चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
About this granth
The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.
This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.
As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.
अ० ६ ] विमानस्थानम १३७
अ० ६ ] विमानस्थानम १३७
हेतु है । इसलिये समान-वात-पित्त-कफ प्रकृति के भी मनुष्य होते हैं । परन्तु
वातप्रकृति, पित्तप्रकृति, और कफप्रकृति के मनुष्य नहीं होते हैं । उस उस
दोष की अधिकता से मनुष्यों की २-वह दोष-प्रकृति कही जाती है । विकृत
(विषम ) हुए दोषों को 'प्रकृति' नहीं कहा जा सकता, ( क्योंकि दोषों की
समान अवस्था का नाम 'प्रकृति' है ) । इसलिये वातप्रकृति आदि प्रकृतियाँ
नहीं हैं । हां, वातल, पित्तल, और श्लेष्मल ( वात-बहुल, पित्त-बहुल, श्लेष्म-
बहुल ) मनुष्य हैं । इन को 'अप्रकृतिस्थ' (प्रकृति में न रहने वाले ) समझना
चाहिये, ये 'विकृतिस्थ' हैं ॥ ११ ॥
तेषां तु खलु चतुर्विधानां पुरुषाणां चत्वार्यनुप्रणिधानानि श्रेयस्क-
राणि । तत्र समसर्वधातूनां सर्वाकारसमं अधिकदोषाणां तु त्रयाणां
यथास्वं दोषाधिक्यमभिसमीक्ष्य दोषप्रतिकूलयोगीनित्रीण्यनुप्रणिधा-
नानि श्रेयस्कराणि भवन्ति यावदग्नेः समीभावात्, समेतु सममेव
कार्यम्, एवं चेष्टा भेषजप्रयोगांश्चापरे, तान् विस्तरेणानुव्याख्या-
स्यामः ॥ १२ ॥
इन चार प्रकार के ( सम प्रकृति, वात, पित्त, कफ एवं तीक्ष्ण, मन्द, विषम
और समाग्नि ) प्रकृति वाले पुरुषों को आगे कहे जाने वाले चार प्रकार के
अन्न-पान का सेवन करना हितकारी होता है । इन में सम सर्वधातु ( दोषों )
वाले पुरुषों को सब प्रकार का सेवन समान रूप में करना श्रेयस्कर है । शेष
अधिक दोषों वाले वातल, पित्तल, श्लेष्मल तीनों को उन २ के दोषों की अधि-
कता को देखकर दोष के प्रतिकूल वस्तुओं का तब तक सेवन करना चाहिये
जब तक अग्नि समान अवस्था में न आये । समान अवस्था में आने पर बन्द
कर सब का समान रूप में सेवन करना चाहिये । इसी प्रकार धातुओं को समान
करनेवाले अन्यान्य भेषज प्रयोग भी अभीष्ट हैं। उन का विस्तार से वर्णन करेंगे ॥
त्रयस्तु पुरुषा भवन्त्यातुराः, ते त्वनातुरास्तन्त्रान्तरीयाणां भिषजाम् ।
तद्यथा—वातलः पित्तलः श्लेष्मलश्चेति । तेषां विशेषविज्ञानं—वात-
लस्य वातनिमित्ताः, पित्तलस्य पित्तनिमित्ताः, श्लेष्मलस्य श्लेष्मनिमित्ता
व्याधयः प्रायेण बलवन्तश्च भवन्ति ॥ १३॥
वातल, पित्तल और श्लेष्मल ये तीन प्रकार के रोगी होते हैं । अन्य तन्त्र-
कर्त्ताओं के मत से ये रोगी नहीं हैं । यथा—वातल, पित्तल और श्लेष्मल ।
इन के मत में ये भी प्रकृतियां हैं । इस प्रकार से सात प्रकृतियां हैं । इन में
यह बात विशेषकर जानने योग्य है कि वातप्रकृति को वायुजन्य, पित्तल को पित्त-
जन्य और श्लेष्मल को कफजन्य रोग प्रायः और बलवान् रूप में होते हैं ॥१३॥
५३८ चरकसंहिता [ अ० ६
तत्र वातलस्य वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानस्य क्षिप्रं वातः प्रको-
मापद्यते, न तथेतरौ दोषौ । स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तैर्विकारैः
शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं-स्नेहस्वेदो
विधियुक्तौ, मृदूनि च संशोधनानि स्नेहोष्ण-मधुराम्ल-लवण-युक्तानि,
तद्द्रव्यव्यवहार्याण्युपनाहनपोवेष्टनोन्मर्दन-परिषेकावगाहन-संवाहनावपी-
डन-वित्रासन-विस्मापन-विस्मारणानि, सुरासवविधानं, स्नेहाश्चानेकयो-
नयो दीपनीय-पाचनीय-वातहर-विरेचनीयोपहिताः तथा शतपाकाः
सहस्रपाकाः सर्वशश्च प्रयोगार्था बस्तयः, बस्तिनियमः, सुखशीलता
चेति ॥ १४ ॥
इन में वातप्रकृति का मनुष्य जब वायु को प्रकुपित करने वाले कारणों
का सेवन करता है तब वायु शीघ्र प्रकुपित हो जाता है, शेष दोनों दोष पित्त
और कफ इतना शीघ्र कुपित नहीं होते । वायु प्रकुपित होकर पूर्वोक्त अस्सी
प्रकार के वात रोगों (विकारों) में बल, वर्ण, सुख और आयुष्य को नष्ट
करने के लिये शरीर को पीड़ित करता है। इस वायु को शान्त करने के लिये
स्नेह-विधि और स्वेद-विधि हैं । एवं मृदु (तीक्ष्ण नहीं) स्नेह, उष्ण, मधुर,
अम्ल, लवण युक्त संशोधन, मृदु, स्नेहन, उष्ण, मधुर, अम्ल, लवण से युक्त
शोधन द्रव्य और आहार-द्रव्य, उपनाह (वातहर द्रव्यों का बन्धन), उद्वेष्टन
(वेष्टन लपेटना), उन्मर्दन (हाथों से मालिश), परिषेक (वातहर क्वाथो से
परिसेचन), अवगाहन (वात हर क्वाथो में डुबकी), संवाहन (कोमलता से
हाथ फेरना), अवपीड़न (ताडन), वित्रासन (डराना), विस्मापन (विस्मय
उत्पन्न करना), विस्मारण (भुलाना), सुरा और आसव (वाष्णी यंत्र से
तैयार किया पदार्थ सुरा, न तैयार किया हुआ आसव) का देना, स्थावर और
जंगम योनि के स्नेहों को दीपनीय, पाचनीय और विरेचनीय औषधियों से
मिलाकर सौ बार या हज़ार बार (अर्थात् बार-बार) पकाये हुए स्नेह, सब
प्रकार की बस्ति विधि, (बहुन बार पकाये तेलों की बस्ति भो उपयुक्त है), और
निरन्तर सुखी जीवन व्यतीत करना उत्तम है ॥ १४ ॥
पित्तलस्यापि पित्तप्रकोपणोक्तान्यासेवमानस्य क्षिप्रं पित्तं प्रको-
पमापद्यते, तथा नेतरौ दोषौ । तदस्य प्रकोपमापन्नं यथोक्तैर्विकारैः
शरीरमुपतपति बल-वर्ण-सुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं-सर्पि-
ष्पानं, सर्पिषा च स्नेहनमधश्च दापहरणं, मधुर-तिक्त-कषाय-शीतानां
चौषधाभ्यवहार्याणामुपयोगो मृदु-मधुर-सुरभि-शीत-हृद्यानां गन्धानां
चोपसेवा, मुक्तामणिरहारावळीनां च परम-शिशिर-वारि-संस्थितानां धार-
णमुरसा क्षणे क्षणे चाम्रथ-चन्दन-प्रियङ्गु-कालीय-मृणाल-शीतवात-वारि-
भिरुत्पल-कुमुद-कोकनद-सोगन्धिक-पद्मानुगतैश्च वारिभिरभिप्रोक्षणं,
श्रुति-सुख-मृदुमधुर-मनोनुगानां च गीतवादित्राणां श्रवणं, श्रवणं चाभ्यु-
दयानां, सुहृद्भिश्च संयोगः, संयोगश्चेष्टाभिः स्त्रीभिः शीतोपहितांशुक्र-
स्रग्दामहारधारिणीभिनिशाकरांशु-शीतल-प्रवात-हर्म्यवासः, शैलान्तर-
पुलिन-शिशिरसदन-व्यजन-पवनानां सेवा, रम्याणां चोपवनानां
सेवा, सुख-शिशिर-सुरभि-मारुतोपवानानामुपसेवनं, सेवनं च नलि-
नोत्पल-पद्म-कुमुद-सौगन्धिक-पुण्डरीक-शतपत्र-रम्यतां सौम्यानां च
सर्वभावानामिति॥ १५॥
पित्त-प्रकृति का मनुष्य जब पित्त-प्रकोपक वस्तुओं का सेवन करता है उस
समय पित्त शीघ्र कुपित होजाता है, शेष अन्य दो धातु इतनी जल्दी कुपित
