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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—२० देवता—अग्नि

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सूक्त—२० देवता—अग्नि
यमग्ने वाजसातम त्वं चिन्मन्यसे रयिम्.
तं नो गीर्भिः श्रवाय्यं देवत्रा पनया युजम्.. (१)
हे अन्नदाताओं में श्रेष्ठ अग्नि! हमारे द्वारा दिए गए जिस हव्य को तुम धन समझते हो,
उसी श्रवणीय एवं स्तुतियुक्त हव्यरूपी धन को देवों के समीप ले जाओ. (१)
ये अग्ने नेरयन्ति ते वृद्धा उग्रस्य शवसः. अप द्वेषो अप ह्वरोऽन्यव्रतस्य सश्चिरे.. (२)
हे अग्नि! जो पशु आदि धन से समृद्ध लोग तुम्हारे लिए हवि नहीं देते, वे अन्न से अत्यंत
हीन बनते हैं. तुम वेद-विरुद्ध कर्म करने वाले असुर का विरोध एवं हिंसा करो. (२)
होतारं त्वा वृणीमहेऽग्ने दक्षस्य साधनम्. यज्ञेषु पूर्व्यं गिरा प्रयस्वन्तो हवामहे.. (३)
हे देवों को बुलाने वाले एवं बल के साधक अग्नि! अन्न के स्वामी हम लोग तुम्हारा वरण
करते हैं एवं यज्ञों में श्रेष्ठ मानकर स्तुति-वचनों से तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. (३)
इत्था यथा त ऊतये सहसावन्दिवेदिवे.
राय ऋताय सुक्रतो गोभिः ष्याम सधमादो वीरैः स्याम सधमादः.. (४)
हे अग्नि! ऐसी कृपा करो, जिससे हम प्रतिदिन तुम्हारी रक्षा प्राप्त करें. हे शोभन यज्ञ के
स्वामी! ऐसा करो, जिससे हम धन पा सकें. यज्ञ कर सकें, गाएं पा सकें एवं पुत्र-पौत्रों के
साथ प्रसन्न हो सकें. (४)
सूक्त—२१ देवता—अग्नि
मनुष्वत्त्वा नि धीमहि मनुष्वत्समिधीमहि. अग्ने मनुष्वदङ्गिरो देवान्देवयते यज.. (१)
हे अग्नि! हम मनु के समान तुम्हें धारण एवं प्रज्वलित करते हैं. हे अंगारयुक्त अग्नि!
तुम देवों की कामना करने वाले यजमानों का यज्ञ करो. (१)
त्वं हि मानुषे जनेऽग्ने सुप्रीत इध्यसे. स्रुचस्त्वा यन्त्यानुषक्सुजात सर्पिरासुते.. (२)
हे अग्नि! तुम स्तोत्रों द्वारा प्रसन्न होकर मानवलोक में प्रज्वलित होते हो. हे सुजात एवं
घृतयुक्त अन्न के स्वामी अग्नि! हव्य से पूर्ण स्रुच तुम्हें सदा प्राप्त करता है. (२)
त्वां विश्वे सजोषसो देवासो दूतमक्रत. सपर्यन्तस्त्वा कवे यज्ञेषु देवमीळते.. (३)
हे क्रांतदर्शी अग्नि! सब देवों ने परस्पर प्रसन्न होकर, तुम्हें अपना दूत बनाया था.

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इसीलिए यज्ञों में तुम्हारी सेवा करते हुए यजमान देवों को बुलाने हेतु तुम्हारी सेवा करते हैं.
(३)
देवं वो देवयज्ययाग्निमीळीत मर्त्यः.
समिद्धः शुक्र दीदिह्यतस्य योनिमासदः ससस्य योनिमासदः.. (४)
हे दीप्तिशाली अग्नि! यजमान देवयज्ञ के निमित्त तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे ज्वालायुक्त
अग्नि! तुम हवि से समृद्ध होकर चमको. मुझ सस ऋषि के यज्ञस्थान में तुम ठहरो. (४)
सूक्त—२२ देवता—अग्नि
प्र विश्वसामन्नत्रिवदर्चा पावकशोचिषे. यो अध्वरेष्वीड्यो होता मन्द्रतमो विशि.. (१)
हे विश्वसामा ऋषि! तुम अत्रि ऋषि के समान पवित्र प्रकाश वाले अग्नि की पूजा करो.
वे यज्ञों में सभी ऋत्विजों द्वारा स्तुत्य, देवों को बुलाने वाले एवं मानवों में सबसे अधिक पूज्य
हैं. (१)
न्य१ग्निं जातवेदसं दधाता देवमृत्विजम्. प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः.. (२)
हे यजमानो! तुम जातवेद, द्युतिमान एवं ऋतु अनुसार यज्ञ करने वाले अग्नि को धारण
करो. देवों को अतिशय प्रिय व यज्ञ-साधन के रूप में हमारे द्वारा दिया गया हवि आज अग्नि
को प्राप्त हो. (२)
चिकित्विमनसं त्वा देवं मर्तास ऊतये. वरेण्यस्य तेऽवस इयानासो अमन्महि.. (३)
हे दीप्तिशाली एवं ज्ञानसंपन्न मन वाले अग्नि! तुम्हारे समीप जाते हुए हम मनुष्य तुझ
संभवनीय को तृप्त करने के लिए स्तुति करते हैं. (३)
अग्ने चिकिद्ध्या१स्य न इदं वचः सहस्य.
