Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1784 of 1855

Read in context
Page 1784

पिबा सोमं महत इन्द्रियाय पिबा वृत्राय हन्तवे शविष्ठ.
पिब राये शवसे हूयमानः पिब मध्वस्तृपदिन्द्रा वृषस्व.. (१)
हे अतिशय शक्तिशाली इंद्र! तुम महान् शक्ति दिखाने एवं वृत्र की हत्या के लिए सोमरस
पिओ. हे अन्न एवं शक्ति पाने के लिए बुलाए जाने वाले इंद्र! तुम मधुर सोमरस पीकर तृप्त
बनो तथा जल बरसाओ. (१)
अस्य पिब क्षुमतः प्रस्थितस्येन्द्र सोमस्य वरमा सुतस्य.
स्वस्तिदा मनसा मादयस्वावाचीनो रेवते सौभगाय.. (२)
हे इंद्र! तुम इस हव्ययुक्त, उत्तरवेदी पर स्थापित एवं भली प्रकार निचोड़े गए सोमरस
को पिओ. तुम हमें कल्याण प्रदान करो, मन से प्रसन्न बनो तथा हमें धनयुक्त सौभाग्य देने के
लिए आगे बढ़ो. (२)
ममत्तु त्वा दिव्यः सोम इन्द्र ममत्तु यः सूयते पार्थिवेषु.
ममत्तु येन वरिवश्चकर्थ ममत्तु येन निरिणासि शत्रून्.. (३)
हे इंद्र! दिव्य सोम तुम्हें मतवाला बनावे. धरतीवासियों द्वारा निचोड़ा गया सोम तुम्हें
नशा दे. जिस सोम के द्वारा तुम धन का निर्माण करते हो, वह तुम्हें प्रसन्न करे. तुम जिसके
द्वारा शत्रुओं को मारते हो, वह तुम्हें आनंदित करे. (३)
आ द्विबर्हा अमिनो यात्विन्द्रो वृषा हरिभ्यां परिषिक्त मन्धः.
गव्या सुतस्य प्रभृतस्य मध्वः सत्रा खेदामरुशहा वृषस्व.. (४)
दोनों में बढ़ाने योग्य, सर्वत्र जाने वाले एवं वृष्टिदाता इंद्र अपने घोड़ों की सहायता से
हमारे सिंचित सोम के समीप जावें. हे शत्रुनाशक इंद्र! हमारे यज्ञ में गोचर्म पर निचोड़े गए
सोमरस को पीकर प्रसन्न बनो एवं बैल के समान शत्रुओं को समाप्त कर दो. (४)
नि तिग्मानि भ्राशयन्भ्राश्यान्यव स्थिरा तनुहि यातुजूनाम्.
उग्राय ते सहो बलं ददामि प्रतीत्या शत्रून्विगधेषु वृश्च.. (५)
हे इंद्र! तुम दीप्तियुक्त एवं तीखे आयुधों को अधिक दीप्तिशाली बनाते हुए राक्षसों के
दृढ़ शरीरों को नष्ट करो. तुम उग्र हो. हम तुम्हें शत्रुहनन में समर्थ एवं शक्तिदाता हव्य देते हैं.
तुम शब्द करते हुए शत्रुओं के बीच में जाकर उन्हें काटो. (५)
व्य१र्य इन्द्र तनुहि श्रवांस्योजः स्थिरेव धन्वनोऽभिमातीः.
अस्मद्र्यग्वावृधानः सहोभिरनिभृष्टस्तन्वं वावृधस्व.. (६)
हे स्वामी इंद्र! हमारे अन्नों का विस्तार करो एवं शत्रुओं के प्रति अपने बल तथा धनुष
का विस्तार करो. तुम हमारे अनुकूल बढ़ते हुए एवं शत्रुओं से पराजित न होते हुए अपने
ebook converter DEMO Watermarks*