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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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भूमिका ४५
आकार की प्रतीतियों का सम्पादन होता है । इसके लिए अलग जाति नाम के
भाव पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है ।
विशेष
'विशेष' नाम का भी एक पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । इसे केवल
वैशेषिक लोग ही मानते हैं । इसको मानने में वे इस युक्ति का प्रयोग करते हैं कि
जिस प्रकार घट-पटादि दृश्य पदार्थों में परस्पर भेद मानते हैं, उसी प्रकार उनके
उत्पादक परमाणुओं में और आकाश-कालादि विभु पदार्थों में भी भेद मानना होगा;
किन्तु घट-पटादि सावयव पदार्थों में परस्पर भेद के नियामक उनके अवयवों के
भेद हैं । अर्थात् घट पट से भिन्न इसलिए हैं कि घट के उत्पादक कपाल और पट
के उत्पादक तन्तु परस्पर भिन्न हैं । जिनके उत्पादक अवयव परस्पर भिन्न जाति
के होते हैं, वे सभी द्रव्य भी परस्पर भिन्न जाति के ही होते हैं; किन्तु निरवयव
परमाणु और आकाशादि के तो अवयव नहीं हैं । अवयवों के भेद से उनमें
परस्पर भेद का नियम नहीं किया जा सकता । अतः निरवयव द्रव्यों में परस्पर
भेद का नियामक कोई पदार्थ मानना पड़ेगा । इसी पदार्थ का नाम 'विशेष' है ।
अर्थात् जो अपने-अपने आश्रयीभूत द्रव्य को अपने से भिन्न सभी वस्तुओं से
'विशेष' रूप में या भिन्न रूप में समझावें वही 'विशेष' है । यह प्रत्येक निरवयव
द्रव्य में अलग-अलग है, फलतः अनन्त है ।
किन्तु इस प्रसङ्ग में यह समझना शेष रहता है कि एक परमाणु में एक विशेष
है, दूसरे परमाणु में दूसरा विशेष है । अतः एक परमाणु से दूसरा परमाणु भिन्न
है । फलतः दोनों परमाणुओं में रहनेवाले दोनों विशेषों के परस्पर भेद ही दोनों
परमाणु में परस्पर भेद के प्रयोजक हैं । किन्तु इन दोनों विशेषों में परस्पर भेद
है ? इसका ही कौन नियामक है ? इस प्रसङ्ग में वैशेषिकों का कहना है कि ये
विशेष 'स्वतः व्यावृत्त' हैं, इनमें परस्पर भेद के लिए किसी दूसरे नियामक की
आवश्यकता नहीं है ।
इस 'स्वतोव्यावृत्ति' वाली दुर्बलता के कारण ही नव्यवैशेषिकों ने 'विशेष'
पदार्थ को अस्वीकार कर दिया है । उन लोगों का कहना है कि अगर परमाणु
प्रभृति निरवयव द्रव्यों में रहनेवाले विशेषों को स्वतः व्यावृत्त मानते हैं, तो फिर
परमाणु प्रभृति सभी निरवयव द्रव्यों को ही स्वतोव्यावृत्त क्यों नहीं मान लेते ?
इसमें क्या लाभ है कि निरवयव पदार्थों में परस्पर भेद के लिए उनमें स्वतोव्यावृत्त
स्वभाववाले विशेषों की कल्पना की जाय ?