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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५११

Page 476Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५११
न्यायकन्दली
प्रमाणशब्दः करणव्युत्पत्तिसिद्धो न फलं विना पर्यवस्यति, अतः प्रमाणफलविभागं
दर्शयति- तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणमिति । तत्रानुमाने लिङ्गज्ञानं प्रमाणं प्रमीयतेऽनेनेति
व्युत्पत्त्या, प्रमितिः प्रमाणस्य फलमग्निज्ञानम् । यद्यपि लिङ्गलिङ्गिज्ञानयोरुत्पत्त्यपेक्षया
विषयभेदस्तथापि लिङ्गज्ञानस्यापि लिङ्गिनि ज्ञानोत्पत्तौ व्यापाराल्लिङ्गिविषयत्वम्, ततश्च
प्रमाणफलयोर्न व्यधिकरणत्वम् । प्रकारान्तरमाह- अथवेति । अग्निज्ञानं प्रमाणम्,
प्रमितिः प्रमाणस्य फलम् । अग्नौ गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम्- गुणदर्शनं सुखसाधन-
मेतदिति ज्ञानम्, दोषदर्शनं दुःखसाधनत्वज्ञानम्, माध्यस्थ्यदर्शनं सुखदुःखसाधनत्वाभाव-
ज्ञानम्, अग्निज्ञाने सति तथाप्रतीत्युत्पादात् ।
'प्रमीयतेऽनेन' इस करणव्युत्पत्ति के द्वारा प्रकृत में 'प्रमाण' शब्द का प्रयोग
किया गया है । प्रमाणकरणरूप इसका निरूपण प्रमारूप फल के निर्देश के बिना
अधूरा ही रहेगा । अतः 'तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणम्' इस वाक्य के द्वारा प्रमाण और
फल का विभाग दिखलाया गया है । 'तत्र' अर्थात् अनुमान स्थल में 'लिङ्ग- ज्ञान'
ही 'प्रमाण' है चूँकि यहाँ 'प्रमाण' शब्द 'प्रमीयतेऽनेन' इस व्युत्पत्ति के द्वारा सिद्ध
है । 'प्रमिति' अर्थात् प्रमाण का फल है 'अग्नि' का ज्ञान । यद्यपि यह ठीक है कि
(प्र०) लिङ्गज्ञान और लिङ्गी (साध्य) का ज्ञान दोनों की उत्पत्ति भिन्न विषयक होती
है, (अतः दोनों व्यधिकरण हैं, किन्तु कार्य और कारण को समान अधिकरण का
होना चाहिए) । (उ०) फिर भी लिङ्गी (साध्य) में जो (विधेयता सम्बन्ध से) ज्ञान
की उत्पत्ति होती है, उसमें लिङ्गज्ञान व्यापार (रूप कारण) है, अतः लिङ्गज्ञान भी
लिङ्गिरूप विषय से सर्वथा असम्बद्ध नहीं है । अतः लिङ्गज्ञानरूप प्रमाण और लिङ्गि
(साध्य) ज्ञानरूप फल इन दोनों में सर्वथा विपरीतविषयत्व रूप वैयधिकरण्य की
आपत्ति नहीं है । 'अथवा' इत्यादि सन्दर्भ से (प्रमाण फल विभाग का) दूसरा
प्रकार दिखलाया गया है । अग्नि (साध्य) का ज्ञान ही 'प्रमाण' है और 'प्रमिति'
अर्थात् उस प्रमाण का फल है-'अग्नि में गुण, दोष और माध्यस्थ्य का ज्ञान' ।
(अग्नि में) 'यह सुख का साधन है' इस प्रकार का ज्ञान है 'गुणदर्शन' । एवं 'यह
दुःख का साधन है' इस आकार की बुद्धि ही 'दोषदर्शन' है । और 'न यह सुख
का साधन है न दुःख का' इस प्रकार का ज्ञान ही 'माध्यस्थ्यदर्शन' है । चूँकि
अग्नि-ज्ञान के बाद ही उक्त गुणदर्शनादि उत्पन्न होते हैं (अतः ये गुणदर्शनादि
अग्निज्ञान रूप प्रमाण के फल हैं) ।
अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् ।
बुद्धिपौरुष हीनानां जीविकेति बृहस्पतिः ॥