तं त्वा सुशिप्र दम्पते स्तोमैर्वर्धन्त्यत्रयो गीर्भिः शुम्भन्त्यत्रयः.. (४)
हे बलपुत्र अग्नि! हमारी इस सेवारूपी स्तुति को जानो. हे सुंदर नाक वाले एवं
गृहस्वामी अग्नि! अत्रि ऋषि के पुत्र तुम्हें स्तुतियों द्वारा वर्द्धित एवं वचनों से अलंकृत करते
हैं. (४)
सूक्त—२३ देवता—अग्नि
अग्ने सहन्तमा भर द्युम्नस्य प्रासहा रयिम्.
विश्वा यश्चर्षणीरभ्या३सा वाजेषु सासह्.. (१)
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हे अग्नि! मुझ द्युम्न ऋषि को उत्तम बल से युक्त एवं शत्रुओं को पराजित करने वाला
पुत्र दो, जो स्तुति से युक्त होकर युद्ध में सामने आने वाले शत्रुओं को हरा दे. (१)
तमग्ने पृतनाषहं रयिं सहस्व आ भर.
त्वं हि सत्यो अद्भुतो दाता वाजस्य गोमतः.. (२)
हे बलवान् अग्नि! तुम सत्यस्वरूप एवं महान् तथा गोयुक्त अन्न देने वाले हो. मुझे शत्रु
सेनाओं को हराने वाला पुत्र दो. (२)
विश्वे हि त्वा सजोषसो जनासो वृक्तबर्हिषः.
होतारं सदमसु प्रियं व्यन्ति वार्या पुरु.. (३)
हे अग्नि! परस्पर प्रसन्न एवं कुश बिछाने वाले सब ऋत्विज् यज्ञशाला में देवों को बुलाने
वाले एवं सर्वप्रिय तुमसे उत्तम धन मांगते हैं. (३)
स हि ष्मा विश्वचर्षणिर्भिमाति सहो दधे.
अग्न एषु क्षयेष्वा रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि.. (४)
हे अग्नि! वे विश्व-चर्षण ऋषि शत्रुहिंसक बल धारण करें. हे तेजस्वी अग्नि! हमारे घरों
में तुम धनयुक्त प्रकाश करो. हे पापनाशक अग्नि! तुम दीप्तिशाली होकर प्रकाश करो. (४)
सूक्त—२४ देवता—अग्नि
अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः.. (१)
वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छा नक्षि द्युमत्तमं रयिं दाः.. (२)
हे वरणीय, रक्षक एवं सुखकर अग्नि! तुम हमारे समीपवर्ती बनो. हे निवास एवं
अन्नदाता अग्नि! तुम हमें प्राप्त होकर हमें अत्यंत उज्ज्वल धन दो. (१, २)
स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णो अघायतः समस्मात्.. (३)
तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः.. (४)
हे अग्नि! तुम हमें जानो एवं हमारी पुकार सुनो. सभी पाप चाहने वाले लोगों से हमें
बचाओ. हे अपने तेज से दीप्त अग्नि! हम तुमसे सुख एवं पुत्र की याचना करते हैं. (३, ४)
सूक्त—२५ देवता—अग्नि
अच्छा वो अग्निमवसे देवं गासि स नो वसुः.
रासत्पुत्र ऋषूणामृतावा पर्षति द्विषः.. (१)
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हे धन के अभिलाषी ऋषियो! तुम रक्षा के लिए अग्नि की स्तुति करो. अग्निहोत्र के
निमित्त यजमानों के घर में रहने वाले अग्नि हमारी अभिलाषा पूर्ण करें. ऋषियों के पुत्र एवं
सत्ययुक्त अग्नि हमें शत्रुओं से सुरक्षित करें. (१)
स हि सत्यो यं पूर्वे चिद्देवासश्चिद्यमीधिरे.
होतारं मन्द्रजिह्वमित्सुदीतिभिर्विभावसुम्.. (२)
प्राचीन ऋषियों एवं देवों ने देवों को बुलाने वाले, प्रसन्नताकारक जीभ वाले, शोभन
दीप्तियों से युक्त एवं प्रभा वाले जिस अग्नि को प्रज्वलित किया था, वे सत्यप्रतिज्ञ हैं. (२)
स नो धीती वरिष्ठया श्रेष्ठया च सुमत्या.
