ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइसीलिए यज्ञों में तुम्हारी सेवा करते हुए यजमान देवों को बुलाने हेतु तुम्हारी सेवा करते हैं.
(३)
देवं वो देवयज्ययाग्निमीळीत मर्त्यः.
समिद्धः शुक्र दीदिह्यतस्य योनिमासदः ससस्य योनिमासदः.. (४)
हे दीप्तिशाली अग्नि! यजमान देवयज्ञ के निमित्त तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे ज्वालायुक्त
अग्नि! तुम हवि से समृद्ध होकर चमको. मुझ सस ऋषि के यज्ञस्थान में तुम ठहरो. (४)
सूक्त—२२ देवता—अग्नि
प्र विश्वसामन्नत्रिवदर्चा पावकशोचिषे. यो अध्वरेष्वीड्यो होता मन्द्रतमो विशि.. (१)
हे विश्वसामा ऋषि! तुम अत्रि ऋषि के समान पवित्र प्रकाश वाले अग्नि की पूजा करो.
वे यज्ञों में सभी ऋत्विजों द्वारा स्तुत्य, देवों को बुलाने वाले एवं मानवों में सबसे अधिक पूज्य
हैं. (१)
न्य१ग्निं जातवेदसं दधाता देवमृत्विजम्. प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः.. (२)
हे यजमानो! तुम जातवेद, द्युतिमान एवं ऋतु अनुसार यज्ञ करने वाले अग्नि को धारण
करो. देवों को अतिशय प्रिय व यज्ञ-साधन के रूप में हमारे द्वारा दिया गया हवि आज अग्नि
को प्राप्त हो. (२)
चिकित्विमनसं त्वा देवं मर्तास ऊतये. वरेण्यस्य तेऽवस इयानासो अमन्महि.. (३)
हे दीप्तिशाली एवं ज्ञानसंपन्न मन वाले अग्नि! तुम्हारे समीप जाते हुए हम मनुष्य तुझ
संभवनीय को तृप्त करने के लिए स्तुति करते हैं. (३)
अग्ने चिकिद्ध्या१स्य न इदं वचः सहस्य.
तं त्वा सुशिप्र दम्पते स्तोमैर्वर्धन्त्यत्रयो गीर्भिः शुम्भन्त्यत्रयः.. (४)
हे बलपुत्र अग्नि! हमारी इस सेवारूपी स्तुति को जानो. हे सुंदर नाक वाले एवं
गृहस्वामी अग्नि! अत्रि ऋषि के पुत्र तुम्हें स्तुतियों द्वारा वर्द्धित एवं वचनों से अलंकृत करते
हैं. (४)
सूक्त—२३ देवता—अग्नि
अग्ने सहन्तमा भर द्युम्नस्य प्रासहा रयिम्.
विश्वा यश्चर्षणीरभ्या३सा वाजेषु सासह्.. (१)
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