चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
About this granth
The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.
This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.
As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.
५२६ चरकसंहिता [ अ० ५
चलना), प्रकुपित (बहुत तेजी से चलना), थोड़ा थोड़ा चलना, अभीक्ष्ण (बार-
बार रुक रुक कर आना), शब्दशूल अर्थात् वेदनायुक्त शब्द के साथ, श्वास लेते
हुए रोगी को देखकर प्राणवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥७॥
उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च। प्रदुष्टानां खल्वेषामिदं
विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—जिह्वा-ताल्वोष्ठ-कण्ठ-क्लोम-शोषं पिपासां
चातिप्रवृद्धां दृष्ट्वा भिषगुदकवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥८॥
उदकवह स्रोतों का मूल तालु और क्लोम (पित्ताशय) है। इन उदक-
वह स्रोतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। यथा—जिह्वा, तालु, ओष्ठ, कण्ठ
क्लोम का सूख जाना, प्यास का बहुत अधिक लगना ये लक्षण देखकर उदक-
वह-स्रोत विकृत हुए हैं यह समझना चाहिये ॥८॥
अन्नवहानां स्रोतसामामाशयो मूलं वामं च पार्श्वम्। प्रदुष्टानां तु
खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—अनन्नाभिलषणमरोचका-
विपाकौ छर्दि च दृष्ट्वाऽन्नवहानि स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ६ ॥
अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय और वाम पार्श्व है। इन के दुष्ट होने पर
ये लक्षण होते हैं। यथा—अन्न की रुचि का न होना, अरुचि, अविपाक, वमन।
इन लक्षणों को देखकर अन्नवह स्रोत विकृत हुए यह समझना चाहिये ॥ ९ ॥
रसवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं दश च धमन्यः। शोणितवहानां
स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च। मांसवहानां च स्रोतसां स्नायु मूलं त्वक्च
मेदोवहानां स्रोतसां वृक्कौ मूलं वपावहनं च। अस्थिवहानां स्रोतसां
मेदो मूलं जघनं च। मज्जावहानां स्रोतसामस्थीनि मूलं संधयश्च।
शुक्रवहानां स्रोतसां वृषणो मूलं शेफश्च। प्रदुष्टानां तु खल्वेषां रसा-
दिस्रोतसां विज्ञानान्युक्तानि विविधाशितपीतीयेऽध्याये। यान्येव हि
धातूनां प्रदोषविज्ञानानि तान्येव यथास्वं धातुस्रोतसाम् ॥ १० ॥
रसवह स्रोतों का मूल हृदय और हृदय से सम्बद्ध दस धमनियां
हैं। शोणित (रक्त) वह स्रोतों का मूल यकृत् और प्लीहा है।
मांसवह स्रोतों का मूल स्नायु और त्वचा है। मेदोवह स्रोतों का मूल दो
वृक्क (दो मांसपिण्ड एक दक्षिण पार्श्व में स्थित और दूसरा वाम पार्श्व में
१. क्लोम को सुश्रुत में 'पिपासा-स्थान' माना है। क्लोम का स्थान गले में
जरा नीचे की ओर दक्षिण पार्श्व में मना है। जिसको आज कल 'तिलक' या
(कण्ठकूप) कहते हैं। वैद्य श्री हरिप्रपन्न ने 'क्लोम याथातथ्यम्' नाम एक
पुस्तक लिखी है उस में पित्ताशय को यह नाम दिया है।
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वृक्क ) और वपावह है । अस्थिवह स्रोतों का मूल मेद और जघन है । मज्जा-
वह स्रोतों का मूल अस्थियां और सन्धियां हैं । शुक्रवह स्रोतों का मूल दोनों
अण्डकोश और लिङ्ग-इन्द्रिय हैं । विविधाशितपीतीय अध्याय में रसादि धातुओं
के दुष्ट होने से उत्पन्न होने वाले रोगों को कह दिया है । ये ही इन रसवह
आदि स्रोतों के दुष्ट होने के लक्षण हैं । जो दूषित हुए धातुओं के लक्षण हैं वे
ही दुष्ट हुए धातुवह स्रोतों के भी लक्षण होते हैं ॥१०॥
मूत्रवहानां स्रोतसां बस्तिर्मूलं वङ्क्षणौ च । खल्वेषामिदं विशेष-
विज्ञानं भवति । तद्यथा अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पल्पमभीक्ष्णं वा
बहलं सशूलं मूत्रयन्तं दृष्ट्वा मूत्रवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति
विद्यात् ॥ ११ ॥
मूत्रवह स्रोतो का मूल बस्ति ( मूत्राशय ) और वंक्षण ( वृक्क ) हैं । इन
के दूषित होने पर ये लक्षण होते हैं । जैसे-मूत्र का अधिक आना, रुक २ कर
आना, बार बार आना, थोड़ा थोड़ा आना, मात्रा में अधिक ( गाढ़ा ), दर्द
के साथ आना । ये लक्षण देखकर मूत्रवह स्रोत दुष्ट हुए समझने चाहिये ॥११॥
पुरीषवहानां स्रोतसां पक्वाशयो मूलं स्थूलगुदञ्च । प्रदुष्टानां
खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा-कृच्छ्रेणाल्पल्पं सशूल-
मतिद्रवं कुथितमतिग्रथितमतिबहु चोपविशन्तं दृष्ट्वा पुरीषवहान्यस्य
