ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयजमानाय सुन्वत आग्ने सुवीर्यं वह.
देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (५)
हे अग्नि! तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को शोभन बल प्रदान करो एवं देवों के
साथ कुशों पर बैठो. (५)
समिधानः सहस्रजिदग्ने धर्माणि पुष्यसि.
देवानां दूत उक्थ्यः.. (६)
हे हजारों को जीतने वाले अग्नि! तुम हवियों द्वारा प्रज्वलित, प्रशंसित एवं देवों के दूत
बनकर यज्ञकर्मों को बढ़ाते हो. (६)
न्य१ग्निं जातवेदसं होत्रवाहं यविष्ठ्यम्.
दधाता देवमृत्विजम्.. (७)
हे यजमानो! तुम जातवेद, यज्ञ को वहन करने वाले, अतिशय युवा, द्युतियुक्त एवं ऋतु
अनुसार यज्ञ करने वाले अग्नि को स्थापित करो. (७)
प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः. स्तृणीत बर्हिरासदे.. (८)
आज प्रकाशमान स्तोताओं द्वारा दिया गया हवि लगातार देवों के पास पहुंचे, हे
ऋत्विज्! तुम अग्नि के बैठने के लिए कुश बिछाओ. (८)
एदं मरुतो अश्विना मित्रः सीदन्तु वरुणः. देवासः सर्वया विशा.. (९)
मरुद्गण, अश्विनीकुमार, मित्र, वरुण आदि देव अपने सभी साथियों को लेकर इन
कुशों पर बैठें. (९)
सूक्त—२७ देवता—अग्नि
अनस्वन्ता सत्पतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुरो मघोनः.
त्रैवृष्णो अग्ने दशभिः सहस्रैर्वैश्वानर त्र्यरुणश्चिकेत.. (१)
हे सकल मानवों के नेता, साधुओं का पालन करने वाले, अतिशय ज्ञानसंपन्न, बलवान्
एवं धनस्वामी अग्नि! वृष्ण के पुत्र त्र्यरुण नामक राजर्षि ने गाड़ी सहित दो बैल एवं दस
हजार स्वर्ण मुद्राएं मुझे दीं. इस दान से वह प्रसिद्ध हो गया. (१)
यो मे शता च विंशतिं च गोनां हरी च युक्ता सुधुरा ददाति.
वैश्वानर सुष्टुतो वावृधानोऽग्ने यच्छ त्र्यरुणाय शर्म.. (२)