पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१
स्वस्मिन् मृतेऽपि पुत्रादिर्जीवेद् वित्तादिना यथा ।
तथैव यत्नं कुरुते मुख्याः पुत्रादयस्ततः ॥३८॥
देखा जाता है कि-अपने मर जाने पर भी पुत्र पत्नी
आदि, क्षेत्र आदि सम्पत्ति के द्वारा जैसे जीते रहें, वैसा यत्न
यह प्राणी किया करता है। इससे यही सिद्ध होता है कि-
पुत्र भार्या आदि ही मुख्य हैं [क्योंकि अपना प्रयास सह सह-
कर भी पुत्रादि के जीवन का उपाय किया जाता है, इसी से
समझते हैं कि पुत्रादि ही प्रधान हैं।]
बाढमेतावता नात्मा शेषो भवति कस्यचित् ।
गौणमिथ्यामुख्यभेदैरात्मायं भवति त्रिधा ॥३९॥
इसका समाधान यह है कि-उक्त रीति से कहीं कहीं
पुत्रादि मुख्य तो होते हैं। परन्तु केवल इतनी सी बात से यह
आत्मा किसी का शेष नहीं बन जाता। गौण, मिथ्या तथा
मुख्य ये तीन भेद आत्मा के होते हैं। [सो जिस जिस व्यव-
हार में, जिस जिस तरह की आत्मता विवक्षित होती है,
उस-उस व्यवहार में उस-उस आत्मा की प्रधानता मानी
जाती है।]
देवदत्तस्तु सिंहोऽयमित्यैक्यं गौणमेतयोः ।
भेदस्य भासमानत्वात् पुत्रादेरात्मता तथा ॥४०॥
'यह देवदत्त तो शेर है' ऐसा जब कोई कहता है तब शेर
तथा देवदत्त इन दोनों की जो एकता भासती है वह गौण है।
क्योंकि इन दोनों का भेद तो प्रत्यक्ष ही प्रतीत होता रहता है।
इसी प्रकार भेद के प्रत्यक्ष प्रतीत होते रहने के कारण पुत्रादि
भी गौण आत्मा माने जा सकते हैं। [ मुख्य नहीं ]
४८२ पञ्चदशी
भेदोस्ति पंचकोशेषु साक्षिणो न तु भात्यसौ ।
मिथ्यात्मताऽतः कोशानां स्थाणोश्चौरात्मता यथा ॥४१॥
आनन्दमयादि जो पांच कोष हैं, वे यद्यपि साक्षी से भिन्न
हैं, परन्तु यह भेद किसी को भी भासता नहीं है। इस कारण
इन कोशों को मिथ्या आत्मा कहा जाता है। जो स्थाणु वस्तुतः
चोर से भिन्न है उस स्थाणु की चोररूपता जैसे मिथ्या होती
है [ऐसे ही ये पांच कोष भी मिथ्या आत्मा कहा सकते हैं]
न भाति भेदो नाप्यस्ति साक्षिणोऽप्रतियोगिनः ।
सर्वान्तरत्वात् तस्यैव मुख्यमात्मत्वमिष्यते ॥४२॥
अप्रतियोगी होने के कारण, साक्षी का भेद न तो है ही
और न प्रतीत ही होता है। सर्वान्तर होने के कारण उस साक्षी
को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
पुत्र या देह आदि का प्रतियोगी जैसे स्वयं होता है इस
प्रकार स्वयं का कोई भी (सच्चा) प्रतियोगी नहीं होता, [क्योंकि
देहादि सभी पदार्थ आरोपित हैं] इस कारण साक्षीरूप इस
आत्मा का, पुत्रादि गौण आत्माओं की तरह, किसी से भी भेद
प्रतीत नहीं होता है और न देहादि मिथ्या आत्माओं की तरह
किसी से भेद है ही। देह या पुत्रादि जितने भी मिथ्या आत्मा
या गौण आत्मा हैं, उन सभी से आन्तर होने के कारण इस
साक्षी को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
सत्येवं व्यवहारेषु येषु यस्यात्मतोचिता ।
तेषु तस्यैव शेषित्वं सर्वस्यान्यस्य शेषता ॥४३॥
यों आत्मा के तीन प्रकार का होने पर भी जिन व्यवहारों
में जिसको आत्मा होना चाहिये, उन व्यवहारों में वही आत्मा