स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ १२ ॥
पुरीषवह स्रोतो का मूल पक्वाशय, स्थूलांत्र और गुदा है। इन के दूषित
होने पर ये लक्षण होते हैं । तथा-कठिनाई से थोड़ा थोड़ा, शब्द और वेदना
के साथ, बहुत पतला ( पानी जैसा ), बहुत कठिन, मात्रा में मल का बहुत
अधिक आना, इन लक्षणों को देखकर पुरीषवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना
चाहिये ॥ १२ ॥
स्वेदवहानां स्रोतसां मेदो मूलं रोमकूपाश्च । प्रदुष्टानां खल्वेषा-
मिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमति-
श्लक्ष्णतामङ्गस्य परिदाहं लोमहर्षं च दृष्ट्वा स्वेदवहान्यस्य स्रोतांसि
प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ १३ ॥
स्वेदवह स्रोतों का मूल मेद और लोमकूप हैं। इन के दूषित होने पर ये
लक्षण होते हैं। जैसे-पसीने का न आना या बहुत आना, त्वचा में कठोरता
या बहुत चिकनास, अङ्गों में दाह और शरीर में रोमांच होना । इन लक्षणों को
देखकर स्वेदवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥ १३ ॥
५३८ चरकसंहिता [ अ० ५
स्रोतांसि सिरा धमन्यो रसायन्यो रसवाहिन्यो नाड्यः पन्थानो
मार्गाः शरीरच्छिद्राणि संवृतासंवृतानि स्थानान्याशयाः क्षया निकेता-
श्चेति शरीरधात्ववकाशानां लक्ष्यालक्ष्याणां नामानि भवन्ति ॥ १४ ॥
स्रोतों के पर्याय—स्रोत, सिरा, धमनी, रसायनी, रसवाहिनी, नाड़ी, पन्था
मार्ग, शरीरच्छिद्र, संवृत-असंवृत, स्थान, आशय, क्षय और निकेत ये शरीर के
धातुओं को ले जाने के लिये जो आंख से दीखने या न दीखने योग्य छेद हैं
उन स्रोतों के नाम हैं। १४ ॥
तेषां प्रकोपात्स्थानस्थाश्चैव मार्गगाश्चैव शरीरधातवः प्रकोपमाप-
द्यन्ते। इतरेषां च प्रकोपादितराणि। स्रोतांसि स्रोतांस्येव धातवश्च
धातूनेव प्रदूषयन्ति प्रदुष्टाः; तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणो दूषयि-
तारो भवन्ति, दोषस्वभावादिति ॥ १५ ॥
इन स्रोतों (छिद्रों) के प्रकुपित होने से आशय में स्थित, मार्ग में स्रोतों
से जाने वाले शरीर के धातु भी प्रकुपित हो जाते हैं। दूसरों के प्रकोप से और भ
(स्रोतस्, वातादि दोष) कुपित होकर दुष्ट हुए स्रोत अन्य स्रोतों को दूषित
कर देते हैं। दुष्ट हुए धातु सब धातुओं को दूषित कर देते हैं। सब स्रोतों तथा
धातुओं को दूषित करने वाले वात, पित्त, कफ ही होते हैं। क्योकि दोष स्वभाव
होने से अर्थात् दूषित करना ही इनका स्वभाव है ॥ १५ ॥
भवन्ति चात्र—क्षयात्संधारणाद्रौक्ष्याद् व्यायामात्क्षुधितस्य च।
प्राणवाहीनि दुष्यन्ति स्रोतांस्यन्यैश्च दारुणैः ॥ १६ ॥
औष्ण्यादामाद्भयात्पानादतिशुष्कान्नसेवनात्।
अम्बुवाहीनि दुष्यन्ति तृष्णायाश्चातिपीडनात् ॥ १७ ॥
अतिमात्रस्य चाकाले चाहितस्य च भोजनात्।
अन्नवाहीनि दुष्यन्ति वैगुण्यात्पावकस्य च ॥ १८ ॥
गुरुशीतमतिस्निग्धमतिमात्रं समश्नताम्।
रसवाहीनि दुष्यन्ति चिन्त्यानां चातिचिन्तनात् ॥ १६ ॥
विदाहीन्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि द्रवाणि च।
रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चाऽऽतपानलौ ॥ २० ॥
अभिष्यन्दीनि भोज्यानि स्थूलानि च गुरूणि च।
मांसवाहीनि दुष्यन्ति भुक्त्वा च स्वपतां दिवा ॥ २१ ॥
अव्यायामाद्दिवास्वप्नान्मेध्यानां चातिभक्षणात्।
मेदोवाहीनि दुष्यन्ति वारुण्याश्चातिसेवनात् ॥ २२ ॥
अ० ५ ] २४ विमानस्थानम् ५२६
अ० ५ ] २४ विमानस्थानम् ५२६
व्यायामादतिसंक्षोभादस्थ्नामविविघट्टनात् ।
अस्थिवाहिनी दुष्यन्ति वातलानां च सेवनात् ॥ २३ ॥
उत्पेषणादत्यभिष्यन्दादभिघातात्प्रपीडनात् ।
मज्जवाहीनि दुष्यन्ति विरुद्धानां च सेवनात् ॥ २४ ॥
अकालयोनिगमनान्निग्रहादतिमैथुनात् ।
शुक्रवाहीनि दुष्यन्ति शस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा ॥ २५ ॥
मूत्रितोदक-भक्ष्य-स्त्री-सेवनान्मूत्रनिग्रहात् ।
मूत्रवाहीनि दुष्यन्ति क्षीणस्याभिक्षतस्य च ॥ २६ ॥
विधारणादत्यशनादजीर्णाध्यशनात्तथा ।
वर्चोवाहीनि दुष्यन्ति दुर्बलाग्नेः कृशस्य च ॥ २७ ॥
व्यायामादतिसंतापाच्छीतोष्णाक्रमसेवनात् ।
स्वेदवाहीनि दुष्यन्ति क्रोधशोकमयैस्तथा ॥ २८ ॥
प्रकुपित होने के कारण—धातु-क्षय से, उपस्थित वेगों को रोकने से, रूक्षता
से, भूख लगे होने पर व्यायाम करने से और अन्य कठिन कार्यों से प्राणवाही
स्रोत कुपित होते हैं ।
गरमी से, आम-दोष से, भय से, बहुत पानी पीने से, शुष्क अन्न (चने
आदि) के अधिक सेवन से और प्यास को ज़बर्दस्ती रोकने से उदकवाही