नहीं होते। तब इस पुरुष के पूर्वोक्त चालीस पित्तजन्य रोगों से शरीर आक्रान्त
हो जाता है, जिससे उसके बल, वर्ण, सुख और आयु का नाश होता है।
इस पित्त को शान्त करने के लिये घी का सेवन करना श्रेयस्कर है। शोधन के
लिये घी से स्नेहन (तेलादि से नहीं), अधोदपहरण अर्थात् विरेचन का देना,
मधुर, तिक्त, कषाय, और शीत ओषधियों से युक्त खान-पान का उपयोग, मृदु-
मधुर, सुगन्धित, शीतल और हृदय को प्रिय लगने वाले गन्धों (सुगन्धों)
का सेवन, अति ठण्डे पानी में रक्खे मोती, मणियों की मालाओं को छाती पर
धारण करना, थोड़ी देर में श्वेत चन्दन, प्रियंगु, कालीयक, (चन्दन का भेद)
मृणाल, शीतल वायु, शीतल पानी, उत्पल, कुमुद, कोकनद, सौगन्धिक और
पद्म (ये सब कमल के भेद हैं) इनसे हाथ-पांव धोना या छींटे डालना, कान
के लिये प्रिय, मृदु, मधुर एवं मन के अनुकूल गाना-बजाना सुनना, उत्सव
(नाच-रंग) आदि देखना, मित्रों से मिलना शीतल द्रव्यों से लिप्त वस्त्र,
माला, और हारों को धारण की हुई अभिलषित स्त्रियों से मिलना-जुलना,
चन्द्रमा की शीतल किरणों से शीतल खुली वायु मे, महल की छतों पर ठंडे,
पहाड़ों के बीच में, नदियों के तटों पर, ठंडे घरों (धारागृहों) में, ठण्डे
पंखों की शीतल वायु का सेवन, सुखस्पर्श, शिशिर, सुगन्धित वायु से युक्त
रम्य उपबनों का सेवन करना, पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्ड-
रीक, शतपत्र इन नाना प्रकार के कमलों से भरे तालाबों का सेवन और अन्य
सब सौम्य शीतल वस्तुओं का सेवन करना पित्त को शान्त करता है ॥ १५ ॥
श्लेष्मलस्यापि श्लेष्मप्रकोपणोकान्यासेवमानस्य क्षिप्रं श्लेष्मा
प्रकोपमापद्यते, न तथेतरौ दोषौ। स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तै-
५४० चरकसंहिता [ अ० ६
विकारैः शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं—
विधियुक्तानि तीक्ष्णोष्णानि संशोधनानि, रूक्षप्रायाणि चाभ्यवहा-
र्याणि कटु-तिक्त-कषायोपहितानि, तथैव धावन-लंघन-प्लवन-परिसरण-
जागरणानि युद्ध-व्यवाय-व्यायामोन्मर्दन-स्नानोत्साधनानि, विशेषत-
स्तीक्ष्णानां दीर्घकालस्थितानां मद्यानामुपयोगः, सधूमपानः सर्वशश्चो-
पवासः, तथोष्णवासः सुखप्रतिषेधश्च सुखार्थमेवेति ॥ १६ ॥
कफप्रकृति के मनुष्य का कफ प्रकोपक वस्तुओं को सेवन करने से शीघ्र
प्रकुपित हो जाता है, शेष अन्य दोनों धातु इतनी जल्दी कुपित नहीं होते ।
कुपित कफ पूर्वोक्त बीस प्रकार के कफ-रोगों से शरीर को पीड़ित करता है,
जिससे उसके बल, वर्ण सुख और आयु का ह्रास होता है । इस कफ को शमन
करने के लिये शास्त्रोक्त विधि से तीक्ष्ण-उष्ण संशोधन और संशमन, रूक्ष गुण-
वाले कटु, तिक्त, कषाय रस युक्त आहार-द्रव्य प्रयोग करने चाहियें । इसी
प्रकार भागना, उपवास (लंघन), प्लवन (कूदना या पानी में तैरना),
परिसरण (परिक्रमण, चारों ओर घूमना), रात्रि में जागना युद्ध व्यायाम
(शरीर को परिश्रम देने वाला कर्म, कुश्ती आदि), उन्मर्दन (रूक्ष मालिश),
स्नान, उत्सादन (उबटन लगाना), खासकर तीक्ष्ण और पुराने मद्य का
उपयोग, और धूमपान करना, सब प्रकार से उपवास, गरम वस्त्रों का उप-
योग, और सुख (आराम) का परित्याग, दुःख सहना, सुख प्राप्ति के लिये
सेवन करना चाहिये ॥१६॥
भवति चात्र—सर्व्ररोगविशेषज्ञः सर्वकार्यविशेषवित् ।
सर्वभेषजतत्त्वज्ञो राज्ञः प्राणपतिर्भवेत् ॥ १७ ॥
सब रोगों में (दोष, अग्नि, वात आदि को) जानने वाला, सब कार्यों के
अनुष्ठान को भली प्रकार जानने वाला, सब औषधियों के तत्त्व (सार) का
समझने वाला वैद्य राजा का प्राणपति (प्राणों का पालक) होगा ॥ १७ ॥
तत्र श्लोकाः—प्रकृत्यन्तरभेदेन रोगानीकविकल्पनम् ।
परस्पराविरोधश्च सामान्यं रोगदोषयोः ॥ १८ ॥
दोषसंख्याविकाराणामेकदोषप्रकोपणम् ।
ज्वरणं प्रतिचिन्ता च कायाग्नेर्धुक्षणानि च ॥ १९ ॥
नराणां वातलादीनां प्रकृतिस्थापनानि च ।
रोगानीके विमानेऽस्मिन् व्याहृतानि महर्षिणा ॥ २० ॥
प्रकृति (प्रभाव आदि) भेद से, रोगों के भेद, नानाविध संख्या होने पर
भी परस्पर अविरोध, रोग और दोष में समानता, दोषों की संख्या, रोगों का
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४१
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४१
एक देश, दोषों के प्रकोप का कारण, अग्नि का विशेष कथन, शरीरस्थ अग्नि के
चार रूप, वातल आदि तीन पुरुषों को प्रकृति में लाने वाली भेषज, ये सब
बातें इस 'रोगानीक' अध्याय में महर्षि आत्रेय ने कह दी हैं ॥ १६-२० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने रोगानीक-विमानं
नाम षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातो व्याधितरूणीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'व्याधितरूपीय' विमान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
इह खलु द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः । तद्यथा—गुरुव्याधित
एकः सत्त्वबलशरीरसंपदुपेतत्वाल्लघुव्याधित इव दृश्यते, लघुव्याधि-
तोऽपरः सत्त्वादीनामधमत्वाद् गुरुव्याधित इव दृश्यते, तयोरकुशलाः
केवलं चक्षुषैव रूपं दृष्ट्वाऽध्यवस्यन्तो व्याधिगुरुलाघवे विप्रति-
पद्यन्ते ॥ ३ ॥
दो प्रकार के पुरुष रोगी की भाँति दीखते हैं (१) गुरु व्याधि से पीड़ित
एक मनुष्य और सत्त्व, बल, और शरीर इनके उत्कर्ष से गुरु व्याधि वाला होने
पर भी लघुव्याधि से पीड़ित सा दिखाई देता है। दूसरा सत्त्व, बल, शरीर
इनके न्यून होने से लघु व्याधि होने पर भी गुरु व्याधि से पीड़ित दिखाई देता
है। इनमें अकुशल वैद्य केवल आंख से ही देखकर गुरु व्याधि और लघु
व्याधि के ज्ञान में मोह या धोखे में पड़ जाते हैं। वे गुरु व्याधि को लघु-व्याधि
और लघु-व्याधि को गुरु-व्याधि समझ लेते हैं ॥ ३ ॥
न हि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमुपपद्यते; विप्रतिपन्नास्तु खलु
रोगज्ञाने, उपक्रमयुक्तिज्ञाने चापि विप्रतिपद्यन्ते । ते यदा गुरुव्याधितं
लघुव्याधितरूपमासादयन्ति, तदा तमल्पदोषं मत्वा संशोधनकालेऽस्मै
मृदुसंशोधनं प्रयच्छन्तो भूय एवास्य दोषानुदीरयन्ति । यदा तु लघु-
व्याधितं गुरुव्याधितरूपमासादयन्ति, तं महादोषं मत्वा संशोधन-
कालेऽस्मै तीक्ष्णं संशोधनं प्रयच्छन्तो दोषानतिनिर्हृत्यव शरीरमस्य
क्षिण्वन्ति; एवमवयवेन ज्ञानस्य कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमिति मन्यमानाः
