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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 567 of 639

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Page 567

अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४६
दोष निकालने के लिये वमन, विरेचन रूपी संशोधन, देश, काल, मात्रादि
की अपेक्षा से देना चाहिये ।
विधि—मदनफल, पिप्पली कषाय की आधी अंजलि, को त्रिवृत् (निशोथ)
के कल्क की एक अक्ष मात्रा में मिलाकर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये ।
इस प्रकार से रोगी के दोष दोनों मागों से भली प्रकार निकलते हैं । इस प्रकार
से कल्प-स्थान में कहे जाने वाले वमन, विरेचन योगों को परस्पर मिला कर
रोगी की सब बातों को देख कर बुद्धि से भली प्रकार विचार कर रोगी को पीने
के लिये देवे ॥ १६ ॥
अथैनं सम्यग्वि॒रिक्तं विज्ञायापराह्ने शैखरिककषायेण सुखोष्णेन
परिषेचयेत्, तेनैव च कषायेण बाह्याभ्यन्तरान् सर्वोदकार्थान् कार-
येच्छश्वत् । तदभावे वा कटुतिक्तकषायाणामौषधानां क्वाथैर्मूत्रक्षारैर्वा
परिषेचयेत् । परिषिक्तं चैनं निर्वातमागारमनुप्रवेश्य पिप्पली-पिप्पली-
मूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-सिद्धेन यवाग्वादिना क्रमेणोपक्रमयेत्।
बिलेप्याः क्रमागतं चैनमनुवासयेद्विडङ्गतैलेनैकान्तरं द्वित्रिर्वा ॥ २० ॥
इसके पश्चात्(दोनों भागों से संशोधन होने पर) भली प्रकार संशोधन
हुआ जान कर शैखरिक कषाय ( अपामार्ग के थोड़े गरम कषाय ) से परिषेचन
करे । इसी कषाय को पानी के स्थान पर पीने के लिये और बाह्य ( स्नान
आदि में ) निरन्तर बरतना चाहिये । इस अपामार्ग के कषाय के अभाव में
कटु, तिक्त, कषाय रसवाली औषधियों के क्वाथों से, मूत्रमिश्रित यवक्षार
( जवाखार ) आदि से परिषेचन करना चाहिये । परिषिक्त इस रोगी को वायु-
रहित घर में प्रविष्ट करके पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोंठ इस पंचकोल
द्वारा सिद्ध यवागू को उपकल्पनीय अध्याय में कहे पेयादि क्रम से देना चाहिये ।
विलेपी तक पहुंच जाने पर रोगी को विडंग-तैल द्वारा एक दिन के अन्तर से
दो बार तीन बार अनुवासन देना चाहिये । ( अनुवासन में पेया का निषेध है,
क्योंकि पेया अभिष्यन्दी है ) ॥ २० ॥
यदि पुनरस्यातिप्रवृद्धाञ्शीर्षादान्कृमीन्मन्येत शिरस्येवाभिसर्पतः
काँश्चित्, ततः स्नेहस्वेदाभ्यामस्य शिर उपपाद्य विरेचयेदपामार्गतण्डु-
लादिना शिरोविरेचनेन ॥ २१ ॥
शिरो-विरेचन—इस रोगी के शिर को खाने वाले कृमियों को बहुत बढ़ा
हुआ जाने और देखे कि कृमि शिर में फिरते हों, ऐसा वैद्य को अनुभव हो तो
रोगी के शिर को स्नेहन और स्वेदन देकर अपामार्ग के तण्डुलों (चावलों )
आदि शिरो-विरेचन योग्य द्रव्यों से शिरोविरेचन देवे ॥ २१ ॥