स्रोत कुपित होते हैं ।
मात्रा का अतिक्रमण करके भोजन करने से, अप्राप्त या अतीत काल में
भोजन करने से, अपथ्य भोजन के सेवन से और जाठराग्नि के मन्द होने से
अन्नवह स्रोत कुपित होते हैं ।
गुरु, शीत, अतिस्निग्ध पदार्थों के बहुत अकिध सेवन करने से, चिन्ता
करने योग्य वस्तुओं को बहुत अधिक चिन्ता करने से रसग्राही स्रोत दूषित
होते हैं ।
जलन पैदा करने वाले, स्निग्ध, गरम और तरल खान-पान के सेवन और
धूप और वायु का सेवन करनेवाले पुरुषों के रक्तवाही स्रोत दूषित होते हैं ।
दोष, धातु, मल और स्रोतों में कफ बढ़ाने वाले, स्थूल और गुरु (भारी)
पदार्थ खाकर दिन में सोनेवालों के मांसवाही स्रोत दूषित होते हैं ।
व्यायाम के न करने से, दिन में सोने से, चर्बी वाले पशुओं के मांस
(सुअर का मांस) के अधिक सेवन से, मद्य के अधिक पीने से मेदोवाही स्रोत
दूषित होते हैं ।
अधिक व्यायाम से, अति संक्षोभ से, चोट आदि से, अस्थियों के अधिक
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चलाने (मोड़ने माड़ने से) से, वायु वर्धक खान-पान के सेवन से अस्थिवाही
स्रोत दूषित होते हैं।
उत्पेषण (पीसने) से, अभिष्यन्दी पदार्थों के अतिसेवन से, चोट से,
दण्डे की चोट से तथा विरोधी अन्न-पान के सेवन से मज्जावाही स्रोत
दूषित होते हैं।
अकाल (निषिद्ध तिथियों में ऋतुमती आदि से) सम्भोग करने से,
अयोनि (निषिद्ध योनि) में सम्भोग करने से, उपस्थित शुक्र के वेग को रोकने
से, अतिमैथुन से, शस्त्र, क्षार और अग्नि से शुक्रवाही स्रोत दूषित हो जाते हैं।
उपस्थित मूत्र-वेग के समय पानी, भोजन या स्त्री का सेवन करने से,
क्षीण और अतिकृश व्यक्ति के मूत्रवेग को रोकने से मूत्रवाही स्रोत दूषित
हो जाते हैं।
मल के उपस्थित वेग को रोकने से, मन्दाग्नि और निर्बल पुरुष के अति-
भोजन करने से, अजीर्ण में भोजन करने से, अध्यशन से मलवाही स्रोतः
दूषित होते हैं।
व्यायाम से, अति संक्षोभ से, शीत और उष्ण को बिना क्रम के सेवन करने
से, क्रोध, शोक एवं भय से स्वेदवाही स्रोत दूषित होते हैं ॥ १६-२८ ॥
आहारश्च विहारश्च यः स्याद्दोषगुणैः समः।
धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसां स प्रदूषकः ॥ २९ ॥
जो आहार विहार और कर्म वातादि दोषों के पृथक् अथवा समष्टि रूप में
गुणों के समान होता है, वह समान गुण के कारण इन को बढ़ाता है और
जो धातुओं से विपरीत गुणवाला हो वह आहार-विहार स्रोतों को दूषित
करता है ॥ २९ ॥
अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा।
विमार्गगमनं वापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ॥ ३० ॥
स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण—स्रोतों से रस आदि की अधिक
प्रवृत्ति अर्थात् अधिक निकलना अथवा एकदम से रुक जाना, सिराओं में
गांठ पड़ जाना, विमार्ग अर्थात् विपरीत, उल्टे मार्ग से जाने लगना, ये सब
स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण हैं ॥ ३० ॥
स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च।
स्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ॥ ३१ ॥
स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप—अपने धातु के समान रंग वाले (रक्तवाही
स्रोत रक्त के समान और मांसवाही स्रोत मांस के समान), वृत्त (गोल),
स्थूल और अणु (सूक्ष्म), दीर्घ और लता के समान फैले (कोई गोल, कोई
लम्बे, कोई स्थूल और कोई सूक्ष्म) होते हैं ॥ ३१ ॥
प्राणोदकान्नवाहानां दुष्टानां श्वासिकी क्रिया।
कार्या तृष्णोपशमनी तथैवाऽऽमप्रदोषिकी ॥ ३२ ॥
विविधाशितपीतीये रसादीनां यदौषधम्।
रसादिस्रोतसां कुर्यात्तच्चथास्वमुपक्रमम्॥ ३३ ॥
मूत्र-विट्-स्वेद-वाहानां चिकित्सा मौत्रकृच्छ्रिकी।
तथाऽतिसारिकी कार्या तथा ज्वरचिकित्सिकी॥ ३४॥ इति।
प्राण, उदक और अन्नवाही स्रोतों के दुष्ट होने पर क्रम से श्वासिकी
(अर्थात् हिक्का कास रोग में ही), श्वास को सुधारने वाली, तृष्णा-रोग
नाशक और आम-दोषनाशक चिकित्सा करनी चाहिये। प्राणवाही स्रोतों में
श्वासिकी उदकवाही में तृष्णाशमन और अन्नवाही में आम-प्रदोष नाशक
चिकित्सा करनी चाहिये। 'विविधाशितपीतीय' अध्याय में रस से लेकर
शुक्र तक दूषित धातुओं की जो चिकित्सा कही है, वही रसवह आदि दुष्ट
स्रोतों की भी समझनी चाहिये। उनकी उसी प्रकार चिकित्सा करनी चाहिये।
मूत्रवाही, मलवाही और स्वेदवाही स्रोतों के दूषित होने पर क्रमशः मूत्रकृच्छ्र