५४० चरकसंहिता [ अ० ७
परिस्र्वलन्ति, विदितवेदितव्यास्तु भिषजः सर्वं सर्वथा यथासंभवं
परीक्ष्य परीक्ष्याध्यवस्यन्तो न कचिदपि विप्रतिपद्यन्ते, यथेष्टमर्थमभि-
निर्वर्तयन्ति चेति ॥ ४ ॥
क्योंकि ज्ञान के एक देश (भाग) से सम्पूर्ण ज्ञेयवस्तु का ज्ञान नहीं हो
सकता। इस प्रकार से रोग-ज्ञान में धोखा खाने पर चिकित्सा-युक्ति ज्ञान में
भी धोखा खाजाते हैं। जिस समय ये अकुशल वैद्य गुरु-व्याधि से पीड़ित
मनुष्य को लघु-व्याधि से पीड़ित अर्थात् अल्प-दोषयुक्त समझ कर इस रोगी को
संशोधन के लिये मृदु संशोधन देते हैं, उस समय इसके दोषों को वे और भी
अधिक बढ़ा देते हैं और जब लघु-व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को महादोषयुक्त,
गुरु-व्याधि वाला समझकर संशोधन के लिये तीक्ष्ण संशोधन देते हैं, तब दोषों
को बहुत अधिक मात्रा में बाहर निकाल कर इस रोगी के शरीर को निर्बल
करते हैं। इस प्रकार से ज्ञान के एक ही भाग से सम्पूर्ण ज्ञेय वस्तु का ज्ञान
करके काम करने पर ये सब स्थानों पर धोखा खाते हैं। इसके विपरीत
तीनों प्रमाणों द्वारा परीक्षा करने वाले, सर्व प्रमाण-कुशल वैद्य सत्त्व आदि सब
बातों की परीक्षा करके कार्य करते हैं, इसलिये चिकित्सा कार्य में वे कहीं भी
धोखा नहीं खाते। इससे इनको मनोवाञ्छित प्रयोजन (आरोग्य) मिल जाता है।४।
भवन्ति चात्र— सत्त्वादीनां विकल्पेन व्याधीनां रूपमातुरे ।
दृष्ट्वा विप्रतिपद्यन्ते बाला व्याधिबलाबले ॥ ५ ॥
ते भेषजमयोगेन कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः ।
व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ ६ ॥
प्राज्ञास्तु सर्वमाज्ञाय परीक्ष्यमिह सर्वथा ।
न स्खलन्ति प्रयोगेषु भेषजानां कदाचन ॥ ७ ॥
मूर्ख वैद्य गुरु-व्याधित पुरुष में सत्त्व आदि के उत्कर्ष और अपकर्षको न
समझ कर रोग के बल और अबल (गुरु-लाघव ज्ञान) में धोखा खा जाते हैं।
इस प्रकार अज्ञान के कारण रोग-ज्ञान में धोखा खाये हुए रोगियों के नाश या
बड़े भारी कष्ट के लिये, अयुक्ति से (दोष-दूष्य की अपेक्षा न करके) चिकित्सा
कर्म करते हैं। बुद्धिमान् वैद्य सब (सत्त्व आदि) की परीक्षा तीनों प्रमाणों
द्वारा करके औषध का प्रयोग करते हैं, इसलिये वे चिकित्सा कर्म में कभी भूल
नहीं करते ॥ ५-७ ॥
इति व्याधितरूपाधिकारे श्रुत्वा व्याधितरूपसंख्याप्रसंभवं व्या-
धितरूपहेतुं विप्रतिपत्तौ च कारणं सापवादं संप्रतिपत्तिकारणं चान-
पवादं, भगवन्तमात्रेयमग्निवेशोऽतः परं सर्वकृमीणां पुरुषसंश्रयाणां
अ० ७] विमानस्थानम् ५४३
अ० ७] विमानस्थानम् ५४३
समुत्थान-स्थान-संस्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषान् पप्रच्छो-
पसंगृह्य पादौ ॥ ८ ॥
इस प्रकार से इस व्याधित रूपाधिकार में रोगी के रूप, संख्या, परिमाण,
गुरु व्याधित, लघु व्याधित, संख्या गुरु-व्याधित और लघु-व्याधित में कारण
( सत्त्वादि का उत्कर्ष और अपकर्ष ), रोग के बलाबल ज्ञान में प्रमाद ( मोह ),
इस प्रमाद के कारण ( एक प्रत्यक्ष प्रमाण से ही ज्ञान करना ), सापवाद
( दोष सहित, ) सम्प्रतिपत्ति ( सम्यक् ज्ञान तीनों प्रमाणों से परीक्षा करने का
ज्ञान ), और अनपवाद ( निर्दोष ), इनको सम्पूर्ण रूप में सुनकर अग्निवेश
ने भगवान् आत्रेय के चरणों में नमस्कार कर, सब प्रकार के कृमियों के समु-
त्थान ( निदान ), स्थान संस्थान ( लक्षण ), वर्ण, नाम, प्रभाव और चि-
कित्सा को पूछा ॥ ८ ॥
अथास्मै प्रोवाच भगवानात्रेयः—इह खल्वग्निवेश ! विंशतिविधाः
कृमयः पूर्वमुद्दिष्टा नानाविधेन प्रविभागेनान्यत्र सहजेभ्यः, ते पुनः
प्रकृतिभिर्भिद्यमानाश्चतुर्विधा भवन्ति । तद्यथा—पुरीषजाः श्लेष्मजाः
शोणितजा मलजाश्चेति ॥ ९ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा, हे अग्निवेश ! पीछे अष्टोदरीय
अध्याय में सहज ( सहजन्म ) कृमियों को छोड़ कर नाना प्रकार के विभाग
से बीस प्रकार के ( मलजन्य दो प्रकार के, रक्तजन्य छः प्रकार के, कफजन्य
सात प्रकार के और पुरीषजन्य पांच प्रकार के ) कृमि कहे हैं। ये बीस प्रकार
के कृमि प्रकृति की भिन्नता के कारण चार प्रकार के हैं। यथा—पुरीषजन्य,
श्लेष्मजन्य, रक्तजन्य और मलजन्य ॥ ६ ॥
तत्र मलो बाह्यश्चाऽऽभ्यन्तरश्च । तत्र बाह्ये मले जातान्मलजांस्-
चक्ष्महे । तेषां समुत्थानं—मृजावर्जनम् । स्थान—केश-श्मश्रु-लोम-
पक्ष्म-वासांसि । संस्थानं-अणवस्तिलाकृतयो बहुपादाः । वर्णः कृष्णः
शुक्लश्च । नामानि-यूकाः पिपीलिकाश्च । प्रभावः कण्डूजननं कोठपिड-
काभिनिर्वर्तनं च । चिकित्सितं त्वेषामपकर्षणं मलोपघातो मलकराणां
च भावानामनुपसेवनमिति ॥ १० ॥
इनमें मल दो प्रकार का है—( १ ) बाह्य और ( २ ) आभ्यन्तर । इनमें
शरीर के बाह्यमल ( पसीना आदि से ) उत्पन्न होने वाले कृमियो को
मलजन्य कृमि कहते हैं । इनकी उत्पत्ति का कारण शरीर शुद्धि का न
करना है। इनका स्थान केश ( शिर के बाल ), दाढ़ी मूंछ, शरीर के लोम,
आंखों की पलकों के बाल और वस्त्र हैं।
५४४ चरकसंहिता [ अ० ७
इनका संस्थान अर्थात् (रूप या आकृति) ये अणु (सूक्ष्म), तिल के
समान आकृति और बहुत पांव वाले होते हैं। इनका वर्ण (रंग) काला और
श्वेत है। इनके नाम यूक (जूं) और पिपीलिका (लिक्खा), लीख है।
इनका प्रभाव—खाज उत्पन्न करना और कोठ, पिडका आदि फुन्सियों को
शरीर पर उत्पन्न करना है।
इनकी चिकित्सा—इनको चिमटी से पकड़ कर खींचना, मल का नाश
करना और मलोत्पादक वस्तुओं का परित्याग करना है ॥१०॥
शोणितजानां तु खलु कुष्ठैः समानं समुत्थानम्, स्थानं रक्तवाहिन्यो
धमन्यः। संस्थानं अणवो वृत्ताश्चापादाश्च सूक्ष्मत्वाच्चैके भवन्त्यदृश्याः।
वर्णस्ताम्रः। नामानि केशादा लोमादा लोमद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा
जन्तुमातरश्चेति। प्रभावः केश-श्मश्रु-नख-लोम-पक्ष्मपापध्वंसो व्रणगतानां
च हर्ष-कण्डू-तोद-संसर्पणान्यतिवृद्धानां च त्वक्-शिरा-स्नायु-मांस-तरु-
णास्थि-भक्षणमिति, चिकित्सितमप्येषां कुष्ठैः समानं तदुत्तरकालमुपदे-
क्ष्यामः ॥ ११ ॥
रक्तजन्य कृमियों का निदान कुष्ठ रोग के निदान के समान ही है। कृमियों
का स्थान—रक्तवाहिनी धमनियां (शिरायें भी) हैं। इनका रूप सूक्ष्म होने से
कुछ कृमि अदृश्य होते हैं। वे आंख से नहीं देखे जाते, इनका रंग ताम्र वर्ण है;