अग्ने रायो दिदीहि नः सुवृक्तिभिर्विरेण्य.. (३)
हे शोभन स्तुतियों द्वारा प्रशंसित एवं वरण करने योग्य अग्नि! तुम हमारे अतिशय
प्रशंसनीय एवं श्रेष्ठ सेवारूपी कर्म से एवं स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें धन दो. (३)
अग्निद्देवेषु राजत्यग्निर्मर्तेष्वाविशन्.
अग्निर्नो हव्यवाहनोऽग्निं धीभिः सपर्यत.. (४)
हे यजमान! जो अग्नि देवों के बीच में देवतारूप में प्रकाशित होते हैं, मनुष्यों में
आहवानीय आदि रूप से प्रविष्ट हैं एवं जो हमारा हव्य देवों के पास ले जाते हैं, तुम स्तुतियों
द्वारा उन्हीं अग्नि की सेवा करो. (४)
अग्निस्तुविश्वस्तमं तुविब्रह्माणमुत्तमम्.
अतूर्तं श्रावयत्पतिं पुत्रं ददाति दाशुषे.. (५)
अग्नि हव्य देने वाले यजमान को ऐसा पुत्र दें जो अनेक प्रकार के अन्नों का स्वामी,
विविध स्तोत्रों से युक्त, उत्तम शत्रुओं से पराजित न होने वाला एवं अपने कर्मों से पूर्वजों के
यज्ञ को प्रसिद्ध करने वाला हो. (५)
अग्निर्दाति सत्पतिं सासाह यो युधा नृभिः.
अग्निंरत्यं रघुष्यदं जेतारमपराजितम्.. (६)
अग्नि हमें सत्यपालक युद्ध में परिजनों की सहायता से शत्रुओं को पराजित करने
वाला, सज्जनों का पालक, शत्रुजयी एवं परम वेगशाली पुत्र दें. (६)
यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो.
महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते.. (७)
सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र अग्नि के उद्देश्य से बोला जाता है. हे प्रभायुक्त अग्नि! हमें अधिक मात्रा
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में अन्न दो, क्योंकि महान् धन एवं अन्न तुम्हीं से उत्पन्न होता है. (७)
तव द्युमन्तो अर्चयो ग्रावेवोच्यते बृहत्.
उतो ते तन्यतुर्यथा स्वानो अर्त त्मना दिवः.. (८)
हे अग्नि! तुम्हारी लपटें प्रकाश वाली हैं. तुम सोमलता कुचलने वाले पत्थर के समान
महान् हो. तुम स्वयं द्योतमान हो. तुम्हारा शब्द मेघगर्जन के समान है. (८)
एवाँ अग्निं वस्यवः सहसानं ववन्दिम.
स नो विश्वा अति द्विषः पर्षन्नावेव सुक्रतुः.. (९)
धन की इच्छा करने वाले हम लोग बल का आचरण करने वाले अग्नि की वंदना करते
हैं. वे शोभनकर्म वाले अग्नि हमें उसी प्रकार शत्रुओं से पार करें. जिस प्रकार नाव सरिता के
पार लगाती है. (९)
सूक्त—२६ देवता—अग्नि
अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रया देव जिह्वया.
आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (१)
हे शोधक एवं दीप्तिशाली अग्नि! तुम अपनी दीप्ति और देवों को प्रसन्न करने वाली
जिह्वा से यज्ञ में देवों को बुलाओ तथा उनके निमित्त यज्ञ करो. (१)
तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्वर्दृशम्.
देवाँ आ वीतये वह.. (२)
हे घृत प्रेरक एवं अनेक विशाल लपटों वाले अग्नि! तुझ सर्वद्रष्टा की हम याचना करते
हैं. हव्य भक्षण करने के लिए तुम देवों को बुलाओ. (२)
वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्तं समिधीमहि.
अग्ने बृहन्तमध्वरे.. (३)
हे क्रांतदर्शी, हव्य भक्षण करने वाले, यज्ञ को सुशोभित करने वाले, दीप्तिशाली एवं
महान् अग्नि! हम यज्ञ में तुम्हें समिधाओं द्वारा प्रज्वलित करते हैं. (३)
अग्ने विश्वेभिरा गहि देवेभिर्हव्यदातये.
होतारं त्वा वृणीमहे.. (४)
हे अग्नि! तुम सब देवों के साथ हव्य देने वाले यजमान के यज्ञ में आओ. इसीलिए हम
देवों को बुलाने वाले तुमसे प्रार्थना करते हैं. (४)
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यजमानाय सुन्वत आग्ने सुवीर्यं वह.
देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (५)
हे अग्नि! तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को शोभन बल प्रदान करो एवं देवों के
साथ कुशों पर बैठो. (५)
समिधानः सहस्रजिदग्ने धर्माणि पुष्यसि.
देवानां दूत उक्थ्यः.. (६)
हे हजारों को जीतने वाले अग्नि! तुम हवियों द्वारा प्रज्वलित, प्रशंसित एवं देवों के दूत
बनकर यज्ञकर्मों को बढ़ाते हो. (६)
न्य१ग्निं जातवेदसं होत्रवाहं यविष्ठ्यम्.