रोग की, अतिसार रोग की तथा ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३२-३४॥
तत्र श्लोकाः-त्रयोदशानां मूलानि स्रोतसां दृष्टिलक्षणम्।
सामान्यं नाम पर्यायाः कोपनानि परस्परम् ॥ ३५॥
दोषहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च।
स्रोतोविमाने निर्दिष्टस्तथा चाऽऽदौ विनिश्चयः ॥ ३६॥
केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः।
शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति ॥ ३७ ॥
तेरह प्रकार के स्रोतों के मूल, प्रत्येक के दूषित लक्षण, सब स्रोतों के
सामान्य दूषित लक्षण, नाम, पर्याय, परस्पर कोपन, दोष का कारण, पृथक् २
औषध और उपक्रम ये सब बातें इस स्रोतो-विमान अध्याय में भगवान् आत्रेय
ने कह दी हैं। जो भिषक् सम्पूर्ण शरीर के स्रोतों आदि को भली प्रकार
जानता है और जिस को शारीरिक और मानसिक सब प्रकार के रोग ज्ञात हैं,
वह चिकित्सा में कभी मोह को प्राप्त नहीं होता ॥ ३५-३७॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने
स्रोतोविमानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
५३२ चरकसंहिता [ अ० ६
षष्ठोऽध्यायः।
अथातो रोगानीकं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः॥ २ ॥
अब इसके आगे 'रोगानीक' नामक विमान का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥
द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं चासाध्यं च, द्वे रोगानीके
बलभेदेन मृदु च दारुणं च, द्वे रोगानीकेऽधिष्ठानभेदेन—मनोऽधिष्ठानं
शरीराधिष्ठानं च, द्वे रोगानीके निमित्तभेदेन स्वधातुवैषम्यनिमित्तं
चाऽऽगन्तुनिमित्तं च, द्वे रोगानीके आशयभेदेन—आमाशयसमुत्थं च
पक्वाशयसमुत्थं च। एवमेतत्प्रभाव-बलाधिष्ठान-निमित्ताशय-भेदाद् द्वैधं
सङ्गेदप्रकृत्यन्तरेण भिद्यमानमथवा संधीयमानं स्यादेकत्वं वा बहुत्वं
वा। एकत्वं तावदेकमेव रोगानीकं दुःखसामान्यात्, बहुत्वं तु दश
रोगानीकानि प्रभावभेदादिना भवन्ति। बहुत्वमपि संख्येयं स्यादसं-
ख्येयं वा स्यात्। तत्र संख्येयं तावद्यथोक्तमष्टोदरीये। अपरिसंख्येयं पुन-
र्यथा महारोगाध्याये, रुग्वर्णसमुत्थानादीनामसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥
प्रभाव के भेद से रोगों के समूह दो प्रकार के हैं, (१) साध्य और (२)
असाध्य। बल के भेद से रोग समूह दो प्रकार के हैं (१) मृदु (अल्पबल) और
(२) दारुण (महाबल)। अधिष्ठान अर्थात् आश्रय के भेद से रोग दो प्रकार के हैं
(१) मानस, मन जिनका अधिष्ठान है और शारीरिक जिनका शरीर अधिष्ठान है।
कारण के भेद से रोग दो प्रकार के हैं, (१) धातुओं (वात, पित्त, कफ) की विष-
मता से होने वाले और (२) आगन्तुक कारण से होने वाले। आमाशय के भेद
से रोग दो प्रकार के हैं। (१) आमाशय से उत्पन्न होने वाले और (२) पक्वा-
शय से उत्पन्न होने वाले। (आमाशय पित्त और कफ का स्थान है और पक्वाशय
वायु का स्थान है।) इस प्रकार प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आश्रय
के भेद से रोग दो प्रकार के होने पर भी प्रकृति आदि भेदों के कारण अनेक
प्रकार के हो जाते हैं। रोग का रूप एक प्रकार का ही है। रुजा, दुःख,
पीड़ा यह सब प्रकार के रोगों में सामान्य धर्म है। रोग बहुत हैं, क्योंकि प्रभाव,
बल आदि के भेद से रोग बहुत प्रकार के हो जाते हैं। यह बहुत होना भी दो
प्रकार का है। संख्येय अर्थात् गिनने के योग्य एवं असंख्येय
अर्थात् गणना के अयोग्य । गिनने के योग्य जैसे अष्टोदरीय रोगाध्याय में
अ० ६ ] विमानस्थानम् ५३३
अ० ६ ] विमानस्थानम् ५३३
रोगों की गणना की है। असंख्य जैसे महारोगाध्याय में रुक्, वर्ण समुत्थान
आदि के कारण असंख्य हो जाते हैं ॥३॥
न च संख्येयाग्रेषु भेदप्रकृत्यन्तगीयेषु विगीतिरित्यतो दोषवती स्या-
दत्र काचित्प्रतिज्ञा, न चाविगीतिरित्यतः स्याद्दोषवती। भेत्ता हि
भेद्यमन्यथा भिनत्ति, अन्यथा पुरुषस्तावद्भिन्नं भेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्द-
न् भेदसंख्याविशेषमापादयत्यनेकधा, नच पूर्वं भेदाप्रमुपहन्ति। स-
मानायामपि खलु भेदप्रकृतौ प्रकृतानुप्रयोगान्तरमपेक्ष्यम्। सन्ति
ह्यर्थान्तराणि समानशब्दाभिहितानि। सन्ति चानर्थान्तराणि पर्याय-
शब्दाभिहितानि। समानो हि रोगशब्दो दोषेषु च व्याधिषु च, दोषा
ह्यपि रोगशब्दमातङ्कशब्दं यक्ष्मशब्दं दोषप्रकृतिशब्दं विकारशब्दं च
लभन्ते। व्याधयश्च रोगशब्दमातङ्कशब्दं यक्ष्मशब्दं दोषप्रकृतिशब्दं
विकारशब्दं च लभन्ते। तत्र दोषेषु चैव व्याधिषु च रोगशब्दः समानः,