इनके नाम केशाद (केशों को खाने वाला), लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदु-
म्बर और जन्तुमाता हैं। इनका प्रभाव केश श्मश्रु, लोम और पलक के बालों
को नाश करना है, व्रण में प्रवेश करके ये हर्ष ✳, खाज, तोद (चुनचुना) और
संसर्पण की सी प्रतीति कराते हैं। बहुत बढ़के ये त्वचा सिरा, स्नायु, मांस
और तरुण अस्थि को भी खाने लगते हैं। इनकी चिकित्सा भी कुष्ठ-रोग के
समान है, इसका वर्णन आगे कुष्ठ-चिकित्सा में करेंगे ॥ ११ ॥
श्लेष्मजाः क्षीर-गुड-तिल-मत्स्याानूपमांस-पिष्टान्न-परमान्न-कुसुम्भ-
स्नेहाजीर्ण-पूति-क्लिन्न-संकीर्ण-विरुद्ध्रासात्म्य-भोजनसमुत्थानाः। तेषामा-
माशयः स्थानं। ते प्रवर्धमानास्तूष्र्ध्वमधो वा बिसर्पन्त्युभयतो वा।
संस्थानवर्ण-विशेषास्तु श्वेताः पृथुब्रध्नसंस्थानाः केचित्, केचिद्वृत्तपरि-
णाहा गण्डूपदाकृतयश्च श्वेतास्ताम्रावभासाः, केचिदणवो दीर्घास्तन्तवा-
कृतयः श्वेताः। *तेषां त्रिविधानां श्लेष्मनिमित्तानां कृमीणां नामानि—
✳ हर्ष—जिस प्रकार दाद में खुजाने से आनन्द, हर्ष वा रोमाञ्च होता है।
इस को भी कृमि उत्पन्न करते हैं।
अ० ७ ] ३२ विमानस्थानम् ५४५
अ० ७ ] ३२ विमानस्थानम् ५४५
अन्त्रादाः, उदारादाः, हृदयचराः, चुरवः, दर्भपुष्पाः, सौगन्धिकाः,
महागुदाश्चेति । प्रभावो हृल्लासास्यसंस्रवणमरोचकाविपाको ज्वरो
मूर्च्छा जम्भा क्षवथुरानाहोऽङ्गमर्दश्छर्दिः कार्श्यं पारुष्यमिति ॥ १२ ॥
कफजन्य कृमि—क्षीर-भोजन, गुड़, तिल मछली, जलचर प्राणियों के मांस
पिष्टान्न और परमान्न (खीर आदि) का भोजन, कुसुम्भ का तेल, अजीर्ण में
भोजन, पूति (सड़े), क्लिन्न (क्लेदकारक द्रव्यों के) संकीर्ण (हित और अहित
बेमेल मिले भोजन) और विरुद्ध एवं असात्म्य भोजनों से उत्पन्न होते हैं।
इनका स्थान आमाशय है। ये आमाशय से बढ़ कर यहीं से ही ऊपर या नीचे
अथवा दोनों तरफ फैल जाते हैं। इनका रूप और वर्ण श्वेत तथा कुछ बड़ी
मासपेशी के से, बद के आकार के, कुछ गोल आकार वाले, (वेष्टन) वाले,
गिंडोये की आकृति के, श्वेत और लाल रंग की आभा वाले होते हैं। कुछ अणु
(पतले), लम्बे और सूत के समान आकृति वाले, श्वेत होते हैं। इन तीनों
प्रकार के कफजन्य कृमियों के नाम ये हैं। जैसे—अन्त्राद, उदराद, हृदयचर,
चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद । इन का प्रभाव—हृल्लास वमनकी रुचि
होना, मुख से लार का बहना, अरुचि, अविपाक, ज्वर, मूर्च्छा, जम्भाई का आना,
छींकें आना, अफरा, शरीर के अंगों का टूटना, वमन, कृशता और शरीर में
रूक्षता वा कठोरता होना है ॥ १२ ॥
पुरीषजास्तुल्यसमुत्थानाः श्लेष्मजैस्तेषां स्थानं पक्वाशयः । प्रवर्धमा-
नास्त्वधो विसर्पन्ति, यस्य पुनरामाशयाभिमुखाः स्युर्यदन्तरम्; तद-
न्तरं तस्योद्गारनिश्वासाः पुरीषगन्धिनः स्युः; संस्थानवर्णविशेषास्तु
सूक्ष्मवृत्तपरीणाहाः श्वेता दीर्घा ऊर्णाशुकसंकाशाः केचित्, केचित्पुनः
स्थूलवृत्तपरीणाहाः श्यावनीलहरितपीताः । तेषां नामानि ककेरुका
मकेरुका लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति । प्रभावः पुरीषभेदः
कार्श्यं पारुष्यं लोमहर्षोऽभिनिर्वर्तनं च, त एवास्य गुदमुखं परितुदन्तः
कण्डूं चोपजनयन्तो गुदमुखं पर्यासते, त एव जातहर्षा गुदनिष्क्रमण-
मतिवेलं कुर्वन्ति-इत्येष श्लेष्मजानां पुरीषजानां च कृमीणां समुत्थाना-
दिविशेषः ॥ १३ ॥
पुरीषजन्य (मल से उत्पन्न) कृमियों का निदान कफजन्य कृमियों के
समान है। इन कृमियों का स्थान पक्वाशय है। ये कृमि बढ़कर नीचे को ओर
फैलते हैं। जिस पुरुष में ये कृमि आमाशय की ओर जाने लगते हैं, उस पुरुष
के उद्गार (डकार) और श्वास में मल की गन्ध आती है। इनका रूप
वर्ण—सूक्ष्म, गोल वेष्टन वाले तथा श्वेत और भेड़ के लम्बे बालो के समान
५४६ चरकसंहिता [ अ०७
होते हैं। कुछ स्थूल, गोल वेष्टन वाले, काले, नीले, हरे या पीले रंग के होते
हैं। इन के नाम—ककेरुक, मकेरुक, लेलिह, ससूलक, सौसुराद हैं। इनका
प्रभाव—मल का पतला आना, शरीर में कृशता, परुषता और रोमांच होना
है। ये कृमि रोगी की गुदा के मुख पर रहते हैं। ये हर्ष उत्पन्न होने पर बार
बार गुदा से बाहर (मल के साथ) निकलते हैं। यह कफजन्य और पुरीष-
जन्य कृमियों में उत्पत्ति आदि का भेद है ॥ १३ ॥
चिकित्सितं तु खल्वेषां समासेनोपदेक्ष्य पश्चाद्विस्तरेणोपदेक्ष्यामः ।
तत्र सर्वकृमीणामपकर्षणमेवाऽऽदितः कार्यं; ततः प्रकृतिविघातोऽनन्तरं
निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति ॥ १४ ॥
कफ और मल से उत्पन्न कृमियों की चिकित्सा संक्षेप में कहकर
फिर पीछे से विस्तार से कहेंगे। इन कृमियों का प्रथम अपकर्षण (खींचना
शोधन) करना चाहिये, फिर प्रकृति-विघात (उपशम) और पीछे से निदान-
रूप पदार्थों का अनुपसेवन अर्थात् त्याग करना चाहिये ॥ १४ ॥
तत्रापकर्षणं हस्तेनाभिगृह्य विमृश्योपकरणवताऽपनयनमनुपक-
रणेन वा, स्थानगतानां तु कृमीणां भेषजेनापकर्षणं; न्यायतस्तु तच्चतु-
र्विधम्। तद्यथा—शिरोविरेचनं वमनं विरेचनमास्थापनमित्यपक-
र्षणविधिः ॥ १५ ॥
अपकर्षण विधि—उपकरण (संदंश, चिमटी आदि) से अथवा बिना
उपकरण के हाथ से पकड़ कर बाहर निकालने का नाम 'अपकर्षण' है। यह
कार्य बाह्य मलजन्य (पुरीषजन्य) और श्लेष्मजन्य कृमियों के स्थान से
निकले होने पर ही हो सकता है और जो कृमि अपने स्थान में स्थित हों,
उनको औषध द्वारा निकालना उचित है और यह औषध चार प्रकार का है।
यथा—शिरोविरेचन, वमन, विरेचन और आस्थापन । यह अपकर्षण-
विधि है ॥ १५ ॥
प्रकृतिविघातस्तेषां—कटु-तिक्त-कषाय-क्षारोष्णानां द्रव्याणामुपयोगो
यच्चान्यदपि किंचिच्छ्लेष्मपुरीषप्रत्यनीकभूतं तत्स्यादिति प्रकृति-
विघातः ॥ १६ ॥
प्रकृति-विघात—प्रकृति (कफ और पुरीष) का उपघात अर्थात् नाश या
शमन करना। इस के लिये कटु, तिक्त, कषाय, क्षार और उष्ण पदार्थों का
उपयोग करना चाहिये। इसके अतिरिक्त और भी जो कुछ श्लेष्मा और मल के
विरुद्ध आहार-विहार हो उसका सेवन करना चाहिये। यह प्रकृति-विघात-
विधि है ॥ १६ ॥
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४७
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४७
अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति यदुक्तं निदा-
नविधौ तस्य विसर्जनं तथाप्रायाणां चापरेषां द्रव्याणामिति लक्षणतश्चि-
