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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 726 में से

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पृष्ठ 470

१४८ पंचदशी
आस्तमेतद् यत्र यत्र सुखं स्याद् विषयैर्विना ।
तत्र सर्वत्र विद्ध्येतां ब्रह्मानन्दस्य वासनाम् ॥८५॥
इस सब को यहीं छोड़कर अब प्रकृत बात कहते हैं कि—
जहां जहां [ तूष्णींभाव आदि के समय ] विषयानुभव के बिना
भी सुख होता हो वहां सभी जगह इस ब्रह्मानन्द की वासना को
समझ लो ।
विषयेष्वपि लब्धेषु तदिच्छोपरमे सति ।
अन्तर्मुखमनोवृत्तावानन्दः प्रतिबिम्बति ॥८६॥
विषयों के मिल जाने पर भी जब उन विषयों की इच्छा
शान्त हो जाती और मन अन्तर्मुख होता है तब उस अन्तर्मुख
मन में इसी आनन्द का प्रतिबिम्ब पड़ा करता है । [ यही
'विषयानन्द' किंवा दुनियादारी का सुख कहाता है ]
ब्रह्मानन्दो वासना च प्रतिबिम्ब इति त्रयम् ।
अन्तरेण जगत्यस्मिन्नानन्दो नास्ति कश्चन ॥८७॥
'ब्रह्मानन्द' 'वासनानन्द' तथा 'विषयानन्द' इन तीन
आनन्दों के बिना जगत् में कोई आनन्द ही नहीं है ।
'ब्रह्मानन्द' वह है जो सुषुप्ति में स्वप्रकाशरूप से भासा
करता है । 'वासनानन्द' वह है जो कि चुप बैठने पर विषयानु-
भव के बिना ही प्रतीत हुआ करता है। अभिलषित विषय
के मिलने पर जब कि मन अन्तर्मुख हो जाया करता है तब
जो उसमें आत्मानन्द का प्रतिबिम्ब हो जाता है वह तो
'विषयानन्द' कहाता है ।
शंका—इसी प्रकरण के ११ वें श्लोक में “आनन्दस्त्रिविधो 'ब्रह्मा-
नन्दो' 'विद्यासुखं' तथा 'विषयानन्दः” इस प्रकार तीन तरह का आनन्द