शेषेषु तु विशेषवान् ॥४॥
तत्र व्याधयोऽपरिसंख्येया भवन्ति, अतिबहुत्वात्। दोषास्तु खलु
परिसंख्येयाः, अनतिबहुत्वात्। तस्माद्यथाचित्रं विकारा उदाहरणार्थ-
मनवशेषेण च दोषा व्याख्यास्यन्ते।
एक ही रोग में संख्येयत्व और असंख्येयत्व ये दोनों विरुद्ध बातें किस
प्रकार हो सकती हैं ? प्रकृति भेद के कारण (ज्वर, अतिसार आदि भेद से)
गिने जाने योग्य रोगों में एक और अनेक भेद का कथन परस्पर विरुद्ध दोष-
युक्त नहीं है। यदि ऐसा विपरीत भाव न हो तो इतने से कोई कथन दोषरहित
भी नहीं होता।
भेद दर्शाने वाला पुरुष भेद्य रोग के अन्य रूप से भेद करता है। पहिले
अन्य प्रकार (एक दूसरे ही रूप से) से भेद किये होते हैं। पहिले एक ही
भेद-प्रकृति से एक रूप से विभक्त किये हुए रोग को पीछे प्रकृति-भेद से विभाग
करके अनेक (असंख्य) भेद कर लेता है। इस प्रकार असंख्य भेद करने पर
भी वह प्रथम किये हुए भेदों का लोप नहीं करता, वह तो बने ही रहते हैं।
भेद-प्रकृति में समान होने पर भी प्रकृत अर्थात् समान शब्द से कहने के
बाद अन्य रूप से वर्णन करना भी अपेक्षित है। क्योंकि समान शब्द से कहने के
जाने वाले भी अनेक पदार्थ हैं और नाना पर्याय शब्दों से कहे जाने वाले एक
एक पदार्थ भी अनेक हैं। अर्थात् एक शब्द अनेकार्थवाचक है, और भिन्न
भिन्न शब्द एक ही अर्थ को कहते हैं। जैसे-रोग शब्द व्याधि और दोष के
लिये प्रयुक्त होता है। दोषों को रोग, आतंक, यक्ष्म, दोष, प्रकृति, विकार आदि
५३४ चरकसंहिता [ अ० ६
शब्दों से कहा जाता है। व्याधियां भी रोग, आतंक, यक्ष्म, दोष-प्रकृति और
विकार शब्दों से कही जाती हैं। इस प्रकार से दोषों और व्याधियों में रोग-शब्द
सामान्य रूप से प्रयुक्त होता है। शेष ज्वरादि में विशेष अर्थ को कहता है।
इनमें व्याधियां असंख्य हैं। क्योंकि ये बहुत अधिक हैं। दोष परिसंख्येय (गण-
ना के योग्य परिमित) हैं। क्योंकि ये बहुत अधिक नहीं हैं। इसलिये रोग के
असंख्य होने से, उदाहरण के लिये कुछ थोड़े से विकारों को सम्पूर्ण रूप में
और गिनने के योग्य होने से दोषों को सम्पूर्ण रूप से कहेंगे ॥ ४ ॥
रजस्तमश्च मानसौ दोषौ । तयोर्विकाराः काम-क्रोध-लोभ-मोहेर्ष्या-
मान-मद-शोक-चित्तोद्वेग-भय-हर्षादयः। वातपित्तश्लेष्माणस्तु खलु शारी-
रा दोषाः, तेषामपि च विकारा ज्वरातीसार-शोथ-शोष-श्वास-मेह-कुष्ठा-
दय इति । दोषाश्च केवला व्याख्याताः, विकारैकदेशश्च ॥ ५ ॥
रज और तम ये दो मानस दोष हैं। इन रज और तम के विकार काम,
क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, मद, शोक, चिन्ता, उद्वेग, भय हर्ष अतिसार
शोथ, शोष, मेह, कुष्ठ आदि हैं। इस प्रकार से सम्पूर्ण रूप में और विकार
एकांश में कह दिये हैं ॥ ५ ॥
तत्र तु खल्वेषां द्वयानामपि दोषाणां त्रिविधं प्रकोपणम्; तद्यथा-
असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्चेति । प्रकुपितास्तु खलु
प्रकोपणविशेषाद् दृश्यविशेषाच्च विकारविशेषानभिनिर्वर्तयन्त्यपरिसंख्ये-
यान् । ते विकाराः परस्परमनुवर्तमानाः कदाचिदनुबध्नन्ति कामादयो
ज्वरादयश्च । नियतस्त्वनुबन्धो रजस्तमसोः परस्परम् । न ह्यरजस्कं
तमः प्रवर्तते ॥ ६ ॥
इन दोनों प्रकार के (मानसिक और शारीरिक) दोषों के कुपित होने
के कारण तीन प्रकार के हैं। ( १ ) असात्म्येन्द्रियार्थ-संयोग ( २ ) प्रज्ञापराध
और ( ३ ) परिणाम । ये कुपित हुए दोष प्रकोपन भेद से, और दूष्य (शरीर
के धातुओं) के भेद से असंख्य रोगों को उत्पन्न करते हैं। ये उत्पन्न होकर
कभी परस्पर एक दूसरे विकारों से मिल जाते हैं (शारीरिक रोग मानसिक रोगों
से और मानसिक विकार शारीरिक विकारों से)। जैसे काम आदि मानसिक
विकार, ज्वर आदि शारीरिक विकारों से मिल जाते हैं।
रज और तम का परस्पर सम्बन्ध नियत (सदा स्थिर) बना रहता है। क्योंकि
तम रज के बिना नहीं रह सकता, किन्तु सदा रज के साथ मिला रहता है ॥६॥
प्रायः शरीरदोषाणामेकाधिष्ठानीयानां संनिपातः संसर्गो वा
समानगुणत्वात् । दोषा हि दूषणैः समानाः ॥ ७ ॥
प्रायः वात आदि शारीरिक दोषों के एक स्थान में रहने से परस्पर मेल
हो जाता है। तीनों दोषों के मिलने से सन्निपात और दो दोषों के मिलने
से संसर्ग होता है। कारण की भिन्नता होने पर भी इन में जो परस्पर संसर्ग
होता है वह इसलिये होता है कि दोष दूषित करने वाले कारणों के समान गुण
वाले हैं। अर्थात् दोषों में दूषित करने वाले कारणों के समान गुण हैं ॥ ७ ॥
तत्रानुबन्ध्याद्यनुबन्धविशेषः, -स्वतन्त्रो व्यक्तलिङ्गो यथोक्तसमुत्थान-
