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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—१०९ देवता—विश्वेदेव

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हे पणियो! तुम इस स्थान से दूर भाग जाओ. घेरने वाले पर्वत को टक्करें मारती हुई
गाएं इस सत्याश्रित पर्वत से लौट जावें. बृहस्पति, सोम, पत्थर, ऋषि एवं ब्राह्मण इस गुप्त
स्थान को जान गए हैं.” (११)
सूक्त—१०९ देवता—विश्वेदेव
तेऽवदन्प्रथमा ब्रह्मकिल्बिषेऽकूपारः सलिलो मातरिश्वा.
वीळुहरास्तप उग्रो मयोभूरापो देवीः प्रथमजा ऋतेन.. (१)
बृहस्पति द्वारा पत्नीत्यागरूपी पाप किए जाने पर आदित्य, वरुण, वायु, जलती हुई
अग्नि, सुखदायी सोम, दिव्य जलों एवं प्रजापति द्वारा पहले उत्पादित संतानों ने कहा. (१)
सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छदहृणीयमानः.
अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदग्निर्होता हस्तगृह्या निनाय.. (२)
राजा सोम ने लज्जा का त्याग करके बृहस्पतिपत्नी जुहू को सबसे पहले उसे दिया.
मित्र और वरुण इस में मध्यस्थ बने. देवों को बुलाने वाले अग्नि उसे हाथ पकड़कर लाए. (२)
हस्तेनैव ग्राह्य आधिरस्या ब्रह्मजायेयमिति चेदवोचन्.
न दूताय प्रह्ये तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुप्तितं क्षत्रियस्य.. (३)
उन लोगों ने बृहस्पति से कहा—“यह तुम्हारी विवाहिता पत्नी है. तुम्हें इसका शरीर
हाथ से ग्रहण करना चाहिए. इन्हें खोजने को दूत गया था, उसके प्रति इसने समर्पण नहीं
किया था. यह शक्तिशाली राजा के राष्ट्र के समान सुरक्षित है. (३)
देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तऋषयस्तपसे ये निषेदुः.
भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धा दधाति परमे व्योमन्.. (४)
देवों एवं तपस्या के लिए बैठे हुए सप्तऋषियों ने इस पत्नी की पवित्रता के विषय में
कहा है. बृहस्पति द्वारा विवाहिता यह नारी शुद्ध चरित्र वाली है. तप का प्रभाव बुरे पदार्थ को
भी आकाश में पहुंचा देता है. (४)
ब्रह्मचारी चरति वेविषद्विषः स देवानां भवत्येकमङ्गम.
तेन जायामन्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं१ न देवाः.. (५)
स्त्री के अभाव में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले जैसे बृहस्पति ने देवों की सेवा करके
यज्ञ के एक भाग के रूप में इसे प्राप्त किया, उसी प्रकार इस समय देवों से पाया. (५)
पुनर्वे देवा अददुः पुनर्मनुष्या उत. राजानः सत्यं कृण्वाना ब्रह्मजायां पुनर्ददुः.. (६)
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देवों और मानवों ने जुहू नामक पत्नी बृहस्पति को पुनः प्रदान की. शपथ लेते हुए
राजाओं ने ब्रह्मपत्नी को प्रदान किया. (६)
पुनर्दाय ब्रह्मजायां कृत्वी देवैर्निकिल्बिषम्.
ऊर्जं पृथिव्या भक्तवायोरुगायमुपासते.. (७)
देवों ने पत्नी पुनः बृहस्पति को दी एवं इस प्रकार उन्हें पापरहित बनाया. इसके बाद
सब लोग धरती का धन आपस में बांटकर सुख से रहने लगे. (७)
सूक्त-११० देवता-आप्री
समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः.
आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः.. (१)
हे जातवेद अग्नि! तुम आज मानवों के घर में प्रज्वलित होकर इंद्रादि देवों की पूजा
करते हो. स्तोता मित्रों की पूजा करने वाले अग्नि! तुम स्तोताओं द्वारा की हुई स्तुतियां जानते
हुए देवों को बुलाओ. तुम बुद्धिमान् एवं कार्यकुशल हो. (१)
तनूनपात्पथ ऋतस्य यानान्मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व.
मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन्देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. (२)
हे अग्नि! यज्ञ के जो मार्ग अर्थात् हवि हैं, उन्हें मधु से मिलाकर अपनी शोभन-ज्वाला
रूपी जीभ से उनका स्वाद लो. तुम सुंदर भावों द्वारा हमारी स्तुतियों और यज्ञ को उन्नत
बनाओ एवं हमारे यज्ञ को देवों के भाग के योग्य बनाओ. (२)
आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्चा याह्यग्ने वसुभिः सजोषाम्.
त्वं देवानामसि यह्व होता स एनान्यक्षीषितो यजीयान्.. (३)
हे देवों को बुलाने वाले, प्रार्थनीय एवं वंदना के योग्य अग्नि! तुम वसुओं के साथ
पधारो. हे महान् अग्नि! तुम देवों के होता हो. हे अतिशय यज्ञकर्त्ता अग्नि! तुम हमारी प्रार्थना
सुनकर इन देवों का यजन करो. (३)
प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्.
व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. (४)
प्रातः वेदी को आच्छादित करने के लिए कुशों को पूर्व की ओर मुख करके बिछाया
जाता है. यह सुंदर कुश अधिक फैलाया जाता है. यह अदिति तथा अन्य देवों के बैठने के
लिए है. (४)
व्यचस्वतीरूर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः.
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देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुपायणा:.. (५)
सुंदर पत्नियां अच्छे कपड़े पहनती हैं एवं पतियों के सामने जिस प्रकार अपना शरीर
प्रकट करती हैं, उसी प्रकार यज्ञशाला के सभी द्वारों पर देवियां प्रकट हों. हे द्वारदेवियो! द्वार
इतने खुल जावें कि देवगण उन में होकर सरलता से जा सकें. (५)
आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ.
दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने.. (६)
यज्ञ भाग की अधिकारिणी एवं शोभन-गति वाली उषा व रात्रि यज्ञशाला में बैठें. ये
दिव्य नारी के समान शोभन दीप्ति वाली अत्यंत सुंदर एवं तेज को धारण करने वाली हैं. (६)
दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै.
प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७)
देवों के होता अर्थात् अग्नि और सूर्य सबसे पहले शोभन स्तुतियां बोलते हुए यज्ञकर्त्ता
मनुष्य के लिए यज्ञ पूर्ण करने का काम करते हैं. ये दोनों पुरोहितों को यज्ञ कर्म में लगाते हैं.
ये क्रियाकुशल हैं एवं पूर्व दिशा में प्राचीन प्रकाश उत्पन्न करते हैं. (७)
आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विळा मनुष्यदिह चेतयन्ती.
तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं स्योनं सरस्वती स्वपसः सदन्तु.. (८)
सूर्यदीप्ति हमारे यज्ञ में शीघ्र आवें. इळादेवी इस यज्ञ का ज्ञान करके यहां मनुष्य के
समान पधारें. इन दोनों के साथ सरस्वती देवी मिलें एवं तीनों देवियां इस सुखकर यज्ञ में बैठें.
(८)
य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा.
