझकर आचार्यों ने 'अभाव' की भी वैशेषिक
दर्शन के द्वारा अभिमत स्वतन्त्र पदार्थों में गणना कर ली और तब से ही
वैशेषिकदर्शन को सप्तपदार्थवादी माना जाने लगा । अतएव किरणावलीकार
उदयनाचार्य, न्यायकन्दलीकार श्रीधर भट्ट, न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य प्रभृति
वैशेषिकदर्शन के सभी प्रमुख आचार्यों को इसकी उपपत्ति देनी पड़ी है कि
"पदार्थोद्देश" सूत्र में अभाव पदार्थ की अनुक्ति से उसका महर्षि कणाद के द्वारा
अस्वीकृति का समर्थन नहीं किया जा सकता; किन्तु महर्षि कणाद के द्वारा निर्मित
सूत्रों में निम्नलिखित पाँच सूत्र ऐसे हैं, जिनसे अभाव पदार्थ का स्वातन्त्र्य और
उसके प्रागभावादि चार भेदों का स्पष्टतः उल्लेख है । एवं ये पाँच सूत्र उन सभी
सूत्र- व्याख्याताओं के द्वारा स्वीकृत हैं जो अभी तक उपलब्ध हैं । कणाद-सूत्र की
अभी तक तीन प्राचीन स्वतन्त्र टीकाएँ उपलब्ध हैं- (१) अनेकशः प्रकाशित
शङ्करमिश्र कृत उपस्कार टीका, (२) मिथिला विद्यापीठ के द्वारा प्रकाशित
अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान् की टीका एवं (३) बड़ौदा से प्रकाशित
चन्द्रानन्द पण्डित कृत टीका । इन सभी टीकाकारों के द्वारा ये पाँच सूत्र स्वीकृत
हैं और इनकी व्याख्या भी प्रायः उक्त सभी टीकाओं में एक-सी है । पं. जय-
नारायण तर्कपञ्चानन की विवृति और चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार के भाष्य- ये दो
वैशेषिक सूत्र की अर्वाचीन टीकाएँ हैं । इन दोनों में भी उक्त पाँच सूत्र हैं । इन
उपपत्तियों से अपने निर्णय पर पहुँचने के बाद मैंने चौखम्बा सीरीज से प्रकाशित
शङ्करमिश्र कृत 'कणादरहस्य' के अन्त में चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार महाशय कृत
वैशेषिक-दर्शनभाष्य की एक आलोचना छपी देखी है, आलोचक का नाम उसमें
नहीं है, इस आलोचना के अन्त में स्वतन्त्र रूप से इन पाँच सूत्रों का उल्लेख
किया गया है और व्याख्या लिखी गयी है । और उन्होंने लिखा है कि 'अभाव की
कणाद के द्वारा अस्वीकृति का जो आक्षेप किया जाता है, उसके निराकरण के
लिए ही मैंने इन.सूत्रों की व्याख्या की है' । अतः इन पाँच सूत्रों की प्रामाणिकता
में कोई सन्देह नहीं है । ये सूत्र हैं-
(१) क्रियागुणव्यपदेशाभावात् (९।१।१)। उत्पत्ति से पहले (घटादि कार्य)
असत् हैं; क्योंकि उस समय उनमें क्रियाओं का और गुणों का व्यवहार नहीं
होता ।