कित्सितमनुव्याख्यातमेतदेव पुनर्विस्तरेणोपदेक्ष्यते ॥ १७ ॥
इसके आगे निदान में कहे पदार्थों का सेवन का त्यागना आवश्यक है।
ऐसा निदान विधि में जिन जिन द्रव्यों को निदान रूप से कहा है, उनका
परित्याग करना चाहिये । इसी प्रकार न कहे हुए निदान के अनुरूप द्रव्यों
का भी परित्याग करना चाहिये । इस प्रकार संक्षेप से चिकित्साक्रम कह दिया
है, अब इसी को विस्तार से कहते हैं ॥ १७ ॥
अथैनं कृमिकोष्ठमातुरमग्रे षड्रात्रं सप्तरात्रं वा स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य
श्वोभूते एनं संशोधनं पाययितास्मीति क्षीर-दधि-गुड-तिल-मत्स्यानू-
पमांस-पिष्टान्न-परमान्न-कुसुम्भस्नेह-संयुक्तैर्भोज्यैः सायं प्रातश्चोपपादये-
त्समुदीरणार्थं चैव कृमीणां कोष्ठाभिसरणार्थं च भिषक् । अथ व्युष्टायां
रात्रौ सुखोषितं सुप्रजीर्णभुक्तं च विज्ञाय।ऽऽस्थापन-वमन-विरेचनैस्तवह-
रेवोपपादयेदुपपादनीयश्चेत्स्यात्सर्वान् परीक्ष्यविशेषान् परीक्ष्य सम्यक्।
इस कृमि-कोष्ठ वाले रोगी को संशोधन देने से पूर्व छः या सात रात तक
स्नेहन और स्वेदन देना चाहिये । फिर सातवें वा आठवें दिन ( अगले दिन )
इस को संशोधन दूंगा ऐसा निश्चय करके सायं-प्रातः दोनों समय क्षीर ( दूध ),
गुड़, दही, तिल, मछली, जलचर प्राणियों का मांस, पिष्टान्न, कुसुम्भ तैल से
बने भोजन खिलावे । इस प्रकार के भोजनों से कोष्ठ के क्रिमि भली प्रकार से
उत्क्लेशित हो जाते हैं ( निकल आते हैं ) और अन्यत्र गये हुए कृमि भी
कोष्ठ की ओर आने लगते हैं । इस के अनन्तर रात्रि के बीतने पर ( प्रातः
काल होने पर ) भली प्रकार नींद आई तथा खाया हुआ भोजन भली प्रकार
जीर्ण हो गया यह देखकर उस दिन ( नवम दिन ) आस्थापन, वमन, विरेचन
( इन में से कोई एक क्रिया ) देना चाहिये । क्रिया करने से पूर्व रोगी की
सब प्रकार से ( प्रकृति-सात्म्य, सत्त्व आदि से ) परीक्षा कर लेनी चाहिये ।
अथाऽऽहरेति ब्रूयात्-मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज-शिग्रु-मधुशिग्रु-कमठ -
खर पुष्पा-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठेरक-गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-
फणिज्जकानि सर्वाण्यथवा यथालाभं, तान्याहृतान्यभिसमीक्ष्य खण्ड-
शश्छेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य
गोमूत्रेणार्धोदकेनाभ्यासिच्य साधयेत् सततमवघट्टयन् दर्व्या। तस्मिन्
शीतीभूते तूपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वोषधेषु स्थालीमवतार्य, सुप-
रिपूतं कषायं सुखोष्णं मदनपिप्पलीफलं विडङ्गकल्कतैलोपहितं, सर्जि-
कालवणितमभ्यासिच्य बस्तौ विधिवदास्थापयेदेनं, तथाऽर्काऽलर्क-कुट-
जाढकी-कुष्ठ-कैडर्य-कषायेण वा, तथा शिग्रु-पीलु-कुस्तुम्बुरु-कटुकासर्षप-
कषायेण, तथाऽऽमलक-शृङ्गवेर-दारुहरिद्रा-पिचुमर्द-कषायेण मदनफल-
संयोगसंयोजितेन त्रिरात्रं सप्तरात्रं वाऽऽस्थापयेत् ॥ १८ ॥
आस्थापन आदि क्रिया करने की विधि—अनन्तर कहे कि निम्न सब
वस्तुओ को अथवा इन में से जितनी प्राप्त हो सकें उन वस्तुओं को लावे—
मूलक ( मूली ), सरसों, लशुन, नाटा करञ्ज, शिग्रु ( शोभांजन ), मधुशिग्रु
( मीठा सहजन ), कमठ ( कोई लाल फूल का कचनार मानते हैं ), खर-
पुष्पा ( अजवायन ), भूस्तृण, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमाल,
पर्णास, क्षवक और फणिज्जक ( ये सब तुलसी के भेद हैं ) इन सब को अथवा
इन में से जो मिलें उनको लाकर, टुकड़े टुकड़े करके, पानी से भली प्रकार
धोकर, अच्छी प्रकार धुली हांडी में रखकर, आधे, पानी मिले गोमूत्र में भिगो
कर ( डालकर ) निरन्तर कड़छो ( खोंचे ) से चलाते हुए अग्नि पर पकाना
चाहिये। जब औषधियों का सम्पूर्ण रस जल में आ जाय तब हांडी को उतार
कर वस्त्र में से भली प्रकार छान ले। इस कुछ गरम क्वाथ में मॅनफल, पिप्पली,
वायविडंग इन का कल्क और तैल मिश्रित सर्जक्षार ( सज्जी खार ) एवं नमक
मिलाकर विधिपूर्वक इस रोगी को आस्थापन बस्ति देनी चाहिये। इसी
प्रकार आक, अलर्क ( मदार ), कुटज, आढकी, ( अरहर ), कुष्ठ ( कूठ )
और कैटर्य ( पर्वतनिम्ब्र ) कषाय से बस्ति देनी चाहिये, ( तैल मिश्रत नमक
एवं मैनफल आदि पूर्व की भाँति डाले )। इसी प्रकार शिग्रु, पीलु,
कुस्तुम्बुरु, कुटकी और सरसों के कषाय से, इसी प्रकार आंवला, अदरक
( सोंठ ), दारुहल्दी, पिचुमर्द ( नीम ) के कषाय से, मैनफल आदि डालकर
लवण युक्त तैल मिलाकर तीन बार अथवा सात बार आस्थापन-कर्म करना
चाहिये ॥ १८ ॥
प्रत्यागते च पश्चिमे बस्तौ प्रत्याश्वस्तं तदहरेवोभयतोभागहरणं
संशोधनं पाययेद्युक्त्या। तस्य विधिरुपदेक्ष्यते। मदनफलपिप्पलीकषा-
यस्यार्धाञ्जलिमात्रेण त्रिवृत्कल्काक्षमात्रमालोड्य पातुमस्मै प्रयच्छेत्,
तदस्य दोषमुभयतो निर्हरति साधु, एवमेव कल्पोक्तानि वमनविरे-
चनानि संसृज्य पाययेदेनं बुद्ध्या सर्वविशेषानवेक्षमाणो भिषक् ॥१९॥
शेष बस्ति के गुदा द्वारा बाहर निकल आने पर रोगी को आश्वासन
देकर उसी दिन ( जिस दिन बस्ति दी है ) दोनों ऊर्ध्व एवं अधोमागों से
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४६
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४६
दोष निकालने के लिये वमन, विरेचन रूपी संशोधन, देश, काल, मात्रादि
की अपेक्षा से देना चाहिये ।
विधि—मदनफल, पिप्पली कषाय की आधी अंजलि, को त्रिवृत् (निशोथ)
के कल्क की एक अक्ष मात्रा में मिलाकर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये ।
इस प्रकार से रोगी के दोष दोनों मागों से भली प्रकार निकलते हैं । इस प्रकार
से कल्प-स्थान में कहे जाने वाले वमन, विरेचन योगों को परस्पर मिला कर
रोगी की सब बातों को देख कर बुद्धि से भली प्रकार विचार कर रोगी को पीने
के लिये देवे ॥ १६ ॥
अथैनं सम्यग्वि॒रिक्तं विज्ञायापराह्ने शैखरिककषायेण सुखोष्णेन
परिषेचयेत्, तेनैव च कषायेण बाह्याभ्यन्तरान् सर्वोदकार्थान् कार-
येच्छश्वत् । तदभावे वा कटुतिक्तकषायाणामौषधानां क्वाथैर्मूत्रक्षारैर्वा
परिषेचयेत् । परिषिक्तं चैनं निर्वातमागारमनुप्रवेश्य पिप्पली-पिप्पली-
मूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-सिद्धेन यवाग्वादिना क्रमेणोपक्रमयेत्।
बिलेप्याः क्रमागतं चैनमनुवासयेद्विडङ्गतैलेनैकान्तरं द्वित्रिर्वा ॥ २० ॥
इसके पश्चात्(दोनों भागों से संशोधन होने पर) भली प्रकार संशोधन