तमद्य होतरिषितो यजीयान्देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (९)
हे होता! जिन त्वष्टा देव ने देवों की माता के समान द्यावा-पृथिवी को बनाकर उन्हें
भांति-भांति के प्राणियों से युक्त किया है, उन्हीं त्वष्टा देव की तुम पूजा करो. तुम आज अन्न
वाले हो, विद्वान् हो एवं सर्वश्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता हो. (९)
उपावसृज त्मन्या समञ्जन्देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि.
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (१०)
हे यूप! तुम ऋतु के अनुकूल अन्न एवं होमद्रव्य अर्पण करो. वनस्पति शमिता नाम का
देव एवं अग्नि मधु तथा घी के साथ होम के द्रव्यों का स्वाद लें. (१०)
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत्पुरोगाः.
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अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः.. (११)
अग्नि तुरंत उत्पन्न होते ही यज्ञ का निर्माण करने लगे एवं देवों के अग्रगामी दूत बने.
यज्ञ संबंधी अग्नि के वचन में मंत्र पढ़े जावें, स्वाहा शब्द बोला जावे एवं देव इव्य का भक्षण
करें. (११)
सूक्त—१११ देवता—इंद्र
मनीषिणः प्र भरध्वं मनीषां यथायथा मतयः सन्ति नृणाम्.
इन्द्रं सत्यैरैरयामा कृतेभिः स हि वीरो गिर्वणस्युर्विदानः.. (१)
हे स्तोताओ! ज्यों-ज्यों तुम्हारी बुद्धि का उदय हो, वैसे-वैसे ही तुम स्तुतियां पढ़ो.
सत्यकर्मों के अनुष्ठान द्वारा हम इंद्र को बुलाते हैं. वीर इंद्र स्तुतियों को जानकर स्तोताओं को
प्यार करते हैं. (१)
ऋतस्य हि सदसो धीतिरद्यौत्सं गार्ष्टेयो वृषभो गोभिरानट्.
उदतिष्ठत्तविषेणा रवेण महान्ति चित्सं विव्याचा रजांसि.. (२)
जल के आधार आकाश को धारण करने वाले इंद्र प्रकाशित होते हैं. तुरंत जन्मा बछड़ा
जिस प्रकार गाय से मिला रहता है, उसी प्रकार इंद्र सर्वत्र व्याप्त हैं. इंद्र महान् शब्द के साथ
उत्पन्न होते हैं तथा विस्तृत जलों का निर्माण करते हैं. (२)
इन्द्रः किल श्रुत्या अस्य वेद स हि जिष्णुः पथिकृत्सूर्याय.
आन्मेनां कृण्वन्नच्युतो भुवद्गोः पतिर्दिवः सनजा अप्रतीतः.. (३)
इंद्र ही इस स्तुति को सुनना जानते हैं. जयशील इंद्र ने सूर्य का मार्ग बनाया है. अच्युत
इंद्र ने सेना को प्रकट किया है. इंद्र गायों और स्वर्ग के प्रति सनातन एवं विरोधहीन हैं. (३)
इन्द्रो महा महतो अर्णवस्य व्रतामिनादङ्गिरोभिर्गृणानः.
पुरूणि चिन्नि तताना रजांसि दाधार यो धरुणं सत्यताता.. (४)
अंगिरागोत्रीय ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर इंद्र ने अपनी महिमा से विशाल मेघ का
कार्य समाप्त किया था. उन्होंने अनेक जल बनाए तथा सत्यरूप स्वर्ग में बल संचार किया.
(४)
इन्द्रो दिवः प्रतिमानं पृथिव्या विश्वा वेद सवना हन्ति शुष्णम्.
महीं चिद्द्यामातनोत्सूर्येण चास्कम्भ चित्कम्भनेन स्कभीयान्.. (५)
द्यावा-पृथिवी के बराबर इंद्र सभी सोम यज्ञों को जानते एवं सबका संताप नष्ट करते हैं.
उन्होंने सूर्य के द्वारा विस्तृत आकाश को प्रकाशित किया. अतिशय धारणकर्त्ता इंद्र ने खंभा
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बनकर आकाश को धारण किया है. (५)
वज्रेण हि वृत्रहा वृत्रमस्तरदेवस्य शूशुवानस्य मायाः.
वि धृष्णो अत्र धृषता जघन्थाथाभवो मघवन्बाह्वोजाः.. (६)
हे इंद्र! तुमने वज्र से वृत्र को मारा. यज्ञविरोधी कार्य करने वाले वृत्र की सारी मायाओं
को भयानक वज्र से समाप्त किया. हे धनस्वामी इंद्र! इसके बाद तुम अधिक शक्तिशाली बने.
(६)
सचन्त यदुषसः सूर्येण चित्रामस्य केतवो रामविन्दन्.
आ यन्नक्षत्रं ददृशे दिवो न पुनर्यतो नकिरद्धा नु वेद.. (७)
जब उषाएं सूर्य से मिलीं, तब इसकी किरणों ने विचित्र शोभा प्राप्त की. आकाश में जब
कोई नक्षत्र दिखाई नहीं दिया था, तब सूर्य की सर्वत्रगामी किरणों को कोई नहीं जान पाया.
(७)
दूरं किल प्रथमा जग्मुरासामिन्द्रस्य याः प्रसवे सस्रुरापः.
क्व स्विद्रग्रं क्व बुध्न आसामापो मध्यं क्व वो नूनमन्तः.. (८)
इंद्र की आज्ञा से पहली बार जो जल बहा था, वह बहुत दूर गया. उस जल का अग्रभाग
एवं मस्तक कहां है? हे जलो! तुम्हारा मध्य भाग कहां है? (८)
सृजः सिन्धूँरहिना जग्रसानाँ आदिदेताः प्र विविज्रे जवेन.
मुमुक्षमाणा उत या मुमुग्धेऽधेदेता न रमन्ते नितिक्ताः.. (९)
हे इंद्र! तुमने मेघ के द्वारा ग्रसित जल को छुड़ाकर वेग से बहाया. इंद्र ने जब जलों को
मुक्त करने की इच्छा की, उस समय अत्यंत शुद्ध जल एक स्थान पर नहीं रहे. (९)
सध्रीचीः सिन्धुमुशतीरिवायन्त्सनाज्जार आरितः पूर्विदासाम्.
अस्तमा ते पार्थिवा वसून्यस्मे जग्मुः सूनृता इन्द्र पूर्वीः.. (१०)
सारे जल मिलकर अभिलाषिणी नारी के समान सागर की ओर बढ़े. शत्रुनगरियों को
नष्ट करने वाले एवं शत्रुओं को दुर्बल बनाने वाले इंद्र सभी जलों के स्वामी हैं. हे इंद्र! धरती
पर स्थित प्राचीन यज्ञरूपी धन एवं प्रसन्नतादायक स्तुतियां तुम्हारे पास गईं. (१०)
सूक्त—११२ देवता—इंद्र
इन्द्र पिब प्रतिकामं सुतस्य प्रातः सावस्तव हि पूर्वपीतिः.
हर्षस्व हन्तवे शूर शत्रूनुक्थेभिष्ठे वीर्या ३ प्र ब्रवाम.. (१)

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हे इंद्र! निचोड़े हुए सोम को इच्छानुसार पिओ. प्रातःकाल निचोड़ा हुआ सोम सबसे
पहले तुम्हें पीना चाहिए. हे वीर! शत्रुवध के लिए उत्साहित बनो. हम मंत्रों द्वारा तुम्हारी
वीरता का बखान करते हैं. (१)
यस्ते रथो मनसो जवीयानेन्द्र तेन सोमपेयाय याहि.