दधाता देवमृत्विजम्.. (७)
हे यजमानो! तुम जातवेद, यज्ञ को वहन करने वाले, अतिशय युवा, द्युतियुक्त एवं ऋतु
अनुसार यज्ञ करने वाले अग्नि को स्थापित करो. (७)
प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः. स्तृणीत बर्हिरासदे.. (८)
आज प्रकाशमान स्तोताओं द्वारा दिया गया हवि लगातार देवों के पास पहुंचे, हे
ऋत्विज्! तुम अग्नि के बैठने के लिए कुश बिछाओ. (८)
एदं मरुतो अश्विना मित्रः सीदन्तु वरुणः. देवासः सर्वया विशा.. (९)
मरुद्गण, अश्विनीकुमार, मित्र, वरुण आदि देव अपने सभी साथियों को लेकर इन
कुशों पर बैठें. (९)
सूक्त—२७ देवता—अग्नि
अनस्वन्ता सत्पतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुरो मघोनः.
त्रैवृष्णो अग्ने दशभिः सहस्रैर्वैश्वानर त्र्यरुणश्चिकेत.. (१)
हे सकल मानवों के नेता, साधुओं का पालन करने वाले, अतिशय ज्ञानसंपन्न, बलवान्
एवं धनस्वामी अग्नि! वृष्ण के पुत्र त्र्यरुण नामक राजर्षि ने गाड़ी सहित दो बैल एवं दस
हजार स्वर्ण मुद्राएं मुझे दीं. इस दान से वह प्रसिद्ध हो गया. (१)
यो मे शता च विंशतिं च गोनां हरी च युक्ता सुधुरा ददाति.
वैश्वानर सुष्टुतो वावृधानोऽग्ने यच्छ त्र्यरुणाय शर्म.. (२)

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हे वैश्वानर! जिस त्र्यरुण ने मुझे सौ स्वर्णमुद्राएं, बीस गाएं एवं रथ में जुते हुए दो घोड़े
दिए थे, तुम हमारी स्तुतियों द्वारा प्रज्वलित होकर उसे सुख दो. (२)
एवा ते अग्ने सुमतिं चकानो नविष्ठाय नवमं त्रसदस्युः.
यो मे गिरस्तुविजातस्य पूर्वीर्युक्तेनाभि त्र्यरुणो गृणाति.. (३)
हे अग्नि! जिस त्र्यरुण ने बहुत संतान वाले हम लोगों की अनेक स्तुतियां सुनकर
प्रसन्नतापूर्वक मन से विभिन्न वस्तुएं ग्रहण करने को कहा था, उसी प्रकार तुझ अतिशय स्तुति
योग्य की अति नवीन स्तुतियों की कामना करने वाले त्रसदस्यु ने भी कहा था. (३)
यो म इति प्रवोचत्यश्वमेधाय सूरये.
ददद्वचा सनिं यते ददन्मेधामृतायते.. (४)
हे अग्नि! जो धन का याचक दानी अश्वमेध नामक राजर्षि के पास आकर याचना
करता है, उस स्तुतिकारी भिक्षुक को वे धन देते हैं. यज्ञ के इच्छुक उस अश्वमेध को तुम धन
दो. (४)
यस्य मा परुषाः शतमूद्धर्षयन्त्युक्षणः.
अश्वमेधस्य दानाः सोमाइव त्र्याशिरः.. (५)
हे अग्नि! अश्वमेध द्वारा की हुई कामना पूर्ण करने वाले बैलों ने मुझे इस प्रकार प्रसन्न
किया है, जिस प्रकार दही, दूध एवं सत्तू से मिला हुआ सोम तुम्हें प्रसन्न करता है. (५)
इन्द्राग्नी शतदाव्यश्वमेधे सुवीर्यम्.
क्षत्रं धारयतं बृहद्दिवि सूर्यमिवाजरम्.. (६)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम याचकों को अनगिनत धन देने वाले अश्वमेध के लिए आकाश
स्थित सूर्य के समान शोभन बलयुक्त महान् एवं अमर धन दो. (६)
सूक्त—२८ देवता—अग्नि
समिद्धो अग्निर्दिवि शोचिरश्रेत्प्रत्यङ्ङुषसमुर्विया वि भाति.
एति प्राची विश्ववारा नमोभिर्देवाँ ईळाना हविषा घृताची.. (१)
प्रज्वलित अग्नि दीप्तियुक्त आकाश में तेज फैलाते हैं एवं उषाकाल में विस्तृत होकर
शोभा पाते हैं. स्तोत्रों द्वारा इंद्र आदि की प्रशंसा करती हुई, पुरोडाश आदि से युक्त स्रुच लेकर
विश्ववारा पूर्वाभिमुख जाती हैं. (१)
समिध्यमानो अमृतस्य राजसि हविष्कृण्वन्तं सचसे स्वस्तये.