हुआ जान कर शैखरिक कषाय ( अपामार्ग के थोड़े गरम कषाय ) से परिषेचन
करे । इसी कषाय को पानी के स्थान पर पीने के लिये और बाह्य ( स्नान
आदि में ) निरन्तर बरतना चाहिये । इस अपामार्ग के कषाय के अभाव में
कटु, तिक्त, कषाय रसवाली औषधियों के क्वाथों से, मूत्रमिश्रित यवक्षार
( जवाखार ) आदि से परिषेचन करना चाहिये । परिषिक्त इस रोगी को वायु-
रहित घर में प्रविष्ट करके पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोंठ इस पंचकोल
द्वारा सिद्ध यवागू को उपकल्पनीय अध्याय में कहे पेयादि क्रम से देना चाहिये ।
विलेपी तक पहुंच जाने पर रोगी को विडंग-तैल द्वारा एक दिन के अन्तर से
दो बार तीन बार अनुवासन देना चाहिये । ( अनुवासन में पेया का निषेध है,
क्योंकि पेया अभिष्यन्दी है ) ॥ २० ॥
यदि पुनरस्यातिप्रवृद्धाञ्शीर्षादान्कृमीन्मन्येत शिरस्येवाभिसर्पतः
काँश्चित्, ततः स्नेहस्वेदाभ्यामस्य शिर उपपाद्य विरेचयेदपामार्गतण्डु-
लादिना शिरोविरेचनेन ॥ २१ ॥
शिरो-विरेचन—इस रोगी के शिर को खाने वाले कृमियों को बहुत बढ़ा
हुआ जाने और देखे कि कृमि शिर में फिरते हों, ऐसा वैद्य को अनुभव हो तो
रोगी के शिर को स्नेहन और स्वेदन देकर अपामार्ग के तण्डुलों (चावलों )
आदि शिरो-विरेचन योग्य द्रव्यों से शिरोविरेचन देवे ॥ २१ ॥
५५० चरकसंहिता [ अ० ७
यस्त्वभ्यवहार्यविधिः प्रकृतिविघातायोक्तः कृमीणां, सोऽनुव्या-
ख्यास्यते—मूषिकपर्णीं समूलामप्रतानामाहृत्य खण्डशश्छेदयित्वा,
उलूखले क्षोदयित्वा पाणिभ्यां पीडयित्वा रसं गृह्णीयात्, तेन रसेन
ऽोदितशालितण्डुलपिष्टं समालोड्य पूपलिकाः कृत्वा विधूमेष्वङ्गारेषु
विपाच्य विडङ्गतैललवणोपहिताः कृमिकोष्ठाय भक्षयितुं प्रयच्छेत्;
अनन्तरं चाम्लकाञ्जिकमुदश्विद्वा पिप्पल्यादिपञ्चवर्गसंसृष्टं सलवण-
मनुपापयेत् ॥ २२ ॥
अनेन कल्पेन मार्कवार्क-सहचर-नीप-निर्गुण्डी-सुमुख-सुरस-कुठेरक-
गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणिज्जक-बकुल-कुटज-सुवर्णक्षीरी-
स्वरसा नामन्यतमस्मिन्कारयेत्पूपलिकाः, तथा किणिही-किरात-तिक्तक-
सुवहामलक-हरीतकी-बिभीतक-स्वरसेषु कारयेत्पूपलिकाः । स्वरसांश्चै-
तेषामेकैकशो द्वन्द्वशः सर्वशो वा मधुविलुलितान् प्रातरनन्नाय पातुं
प्रयच्छेत् ॥ २३ ॥
कृमियों के प्रकृति-विघात के लिये जो आहार-विधि कही है, उस को
व्याख्या करते हैं । जल और कोमल पत्तों के साथ मूषापर्णी को लाकर इसको
टुकड़े २ करके, ऊखल में कूटकर, हाथों से दबाकर रस निकाल ले । इस रस
में लाल धानों के चावलों की पिष्ठी को मिलाकर इससे पूरी ( पूप ) बनावे ।
इन पूरियों को धूम रहित अंगारों पर पकावे । फिर विडंग तैल और लवण के
. साथ मिलाकर कृमि कोष्ठवाले रोगी को खाने के लिये दे । पूरी खाने के
पीछे खट्टी कांजी ( धान्य-काञ्जिक ) में या उदश्वित् ( आधे विलोये मठे, या
छाछ ) में पिप्पली आदि पंचकोल को लवण के साथ मिला कर पीने के लिये
दे । इसी विधि से मार्कव ( भृंगराज ), अर्क (आंक ), सहचर (झण्टि ),
नीप ( कदम्ब ), निर्गुण्डी ( सिन्धुवार सम्हालू ), सुमुख, सुरस, कुठेरक,
गण्डीर, (सेहुण्ड ), कालमाल ( कुठेरक के भेद ), पर्णास, क्षवक, फणिजक
(तुलसी के भेद ), बकुल (मौलसरी ) कुटज, स्वर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ) इन
में से किसी एक के रस के साथ पूरी तैयार करनी चाहिये। इसी प्रकार किणिही
( अपामार्ग ), किराततिक्त (चिरायता), आम की, हरड़, बिभीतक (बहेड़ा ),
सुवहा (शेफालिका ) इनके रसों में पूरियां बनानी चाहियें । इन ( मण्डूक-
पर्णी आदि ) में से एक एक को या दो दो को अथवा सब को मिलाकर स्वरस
निकाल कर इस स्वरस में मधु मिला कर प्रातःकाल खाली पेट पीने के
लिये दे ॥ २२-२३ ॥
अथापशराफूदाहृत्य महति किलिञ्चके प्रस्तीर्याऽऽतपे शोषयित्वोदूखले
क्षोदयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण
त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो वाऽऽतपे सुपरिभावितानि
भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समा-
वाप्यानुगुप्तं निधापयेत् । तेषां तु खलु चूर्णानां पाणितलं चूर्णं यावद्वा
साधु मन्येत, तत् क्षौद्रेण संसृज्य कृमिकोष्ठाय लेढुं यच्छेत् ॥ २४ ॥
इसके पीछे घोड़े की शकृत (लीद) को लाकर बड़ी चटाई पर फैलाकर
धूप में सुखा ले। फिर ऊखल में कूटकर शिला पर पीसकर बारीक बनाले
इस चूर्ण को विडंग के कषाय से या त्रिफला-कषाय से आठ बार अथवा दस
बार धूप में भावना देकर शुष्क कर ले। फिर इसको पत्थर पर पीसकर नये
घड़े में रखकर, वायु आदि न जा सके इस प्रकार से मुख को ढांप कर गुप्त
स्थान पर रख दे। इसमें से कर्ष परिमाण (चार माशा) अथवा रोग के
अनुसार जितनी मात्रा उचित समझे उतनी मात्रा को शहद में मिलाकर कृमि
रोगी को खाने के लिये दे ॥ २४ ॥
तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन संपोथ्य स्नेहभाविते
दृढ़े कलशे सूक्ष्मानेकच्छिद्रप्रध्ने शरीरमुपवेष्ट्य मृदावलिप्ते समावाप्यो-
ल्पेन पिधाय भूमावाकण्ठं निखातस्य स्नेहभावितस्यैवान्यस्य दृढस्य
कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद् गोमयैरुपचित्य दाहयेत्; स यदा
जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि गलितस्नेहानि भल्लातकास्थीनीति,
ततस्तं कुम्भमुद्घाटयेत् । अथ तस्माद् द्वितीयात्कुम्भात्तं स्नेहमादाय
विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहार्धमात्रैः प्रतिसंसृज्याऽऽतपे सर्वमहः स्थाप-
यित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते, विरिक्तस्य
चाऽऽनुपूर्वी यथोक्ता ॥ २५ ॥
दूसरा प्रयोग—घड़े में जितने भिलावे के फल आ सकें, उतने फलों को
कूट कर तैलादि स्नेह से चिकने, मजबूत एक घड़े में भरे। इस घड़े के
निचले भाग में अनेक सूक्ष्म छिद्र बना दे तथा घड़े पर मिट्टी का लेप कर
दे। इस घड़े में भिलावे भर कर ढक्कन से मुंह ढांप दे। फिर स्नेह से भावित
एक दूसरे घड़े को ले कर जमीन में गले तक गाड़ दे। इस गड़े हुए घड़े के
ऊपर भिलावे वाला घड़ा रख कर चारों ओर उपले रख कर जलावे। जब
उपले भली प्रकार जल जावें, तब ऊपर के घड़े को पृथक् करे। जब इस
दूसरे घड़े में से तेल (स्नेह) ले कर स्नेह से आधी मात्रा में विडंग-तण्डुल
चूर्ण को स्नेह में मिला कर धूप में चार प्रहर तक रखे। पीछे इस स्नेह को