प्रशमो भवत्यनुबन्ध्यः, तद्विपरीतलक्षणस्त्वनुबन्धः। १अनुबन्ध्य-
(अनुबन्ध) लक्षणसमन्वितास्तत्र यदि दोषा भवन्ति तत् त्रिकं संनि-
पातमाचक्षते, द्वयं वा संसर्गम् । अनुबन्ध-२विशेषकृतस्तु बहुविधो
दोषभेदः। एवमेष संज्ञाप्रकृतो भिषजां दोषेषु चैव व्याधिषु च नाना-
प्रकृतिविशेष्यूहः ॥ ८ ॥
अधिष्ठान (आश्रय) और निदान की समानता होने पर भी अनुबन्ध्य
और अनुबन्ध के कारण इन में भेद होता है।
अनुबन्ध्य का लक्षण - जो स्वतन्त्र (स्वतः प्रधान), स्पष्ट लक्षणोंवाला,
अपने ही कारण से उत्पन्न होने वाला तथा अपनी ही चिकित्सा से शान्त होने
वाला हो, उसको अनुबन्ध्य कहते हैं। इस के विपरीत लक्षणोंवाला (परतंत्र,
अस्पष्ट चिह्न, पृथक् निदान एवं चिकित्सा वाला) अनुबन्ध होता है। यदि
अनुबन्ध्य के रूप से तीनों दोष मिले हों तो इसे सन्निपात और दो दोष मिले
हों तो इस को 'संसर्ग' कहते हैं। अनुबन्ध के रूप में मिले हुए दोषों के बहुत
भेद हो जाते हैं। इस प्रकार से दोषों में (अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के भेद से)
और रोगों से (प्रकोपन आदि के भेद से) वैद्योंने (सन्निपात, संसर्गादि से
ज्वर अतिसार आदि) नाना प्रकार की संज्ञाएं की हैं ॥ ८ ॥
अग्निषु तु शारीरेषु चतुर्विधो बलभेदेन भवति। तद्यथा-तीक्ष्णो
मन्दः समा विषम इति। तत्र तीक्ष्णोऽग्निः सर्वापचारसहः तद्विपरी-
तलक्षणो मन्दः। समस्तु खल्वपचारतो विकृतिमापद्यतेऽनपचारतस्तु
प्रकृताववतिष्ठते, समलक्षणविपरीतलक्षणस्तु विषमः । इत्येते चतुर्विधा
भवन्त्यग्नयश्चतुर्विधानामेव पुरुषाणाम् ॥ ६ ॥
बल के भेद के कारण शरीरस्थ अग्नि चार प्रकार का है। जैसे-तीक्ष्ण
मन्द, सम और विषम। इन में तीक्ष्ण अग्नि सब प्रकार के अपचारों को सहन
करता है। वह विषम आहार को भी शीघ्र जीर्ण कर देता है। तीक्ष्ण अग्नि
से विपरीत लक्षणों वाले अग्नि को मन्द-अग्नि कहते हैं। सम अग्नि यथासमय
१ 'अनुबन्ध्य लक्षण सम०', २. 'अनुबन्ध्यानुबन्धविशेष०' इति च पाठ भेदो।
५३६ चरकसंहिता [ अ० ६
भुक्त अन्न को भली प्रकार पचाता है । यह अग्नि अपचार से विकृति को प्राप्त
होता है । अनपचार से प्रकृति में ही रहता है । सम अग्नि के विपरीत लक्षणों
वाले अग्नि को 'विषम' अग्नि कहते हैं ॥ ६ ॥
तत्र समवातपित्तश्लेष्मणां प्रकृतिस्थानां समा भवन्त्यग्नयः, वात-
लानां तु वाताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने विषमा भवन्त्यग्नयः, पित्तलानां तु
पित्ताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने तीक्ष्णा भवन्त्यग्नयः, श्लेष्मलानां तु श्लेष्मा-
भिभूते ह्यग्न्यधिष्ठाने मन्दा भवन्त्यग्नयः ॥ १० ॥
ये चार प्रकार के अग्नि चार प्रकार के पुरुषों में होते हैं । जैसे—सम-वात
पित्त-कफ-प्रकृति-वाले पुरुषों में दोषों के समानावस्था में स्थित होने से अग्नि
भी सम रहता है । वातप्रकृति वाले पुरुषों में अग्नि के आश्रय स्थान (ग्रहणी)
के वायु से आक्रान्त होने के कारण अग्नि भी विषम रहता है । पित्तप्रकृति के
पुरुषों में अग्नि के अधिष्ठान (ग्रहणी) के पित्त से आक्रान्त होने के कारण
अग्नि भी तीक्ष्ण रहता है । कफप्रकृति के पुरुषों में अग्नि के आश्रय स्थान
(ग्रहणी) के कफ से आक्रान्त होने के कारण अग्नि भी मन्द रहता है ॥ १० ॥
तत्र केचिदाहुः—न समवातपित्तश्लेष्माणो जन्तवः सन्ति, विष-
माहारोपयोगित्वान्मनुष्याणाम् । तस्माच्च वातप्रकृतयः केचित् केचित्पि-
त्तप्रकृतयः, केचिःपुनः श्लेष्मप्रकृतयो भवन्तीति ।
इस पर कुछ आचार्यों का कथन है कि समवात-पित्त-कफ प्रकृति वाले
पुरुष नहीं होते । क्योंकि मनुष्यों का आहार विषम होता है । गर्भ में ही
प्रकृति बनती है । इसलिये (माता के आहार की विषमता से भी) कोई वात-
प्रकृति, कोई पित्तप्रकृति और कोई कफप्रकृति होते हैं ।
तच्चानुपपन्नम् । कस्मात्कारणात् ? समवातपित्तश्लेष्माणं हारोगमि-
च्छन्ति भिषजः । यतः प्रकृतिश्चाऽऽरोग्यं, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः,
सा चेष्टरूपा, तस्मात्सन्ति समवातपित्तश्लेष्माणः । न तु खलु सन्ति
वातप्रकृतयः पित्तप्रकृतयः श्लेष्मप्रकृतयो वा । तस्य तस्य किल दोष-
स्य ह्यधिकभावात्सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणाम् । न च विकृतेषु
दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुपपद्यते । तस्मान्नैताः प्रकृतयः सन्ति । सन्ति तु
खलु वातलाः पित्तलाः श्लेष्मलाश्च । अप्रकृतिस्थास्तु ते ज्ञेयाः ॥ ११ ॥
