ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1779 of 1855
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वृत्रेण यदहिना बिभ्रदायुधा समस्थिथा युधये शंसमाविदे.
विश्वे ते अत्र मरुतः सह त्मनावर्धन्नुग्र महिमानमिन्द्रियम्.. (३)
हे उग्र इंद्र! तुम जब युद्ध के लिए आयुध धारण करते हुए मरने योग्य वृत्र के साथ भिड़े,
तब शौर्य प्रदर्शन के लिए मैंने तुम्हारी प्रशंसा की. उस समय सभी मरुतों ने अपने साथ-साथ
तुम्हारी भी महिमा बढ़ाई. (३)
जज्ञान एव व्यबाधत स्पृधः प्रापश्यद्वीरो अभि पौंस्यं रणम्.
अवृश्चदद्रिमव सस्यदः सृजदस्तभ्नान्नाकं स्वपस्यया पृथुम्.. (४)
इंद्र ने जन्म लेते ही शत्रुओं को बाधा पहुंचाई. वीर इंद्र ने उस संग्राम में अपना पौरुष
अधिक रूप में प्रकट किया, वृत्र को काटा, जल बरसाया एवं शोभन कर्म की इच्छा से
विस्तृत स्वर्ग को धारण किया. (४)
आदिन्द्रः सत्रा तविषीरपत्यत वरीयो द्यावापृथिवी अबाधत.
अवाभरद्दधृषितो वज्रमयासं शेवं मित्राय वरुणाय दाशुषे.. (५)
इंद्र सहसा विशाल सेनाओं की ओर दौड़े एवं अपनी उत्तम महिमा से धरती-आकाश को
बाधा पहुंचाई. शत्रुवध में प्रगल्भ इंद्र ने मित्र, वरुण एवं हव्य देने वाले यजमान को सुख
पहुंचाने के लिए लोहे का बना हुआ वज्र धारण किया. (५)
इन्द्रस्यात्र तविषीभ्यो विरप्शिन ऋघायतो अरंहयन्त मन्यवे.
वृत्रं यदुग्रो व्यवृश्चदोजसापो बिभ्रतं तमसा परीवृतम्.. (६)
विविध शब्द करने वाले व शत्रुहिंसक इंद्र का क्रोध विशाल शत्रुसेनाओं पर स्थापित
करने के लिए जल निकले. उग्र इंद्र ने जल धारण करने वाले और अंधकार से घिरे हुए वृत्र
को बलपूर्वक नष्ट किया. (६)
या वीर्याणि प्रथमानि कत्वी महित्वेभिर्यतमानौ समीयतुः.
ध्वान्तं तमोऽव दध्वसे हत इन्द्रो मह्ना पूर्वहूतावपत्यत.. (७)
अपनी महान् शक्ति से युद्ध करने वाले इंद्र और वृत्र ने प्रथम करने योग्य जो वीरताएं
प्रदर्शित कीं, उनके द्वारा वृत्र के मारे जाने पर घना अंधकार नष्ट हो गया. इंद्र अपनी महिमा
से वीरों की गणना में सबसे पहले गिने जाते हैं. (७)
विश्वे देवासो अध वृष्ण्यानि तेऽवर्धयन्त्सोमवत्या वचस्यया.
रद्धं वृत्रमहिमिन्द्रस्य हन्मनाग्निर्न जम्भैस्तृष्वन्नमावयत.. (८)
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