विश्वं स धत्ते द्रविणं यमिन्वस्यातिथ्यमग्ने नि च धत्त इत्पुरः.. (२)

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हे अग्नि! तुम प्रज्वलित होकर जल पर अधिकार करते हो एवं हव्यदाता यजमान के
मंगल के लिए रक्षा करते हो. तुम जिस यजमान के पास जाते हो, वह सभी प्रकार की संपत्ति
धारण करता है. वह तुम्हारे सामने तुम्हारे सत्कार योग्य हव्य को रखता है. (२)
अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु.
सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि.. (३)
हे अग्नि! हमें शोभन धन वाला बनाने के लिए हमारे शत्रुओं का नाश करो. तुम्हारा तेज
उत्कृष्ट हो. तुम हम पति-पत्नी के संबंधों को नियमित एवं हमारे शत्रुओं के तेज को नष्ट करो.
(३)
समिद्धस्य प्रमहसोऽग्ने वन्दे तव श्रियम्.
वृषभो द्युमन्वाँ असि समध्वरेष्विध्यसे.. (४)
हे प्रज्वलित एवं परम तेजस्वी अग्नि! हम यजमान तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम कामवर्षी
एवं धनवान् हो तथा यज्ञों में भली प्रकार प्रज्वलित होते हो. (४)
समिद्धो अग्न आहुत देवान्यक्षि स्वध्वर.
त्वं हि हव्यवाळसि.. (५)
हे यजमानों द्वारा बुलाए गए एवं शोभन यज्ञ से युक्त अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित
होकर इंद्रादि देवों का हवन करो. तुम हव्य वहन करने वाले हो. (५)
आ जुहोता दुवस्यताग्निं प्रत्यत्यध्वरे. वृणीध्वं हव्यवाहनम्.. (६)
हे ऋत्विजो! तुम हमारा यज्ञ आरंभ होने पर हव्य ढोने वाले अग्नि में हवन करो, उनकी
सेवा करो, उन्हें प्राप्त करो एवं अपना हव्य देवों के समीप पहुंचाने के लिए उन्हें वरण करो.
(६)
सूक्त—२९          देवता—इंद्र एवं उशना
त्र्यर्थमा मनुषो देवताता त्री रोचना दिव्या धारयन्त.
अर्चन्ति त्वा मरुतः पूतदक्षास्त्वमेषामृषिरिन्द्रासि धीरः.. (१)
मनु के यज्ञ के तीन तेजों एवं अंतरिक्ष में होने वाले तीन प्रकाशयुक्तों को मरुतों ने धारण
किया है. हे इंद्र! पवित्र-शक्ति वाले मरुत् तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे धीर इंद्र! तुम इन्हें देखने
वाले हो. (१)
अनु यदीं मरुतो मन्दसानमार्चन्निन्द्रं पपिवांसं सुतस्य.
आदत्त वज्रमभि यदहिं हन्नपो यह्वीरसृजत्सर्तवा उ.. (२)
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जब मरुतों ने निचोड़े हुए सोमरस को पीकर प्रसन्न इंद्र की स्तुति की, तब इंद्र ने वज्र
उठाया, शत्रु का नाश किया एवं वृत्र द्वारा रोकी गई विशाल जलराशि को बहने के लिए
छोड़ा. (२)
उत ब्रह्माणो मरुतो मे अस्येन्द्रः सोमस्य सुषुतस्य पेयाः.
तद्धि हव्यं मनुषे गा अविन्ददहन्नहिं पपिवाँ इन्द्रो अस्य.. (३)
हे महान् मरुतो! तुम इंद्र के साथ मिलकर इस भली प्रकार निचोड़े गए सोम को पिओ.
इसी हव्य ने यजमान को गाएं दिलाई हैं एवं इसी को पीकर इंद्र ने अहि को मारा था. (३)
आद्रोदसी वितरं वि ष्कभायत्संविव्यानश्चिद्वियसे मृगं कः.
जिगर्तिमिन्द्रो अपजगृराणः प्रति श्वसन्तमव दानवं हन्.. (४)
इंद्र ने सोमरस पीने के बाद ही विस्तृत धरती-आकाश को स्तंभित किया था एवं
गतिशील बनकर हिरन के समान भागते हुए वृत्र को डराया था. इंद्र ने छिपे हुए एवं सांस लेते
हुए वृत्र को आच्छादनरहित करके मारा. (४)
अध क्रत्वा मघवन्तुभ्यं देवा अनु विश्वे अददुः सोमपेयम्.
यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरः सतीरुपरा एतशे कः.. (५)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे इस कार्य के बदले सभी देवों ने तुम्हें पीने के लिए सोम दिया
था. तुमने एतश ऋषि के कल्याण के लिए सामने से आते हुए सूर्य के घोड़ों को रोक दिया
था. (५)
नव यदस्य नवतिं च भोगानत्साकं वज्रेण मघवा विवृश्चत्.
