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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१

[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१

में से निकल बाहर होना जान जाते हैं] किंवा बुद्ध से उन
[पांचों कोशों] को अनात्मा समझ लेते हैं, तब इन कोशों का
साक्षी जो बोध शेष रह जाता है, वह साक्षिरूपी बोध ही तो
'निज रूप' अथवा 'ब्रह्म' है । उस साक्षिरूपी बोध को शून्य
[अर्थात् कुछ नहीं] कह देना हँसी खेल नहीं है । यह एक
बड़ा ही दुर्घट काम है ।
अस्ति तावत् स्वयं नाम विवादाविषयत्वतः ।
स्वस्मिन्नपि विवादश्चेत् प्रतिवाद्यत्र को भवेत् ॥२३॥
स्वयं [अपना आपा] नाम की कोई चीज तो, क्या लौकिक
और क्या वैदिक सभी के मत में है ही । क्योंकि वह कभी
विवाद का विषय ही नहीं होती है । अपने आपे में कभी
किसी को विप्रतिपत्ति नहीं होती कि मैं हूँ या नहीं हूँ ? यदि
किसी को अपने आपे में भी विप्रतिपत्ति होती हो, तो बताओ
कि इस विप्रतिपत्ति का प्रतिवादी कौन होगा ?
स्वासत्त्वं तु न कस्मैचिद्रोचते विभ्रमं विना ।
अतएव श्रुतिर्बाधं ब्रूते चासत्त्ववादिनः ॥२४॥
भ्रान्ति [पागलपन] को छोड़कर और किसी भी दशा में
अपना अभाव किसी को भी अच्छा नहीं लग सकता । यही
कारण है कि अगले श्लोक में उद्धृत श्रुति असत्त्ववादी का
बाध कह रही है ।
असद्ब्रह्मेति चेद्वेद स्वयमेव भवेदसत् ।
अतोऽस्य मा भूद्बोध्यत्वं स्वसत्त्वं त्वभ्युपेयताम् ॥२५॥
यदि कोई यह समझता है कि 'ब्रह्म असत् है' तो वह
[ ब्रह्म को असत् जानने वाला ] स्वयं भी असत् ही हो जाता

८२ पंचदशी

है [ क्योंकि वह स्वयं भी तो ब्रह्मरूप ही है। उसके 'ब्रह्म नहीं
है' इसे कहने का यही अभिप्राय होता है कि मैं स्वयं ही नहीं
हूँ।] इसलिये यह वेद्य तत्व भले ही न हो परन्तु अपनी सत्ता
तो तुम्हें मान ही लेनी चाहिये [ कि तुम्हीं ब्रह्म हो ] ।
कीदृक्तर्हीति चेत्पृच्छेदीदृक्ता नास्ति तत्र हि ।
यदनीदृगतादृक् च तत् स्वरूपं विनिश्चिनु ॥२६॥
जब यह आत्मा वेद्य भी नहीं है तब फिर वह कैसा है ?
ऐसा एक प्रश्न स्वभाव से उठ सकता है। इसका उत्तर यह है
कि उस आत्म तत्व में 'ईदृक्ता' अर्थात् 'ऐसापन' तो है ही
नहीं। [ यदि उसमें 'ऐसापन, मान लेंगे तो फिर उसे वेद्य
होने से कौन रोक सकेगा ? ] जो ऐसा भी नहीं और वैसा
भी नहीं उसी को आत्मा का [अपना] स्वरूप समझ लो ।
अक्षाणां विषयस्त्वीदृक् परोक्षस्तादृगुच्यते ।
विषयी नाक्षविषय स्वत्वान्नास्य परोक्षता ॥२७॥
जिसको इन्द्रियाँ विषय करती हैं, उसे तो 'ईदृक्' कहा
जाता है। जो तो परोक्ष अर्थात् इन्द्रियों की गति से बाहर
रह जाता है, उसे 'तादृक्' कहते हैं। विषयी अर्थात् ज्ञाता या
द्रष्टा आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं होता [इससे वह 'ईदृक्'
अर्थात् 'ऐसा' नहीं कहाता है ] तथा स्वयं वही होने से वह
परोक्ष भी नहीं होता, [ इससे उसे 'तादृक्' अर्थात् 'वैसा'
कहते भी नहीं बनता । इसी कारण से पहले श्लोक में आत्मा
के 'ऐसा' 'वैसा' होने का निषेध किया है । ]
अवेद्योप्यपरोक्षोतः स्वप्रकाशो भवत्ययम् ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं चेत्यस्तीह ब्रह्मलक्षणम् ॥२८॥