उनका ऐसा कथन ठीक नहीं हैं, क्योंकि वैद्य लोग वात, पित्त, कफ इन
तीनों की समान अवस्था वाले को ही नीरोग (रोग-रहित) कहते हैं और उसी
को प्रकृति मानते हैं । रोगों से रहित रहने के लिये ही औषध की ओर मनुष्य
की प्रवृत्ति है और यह सब को इष्ट है । यह अभिवाञ्छित अर्थ ही प्रवृत्ति में
अ० ६ ] विमानस्थानम १३७
अ० ६ ] विमानस्थानम १३७
हेतु है । इसलिये समान-वात-पित्त-कफ प्रकृति के भी मनुष्य होते हैं । परन्तु
वातप्रकृति, पित्तप्रकृति, और कफप्रकृति के मनुष्य नहीं होते हैं । उस उस
दोष की अधिकता से मनुष्यों की २-वह दोष-प्रकृति कही जाती है । विकृत
(विषम ) हुए दोषों को 'प्रकृति' नहीं कहा जा सकता, ( क्योंकि दोषों की
समान अवस्था का नाम 'प्रकृति' है ) । इसलिये वातप्रकृति आदि प्रकृतियाँ
नहीं हैं । हां, वातल, पित्तल, और श्लेष्मल ( वात-बहुल, पित्त-बहुल, श्लेष्म-
बहुल ) मनुष्य हैं । इन को 'अप्रकृतिस्थ' (प्रकृति में न रहने वाले ) समझना
चाहिये, ये 'विकृतिस्थ' हैं ॥ ११ ॥
तेषां तु खलु चतुर्विधानां पुरुषाणां चत्वार्यनुप्रणिधानानि श्रेयस्क-
राणि । तत्र समसर्वधातूनां सर्वाकारसमं अधिकदोषाणां तु त्रयाणां
यथास्वं दोषाधिक्यमभिसमीक्ष्य दोषप्रतिकूलयोगीनित्रीण्यनुप्रणिधा-
नानि श्रेयस्कराणि भवन्ति यावदग्नेः समीभावात्, समेतु सममेव
कार्यम्, एवं चेष्टा भेषजप्रयोगांश्चापरे, तान् विस्तरेणानुव्याख्या-
स्यामः ॥ १२ ॥
इन चार प्रकार के ( सम प्रकृति, वात, पित्त, कफ एवं तीक्ष्ण, मन्द, विषम
और समाग्नि ) प्रकृति वाले पुरुषों को आगे कहे जाने वाले चार प्रकार के
अन्न-पान का सेवन करना हितकारी होता है । इन में सम सर्वधातु ( दोषों )
वाले पुरुषों को सब प्रकार का सेवन समान रूप में करना श्रेयस्कर है । शेष
अधिक दोषों वाले वातल, पित्तल, श्लेष्मल तीनों को उन २ के दोषों की अधि-
कता को देखकर दोष के प्रतिकूल वस्तुओं का तब तक सेवन करना चाहिये
जब तक अग्नि समान अवस्था में न आये । समान अवस्था में आने पर बन्द
कर सब का समान रूप में सेवन करना चाहिये । इसी प्रकार धातुओं को समान
करनेवाले अन्यान्य भेषज प्रयोग भी अभीष्ट हैं। उन का विस्तार से वर्णन करेंगे ॥
त्रयस्तु पुरुषा भवन्त्यातुराः, ते त्वनातुरास्तन्त्रान्तरीयाणां भिषजाम् ।
तद्यथा—वातलः पित्तलः श्लेष्मलश्चेति । तेषां विशेषविज्ञानं—वात-
लस्य वातनिमित्ताः, पित्तलस्य पित्तनिमित्ताः, श्लेष्मलस्य श्लेष्मनिमित्ता
व्याधयः प्रायेण बलवन्तश्च भवन्ति ॥ १३॥
वातल, पित्तल और श्लेष्मल ये तीन प्रकार के रोगी होते हैं । अन्य तन्त्र-
कर्त्ताओं के मत से ये रोगी नहीं हैं । यथा—वातल, पित्तल और श्लेष्मल ।
इन के मत में ये भी प्रकृतियां हैं । इस प्रकार से सात प्रकृतियां हैं । इन में
यह बात विशेषकर जानने योग्य है कि वातप्रकृति को वायुजन्य, पित्तल को पित्त-
जन्य और श्लेष्मल को कफजन्य रोग प्रायः और बलवान् रूप में होते हैं ॥१३॥
५३८ चरकसंहिता [ अ० ६
तत्र वातलस्य वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानस्य क्षिप्रं वातः प्रको-
मापद्यते, न तथेतरौ दोषौ । स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तैर्विकारैः
शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं-स्नेहस्वेदो
विधियुक्तौ, मृदूनि च संशोधनानि स्नेहोष्ण-मधुराम्ल-लवण-युक्तानि,
तद्द्रव्यव्यवहार्याण्युपनाहनपोवेष्टनोन्मर्दन-परिषेकावगाहन-संवाहनावपी-
डन-वित्रासन-विस्मापन-विस्मारणानि, सुरासवविधानं, स्नेहाश्चानेकयो-
नयो दीपनीय-पाचनीय-वातहर-विरेचनीयोपहिताः तथा शतपाकाः
सहस्रपाकाः सर्वशश्च प्रयोगार्था बस्तयः, बस्तिनियमः, सुखशीलता
चेति ॥ १४ ॥
इन में वातप्रकृति का मनुष्य जब वायु को प्रकुपित करने वाले कारणों
का सेवन करता है तब वायु शीघ्र प्रकुपित हो जाता है, शेष दोनों दोष पित्त
और कफ इतना शीघ्र कुपित नहीं होते । वायु प्रकुपित होकर पूर्वोक्त अस्सी
प्रकार के वात रोगों (विकारों) में बल, वर्ण, सुख और आयुष्य को नष्ट
करने के लिये शरीर को पीड़ित करता है। इस वायु को शान्त करने के लिये
स्नेह-विधि और स्वेद-विधि हैं । एवं मृदु (तीक्ष्ण नहीं) स्नेह, उष्ण, मधुर,
अम्ल, लवण युक्त संशोधन, मृदु, स्नेहन, उष्ण, मधुर, अम्ल, लवण से युक्त
शोधन द्रव्य और आहार-द्रव्य, उपनाह (वातहर द्रव्यों का बन्धन), उद्वेष्टन
(वेष्टन लपेटना), उन्मर्दन (हाथों से मालिश), परिषेक (वातहर क्वाथो से