तूयमा ते हरयः प्र द्रवन्तु येभिर्यासि वृषभिर्मन्दमानः.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारा जो रथ मन से भी अधिक तेज चलने वाला है, उसके द्वारा सोमरस पीने
के लिए आओ. जिन घोड़ों की सहायता से तुम आनंदित होते हुए जाते हो, वे घोड़े तुम्हें शीघ्र
वहन करें. (२)
हरित्वता वर्चसा सूर्यस्य श्रेष्ठै रूपैस्तन्वं स्पर्शयस्व.
अस्माभिरिन्द्र सखिभिर्हुवानः सध्रीचीनो मादयस्वा निषद्य.. (३)
हे इंद्र! हरे रंग के तेज और सूर्य के श्रेष्ठरूपों द्वारा तुम अपने शरीर को विभूषित करो.
हम मित्रों द्वारा बुलाए जाने पर तुम हमारे साथ मिलकर बैठो और आनंदित बनो. (३)
यस्य त्यत्ते महिमानं मदेष्विमे मही रोदसी नाविविक्ताम्.
तदोक आ हरिभिरिन्द्र युक्तैः प्रियेभिर्याहि प्रियमन्नमच्छ.. (४)
हे इंद्र! सोमपान करने के बाद तुम्हारी जो महिमा होती है, उसे ये विस्तृत द्यावा-पृथिवी
अलग नहीं कर सकते. तुम अपने प्यारे घोड़ों को रथ में जोतकर यजमान के घर आओ और
प्रिय अन्न प्राप्त करो. (४)
यस्य शश्वत्पपिवाँ इन्द्र शत्रूनानुकृत्या रण्य चकर्थ.
स ते पुरन्धिं तविषीमियर्ति स ते मदाय सुत इन्द्र सोमः.. (५)
हे इंद्र! तुम जिस यजमान का सोमरस पीकर अद्वितीय आयुध से उसके शत्रुओं को
मारते हो, वही तुम्हारे लिए अधिक स्तुति करता है एवं तुम्हारे नशे के लिए उसने सोमरस
निचोड़ा है. (५)
इदं ते पात्रं सनवित्तमिन्द्र पिबा सोममेना शतक्रतो.
पूर्ण आहावो मदिरस्य मध्वो यं विश्व इदभिहर्यन्ति देवाः.. (६)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! यह पात्र तुमने सदा प्राप्त किया है. तुम इसके द्वारा सोमरस
पिओ. देव जिस पात्र को चाहते हैं, उसी मादक पात्र को सोमरस से पूरा भर दिया गया है.
(६)
वि हि त्वामिन्द्र पुरुधा जनासो हितप्रयसो वृषभ ह्वयन्ते.
अस्माकं ते मधुमत्तमानीमा भुवन्त्सवना तेषु हर्य.. (७)
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हे अभिलाषापूरक इंद्र! बहुत से अन्न संग्रह करने वाले लोग तुम्हें अनेक स्थानों में
सोमरस पीने के लिए बुलाते हैं. हमारा तैयार किया हुआ सोम तुम्हें सबसे अधिक मीठा लगे
एवं तुम उन्हें चाहो. (७)
प्र त इन्द्र पूर्व्याणि प्र नूनं वीर्या वोचं प्रथमा कृतानि.
सतीनमन्युरश्रथायो अद्रिं सुवेदनामकृणोर्ब्रह्मणे गाम्.. (८)
हे इंद्र! प्राचीनकाल में तुमने सबसे पहले जो वीरता दिखाई थी, मैं उसकी निश्चय ही
प्रशंसा करता हूं. तुमने जल बरसाने की इच्छा से मेघ को विदीर्ण किया एवं स्तोता के लिए
गाय पाना सुलभ बनाया. (८)
नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम्.
न ऋते त्वत्क्रियते किंचनारे महामर्कं मघवञ्चित्रमर्च.. (९)
हे गणों के स्वामी इंद्र! तुम स्तोताओं के समूहों में बैठो. तुम कर्मकर्त्ता व्यक्तियों में
सर्वाधिक कुशल हो, पास या दूर, तुम्हारे बिना कोई भी यज्ञकार्य नहीं होता है. हे धन स्वामी
इंद्र! हमारे स्तुतिमंत्रों को विस्तृत और विचित्र बनाओ. (९)
अभिख्या नो मघवन्नाधमानान्सखे बोधि वसुपते सखीनाम्.
रणं कृधि रणकृत्सत्यशुष्माभक्ते चिदा भजा राये अस्मान्.. (१०)
हे धनस्वामी इंद्र! हम स्तुतिकर्त्ताओं को तेजस्वी बनाओ. हे धनपालक एवं मित्र इंद्र!
हमें अपना मित्र जानो. ये युद्धकर्त्ता एवं सच्ची शक्ति वाले इंद्र! धन की संभावना से रहित
स्थान में ही हमें धन प्राप्त कराओ. (१०)
सूक्त-११३ देवता—इंद्र
तमस्य द्यावापृथिवी सचेतसा विश्वेभिर्देवैरनु शुष्ममावताम्.
यदैत्कृण्वानो महिमानमिन्द्रियं पीत्वी सोमस्य क्रतुमाँ अवर्धत.. (१)
द्यावा-पृथिवी सब देवों के साथ मिलकर एकचित्त से इंद्र की शक्ति की रक्षा करें. जब
वीरता के कार्य करतेकरते इंद्र ने अपना महत्त्व प्राप्त किया, तब सोमरस पीने वाले एवं
कर्मकर्त्ता इंद्र बढ़े. (१)
तमस्य विष्णुर्महिमानमोजसांशुं दधन्वान्मधुनो वि रप्शते.
देवेभिरिन्द्रो मघवा सयावभिर्वृत्रं जघन्वाँ अभवद्वरेण्यः.. (२)
विष्णु ने सोमलता का टुकड़ा देकर उत्साह के साथ इंद्र की उस महिमा की घोषणा की
है. धनस्वामी इंद्र ने साथ चलने वाले देवों की सहायता से वृत्र का वध किया और सर्वोत्तम
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बने. (२)
वृत्रेण यदहिना बिभ्रदायुधा समस्थिथा युधये शंसमाविदे.
विश्वे ते अत्र मरुतः सह त्मनावर्धन्नुग्र महिमानमिन्द्रियम्.. (३)
हे उग्र इंद्र! तुम जब युद्ध के लिए आयुध धारण करते हुए मरने योग्य वृत्र के साथ भिड़े,
तब शौर्य प्रदर्शन के लिए मैंने तुम्हारी प्रशंसा की. उस समय सभी मरुतों ने अपने साथ-साथ
तुम्हारी भी महिमा बढ़ाई. (३)
जज्ञान एव व्यबाधत स्पृधः प्रापश्यद्वीरो अभि पौंस्यं रणम्.
अवृश्चदद्रिमव सस्यदः सृजदस्तभ्नान्नाकं स्वपस्यया पृथुम्.. (४)
इंद्र ने जन्म लेते ही शत्रुओं को बाधा पहुंचाई. वीर इंद्र ने उस संग्राम में अपना पौरुष
अधिक रूप में प्रकट किया, वृत्र को काटा, जल बरसाया एवं शोभन कर्म की इच्छा से
विस्तृत स्वर्ग को धारण किया. (४)
आदिन्द्रः सत्रा तविषीरपत्यत वरीयो द्यावापृथिवी अबाधत.
