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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 556 of 639

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Page 556

५३८ चरकसंहिता [ अ० ६
तत्र वातलस्य वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानस्य क्षिप्रं वातः प्रको-
मापद्यते, न तथेतरौ दोषौ । स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तैर्विकारैः
शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं-स्नेहस्वेदो
विधियुक्तौ, मृदूनि च संशोधनानि स्नेहोष्ण-मधुराम्ल-लवण-युक्तानि,
तद्द्रव्यव्यवहार्याण्युपनाहनपोवेष्टनोन्मर्दन-परिषेकावगाहन-संवाहनावपी-
डन-वित्रासन-विस्मापन-विस्मारणानि, सुरासवविधानं, स्नेहाश्चानेकयो-
नयो दीपनीय-पाचनीय-वातहर-विरेचनीयोपहिताः तथा शतपाकाः
सहस्रपाकाः सर्वशश्च प्रयोगार्था बस्तयः, बस्तिनियमः, सुखशीलता
चेति ॥ १४ ॥
इन में वातप्रकृति का मनुष्य जब वायु को प्रकुपित करने वाले कारणों
का सेवन करता है तब वायु शीघ्र प्रकुपित हो जाता है, शेष दोनों दोष पित्त
और कफ इतना शीघ्र कुपित नहीं होते । वायु प्रकुपित होकर पूर्वोक्त अस्सी
प्रकार के वात रोगों (विकारों) में बल, वर्ण, सुख और आयुष्य को नष्ट
करने के लिये शरीर को पीड़ित करता है। इस वायु को शान्त करने के लिये
स्नेह-विधि और स्वेद-विधि हैं । एवं मृदु (तीक्ष्ण नहीं) स्नेह, उष्ण, मधुर,
अम्ल, लवण युक्त संशोधन, मृदु, स्नेहन, उष्ण, मधुर, अम्ल, लवण से युक्त
शोधन द्रव्य और आहार-द्रव्य, उपनाह (वातहर द्रव्यों का बन्धन), उद्वेष्टन
(वेष्टन लपेटना), उन्मर्दन (हाथों से मालिश), परिषेक (वातहर क्वाथो से
परिसेचन), अवगाहन (वात हर क्वाथो में डुबकी), संवाहन (कोमलता से
हाथ फेरना), अवपीड़न (ताडन), वित्रासन (डराना), विस्मापन (विस्मय
उत्पन्न करना), विस्मारण (भुलाना), सुरा और आसव (वाष्णी यंत्र से
तैयार किया पदार्थ सुरा, न तैयार किया हुआ आसव) का देना, स्थावर और
जंगम योनि के स्नेहों को दीपनीय, पाचनीय और विरेचनीय औषधियों से
मिलाकर सौ बार या हज़ार बार (अर्थात् बार-बार) पकाये हुए स्नेह, सब
प्रकार की बस्ति विधि, (बहुन बार पकाये तेलों की बस्ति भो उपयुक्त है), और
निरन्तर सुखी जीवन व्यतीत करना उत्तम है ॥ १४ ॥
पित्तलस्यापि पित्तप्रकोपणोक्तान्यासेवमानस्य क्षिप्रं पित्तं प्रको-
पमापद्यते, तथा नेतरौ दोषौ । तदस्य प्रकोपमापन्नं यथोक्तैर्विकारैः
शरीरमुपतपति बल-वर्ण-सुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं-सर्पि-
ष्पानं, सर्पिषा च स्नेहनमधश्च दापहरणं, मधुर-तिक्त-कषाय-शीतानां
चौषधाभ्यवहार्याणामुपयोगो मृदु-मधुर-सुरभि-शीत-हृद्यानां गन्धानां
चोपसेवा, मुक्तामणिरहारावळीनां च परम-शिशिर-वारि-संस्थितानां धार-