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५१२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
शब्दादीनामप्यनुमानेऽन्तर्भावः, समानविधित्वात् । यथा प्रसिद्धसमयस्या-
सन्दिग्धलिङ्गदर्शनप्रसिद्धस्मरणाम्यामतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानमेवं शब्दादि-
भ्योऽपीति ।
शब्दादि प्रमाण भी इसी (अनुमान) के अन्तर्गत हैं (वे स्वतन्त्र
अलग प्रमाण नहीं हैं), क्योंकि शब्दादि प्रमाणों से भी उसी रीति से
(व्याप्ति के बल पर) प्रमिति की उत्पत्ति होती है, जिस प्रकार अनुमान
प्रमाण से प्रमिति की उत्पत्ति होती है । जैसे कि जिस पुरुष को पूर्व में
व्याप्ति गृहीत है, उसी पुरुष को हेतु के निश्चय और व्याप्ति के स्मरण
इन दोनों से अप्रत्यक्ष अर्थ की अनुमिति होती है, उसी प्रकार शब्दादि
प्रमाणों से भी अतीन्द्रिय अर्थ का ज्ञान होता है ।
न्यायकन्दली
एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् । निश्चितमिति भावे निष्ठा, स्वनिश्चितार्थं
स्वनिश्चयार्थमेतदनुमानमित्यर्थः ।
शब्दादीन्यपि प्रमाणान्तराणि सङ्गिरन्ते वादिनः, तानि कस्मादिह नोक्तानि ? इति
पर्यनुयोगमाशङ्क्य तेषामत्रैवान्तर्भावात्र पृथगभिधानमित्याह-शब्दादीनामपीति । शब्दादीनाम-
नुमानेऽन्तर्भावोऽनुमानाव्यतिरेकित्वम्, समानविधित्वात् समानप्रवृत्तिप्रकारत्वात् । यथा
व्याप्तिग्रहणबलेनानुमानं प्रर्वतते, तथा शब्दादयोऽपीत्यर्थः । शब्दोऽनुमानं व्याप्तिबलेनार्थप्रति-
पादकत्वाद् धूमवत् । समानविधित्वमेव दर्शयति- यथेति । प्रसिद्धः समयोऽविनाभावो यस्य
'एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम्' इस भाष्यवाक्य का 'निश्चित' शब्द 'भाव' अर्थ
में निष्ठा प्रत्यय से निष्पन्न है । तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि यह
कथित अनुमान अपने आश्रय पुरुष में ही निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने के
लिए है (दूसरों को समझाने के लिए नहीं) ।
(प्रत्यक्ष और अनुमान के अतिरिक्त) शब्दादि प्रमाणों को भी अन्य
दार्शनिक गण स्वीकार करते हैं कि वे शब्दादि प्रमाण इस भाष्य में क्यों नहीं
कहे गये ? अपने ऊपर इस अभियोग की आशङ्का से भाष्यकार ने
'शब्दादीनामपि' इत्यादि ग्रन्थ से यह कहा है कि 'उन शब्दादि प्रमाणों का भी
अनुमान में ही अन्तर्भाव हो जाता है' । शब्दादि प्रमाणों का अनुमान में ही
अन्तर्भाव होता है, अर्थात् शब्दादि प्रमाण अनुमान से अभिन्न हैं (अनुमान ही हैं),
क्योंकि (अनुमान और शब्दादि) 'समानविधि' के हैं, अर्थात् अनुमान और
शब्दादि की सभी प्रवृत्तियाँ समान हैं । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार अनुमान
की प्रवृत्ति व्याप्ति के बल से होती है, उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों की प्रवृत्ति
भी व्याप्ति के बल से ही होती है, (इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि)
जिस प्रकार व्याप्ति के बल से धूम वह्नि का ज्ञापक है, उसी प्रकार शब्द भी
व्याप्ति के बल से ही अर्थ का ज्ञापन करता है, अतः (धूम की तरह) शब्द भी