अवाभरद्दधृषितो वज्रमयासं शेवं मित्राय वरुणाय दाशुषे.. (५)
इंद्र सहसा विशाल सेनाओं की ओर दौड़े एवं अपनी उत्तम महिमा से धरती-आकाश को
बाधा पहुंचाई. शत्रुवध में प्रगल्भ इंद्र ने मित्र, वरुण एवं हव्य देने वाले यजमान को सुख
पहुंचाने के लिए लोहे का बना हुआ वज्र धारण किया. (५)
इन्द्रस्यात्र तविषीभ्यो विरप्शिन ऋघायतो अरंहयन्त मन्यवे.
वृत्रं यदुग्रो व्यवृश्चदोजसापो बिभ्रतं तमसा परीवृतम्.. (६)
विविध शब्द करने वाले व शत्रुहिंसक इंद्र का क्रोध विशाल शत्रुसेनाओं पर स्थापित
करने के लिए जल निकले. उग्र इंद्र ने जल धारण करने वाले और अंधकार से घिरे हुए वृत्र
को बलपूर्वक नष्ट किया. (६)
या वीर्याणि प्रथमानि कत्वी महित्वेभिर्यतमानौ समीयतुः.
ध्वान्तं तमोऽव दध्वसे हत इन्द्रो मह्ना पूर्वहूतावपत्यत.. (७)
अपनी महान् शक्ति से युद्ध करने वाले इंद्र और वृत्र ने प्रथम करने योग्य जो वीरताएं
प्रदर्शित कीं, उनके द्वारा वृत्र के मारे जाने पर घना अंधकार नष्ट हो गया. इंद्र अपनी महिमा
से वीरों की गणना में सबसे पहले गिने जाते हैं. (७)
विश्वे देवासो अध वृष्ण्यानि तेऽवर्धयन्त्सोमवत्या वचस्यया.
रद्धं वृत्रमहिमिन्द्रस्य हन्मनाग्निर्न जम्भैस्तृष्वन्नमावयत.. (८)
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हे इंद्र! सभी देवों ने सोमयुक्त स्तुति की अभिलाषा से तुम्हारे बलों को बढ़ाया. इंद्र के
आयुध वज्र से मारे गए. आवरण करने वाले मेघ ने शीघ्र ही सबको अन्न का भोजन कराया.
अग्नि जिस प्रकार अपनी ज्वालाओं से हव्य खाते हैं, उसी प्रकार लोगों ने दांतों से अन्न
खाया. (८)
भूरि दक्षेभिर्वचनेभिर्ऋक्वभिः सख्येभिः सख्यानि प्र वोचत.
इन्द्रो धुनिं च चुमुरिं च दम्भयञ्छ्रद्धामनस्या शृणुते दभीतये.. (९)
हे स्तोताओ! उत्तम शब्दों एवं मैत्रीपूर्ण मंत्रों द्वारा इंद्र के मैत्रीकार्यों का वर्णन करो. इंद्र
ने धुनि और चुमुरि नामक राक्षसों को मारते हुए श्रद्धापूर्ण हृदय से दभीति नामक राजर्षि की
प्रार्थना सुनी. (९)
त्वं पुरूण्या भरा स्वश्व्या येभिर्मंसै निवचनानि शंसन्.
सुगेभिर्विश्वा दुरिता तरेम विदो षु ण उर्विया गाधमद्य.. (१०)
हे इंद्र! मैंने स्तोत्रों का उच्चारण करते हुए जिन शोभन अश्वों एवं धनों की याचना की है,
उन्हें मुझे प्रदान करो. मैं उन धनों द्वारा पापों को पार करूं. तुम हमारे द्वारा किए गए स्तोत्र
को अत्यंत आदर के साथ जानो. (१०)
सूक्त—११४ देवता—विश्वेदेव
घर्मा समन्ता त्रिवृतं व्यापतुस्तयोर्जुष्टिं मातरिश्वा जगाम.
दिवस्पयो दिधिषाणा अवेषन्विदुर्देवाः सहसामानमर्कम्.. (१)
दिगंतों में व्याप्त एवं दीप्तिशाली सूर्य-चंद्र ने तीनों लोकों को व्याप्त किया है. वायु ने इन
दोनों की प्रसन्नता प्राप्त की है. देवों ने जिस समय सामवेद के मंत्रों के साथ सूर्य को प्राप्त
किया, उस समय तीनों की रक्षा के लिए दिव्य जल बनाया. (१)
तिस्रो देष्ट्राय निर्ऋतीरुपासते दीर्घश्रुतो वि हि जानन्ति वह्नयः.
तासां नि चिक्युः कवयो निदानं परेषु या गुह्येषु व्रतेषु.. (२)
यजमान हव्य देने के लिए अग्नि, सूर्य और वायु की उपासना करते हैं. इसके बाद परम
यशस्वी देव इन्हें जानते हैं. विद्वान् लोग इनका आदि कारण जानते हैं एवं परम गोपनीय व्रतों
में संलग्न रहते हैं. (२)
चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते.
तस्यां सुपर्णा वृषणा नि षेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्.. (३)
चार कोनों वाली वेदीरूपी युवती शोभन अलंकारों वाली, घी से चिकनी एवं स्तोत्रों को
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धारण करने वाली है. उस पर हव्यदाता यजमान एवं पुरोहितरूपी दो पक्षी बैठते हैं एवं
देवगण अपना भाग प्राप्त करते हैं. (३)
एकः सुपर्णः स समुद्रमा विवेश स इदं विश्वं भुवनं वि चष्टे.
तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम्.. (४)
प्राणवायुरूपी पक्षी ब्रह्मांडरूपी सागर में घुसा. वह सारे संसार को देखता है. मैंने
परिपक्व मन से उसे देखा है. उसे माता चाटती है और वह माता को चाटता है. (४)
सुपर्णं विप्राः कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति.
छन्दांसि च दधतो अध्वरेषु ग्रहान्त्सोमस्य मिमते द्वादश.. (५)
क्रांतदर्शी विद्वान् परमात्मारूपी एक ही पक्षी को अनेक प्रकार के वचनों से वर्णित
करते हैं. वे यज्ञों में भांति-भांति के छंदों की रचना करते हैं तथा सोमरस के बारह पात्रों को
स्थापित करते हैं. (५)
षट्त्रिंशाँश्च चतुरः कल्पयन्तश्छन्दांसि च दधत आद्वादशम्.
यज्ञं विमाय कवयो मनीष ऋक्सामाभ्यां प्र रथं वर्तयन्ति.. (६)
विद्वान् ब्राह्मण चालीस छंदों की कल्पना करते हुए बारह सोमपात्रों की स्थापना करते
हैं. वे विद्वान् अपनी बुद्धि से यज्ञ को पूरा करके ऋक् एवं सोम मंत्रों की सहायता से अपना
यज्ञरूपी रथ चलाते हैं. (६)
चतुर्दशान्ये महिमानो अस्य तं धीरा वाचा प्र णयन्ति सप्त.
आप्रानं तीर्थं क इह प्र वोचद्येन पथा प्रपिबन्ते सुतस्य.. (७)
इस यज्ञरूपी परमात्मा की चौदह विभूतियां हैं. सात होता आदि धीर पुरुष मंत्रों द्वारा
उसे पूरा करते हैं. जिस यज्ञमार्ग से चलकर देवगण सोमरस पीते हैं, उस विश्वव्याप्त
ईश्वररूपी यज्ञ का वर्णन कौन कर सकता है? (७)
सहस्रधा पञ्चदशान्युक़्था यावद् द्यावापृथिवी तावदित्तत्.
सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक्.. (८)
पंद्रह हजार उक्थमंत्र द्यावा-पृथिवी के समान ही विस्तृत हैं. हमारे स्तोत्रों की महिमा
हजारों प्रकार की है. स्तोत्रों के समान वाणी भी असीम है. (८)
कश्छन्दसां योगमा वेद धीरः को धिष्ण्यां प्रति वाचं पपाद.
कमृत्विजामष्टमं शूरमाहुर्हरी इन्द्रस्य नि चिकाय कः स्वित्.. (९)
कौन विद्वान् छंदों का प्रयोग जानता है? होता आदि सात स्थानों के योग्यवाणी का
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प्रतिपादन कौन करता है? सात पुरोहितों के ऊपर प्रधानरूप से आठवां व्यक्ति कौन हो
सकता है? इंद्र के घोड़ों को कौन जान सका है? (९)
भूम्या अन्त पर्यके चरन्ति रथस्य धूर्षु युक्तासो अस्थुः.
श्रमस्य दायं वि भजन्त्येभ्यो यदा यमो भवति हर्म्ये हितः.. (१०)
कुछ घोड़े धरती की अंतिम सीमा तक घूमते हैं एवं कुछ रथ की जुअर में जोड़े जाते हैं.
जब सूर्य रथ के नियंता के रूप में रथ में स्थित होते हैं, तब देवगण घोड़ों को घास देकर श्रम
निवारण करते हैं. (१०)
सूक्त—११५ देवता—अग्नि
चित्र इच्छिशोस्तरुणस्य वक्षथो न यो मातरावप्येति धातवे.
अनूधा यदि जीजनदधा च नु ववक्ष सद्यो महि दूत्यं चरन्.. (१)
नवीन शिशुरूपी अग्नि का हव्य वहन अत्यंत विचित्र है. यह बालक दूध पीने के लिए
अपने माता-पिता के पास नहीं जाता. माता-पिता ने स्तन न होते हुए भी बालक को जन्म
दिया है. यह बालक जन्म लेने के बाद ही महान् दूतकर्म का निर्वाह करता है. (१)
अग्निर्ह नाम धायि दन्नपस्तमः सं यो वना युवते भस्मना दता.
अभिप्रमुरा जुह्वा स्वध्वर इनो न प्रोथमानो यवसे वृषा.. (२)
अनेक यज्ञकार्य करने वाले एवं दाता अग्नि को धारण किया गया है. यह प्रकाशरूपी
दांतों से वनों का भक्षण करते हैं. जुहू नामक ऊंचे पात्र में यज्ञ का भाग प्राप्त करने वाले इंद्र
इस प्रकार हव्यभक्षण करते हैं, जिस प्रकार शक्तिशाली बैल घास खाता है. (२)
तं वो विं न द्रुषदं देवमन्धस इन्दुं प्रोथन्तं प्रवपन्तमर्णवम्.
आसा वह्निं न शोचिषा विरिप्शिनं महिव्रतं न सरजन्तमध्वनः.. (३)
पक्षी के समान वृक्षनिर्मित अरणि का आश्रय लेने वाले, अन्न देने वाले, दीप्तिशाली,
शब्दकर्त्ता, वनों के अत्यधिक दाहक, अतिशय हव्यवाहक, बैल के समान हव्य-वहन करने
वाले अपने प्रकाश से महान् व सूर्य के समान मार्ग का निर्माण करने वाले अग्नि की स्तुति
करो. (३)
वि यस्य ते ज्रयसानस्याजर धक्षोर्न वाताः परि सन्त्यच्युताः.
आ रण्वासो युयुधयो न सत्वनं त्रितं नशन्त प्र शिषन्त इष्टये.. (४)
जरारहित, गमनशील व वनों के जलाने के इच्छुक अग्नि का स्थिर प्रभाव वायु के
समान सब ओर वर्तमान रहता है. योद्धाओं के समान शब्द करते हुए पुरोहित यज्ञ के लिए
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अग्नि को घेरते हैं. उस समय तुम तीन मूर्तियां धारण करके शक्ति का प्रदर्शन करते हो. (४)
स इदग्निः कण्वतमः कण्वसखार्यः परस्यान्तरस्य तरुषः.
अग्निः पातु गृणतो अग्निः सूरीनग्निर्ददातु तेषामवो नः.. (५)
सबसे अधिक शब्द करने वाले शब्दयुक्त स्तोत्र करने वालों के मित्र स्वामी व समीपवर्ती
शत्रुओं का नाश करने वाले अग्नि स्तोताओं का पालन करें. वे हमें और विद्वानों को आश्रय
देते हैं. (५)
वाजिन्तमाय सह्यसे सुप्रित्र्य तृषु च्यवानो अनु जातवेदसे.
अनुद्रे चिद्यो धृषता वरं सते महिन्तमाय धन्वनेदविष्यते.. (६)
हे शोभन पिता वाले, अतिशय अन्नदाता, शत्रु पराभवकारी एवं जातवेद अग्नि! मैं
तुम्हारी स्तुति के लिए शीघ्र तत्पर हूं. मैं शत्रुओं द्वारा विपत्ति खड़ी होने पर शत्रुनाश में समर्थ
अपने धनुष द्वारा ही रक्षा करने वाले होनहार एवं पूज्यतम अग्नि को हव्य देता हूं. (६)
एवाग्निर्मर्तैः सह सूरिभिर्वसु ष्टवे सहसः सूनरो नृभिः.
मित्रासो न ये सुधिता ऋतायवो द्यावो न द्युम्नैरभि सन्ति मानुषान्.. (७)
शक्ति के पुत्र अग्नि धन पाने के लिए यज्ञकर्म के नेता मनुष्यों एवं विद्वानों द्वारा प्रशंसित
होते हैं. मित्रों के समान तृप्त एवं यज्ञ की कामना करने वाले विद्वान् तेजस्वी के समान अपने
बलों से शत्रुओं को हराते हैं. (७)
ऊर्जा नपात्सहसावन्निति त्वोपस्तुतस्य वन्दते वृषा वाक्.
त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः.. (८)
हे बल के पुत्र एवं शक्तिशाली अग्नि! मुझ उपस्तुत ऋषि की हव्य बरसाने वाली स्तुति
तुम्हारी वंदना करती है. हम तुम्हारी स्तुति करें एवं तुम्हारी कृपा से हमारी शोभन संतान लंबी
आयु पावें. (८)
इति त्वाग्ने वृष्टिहव्यस्य पुत्रा उपस्तुतास ऋषयोऽवोचन्.
ताँश्च पाहि गृणतश्च सूरीन्वषड्वषळित्यूर्ध्वासो अनक्षन्नमो नम इत्यूर्ध्वासो अनक्षन्..
(९)
हे अग्नि! वृष्टिहव्य ऋषि के उपस्तुत आदि पुत्रों ने इस प्रकार तुम्हारी स्तुति की है. तुम
उन स्तोताओं तथा विद्वानों की रक्षा करो. उन्होंने वषट्कार एवं नमोनमः शब्द से तुम्हारी
स्तुति की है. (९)
सूक्त—११६ देवता—इंद्र
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पिबा सोमं महत इन्द्रियाय पिबा वृत्राय हन्तवे शविष्ठ.