५५२ चरकसंहिता [ अ० ७
कृमि-कोष्ठ रोगी को पीने के लिये दे । इससे भली प्रकार विरेचन होता है।
विरेचन के पीछे पूर्व की भांति पेया आदि देने का क्रम है ॥२५॥
एवमेव भद्रदारु-सरलकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत्। अनुवा-
सयेच्चैनमनुवासनकाले ॥ २६ ॥
इसी भल्लात के स्नेह-विधि से देवदारु, सरल (राल-सर्ज), वृक्षों से स्नेह
बना कर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये और अनुवासन के योग्य समय
में कहे हुए स्नेहों से अनुवासन देना चाहिये ॥ २६ ॥
अथ 'आहर' इति ब्रूयात् शारदान्नावांस्तिलान्संपदुपपेतान्। तानाहृत्य
सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषाये सुखोष्णे निर्वापयेदाश्लेष-
गमनात्, गतदोषानभिसमीक्ष्य सुप्रलूनान्प्रलुञ्च्य पुनरेव सुनिष्पूतान्
सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभा-
वितान्भावयित्वाऽऽतपे शोषयित्वोलूखले संक्षुद्य दृषदि पुनः श्लक्ष्णपिष्टा-
न्कारयित्वा द्रोण्यामभ्यवधाय विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुरवसिञ्चन् पाणि-
मर्दमेव मर्दयेत् । तस्मिन्खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत्पाणिभ्यां
पर्यादाय शुचौ दृढे कलशे समासिच्यानुगुप्तं निधापयेत् ।
अन्ययोग—वैद्य रोगी से कहे कि 'आगे कहे पदार्थ लाओ'। अच्छी
प्रकार पके, रस-वीर्य युक्त, शरद ऋतु में होने वाले नये तिलों को ला कर,
भली प्रकार मिट्टी आदि से साफ़ करके सुखा ले । फिर सुखोष्ण, कुछ गरम
बिडंग-कषाय में भिगो दे, जब तक कि छिलके में लगा मैल दूर न हो जाय तब
तक भिगो कर रखे । दोष निकलने पर इन तिलों को तुष रहित करके, सुखा
लेवे । फिर छाज से साफ़ करके धोले । फिर सूखने पर बिडंग कषाय में
इक्कीस बार भावना दे कर धूप में सुखा लेवे । इन तिलों को ऊखल में कूट
कर पत्थर की शिला पर रख बारीक पीस लेवे । अब इनको द्रोणी (थाली,
कड़ाही) में रखकर विडंग कषाय को थोड़ा थोड़ा डालते हुए हाथों से खूब
मले, इस प्रकार हाथों से मलने पर जो तैल निकलता है, हाथ पर लगे हुए
उस तैल को ले कर पवित्र, दृढ़ घड़े में रखकर गुप्त स्थान में सुरक्षित रख देवे ।
इस को खाने के लिये कहे ।
अथ 'आहार' इति ब्रूयात्-तिल्वकोदालकयोर्द्वौ बिल्वमात्रौ पिण्डौ
श्लक्ष्णपिष्टौ विडङ्गकषायेण, ततोऽर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतोस्ततोऽर्धमात्रौ
दन्तीद्रवन्त्योरतोऽर्धमात्रौ चव्यचित्रकयोरित्येतं सम्भारं विडङ्गकषा-
यस्याऽऽढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य ततस्तैलप्रस्थमावाप्य सर्वमालोड्य महति
पयोगे समासिच्याग्नावधिश्रित्य महत्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेह-
मवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सतत मवघट्टयन् । स यदा
जानीयाद्विरमति शब्दः, प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहो
यथास्वं गन्धवर्णरसोत्पत्तिः, संवर्तते च भेषजमंगुलिभ्यां मृद्यमानमति-
मृदुनतिदारुणमनंगुलिप्राद्दि चेति, स कालस्तस्यावतारणाय । ततस्तम-
वतीर्णशीतीभूत महतेन वाससा परिपूय शुचौ दृढे कलशे समासिच्य
पिधानेन पिधाय शुक्लेन बद्धपट्टेनावच्छाद्य सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं
निधापयेत् । ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते,
सम्यगपहृतदोषस्य चास्याऽऽनुपूर्वी यथोक्ता । ततश्चैनमनुवासयेदनु-
वासनकाले ।
फिर वैद्य आगे कहे पदार्थ लाने को कहे—तिल्वक और उद्दालक
ये दो बिल्व भर (पल भर, ४ तोला) लेकर विडंग कषाय के साथ खूब बारीक
पीस ले । इनसे आधी मात्रा (२ तोला) श्यामा (काली निशोथ) और त्रिवृत्
(सफेद निशोथ), इन से आधी (१ तोला) दन्ती और द्रवन्ती, इनसे आधे (½
तोला) चव्य और चित्रक इन सबको अर्धाढक (दो प्रस्थ) विडंग कषाय, में तथा
एक प्रस्थ पूर्वोक्त तिलों से तैयार किये तैल के साथ मिलाकर एक बड़े कड़ाहे में
रख कर आग पर रख कर आराम से बैठ कर, चारों ओर स्नेह को देखते हुए
कि गिरे नहीं, निरन्तर मृदु अग्नि से पकावे । और पकाते समय कड़छी द्वारा
बराबर हिलाता रहे। जिस समय शब्द होना बन्द हो जाय, झाग उठना भी
रुक जाय, तथा स्नेह (तैल) भी स्वच्छ हो जावे, एवं तैल में उचित गन्ध,
वर्ण और रस की उत्पत्ति हो जाय तब समझे कि तैल बन गया । औषध
(कल्क) अंगुली से मलने पर न तो बहुत कोमल और न बहुत कठोर हो
तथा अंगुली पर चिपटे नहीं, (कल्क की बत्ती बन जावे)। तब समझ ले कि
तैल सिद्ध हो गया यह समय है, तैल उतारने का; अब इसको उतार कर ठण्डा
होने पर बड़े भारी वस्त्र से छान कर एक शुद्ध, मजबूत पात्र में डाल कर,
ढक्कन से टांप कर, सफेद वस्त्र से बांध कर तागे से कस कर, गुप्त (सुरक्षित)
स्थान पर रख देवे । इस तैल की मात्रा को रोग के अनुसार पीने के लिये
(कृमि-रोगी को) देवे। इससे भली प्रकार विरेचन होता है। दोषों के भली
प्रकार निकल जाने पर पहिले कही विधि करनी चाहिये। अनुवासन योग्य समय
में उस तैल से अनुवासन देना चाहिये ।
एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातसी-करञ्ज-कोषातकी-स्नेहानुपकल्प्य
पाययेत्सर्वविशेषानवेक्ष्यमाणः। तेनागदो भवतीति ॥ २७ ॥
५५४ चरकसंहिता [ अ० ७
इसी पूर्वोक्त विधि से सरसो, अलसी, करञ्ज, कोषातकी ( तुरई ) का तैल
बना कर सब परीक्षणीय वस्तुओं को देख कर कृमि-रोगी को तैल पिलावे। इस
से रोगी नीरोग हो जाता है ॥ २७ ॥
इत्येतत् द्वयानां श्लेष्मपुरीषसंभवानां कृमीणां समुत्थान-संस्थान-
स्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषा व्याख्याताः सामान्यतः ॥२८॥
इस प्रकार से कफजन्य और पुरीषजन्य कृमियों के निदान, संस्थान,
स्थान, वर्ण, प्रभाव और चिकित्सा सामान्य रूप में कह दी है ॥ २८ ॥
विशेषतस्त्वल्पमात्रमास्थापनानुवासनानुलोमहरणभूयिष्ठं तेष्वौष-
धेषु पुरीषजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । मात्राधिकं पुनः
शिरोविरेचन-वमनोपशमन-भूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु श्लेष्मजानां कृमीणां
चिकित्सितं कार्यमिति । एष कृमिघ्नो भेषजविधिरनुव्याख्यातो
भवतीति ॥ २९ ॥
विशेष रूप से पुरीषजन्य कृमियों के लिये कही हुई वमन, विरेचन, आस्था-
पन, अनुवासन, शिरोविरेचन, ओषधियों में अल्पमात्रा में आस्थापन, अनुवा-