अर्चन्तीन्द्रं मरुतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम्.. (६)
जब धन के स्वामी इंद्र ने शंबर के निन्यानवे नगरों को वज्र द्वारा एक साथ नष्ट कर दिया
था, तब मरुतों ने युद्धभूमि में ही त्रिष्टुप् छंद द्वारा इंद्र की स्तुति की थी. इंद्र ने मरुतों की स्तुति
से शक्तिशाली बनकर शंबर को बाधा पहुंचाई. (६)
सखा सख्ये अपचत्तूयमग्निरस्य क्रत्वा महिषा त्री शतानि.
त्री साकमिन्द्रो मनुषः सरांसि सुतं पिबद्वृत्रहत्याय सोमम्.. (७)
अग्नि ने अपने मित्र इंद्र के लिए शीघ्र ही तीन सौ भैंसों को पकाया था. इंद्र ने वृत्र को
मारने के लिए मनु के तीन पात्रों में भरे हुए सोम को एक साथ पी लिया था. (७)
त्री यच्छता महिषाणामघो मास्त्री सरांसि मघवा सोम्यापाः.
कारं न विश्वे अह्वन्त देवा भरमिन्द्राय यदहिं जघान.. (८)
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हे धनस्वामी इंद्र! जब तुमने तीन सौ भैंसों का मांस खाया, सोमरस से भरे तीन पात्रों
को पिया एवं वृत्र को मारा, तब सब देवों ने सोमपान से पूर्ण तृप्त इंद्र को उसी प्रकार बुलाया,
जिस प्रकार मालिक अपने दास को बुलाता है. (८)
उशना यत्सहस्यै३रयातं गृहमिन्द्र जूजुवानेभिरश्वैः.
वन्वानो अत्र सरथं ययाथ कुत्सेन देवैरवनोर्ह शुष्णम्.. (९)
हे इंद्र! जब तुम और उशना कवि सबको पराजित करने वाले एवं शीघ्र चलने वाले
घोड़ों के द्वारा कुत्स ऋषि के घर गए थे, उस समय तुम शत्रुओं की हिंसा करते हुए समस्त
देवों एवं कुत्स के साथ एक रथ पर बैठकर चले थे. तुमने शुष्ण असुर को मारा था. (९)
प्रान्यच्चक्रमवृहः सूर्यस्य कुत्सायान्धद्विरिवो यातवेऽकः.
अनासो दस्यूँरमृणो वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचः.. (१०)
हे इंद्र! तुमने सूर्य के रथ के एक पहिए को पहले ही अलग कर दिया था एवं दूसरा
पहिया कुत्स को इसलिए दे दिया था कि वह धन पा सके. तुमने शब्द न करने वाले दस्युओं
को संग्राम में वज्र द्वारा वाणीरहित करके मारा था. (१०)
स्तोमासस्त्वा गौरिवीतेरवर्धन्नरन्धयो वैदथिनाय पिप्रुम्.
आ त्वामृजिश्व्रा सख्याय चक्रे पचन्पक्तीरपिबः सोममस्य.. (११)
हे इंद्र! गौरिवीति ऋषि के स्तोत्र तुम्हें बढ़ावें. तुमने विदथिन के पुत्र ऋजिश्व्रा के कल्याण
के निमित्त पिप्रु नामक असुर को अपने वश में किया था. ऋजिश्व्रा ने तुम्हारी मित्रता पाने के
लिए पुरोडाश पकाकर तुम्हारे सामने रखा था एवं तुमने उसका सोमरस पिया था. (११)
नवग्वासः सुतसोमास इन्द्रं दशग्वासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
गव्यं चिदूर्वमपिधानवन्तं तं चिन्नरः शशमाना अप व्रन्.. (१२)
नौ एवं दस महीनों तक चलने वाले यज्ञों के कर्त्ता अंगिरावंशीय ऋषियों ने सोम
निचोड़कर स्तुतियों द्वारा इंद्र की पूजा की थी. स्तुति करते हुए अंगिरावंशीय ऋषियों ने असुरों
द्वारा छिपाए हुए गोसमूह को छुटकारा दिलाया था. (१२)
कथो नु ते परि चराणि विद्वान्वीर्या मघवन्त्या चक्रर्थ.
या चो नु नव्या कृणवः शविष्ठ प्रेदु ता ते विदथेषु ब्रवाम.. (१३)
हे धनस्वामी इंद्र! तुमने जो पराक्रम प्रकट किया था, उसे जानते हुए भी हम तुम्हारे
सामने किस प्रकार प्रकट करें? हे शक्तिशाली इंद्र! तुम जो भी नया पराक्रम दिखाओगे, हम
यज्ञों में उसका वर्णन करेंगे. (१३)
एता विश्वा चकृवाँ इन्द्र भूर्यपरीतो जनुषा वीर्येण.
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या चिन्नु वज्रिन्कृणवो दधृष्वान्न ते वर्ता तविष्या अस्ति तस्याः.. (१४)
हे शत्रुओं द्वारा अपराजित इंद्र! तुमने अपनी निजी शक्ति द्वारा इन अनेक लोकों को
बनाया है. हे वज्रधारी इंद्र! शत्रुओं को शीघ्र पराजित करते हुए तुम जो कुछ करोगे, तुम्हारे
उस कार्य को कोई अधिक नहीं कर सकता. (१४)
इन्द्र ब्रह्म क्रियमाणा जुषस्व या ते शविष्ठ नव्या अकर्म.
