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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 726 में से

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पृष्ठ 551

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२९
असाधारण आकार ओषध्यन्नवपुष्यपि ।
एवं विभाव्यं मनसा तत्तद्रूपं यथोचितम् ॥७७॥
ओषधि अन्न तथा शरीरों में भी उन उन का असाधारण
आकार होता ही है । उन उन के उचित रूप को अपने मन से
समझ लेना चाहिये ।
अनेकधा विभिन्नेषु नामरूपेषु चैकधा ।
तिष्ठन्ति सच्चिदानन्दा विसंवादो न कस्यचित् ॥७८॥
सब वस्तुओं में नाम रूप तो भिन्न भिन्न होते ही हैं परन्तु
सच्चिदानन्द नाम के धर्म सब में एक रूप ही होते हैं । इसमें
किसी भी विवेकी को विसंवाद नहीं है ।
निस्तत्वे नामरूपे द्वे जन्मनाशयुते च ते ।
बुद्ध्या ब्रह्मणि वीक्षस्व समुद्रे बुद्बुदादिवत् ॥७९॥
इन दीख पड़ने वाले नामरूपों की गति हमसे पूछो तो हम
कहेंगे कि—ये दोनों नाम रूप तो 'निस्तत्व' किंवा कल्पित ही
हैं । क्योंकि इनके जन्म और नाश [वार बार] होते ही रहते
हैं । समुद्र में जैसे बुलबुलों को देखते हो, इसी प्रकार इन नाम
रूपों को बुद्धि के सहारे ब्रह्मतत्व में ही देखा करो ।
सच्चिदानन्दरूपेऽस्मिन् पूर्णे ब्रह्मणि वीक्षिते ।
स्वयमेवावजानाति नामरूपे शनैः शनैः ॥८०॥
जब कोई अधिकारी इस पूर्ण सचिदानन्द ब्रह्म को बुद्धि
से देख पाता है [ बुद्धि का उड़ान मारकर सब जगह देख
आता है ] तब फिर वह धीरे धीरे नाम रूपों की अवज्ञा करने
लग पड़ता है [ उसे फिर यह सब पसारा नहीं भाता किन्तु उसे
तो कारण तत्व ही प्यारा लगने लगता है ।]
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