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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1774 of 1855

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Page 1774

देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुपायणा:.. (५)
सुंदर पत्नियां अच्छे कपड़े पहनती हैं एवं पतियों के सामने जिस प्रकार अपना शरीर
प्रकट करती हैं, उसी प्रकार यज्ञशाला के सभी द्वारों पर देवियां प्रकट हों. हे द्वारदेवियो! द्वार
इतने खुल जावें कि देवगण उन में होकर सरलता से जा सकें. (५)
आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ.
दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने.. (६)
यज्ञ भाग की अधिकारिणी एवं शोभन-गति वाली उषा व रात्रि यज्ञशाला में बैठें. ये
दिव्य नारी के समान शोभन दीप्ति वाली अत्यंत सुंदर एवं तेज को धारण करने वाली हैं. (६)
दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै.
प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७)
देवों के होता अर्थात् अग्नि और सूर्य सबसे पहले शोभन स्तुतियां बोलते हुए यज्ञकर्त्ता
मनुष्य के लिए यज्ञ पूर्ण करने का काम करते हैं. ये दोनों पुरोहितों को यज्ञ कर्म में लगाते हैं.
ये क्रियाकुशल हैं एवं पूर्व दिशा में प्राचीन प्रकाश उत्पन्न करते हैं. (७)
आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विळा मनुष्यदिह चेतयन्ती.
तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं स्योनं सरस्वती स्वपसः सदन्तु.. (८)
सूर्यदीप्ति हमारे यज्ञ में शीघ्र आवें. इळादेवी इस यज्ञ का ज्ञान करके यहां मनुष्य के
समान पधारें. इन दोनों के साथ सरस्वती देवी मिलें एवं तीनों देवियां इस सुखकर यज्ञ में बैठें.
(८)
य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा.
तमद्य होतरिषितो यजीयान्देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (९)
हे होता! जिन त्वष्टा देव ने देवों की माता के समान द्यावा-पृथिवी को बनाकर उन्हें
भांति-भांति के प्राणियों से युक्त किया है, उन्हीं त्वष्टा देव की तुम पूजा करो. तुम आज अन्न
वाले हो, विद्वान् हो एवं सर्वश्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता हो. (९)
उपावसृज त्मन्या समञ्जन्देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि.
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (१०)
हे यूप! तुम ऋतु के अनुकूल अन्न एवं होमद्रव्य अर्पण करो. वनस्पति शमिता नाम का
देव एवं अग्नि मधु तथा घी के साथ होम के द्रव्यों का स्वाद लें. (१०)
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत्पुरोगाः.
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