पिब राये शवसे हूयमानः पिब मध्वस्तृपदिन्द्रा वृषस्व.. (१)
हे अतिशय शक्तिशाली इंद्र! तुम महान् शक्ति दिखाने एवं वृत्र की हत्या के लिए सोमरस
पिओ. हे अन्न एवं शक्ति पाने के लिए बुलाए जाने वाले इंद्र! तुम मधुर सोमरस पीकर तृप्त
बनो तथा जल बरसाओ. (१)
अस्य पिब क्षुमतः प्रस्थितस्येन्द्र सोमस्य वरमा सुतस्य.
स्वस्तिदा मनसा मादयस्वावाचीनो रेवते सौभगाय.. (२)
हे इंद्र! तुम इस हव्ययुक्त, उत्तरवेदी पर स्थापित एवं भली प्रकार निचोड़े गए सोमरस
को पिओ. तुम हमें कल्याण प्रदान करो, मन से प्रसन्न बनो तथा हमें धनयुक्त सौभाग्य देने के
लिए आगे बढ़ो. (२)
ममत्तु त्वा दिव्यः सोम इन्द्र ममत्तु यः सूयते पार्थिवेषु.
ममत्तु येन वरिवश्चकर्थ ममत्तु येन निरिणासि शत्रून्.. (३)
हे इंद्र! दिव्य सोम तुम्हें मतवाला बनावे. धरतीवासियों द्वारा निचोड़ा गया सोम तुम्हें
नशा दे. जिस सोम के द्वारा तुम धन का निर्माण करते हो, वह तुम्हें प्रसन्न करे. तुम जिसके
द्वारा शत्रुओं को मारते हो, वह तुम्हें आनंदित करे. (३)
आ द्विबर्हा अमिनो यात्विन्द्रो वृषा हरिभ्यां परिषिक्त मन्धः.
गव्या सुतस्य प्रभृतस्य मध्वः सत्रा खेदामरुशहा वृषस्व.. (४)
दोनों में बढ़ाने योग्य, सर्वत्र जाने वाले एवं वृष्टिदाता इंद्र अपने घोड़ों की सहायता से
हमारे सिंचित सोम के समीप जावें. हे शत्रुनाशक इंद्र! हमारे यज्ञ में गोचर्म पर निचोड़े गए
सोमरस को पीकर प्रसन्न बनो एवं बैल के समान शत्रुओं को समाप्त कर दो. (४)
नि तिग्मानि भ्राशयन्भ्राश्यान्यव स्थिरा तनुहि यातुजूनाम्.
उग्राय ते सहो बलं ददामि प्रतीत्या शत्रून्विगधेषु वृश्च.. (५)
हे इंद्र! तुम दीप्तियुक्त एवं तीखे आयुधों को अधिक दीप्तिशाली बनाते हुए राक्षसों के
दृढ़ शरीरों को नष्ट करो. तुम उग्र हो. हम तुम्हें शत्रुहनन में समर्थ एवं शक्तिदाता हव्य देते हैं.
तुम शब्द करते हुए शत्रुओं के बीच में जाकर उन्हें काटो. (५)
व्य१र्य इन्द्र तनुहि श्रवांस्योजः स्थिरेव धन्वनोऽभिमातीः.
अस्मद्र्यग्वावृधानः सहोभिरनिभृष्टस्तन्वं वावृधस्व.. (६)
हे स्वामी इंद्र! हमारे अन्नों का विस्तार करो एवं शत्रुओं के प्रति अपने बल तथा धनुष
का विस्तार करो. तुम हमारे अनुकूल बढ़ते हुए एवं शत्रुओं से पराजित न होते हुए अपने
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शरीर को विस्तृत करो. (६)
इदं हविर्मघवन्तुभ्यं रातं प्रति सम्राळहृणानो गृभाय.
तुभ्यं सुतो मघवन्तुभ्यं पक्वोऽद्धीन्द्र पिब च प्रस्थितस्य.. (७)
हे धनस्वामी इंद्र! यह हव्य तुम्हारे लिए अर्पित है. हे भली प्रकार सुशोभित इंद्र! इसे
क्रोध किए बिना ग्रहण करो. तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ा गया है एवं पुरोडाश पकाया गया
है. अपने समीप आए हुए इस द्रव्य का तुम उपभोग करो. (७)
अद्धीदिन्द्र प्रस्थितेमा हवींषि चनो दधिष्व पचतोत सोमम्.
प्रयस्वन्तः प्रति हर्यामसि त्वा सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (८)
हे इंद्र! अपने समीप आए हुए इन हव्यों, पकाए गए पुरोडाश एवं निचोड़े गए सोम का
तुम उपभोग करो. हम अन्न लेकर तुम्हें भोजन के लिए बुलाते हैं. हमारे यजमान की
अभिलाषाएं पूर्ण हों. (८)
प्रेन्द्राग्निभ्यां सुवचस्यामियर्मि सिन्धाविव प्रेर्यं नावमर्कैः.
अयाइव परि चरन्ति देवा ये अस्मभ्यं धनदा उद्भिदश्च.. (९)
मैं इंद्र एवं अग्नि के लिए बनाई गई स्तुति सुनाता हूं. जिस प्रकार सागर में नाव चलती
है, उसी प्रकार मैं स्तोत्रों द्वारा अपनी स्तुति भेजता हूं. सेवित देव ऋत्विजों के समान हमारी
सेवा करते हैं. ये हमारे शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं धनदाता हैं. (९)
सूक्त—११७ देवता—दान
न वा उ देवाः क्षुधमिद्वधं ददुरुताशितमुप गच्छन्ति मृत्यवः.
उतो रयिः. पृणतो नोप दस्यत्युतापृणन्मर्डितारं न विन्दते.. (१)
देवों ने सभी प्राणियों को क्षुधा के रूप में मृत्यु ही प्रदान की है. भोजन करने पर भी तो
प्राणियों की मृत्यु होती है. देने वाले का धन समाप्त नहीं होता. दान न करने वाले को कोई
भी सुखी नहीं बना सकता है. (१)
य आध्राय चकमानाय पित्वोऽन्नवान्त्सन्न्रफितायोपजग्मुषे.
स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरोतो चित्स मर्डितारं न विदन्ते.. (२)
जो अन्न वाला व्यक्ति भूखे भीख मांगने वाले को सामने पाकर भी अपने मन को कठोर
रखता है एवं उसके सामने भोजन करता है, उसे कोई भी सुख पहुंचाने वाला नहीं मिल
सकता. (२)
स इद्धोजो यो गृहवे ददात्यन्नकामाय चरते कृशाय.
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अरमस्मै भवति यामहूता उतापरीषु कृणुते सखायम्.. (३)
जो दुर्बल व्यक्ति अन्न की अभिलाषा से घूमता है, उसे अन्न देने वाला ही दाता है.
उसीको यज्ञ का पर्याप्त फल मिलता है तथा वह शत्रुओं में भी मित्र खोज लेता है. (३)
न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः.
अपास्मात्प्रेयान्न तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत्.. (४)
जो व्यक्ति सदा साथ रहने वाले एवं सेवा करने वाले मित्र को भी अन्न नहीं देता, वह
व्यक्ति मित्र नहीं है. ऐसे व्यक्ति के पास से दूर चला जाना ही उत्तम है. उसका घर घर नहीं है,
उसी समय अन्य धनी दाता के यहां चले जाना चाहिए. (४)
पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यानद्राघीयांसमनु पश्येत पन्थाम्.
ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुप तिष्ठन्त रायः.. (५)
याचना करने वाले के लिए धनी को धन अवश्य देना चाहिए. वह धर्मरूपी लंबा मार्ग
प्राप्त करता है. जिस प्रकार रथ का पहिया ऊपर-नीचे होता रहता है, उसी प्रकार धन भी
एक व्यक्ति के पास से दूसरे के पास जाता है. (५)
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य.
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी.. (६)
मन में दान की भावना न रखने वाला व्यक्ति व्यर्थ ही अन्न प्राप्त करता है. ऐसे व्यक्ति
का भोजन उसकी मृत्यु के समान है. जो न देवताओं को पुष्ट बनाता है और न सखा को
खिलाता है, ऐसा स्वयं भोजन करने वाला व्यक्ति केवल पापी होता है. (६)
कृषन्नित्फाल आशितं कृणोति यन्नध्वानमप वृङ्क्ते चरित्रैः.
वदन्ब्रह्मावदतो वनीयान्पृणन्नापिरपृणन्तमभि ष्यात्.. (७)
हल खेती का काम करता हुआ अन्य उत्पन्न करता है. वह मार्गों पर चलता हुआ अपने
कार्यों से अन्न उत्पन्न करता है. जिस प्रकार मंत्र बोलने वाला मंत्र न बोलने वाले से श्रेष्ठ है,
उसी प्रकार दान देने वाला दान न देने वाले से उत्तम है. (७)
एकपाद्भूयो द्विपदो वि चक्रमे द्विपात्त्रिपादमभ्येति पश्चात्.
चतुष्पादेति द्विपदामभिख्वरे संपश्यन्पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः.. (८)
संपत्ति का एक भाग रखने वाला संपत्ति के दो भागों के स्वामी के पास मांगने जाता है.
इसके बाद दो भाग संपत्ति रखने वाला तीन भाग संपत्ति रखने वाले के पास जाता है. चार
भाग संपत्ति रखने वाला अपने से दूने के पास जाता है. इसी प्रकार पंक्तिबद्धरूप में छोटा
बड़े के पास मांगने जाता है. (८)
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सूक्त—११८ देवता—राक्षस नाशक अग्नि

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समौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते.
यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः.. (९)
हमारे समान रूप वाले दोनों हाथों की धारण शक्ति समान नहीं है. एक ही माता से
उत्पन्न गाएं बराबर दूध नहीं देतीं. जुड़वां भाइयों का पराक्रम एक जैसा नहीं होता. एक
परिवार में जन्म लेने वाले दो व्यक्ति बराबर दान नहीं करते. (९)
सूक्त—११८ देवता—राक्षस नाशक अग्नि
अग्ने हंसि न्य१त्रिणं दीद्यन्मर्त्येष्वा. स्वे क्षये शुचिव्रत.. (१)
हे पवित्र व्रत वाले अग्नि! तुम मनुष्यों के मध्य अपने स्थान पर प्रज्वलित होकर शत्रुओं
का नाश करो. (१)
उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे. यत्त्वा सुचः समस्थिरन्.. (२)
हे शोभन आहुति वाले अग्नि! तुम उठते हो और घी पाकर प्रसन्न होते हो. तुम्हारे लिए
सुच उठाए जाते हैं. (२)
स आहुतो वि रोचतेऽग्निरीळेन्यो गिरा. सुचा प्रतीकमज्यते.. (३)
बुलाए गए एवं स्तुतियों द्वारा प्रशंसा योग्य अग्नि प्रज्वलित होते हो. एवं सभी देवों से
पहले घी के द्वारा सींचे जाते हैं. (३)
घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः. रोचमानो विभावसुः.. (४)
घृतयुक्त अवयव वाले अग्नि घृतरूपी हव्य से सिंचते हैं. वे स्तुतियों द्वारा रोचमान एवं
दीप्ति वाले हैं. (४)
जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन. तं त्वा हवन्त मर्त्याः.. (५)
हे देवों का हव्य वहन करने वाले अग्नि! तुम स्तोताओं द्वारा प्रशंसित होकर प्रज्वलित
होते हो, मनुष्य तुम्हें बुलाते हैं. (५)
तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत. अदाभ्यं गृहपतिम्.. (६)
हे मनुष्यो! घृत द्वारा मरणरहित, अपराजेय एवं गृहपति अग्नि की सेवा करो. (६)
अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह. गोपा ऋतस्य दीदिहि.. (७)
हे अग्नि! अपने अपराजेय तेज के द्वारा तुम राक्षसों को जलाओ एवं धन के रक्षक
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बनकर दीप्तिधारक बनो. (७)
स त्वमग्ने प्रतीकेन प्रत्योष यातुधान्यः. उरुक्षयेषु दीद्यत्.. (८)
हे अग्नि! तुम अपने अद्वितीय तेज द्वारा राक्षसों को समाप्त करो. तुम अपने सभी
स्थानों में दीप्तिशाली बनो. (८)
तं त्वा गीर्भिरुरुक्षया हव्यवाहं समीधिरे. यजिष्ठं मानुषे जने.. (९)
अनेक यजमानों वाले हव्यवहनकर्त्ता एवं मानव समूह में सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता अग्नि
को स्तुति के साथ प्रज्वलित किया जाता है. (९)
सूक्त—११९ देवता—लवरूपी इंद्र
इति वा इति मे मनो गामश्वं सनुयामिति. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१)
मेरी इच्छा है कि मैं भी गाय और घोड़े का दान करूं. मैं कई बार सोमरस पी चुका हूं.
(१)
प्र वाताइव दोधत उन्मा पीता अयंसत. कुवित्सोमस्यापामिति.. (२)
पिया हुआ सोमरस मुझे उसी प्रकार कंपित करता एवं ऊपर उठाता है, जिस प्रकार
वायु को कंपाता है. मैं कई बार सोमरस पी चुका हूं. (२)
उन्मा पीता अयंसत रथमश्वा इवाश्वः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (३)
पिए हुए सोमरस ने मुझे इस प्रकार ऊपर उठाया है, जिस प्रकार तेज चाल वाले घोड़े
रथ को ऊपर उठाते हैं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (३)
उप मा मतिरस्थित वाश्रा पुत्रमिव प्रियम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (४)
जिस प्रकार गाय रंभाती हुई बछड़े के पास जाती है, उसी प्रकार स्तुतियां मेरे पास
आती हैं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (४)
अहं तष्टेव वन्धुरं पर्यचामि हृदा मतिम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (५)
त्वष्टा जिस प्रकार रथ में सारथि के बैठने का स्थान बनाता है, उसी प्रकार मैं स्तोता के
मन में स्तुति उत्पन्न करता हूं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (५)
नहि मे अक्षिपच्चनाच्छान्त्सुः पञ्च कृष्टयः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (६)
पंचजन मेरे दृष्टिपात से बच नहीं सकते. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (६)
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नहि मे रोदसी उभे अन्यं पक्षं चन प्रति. कुवित्सोमस्यापामिति.. (७)
द्यावा-पृथिवी मेरे एक भाग के भी समान नहीं हैं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं.
