चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ७ ] विमानस्थानम् ५४१
एक देश, दोषों के प्रकोप का कारण, अग्नि का विशेष कथन, शरीरस्थ अग्नि के
चार रूप, वातल आदि तीन पुरुषों को प्रकृति में लाने वाली भेषज, ये सब
बातें इस 'रोगानीक' अध्याय में महर्षि आत्रेय ने कह दी हैं ॥ १६-२० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने रोगानीक-विमानं
नाम षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातो व्याधितरूणीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'व्याधितरूपीय' विमान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
इह खलु द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः । तद्यथा—गुरुव्याधित
एकः सत्त्वबलशरीरसंपदुपेतत्वाल्लघुव्याधित इव दृश्यते, लघुव्याधि-
तोऽपरः सत्त्वादीनामधमत्वाद् गुरुव्याधित इव दृश्यते, तयोरकुशलाः
केवलं चक्षुषैव रूपं दृष्ट्वाऽध्यवस्यन्तो व्याधिगुरुलाघवे विप्रति-
पद्यन्ते ॥ ३ ॥
दो प्रकार के पुरुष रोगी की भाँति दीखते हैं (१) गुरु व्याधि से पीड़ित
एक मनुष्य और सत्त्व, बल, और शरीर इनके उत्कर्ष से गुरु व्याधि वाला होने
पर भी लघुव्याधि से पीड़ित सा दिखाई देता है। दूसरा सत्त्व, बल, शरीर
इनके न्यून होने से लघु व्याधि होने पर भी गुरु व्याधि से पीड़ित दिखाई देता
है। इनमें अकुशल वैद्य केवल आंख से ही देखकर गुरु व्याधि और लघु
व्याधि के ज्ञान में मोह या धोखे में पड़ जाते हैं। वे गुरु व्याधि को लघु-व्याधि
और लघु-व्याधि को गुरु-व्याधि समझ लेते हैं ॥ ३ ॥
न हि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमुपपद्यते; विप्रतिपन्नास्तु खलु
रोगज्ञाने, उपक्रमयुक्तिज्ञाने चापि विप्रतिपद्यन्ते । ते यदा गुरुव्याधितं
लघुव्याधितरूपमासादयन्ति, तदा तमल्पदोषं मत्वा संशोधनकालेऽस्मै
मृदुसंशोधनं प्रयच्छन्तो भूय एवास्य दोषानुदीरयन्ति । यदा तु लघु-
व्याधितं गुरुव्याधितरूपमासादयन्ति, तं महादोषं मत्वा संशोधन-
कालेऽस्मै तीक्ष्णं संशोधनं प्रयच्छन्तो दोषानतिनिर्हृत्यव शरीरमस्य
क्षिण्वन्ति; एवमवयवेन ज्ञानस्य कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमिति मन्यमानाः