वसेव भद्रा सुकृता वस्यू रथं न धीरः स्वपा अतक्षम्.. (१५)
हे सर्वाधिक बलवान् इंद्र! तुम्हारे निमित्त हमने जो नए स्तोत्र बनाए हैं, उन्हें तुम स्वीकार
करो. बुद्धिमान्, शोभन-कर्म करने वाले एवं धन के इच्छुक हम लोगों ने ये स्तोत्र रथ एवं
कपड़ों के समान तुम्हें अर्पण किए हैं. (१५)
सूक्त—३० देवता—इंद्र एवं ऋणंचय
क्व१स्य वीरः को अपश्यदिन्द्रं सुखरथमीयमानं हरिभ्याम्.
यो राया वज्री सुतसोममिच्छन्तदोको गन्ता पुरुहूत ऊती.. (१)
वज्रधारी एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र धन के साथ-साथ सोमरस निचोड़ने वाले
यजमान की अभिलाषा पूर्ण करते हुए यजमान की रक्षा करने के निमित्त उसके घर में चले
जाते हैं. वे वीर इंद्र कहां हैं? हरि नामक घोड़ों द्वारा खींचे जाते हुए सुखदायक रथ पर बैठकर
चलने वाले इंद्र को किसने देखा है? (१)
अवाचचक्षं पदमस्य सस्वरुग्रं निधातुरन्वायमिच्छन्.
अपृच्छमन्याँ उत ते म आहुरिन्द्रं नरो बुबुधाना अशेम.. (२)
हमने इंद्र के छिपे हुए एवं भयानक स्थानों को देखा है. हम ढूंढ़ते हुए अपनी स्थापना
करने वाले इंद्र के उस स्थान में गए हैं. हमने दूसरे विद्वानों से इंद्र के विषय में पूछा है. उन
नेताओं एवं ज्ञानियों ने कहा कि हमने इंद्र को प्राप्त कर लिया है. (२)
प्र नु वयं सुते या ते कृतानीन्द्र ब्रवाम यानि नो जुजोषः.
वेददविद्वाञ्छृणवच्च विद्वान्वहतेऽयं मघवा सर्वसेनः.. (३)
हे इंद्र! तुमने जो कर्म किए हैं, हम स्तोतागण सोम निचोड़ जाने पर उनका उत्तम वर्णन
करते हैं. तुमने भी हमारे जिन कर्मों को स्वीकार किया है, उन्हें न जानने वाले लोग जान लें.
जानने वाले लोग उन्हें न जानने वालों को सुनावें. धनस्वामी एवं ज्ञानी इंद्र अपनी सभी
सेनाओं सहित जानने वाले एवं सुनाने वालों के समीप जावें. (३)
स्थिरं मनश्चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयसश्चित्.

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अश्मानं चिच्छवसा दिद्युतो वि विदो गवामूर्वमुस्रियाणाम्.. (४)
हे इंद्र! तुमने जन्म लेते ही अपना मन स्थिर किया एवं अकेले ही अनगिनत राक्षसों से
युद्ध करने के लिए चल पड़े. तुमने अपनी शक्ति द्वारा गायों को छिपाने वाले पर्वत को तोड़
डाला था एवं दुधारू गायों को पाया था. (४)
परो यत्त्वं परम आजनिष्ठाः परावति श्रुत्यं नाम बिभ्रत्.
अतश्चिदिन्द्रादभयन्त देवा विश्वा अपो अजयद्दासपत्नीः.. (५)
हे सर्वोच्च एवं सर्वोत्कृष्ट इंद्र! तुमने दूरदूर तक प्रसिद्ध नाम को धारण करते हुए जन्म
लिया था. उस समय सभी देव तुमसे डर गए थे एवं तुमने वृत्र द्वारा रोके गए समस्त जलों को
जीत लिया था. (५)
तुभ्येदेते मरुतः सुशेवा अर्चन्त्यर्कं सुन्वन्त्यन्धः.
अहिमोहानमप आशयानं प्र मायाभिर्मायिनं सक्षदिन्द्रः.. (६)
हे इंद्र! ये उत्तम सुख देने वाले स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करते हैं एवं तुम्हें
पिलाने के लिए अन्नरूपी सोम निचोड़ते हैं. इंद्र ने अपनी शक्तियों द्वारा देवों को बाधा पहुंचाने
वाले एवं जलसमूह को रोककर सोए हुए मायावी वृत्र राक्षस को हराया था. (६)
वि षू मृधो जनुषा दानमिन्वन्नहन्रगावा मघवन्त्सञ्चकानः.
