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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 797 of 1855

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Page 797

सूक्त—२० देवता—अग्नि
यमग्ने वाजसातम त्वं चिन्मन्यसे रयिम्.
तं नो गीर्भिः श्रवाय्यं देवत्रा पनया युजम्.. (१)
हे अन्नदाताओं में श्रेष्ठ अग्नि! हमारे द्वारा दिए गए जिस हव्य को तुम धन समझते हो,
उसी श्रवणीय एवं स्तुतियुक्त हव्यरूपी धन को देवों के समीप ले जाओ. (१)
ये अग्ने नेरयन्ति ते वृद्धा उग्रस्य शवसः. अप द्वेषो अप ह्वरोऽन्यव्रतस्य सश्चिरे.. (२)
हे अग्नि! जो पशु आदि धन से समृद्ध लोग तुम्हारे लिए हवि नहीं देते, वे अन्न से अत्यंत
हीन बनते हैं. तुम वेद-विरुद्ध कर्म करने वाले असुर का विरोध एवं हिंसा करो. (२)
होतारं त्वा वृणीमहेऽग्ने दक्षस्य साधनम्. यज्ञेषु पूर्व्यं गिरा प्रयस्वन्तो हवामहे.. (३)
हे देवों को बुलाने वाले एवं बल के साधक अग्नि! अन्न के स्वामी हम लोग तुम्हारा वरण
करते हैं एवं यज्ञों में श्रेष्ठ मानकर स्तुति-वचनों से तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. (३)
इत्था यथा त ऊतये सहसावन्दिवेदिवे.
राय ऋताय सुक्रतो गोभिः ष्याम सधमादो वीरैः स्याम सधमादः.. (४)
हे अग्नि! ऐसी कृपा करो, जिससे हम प्रतिदिन तुम्हारी रक्षा प्राप्त करें. हे शोभन यज्ञ के
स्वामी! ऐसा करो, जिससे हम धन पा सकें. यज्ञ कर सकें, गाएं पा सकें एवं पुत्र-पौत्रों के
साथ प्रसन्न हो सकें. (४)
सूक्त—२१ देवता—अग्नि
मनुष्वत्त्वा नि धीमहि मनुष्वत्समिधीमहि. अग्ने मनुष्वदङ्गिरो देवान्देवयते यज.. (१)
हे अग्नि! हम मनु के समान तुम्हें धारण एवं प्रज्वलित करते हैं. हे अंगारयुक्त अग्नि!
तुम देवों की कामना करने वाले यजमानों का यज्ञ करो. (१)
त्वं हि मानुषे जनेऽग्ने सुप्रीत इध्यसे. स्रुचस्त्वा यन्त्यानुषक्सुजात सर्पिरासुते.. (२)
हे अग्नि! तुम स्तोत्रों द्वारा प्रसन्न होकर मानवलोक में प्रज्वलित होते हो. हे सुजात एवं
घृतयुक्त अन्न के स्वामी अग्नि! हव्य से पूर्ण स्रुच तुम्हें सदा प्राप्त करता है. (२)
त्वां विश्वे सजोषसो देवासो दूतमक्रत. सपर्यन्तस्त्वा कवे यज्ञेषु देवमीळते.. (३)
हे क्रांतदर्शी अग्नि! सब देवों ने परस्पर प्रसन्न होकर, तुम्हें अपना दूत बनाया था.