पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५६० पञ्चदशी
वस्तुस्वभावमाश्रित्य व्यवस्था तूभयोः समा ।
अनुभूत्यनुसारेण कल्प्यते हि नियामकम् ॥१२॥
वस्तु का जैसा स्वभाव हो उसके अनुसार व्यवस्था मानना
तो दोनों ही पक्षों में समान है। क्योंकि नियामक की जब
कल्पना की जाती है तब वह अनुभव के अनुसार ही तो की
जाती है।
न घोरासु न मूढासु सुखानुभव ईक्ष्यते ।
शान्तास्वपि क्वचित् कश्चित् सुखानुभव ईक्ष्यताम् ॥१३॥
लोक में देखते हैं कि—घोर या मूढ अवस्थाओं में
सुखानुभव होता दीखता ही नहीं। इसी तरह अनुभव के अनु-
सार यह भी देख लो कि—शान्त वृत्तियों में भी सुखानुभव
होता है या नहीं ?
गृहक्षेत्रादिविषये यदा कामो भवेत् तदा ।
राजसस्यास्य कामस्य घोरत्वात् तत्र नो सुखम् ॥१४॥
घर या खेत आदि की कामना जब किसी पर सवार हो
जाती है तब फिर कामावस्था में उसे सुख हो ही नहीं सकता ।
क्योंकि वह राजस काम घोर होता है। [ वह सुख को
उद्भूत होने ही नहीं देता । ]
सिद्ध्येन्नवेत्यस्ति दुःखमसिद्धौ तद् विवर्धते ।
प्रतिबन्धे भवेत् क्रोधो द्वेषो वा प्रतिकूलतः ॥१५॥
यह मेरा काम सिद्ध होगा या नहीं ? यह विचार जब
आता है तब दुःख होने लगता है। जब काम सिद्ध नहीं होता
तब दुःख बढ़ने लगता है। जब कोई उस काम में प्रतिबन्ध