अत्रा दासस्य नमुचेः शिरो यद्वर्तयो मनवे गातुमिच्छन्.. (७)
हे धनस्वामी इंद्र! हमारी स्तुति सुनकर तुमने देवों को बाधा पहुंचाने वाले वृत्र को वज्र से
मारते हुए जन्म से ही उसके अनुचर राक्षस आदि की हिंसा की थी. हे इंद्र! इस युद्ध में तुम
मुझ मनु को सुख देने की इच्छा से नमुचि नामक दास का सिर तोड़ दो. (७)
युजं हि मामकृथा आदिदिन्द्र शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन्.
अश्मानं चित्स्वर्यं१ वर्तमानं प्र चक्रियेव रोदसी मरुद्भ्यः.. (८)
हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने गर्जन करने वाले एवं घूमते हुए बादल को नष्ट किया था, उसी
प्रकार नमुचि नामक दास का सिर तोड़कर उसी समय हमारे साथ मित्रता की थी. उस समय
मरुतों के भय से धरती और आकाश पहिए की तरह घूमने लगे थे. (८)
स्त्रियो हि दास आयुधानि चक्रे किं मा करन्नबला अस्य सेनाः.
अन्तर्ह्यख्यदुभे अस्य धेने अथोप प्रैद्युधये दस्युमिन्द्रः.. (९)
नमुचि नामक दास ने स्त्रियों को अपने युद्ध का साधन बनाया. इसकी सारी सेना मेरा
क्या कर सकती है? यह सोचते हुए इंद्र ने उनके बीच से उसकी प्यारी दो सुंदरियों को अपने
घर में रख लिया एवं नमुचि से लड़ने के लिए चल दिए. (९)
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समत्र गावोऽभितोऽनवन्तेहेह वत्सैर्वियुता यदासन्.
सं ता इन्द्रो असृजदस्य शाकैर्यदीं सोमासः सुषुता अमन्दन्.. (१०)
नमुचि द्वारा चुराई गई गाएं अपने बछड़ों से बिछुड़ जाने पर इधर-उधर भटक रही थीं.
वभ्रु ऋषि द्वारा निचोड़े गए सोमरस ने इंद्र को प्रसन्न किया, तब इंद्र ने शक्तिशाली मरुतों के
साथ मिलकर वभ्रु की गायों को बिछुड़े हुए बछड़ों से मिला दिया था. (१०)
यदीं सोमा बभ्रुधूता अमन्दन्नरोरवीद्वृषभः सादनेषु.
पुरन्दरः पपिवाँ इन्द्रो अस्य पुनर्गवामददादुस्रियाणाम्.. (११)
जब वभ्रु द्वारा निचोड़े गए सोमरस ने इंद्र को प्रसन्न किया था, तब कामवर्षी इंद्र ने युद्ध
में अधिक शब्द किया था. पुरंदर इंद्र ने सोमरस पिया एवं वभ्रु की दुधारू गाएं उन्हें वापस
दिलवा दीं. (११)
भद्रमिदं रुशमा अग्ने अक्रन्गवां चत्वारि ददतः सहस्रा.
ऋणञ्चयस्य प्रयता मघानि प्रत्यग्रभीष्म नृतमस्य नृणाम्.. (१२)
हे अग्नि! ऋणंचय राजा के सेवकों ने, जो रुशम देश के निवासी थे, मुझे चार हजार
गाएं देकर भला काम किया था. सर्वश्रेष्ठ नेता ऋणंचय द्वारा दिए गए गोरूप धन को मैंने
स्वीकार किया था. (१२)
सुपेशसं माव सृजन्त्यस्तं गवां सहस्रै रुशमानो अग्ने.
तीव्रा इन्द्रमममन्दुः सुतासोऽक्तोर्व्युष्टौ परितक्म्यायाः.. (१३)
हे अग्नि! रुशम देश की प्रजाओं ने मुझे अलंकार, वस्त्रादि से सुशोभित करके हजारों
गाएं दी थीं. रात बीतने पर अर्थात् प्रातः निचोड़े हुए सोमरस ने इंद्र को प्रसन्न किया. (१३)
औच्छत्सा रात्री परितक्म्या याँ ऋणञ्चये राजनि रुशमानाम्.
अत्यो न वाजी रघुरज्यमानो बभ्रुश्चत्वार्यसनत्सहस्रा.. (१४)
रुशम देश के राजा ऋणंचय के समीप ही मेरी वह गतिशील रात बीत गई थी. वेगवान्
घोड़े के सामन शीघ्रतापूर्वक आने वाले वभ्रु ऋषि ने चार हजार गाएं प्राप्त की थीं. (१४)
चतुःसहस्रं गव्यस्य पश्वः प्रत्यग्रभीष्म रुशमेष्वग्ने.
घर्मश्चित्तप्तः प्रवृजे य आसीदयस्मयस्तम्वादाम विप्राः.. (१५)
हे अग्नि! हमने रुशम देश की प्रजाओं से चार हजार गाएं प्राप्त की थीं. उनके पास
महावीर के समान सोने का जो उत्तम वर्ण कलश यज्ञ के काम आने के लिए था, उसे हमने
गायों का दूध काढ़ने के लिए ले लिया. (१५)
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