पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०३
खाकर मर जाता है] अन्त में भी आनन्द में ही लीन हो जाता
है । जब श्रुति स्वयं यह बात कह रही है तो यह जगत् अपने
कारण उक्त आनन्द से पृथक् कैसे है ? तुम्हीं बताओ ।
कुलालाद् घट उत्पन्नो भिन्नश्चेति न शङ्क्यताम् ।
मृद्वदेव उपादानं, निमित्तं न कुलालवत् ॥४॥
कुम्हार से घट उत्पन्न हुआ है और वह उससे भिन्न भी
है, ऐसी शंका न करो। क्योंकि यह आत्मानन्द तो, मिट्टी जैसे
घड़े का उपादान कारण होती है इसी प्रकार, इस जगत् का
उपादान कारण है । यह कुम्हार की तरह का केवल निमित्त
कारण नहीं है । [ यह तो जाले का मकड़ी की तरह निमित्त
भी है और उपादान भी है । ]
स्थितिर्लयश्च कुम्भस्य कुलाले स्तो न हि क्वचित् ।
दृष्टौ तौ मृदि, तद्वत् स्यादुपादानं तयोः श्रुतेः ॥५॥
कुम्भ की स्थिति और कुम्भ का लय, कुम्हार में कभी नहीं
होते [इस कारण कुम्हार उसका उपादान नहीं होता] घड़े की
स्थिति और घड़े का लय उसके उपादान मिट्टी में ही होते हुए
प्रत्यक्ष देखे गये हैं। ठीक उसी तरह जगत् का उपादान आनन्द
ही है । श्रुति ने स्वयं अपने मुख से जगत् की स्थिति और
जगत् के लय को आनन्द में होता हुआ माना है ।
उपादानं त्रिधा भिन्नं विवर्ति, परिणामि च ।
आरम्भकं च, तत्रान्त्यौ न निरंशेऽवकाशिनी ॥६॥
उपादान तीन प्रकार का होता है—एक 'विवर्ती' दूसरा
'परिणामी' तीसरा 'आरम्भक' । इनमें से 'आरम्भ' और
'परिणाम' ये दोनों ही पक्ष निरवयव वस्तु में लागू नहीं हो सकते ।