सन और अनुलोम-हरण, विरेचन बरतना चाहिये। मलजन्य कृमियों में बस्ति,
विरेचन अधिक बरतना चाहिये। कफजन्य कृमियों में शिरोविरेचन, वमन
और शमन अधिक देना चाहिये ॥ २९ ॥
तमनुतिष्ठता यथास्वहेतुवर्जने प्रयत्नितव्यम् ॥ ३० ॥
यथोद्देशमेवमिदं कृमिकोष्ठचिकित्सितं यथावदनुव्याख्यातं
भवतीति ॥ ३१ ॥
इस विधि को बरतते हुए वैद्य को चाहिये कि रोगी को कृमि निदान से भी
बचाये। इस प्रकार से पूर्व कथितानुसार कृमि-कोष्ठ चिकित्सा ( शोधन-शमन
रूप ) को यथावत् पूर्ण रूप से कह दिया है ॥ ३०-३१ ॥
भवन्ति चात्र—अपकर्षणमेवाऽऽदौ कृमीणां भेषजं स्मृतम्।
ततो विघातः प्रकृतेर्निदानस्य च वर्जनम् ॥ ३२ ॥
अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निग्रहे।
विधिर्दृष्टस्त्रिधा योऽयं कृमीनूद्दिश्य कीर्तितः ॥ ३३ ॥
संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम्।
एतावद्भिषजा कार्यं रोगे रोगे यथाविधि ॥ ३४ ॥
कृमियों को प्रथम खींच कर निकालना ही औषध है। फिर प्रकृति
का नाश, निदान का छोड़ना है यह विधि सब प्रकार के कृमियों के लिये है।
इतना ही नहीं, अपितु सब रोगों के लिये है। इसलिये वैद्य को चाहिये कि
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५५
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प्रत्येक रोग में सब विकारों में संशोधन, संशमन और निदान का त्याग यह
तीन प्रकार की चिकित्सा करे ॥ ३२-३४ ॥
तत्र श्लोकौ—व्याधितौ पुरुषौ ज्ञाज्ञौ भिषजौ सप्रयोजनौ ।
विशतिः कृमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः ॥ ३५ ॥
उक्तो व्याधितरूपीये विमाने परमर्षिणा ।
शिष्यसंबोधनार्थं च व्याधिप्रशमनाय च ॥ ३६ ॥
व्याधि से पीड़ित दो प्रकार के पुरुष विज्ञ (जानने वाले) और अज्ञ
(मूढ), इनका प्रयोजन (जानने बाल से सिद्धि और मूढ से रोगवृद्धि या
मृत्यु), बीस प्रकार के कृमि, इन के हेतु, संस्थान वर्ण, प्रभाव, नाम और
चिकित्सा ये सात बातें, भगवान् आत्रेय ने शिष्य को समझाने के लिये तथा
रोग की शान्ति के लिये इस विमान स्थान में कह दी हैं ॥ ३५-३६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने
व्याधितरूपीयविमानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः।
अथातो रोगभिषग्जितीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इस के आगे 'रोगभिषग्जितीय' नामक अध्याय को व्याख्यान करेंगे।
जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
बुद्धिमानात्मनः कार्यगुरुलाघवे कर्मफलमनुबन्धं देशकालौ च
विदित्वा युक्तिदर्शनाद् भिषग्बुभूषुः शास्त्रमेवाऽऽदितः परीक्षेत । विवि-
धानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके । तत्र यन्मन्येत सुमहद्यश-
स्विधीरपुरुषासेवितमर्थबहुलमाप्तजनपूजितं त्रिविधशिष्यबुद्धिहितमप-
गतपुनरुक्तदोषमार्षं सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंग्रहक्रमं स्वाधारमनवपतित-
शब्दमकष्टशब्दं पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थतत्त्वविनिश्चयप्रधानं
संगतार्थमसंकुलप्रकरणमाशुप्रबोधकं लक्षणवच्चोदाहरणवच्च, तदभिप्रप-
द्येत शास्त्रम् । शास्त्रं ह्येवंविधममल इवाऽऽदित्यस्तमो विधूय प्रकाशयति
सर्वम् ॥ ३ ॥
शास्त्र-परीक्षा—बुद्धिमान् पुरुष अपने कार्य के गौरव (बहुत प्रयास से
साध्य) एवं लाघव (अल्प प्रयास से साध्य), कर्मों के फल, अनुबन्ध
५५६ चरकसंहिता [अ० ८
(कर्मजन्य शुभ-अशुभ फल), देश एवं काल को जान कर तथा युक्ति को
देख कर यदि वैद्य बनने की इच्छा करे तो सब से प्रथम शास्त्र की ही परीक्षा
करे, क्योंकि वैद्यों के नाना प्रकार के शास्त्र लोक में प्रचलित हैं। इन में से
जो शास्त्र निम्नलिखित गुणों वाला हो, उसे पढ़ने के लिये स्वीकार करे।
शास्त्र के गुण—शास्त्र खूब बड़ा, असंक्षिप्त, यशस्वी, धीर पुरुषों से उप-
सेवित, माननीय, थोड़े से शब्दों में बहुत अर्थ को बतलाने वाला, आप्त जनों
से अनुमत (निर्दोष), उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन प्रकार के शिष्यों
की तीनों प्रकार की बुद्धि के लिये योग्य, सब जिस को समझ सकें, पुनरुक्ति
दोष से रहित, ऋषियों से बनाया, सुप्रीत (अच्छी प्रकार ग्रथित किया हो),
जिस में सूत्र (संक्षेप में अर्थों का ग्रहण) भाष्य (विस्तार से वर्णन), और
प्रतिपाद्य विषयों को क्रम से कहा हो, सुन्दर अधिकरणों वाली, ग्राम्य
शब्दों से रहित, कठिन दुर्बोध या बोलने में कठिन शब्दों से रहित, भली
प्रकार से बहुत तत्त्व बतलाने वाला, (क्रम से उद्देश्य क्रम से अर्थों को
बतलाने वाला), वस्तुतत्त्व को सन्देह से रहित, निश्चित तत्त्व को बतलाने
वाला, संगतियुक्त अर्थों को बतलाने वाला, अव्यवस्थित, बेमेल मिले
हुए प्रकरणों से रहित; सुनते ही स्पष्ट अर्थज्ञान कराने वाला,
लक्षण और उदाहरण वाला हो, ऐसा शास्त्र अध्ययन के लिये चुनना चाहिये।
क्योंकि जिस प्रकार बादल आदि से रहित, निर्मल सूर्य अन्धकार को दूर करके
सब पदार्थों को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार शास्त्र अज्ञान को दूर करके
सब अर्थ-तत्त्व को प्रकाशित कर देता है ॥ ३ ॥
ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत। तद्यथा—पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टक-
र्माणं दक्षं दक्षिगं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृ-
तिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं
शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति। एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमा-
र्तवो मेघ इव सस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः संपादयति ॥ ४ ॥
आचार्य का लक्षण—शास्त्र की परीक्षा करने के अनन्तर आचार्य की परीक्षा
करे। यथा-वह निर्मल शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हो, जिसने कर्म को उचित रीति
से देखा हो, केवल शास्त्र ही न पढ़ा हो, प्रत्युत वह कर्म में कुशल, शुचि
(पवित्र), शस्त्र आदि क्रिया में वशी, सिद्धहस्त, नाना उपयोगी उपकरणों
वाला सब इन्द्रियों से युक्त, रोगी की प्रकृति को पहिचानने वाला, उत्तम सूझ
वाला, रोगों की चिकित्सा को समझने वाला, अन्य शास्त्रों के ज्ञान से प्रकट
स्वच्छ विद्या वाला, अभिमान से रहित, गुणों में दोष न देखने वाला, क्रोध-