चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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इसी पूर्वोक्त विधि से सरसो, अलसी, करञ्ज, कोषातकी ( तुरई ) का तैल
बना कर सब परीक्षणीय वस्तुओं को देख कर कृमि-रोगी को तैल पिलावे। इस
से रोगी नीरोग हो जाता है ॥ २७ ॥
इत्येतत् द्वयानां श्लेष्मपुरीषसंभवानां कृमीणां समुत्थान-संस्थान-
स्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषा व्याख्याताः सामान्यतः ॥२८॥
इस प्रकार से कफजन्य और पुरीषजन्य कृमियों के निदान, संस्थान,
स्थान, वर्ण, प्रभाव और चिकित्सा सामान्य रूप में कह दी है ॥ २८ ॥
विशेषतस्त्वल्पमात्रमास्थापनानुवासनानुलोमहरणभूयिष्ठं तेष्वौष-
धेषु पुरीषजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । मात्राधिकं पुनः
शिरोविरेचन-वमनोपशमन-भूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु श्लेष्मजानां कृमीणां
चिकित्सितं कार्यमिति । एष कृमिघ्नो भेषजविधिरनुव्याख्यातो
भवतीति ॥ २९ ॥
विशेष रूप से पुरीषजन्य कृमियों के लिये कही हुई वमन, विरेचन, आस्था-
पन, अनुवासन, शिरोविरेचन, ओषधियों में अल्पमात्रा में आस्थापन, अनुवा-
सन और अनुलोम-हरण, विरेचन बरतना चाहिये। मलजन्य कृमियों में बस्ति,
विरेचन अधिक बरतना चाहिये। कफजन्य कृमियों में शिरोविरेचन, वमन
और शमन अधिक देना चाहिये ॥ २९ ॥
तमनुतिष्ठता यथास्वहेतुवर्जने प्रयत्नितव्यम् ॥ ३० ॥
यथोद्देशमेवमिदं कृमिकोष्ठचिकित्सितं यथावदनुव्याख्यातं
भवतीति ॥ ३१ ॥
इस विधि को बरतते हुए वैद्य को चाहिये कि रोगी को कृमि निदान से भी
बचाये। इस प्रकार से पूर्व कथितानुसार कृमि-कोष्ठ चिकित्सा ( शोधन-शमन
रूप ) को यथावत् पूर्ण रूप से कह दिया है ॥ ३०-३१ ॥
भवन्ति चात्र—अपकर्षणमेवाऽऽदौ कृमीणां भेषजं स्मृतम्।
ततो विघातः प्रकृतेर्निदानस्य च वर्जनम् ॥ ३२ ॥
अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निग्रहे।
विधिर्दृष्टस्त्रिधा योऽयं कृमीनूद्दिश्य कीर्तितः ॥ ३३ ॥
संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम्।
एतावद्भिषजा कार्यं रोगे रोगे यथाविधि ॥ ३४ ॥
कृमियों को प्रथम खींच कर निकालना ही औषध है। फिर प्रकृति
का नाश, निदान का छोड़ना है यह विधि सब प्रकार के कृमियों के लिये है।
इतना ही नहीं, अपितु सब रोगों के लिये है। इसलिये वैद्य को चाहिये कि