(७)
अभि द्यां महिना भुवमभी३मां पृथिवीं महीम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (८)
मैंने अपने महत्त्व से द्यौ एवं विशाल धरती को पराजित किया है. मैं अनेक बार
सोमपान कर चुका हूं. (८)
हन्ताहं पृथिवीमिमां नि दधानीह वेह वा. कुवित्सोमस्यापामिति.. (९)
मैं धरती को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख सकता हूं. मैं अनेक बार
सोमपान कर चुका हूं. (९)
ओषमित्पृथिवीमहं जङ्घनानीह वेह वा. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१०)
मैं अपने तेज से धरती अथवा अन्य स्थान को जला सकता हूं. मैं अनेक बार सोमपान
कर चुका हूं. (१०)
दिवि मे अन्यः पक्षोऽधो अन्यमचीकृषम्. कुवित्सोमस्यापामिति.. (११)
मेरा एक भाग स्वर्ग में है एवं दूसरा मैंने धरती पर स्थिर किया है. मैं अनेक बार
सोमपान कर चुका हूं. (११)
अहमस्मि महामहोऽभिनभ्यमुदीषितः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१२)
मैं अतिशय महान हूं तथा सूर्यरूप से आकाश में अभिगत हूं. मैं अनेक बार सोमपान
कर चुका हूं. (१२)
गृहो याम्यरङ्कृतो देवेभ्यो हव्यवाहनः. कुवित्सोमस्यापामिति.. (१३)
मैं हवि ग्रहण करता हूं, यजमानों द्वारा सुशोभित हूं एवं देवों के लिए हव्य वहन करता
हूं. मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं. (१३)
सूक्त—१२० देवता—इंद्र
तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेष्णृम्णः.
सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यं विश्वे मदन्त्यूमाः.. (१)
इस भुवन में वही बड़ा था, जिससे उग्र एवं प्रदीप्त बल वाले सूर्यरूपी इंद्र उत्पन्न हुए हैं.
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जो इंद्र जन्म के साथ ही शत्रुविनाश करने लगे, सभी देवता उनका स्वागत करते हैं. (१)
वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दासस्य भियसं दधाति.
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (२)
बल से बढ़ते हुए, अधिक शक्तिशाली एवं शत्रुहंता इंद्र दासों के मन में अधिक भय
उत्पन्न करते हैं. प्राणयुक्त एवं प्राणहीन पदार्थ इंद्र के द्वारा संशोधित होते हैं. हे इंद्र! तुम्हारी
प्रसन्नता उत्पन्न होने पर सभी पोषित प्राणी स्तुति हेतु एकत्र होते हैं. (२)
त्वे क्रतुमपि वृञ्जन्ति विश्वे द्विर्यदेते त्रिर्भवन्त्यूमाः.
स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः.. (३)
हे इंद्र! सभी यजमान अपना यज्ञ तुम पर समाप्त करते हैं. तुम्हें तृप्त करने वाले लोग
पत्नी के रूप में दोगुने एवं संतान के रूप में तिगुने बनते हैं. तुम घर, धन आदि से, प्रिय पत्नी
से उत्पन्न परम प्रिय संतान से हमें मिलाओ. हमारी प्रिय संतान को उससे भी अधिक नातियों
आदि से क्रीड़ित करो. (३)
इति चिद्धि त्वा धना जयन्तं मदेमदे अनुमदन्ति विप्राः.
ओजीयो धृष्णो स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन्यातुधाना दुरेवाः.. (४)
हे इंद्र! तुम जब-जब सोमपान के बाद शत्रु के धनों को जीतकर प्रसन्न होते हो, तब-तब
तुम्हारे बाद मेधावी जल हर्षित होते हैं. हे शत्रुनाशक इंद्र! हमें अधिक शक्ति वाला धन दो,
दुर्गतियां एवं राक्षस तुम्हें बाधा न पहुंचावें. (४)
त्वया वयं शाशद्महे रणेषु प्रपश्यन्तो युध्येन्यानि भूरि.
चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा अनुगृहीत होकर हम शत्रुओं का खूब नाश करें एवं युद्धों में युद्ध के
योग्य बहुत से आयुधों को जानते हुए तुम्हारे वज्र आदि को शत्रुओं की ओर प्रेरित करें. हम
तुम्हारे लिए मंत्रोच्चारण के साथ-साथ अन्न का संस्कार करते हैं. (५)
स्तुषेय्यं पुरुवर्पसमृभ्वमिनतममाप्त्यमाप्त्यानाम्.
आ दर्षते शवसा सप्त दानून्प्र साक्षते प्रतिमानानि भूरि.. (६)
जो इंद्र अपनी शक्ति से वृत्र आदि सात राक्षसों को मारते हैं एवं जो राक्षसों के बहुत से
स्थानों को प्राप्त करते हैं. हम उन्हीं स्तुतियोग्य अनेक रूप वाले दीप्तिशाली, स्वामी एवं परम
विश्वसनीय इंद्र की स्तुति करते हैं. (६)
नि तद्दधिषेऽवरं परं च यस्मिन्नाविथावसा दुरोणे.
आ मातरा स्थापयसे जिगत्नू अत इनोषि कर्वरा पूरूणि.. (७)
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हे इंद्र! यजमान के जिस घर में तुम हव्यरूप अन्न से तृप्त होते हो, उस में सांसारिक एवं
दिव्य धन स्थापित करते हो. तुम सबके निर्माणकर्त्ता द्यावा-पृथिवी को गतिशील रखते हो,
इसलिए अनेक लौकिक व वैदिक कर्मों को प्राप्त करते हो. (७)
इमा ब्रह्म बृहद्दिवो विवक्तीन्द्राय शूषमग्रियः स्वर्षाः.
महो गोत्रस्य क्षयति स्वराजो दुरश्च विश्वा अवृणोदप स्वाः.. (८)
बृहद्दिव नामक ऋषि सुखपूर्वक इंद्र के लिए इन मंत्रों को बोलते हैं. ऋषियों में प्रमुख
एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले इंद्र महान् एवं स्वयंप्रकाशित पर्वतों को अपने बल से हराते हैं तथा
बल असुर द्वारा बंद सभी द्वार खोलते हैं. (८)
एवा महान्बृहद्दिवो अथर्वावोचत्स्वां तन्व१मिन्द्रमेव.
स्वसारो मातरिभ्वरीररिप्रा हिन्वन्ति च शवसा वर्धयन्ति च.. (९)
अधिक गुणों वाले, अथर्वा के पुत्र बृहद्दिव ने अपनी विशाल स्तुति केवल इंद्र के प्रति ही
निवेदित की है. पापरहित नदियां यज्ञों का साधन बनकर इंद्र को प्रसन्न करती हैं तथा अपनी
शक्ति से उन्हें बढ़ाती हैं. (९)
सूक्त—१२१ देवता—प्रजापति
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१)
परमात्मा से सबसे पहले प्रजापति उत्पन्न हुए. वे उत्पन्न होते ही सब जगत् के स्वामी
बने. उन्होंने धरती एवं इस द्यौ को धारण किया. हम पुरोडाश आदि के द्वारा दिव्य प्रजापति
की सेवा करें. (१)
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः.
यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२)
जो प्रजापति आत्माओं तथा बलों को देने वाले हैं, सभी विश्व के प्राणी जिनकी आज्ञा
को शिरोधार्य करते हैं. मरण एवं अमरता जिनकी छाया है, हम उन्हीं दिव्य प्रजापति की
पुरोडाश आदि से सेवा करते हैं. (२)
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव.
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (३)
जो अपने महत्त्व से सांस लेने वाले, पलक झपकाने वाले एवं गतिशील प्राणियों के
एकमात्र राजा हुए हैं, जो दो पैरों वाले मानवों एवं चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं, उन्हीं
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