परिसेचन), अवगाहन (वात हर क्वाथो में डुबकी), संवाहन (कोमलता से
हाथ फेरना), अवपीड़न (ताडन), वित्रासन (डराना), विस्मापन (विस्मय
उत्पन्न करना), विस्मारण (भुलाना), सुरा और आसव (वाष्णी यंत्र से
तैयार किया पदार्थ सुरा, न तैयार किया हुआ आसव) का देना, स्थावर और
जंगम योनि के स्नेहों को दीपनीय, पाचनीय और विरेचनीय औषधियों से
मिलाकर सौ बार या हज़ार बार (अर्थात् बार-बार) पकाये हुए स्नेह, सब
प्रकार की बस्ति विधि, (बहुन बार पकाये तेलों की बस्ति भो उपयुक्त है), और
निरन्तर सुखी जीवन व्यतीत करना उत्तम है ॥ १४ ॥
पित्तलस्यापि पित्तप्रकोपणोक्तान्यासेवमानस्य क्षिप्रं पित्तं प्रको-
पमापद्यते, तथा नेतरौ दोषौ । तदस्य प्रकोपमापन्नं यथोक्तैर्विकारैः
शरीरमुपतपति बल-वर्ण-सुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं-सर्पि-
ष्पानं, सर्पिषा च स्नेहनमधश्च दापहरणं, मधुर-तिक्त-कषाय-शीतानां
चौषधाभ्यवहार्याणामुपयोगो मृदु-मधुर-सुरभि-शीत-हृद्यानां गन्धानां
चोपसेवा, मुक्तामणिरहारावळीनां च परम-शिशिर-वारि-संस्थितानां धार-
णमुरसा क्षणे क्षणे चाम्रथ-चन्दन-प्रियङ्गु-कालीय-मृणाल-शीतवात-वारि-
भिरुत्पल-कुमुद-कोकनद-सोगन्धिक-पद्मानुगतैश्च वारिभिरभिप्रोक्षणं,
श्रुति-सुख-मृदुमधुर-मनोनुगानां च गीतवादित्राणां श्रवणं, श्रवणं चाभ्यु-
दयानां, सुहृद्भिश्च संयोगः, संयोगश्चेष्टाभिः स्त्रीभिः शीतोपहितांशुक्र-
स्रग्दामहारधारिणीभिनिशाकरांशु-शीतल-प्रवात-हर्म्यवासः, शैलान्तर-
पुलिन-शिशिरसदन-व्यजन-पवनानां सेवा, रम्याणां चोपवनानां
सेवा, सुख-शिशिर-सुरभि-मारुतोपवानानामुपसेवनं, सेवनं च नलि-
नोत्पल-पद्म-कुमुद-सौगन्धिक-पुण्डरीक-शतपत्र-रम्यतां सौम्यानां च
सर्वभावानामिति॥ १५॥
पित्त-प्रकृति का मनुष्य जब पित्त-प्रकोपक वस्तुओं का सेवन करता है उस
समय पित्त शीघ्र कुपित होजाता है, शेष अन्य दो धातु इतनी जल्दी कुपित
नहीं होते। तब इस पुरुष के पूर्वोक्त चालीस पित्तजन्य रोगों से शरीर आक्रान्त
हो जाता है, जिससे उसके बल, वर्ण, सुख और आयु का नाश होता है।
इस पित्त को शान्त करने के लिये घी का सेवन करना श्रेयस्कर है। शोधन के
लिये घी से स्नेहन (तेलादि से नहीं), अधोदपहरण अर्थात् विरेचन का देना,
मधुर, तिक्त, कषाय, और शीत ओषधियों से युक्त खान-पान का उपयोग, मृदु-
मधुर, सुगन्धित, शीतल और हृदय को प्रिय लगने वाले गन्धों (सुगन्धों)
का सेवन, अति ठण्डे पानी में रक्खे मोती, मणियों की मालाओं को छाती पर
धारण करना, थोड़ी देर में श्वेत चन्दन, प्रियंगु, कालीयक, (चन्दन का भेद)
मृणाल, शीतल वायु, शीतल पानी, उत्पल, कुमुद, कोकनद, सौगन्धिक और
पद्म (ये सब कमल के भेद हैं) इनसे हाथ-पांव धोना या छींटे डालना, कान
के लिये प्रिय, मृदु, मधुर एवं मन के अनुकूल गाना-बजाना सुनना, उत्सव
(नाच-रंग) आदि देखना, मित्रों से मिलना शीतल द्रव्यों से लिप्त वस्त्र,
माला, और हारों को धारण की हुई अभिलषित स्त्रियों से मिलना-जुलना,
चन्द्रमा की शीतल किरणों से शीतल खुली वायु मे, महल की छतों पर ठंडे,
पहाड़ों के बीच में, नदियों के तटों पर, ठंडे घरों (धारागृहों) में, ठण्डे
पंखों की शीतल वायु का सेवन, सुखस्पर्श, शिशिर, सुगन्धित वायु से युक्त
रम्य उपबनों का सेवन करना, पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्ड-
रीक, शतपत्र इन नाना प्रकार के कमलों से भरे तालाबों का सेवन और अन्य
सब सौम्य शीतल वस्तुओं का सेवन करना पित्त को शान्त करता है ॥ १५ ॥
श्लेष्मलस्यापि श्लेष्मप्रकोपणोकान्यासेवमानस्य क्षिप्रं श्लेष्मा
प्रकोपमापद्यते, न तथेतरौ दोषौ। स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तै-
५४० चरकसंहिता [ अ० ६
विकारैः शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं—
विधियुक्तानि तीक्ष्णोष्णानि संशोधनानि, रूक्षप्रायाणि चाभ्यवहा-
र्याणि कटु-तिक्त-कषायोपहितानि, तथैव धावन-लंघन-प्लवन-परिसरण-
जागरणानि युद्ध-व्यवाय-व्यायामोन्मर्दन-स्नानोत्साधनानि, विशेषत-
स्तीक्ष्णानां दीर्घकालस्थितानां मद्यानामुपयोगः, सधूमपानः सर्वशश्चो-
पवासः, तथोष्णवासः सुखप्रतिषेधश्च सुखार्थमेवेति ॥ १६ ॥
कफप्रकृति के मनुष्य का कफ प्रकोपक वस्तुओं को सेवन करने से शीघ्र
प्रकुपित हो जाता है, शेष अन्य दोनों धातु इतनी जल्दी कुपित नहीं होते ।
कुपित कफ पूर्वोक्त बीस प्रकार के कफ-रोगों से शरीर को पीड़ित करता है,
जिससे उसके बल, वर्ण सुख और आयु का ह्रास होता है । इस कफ को शमन
करने के लिये शास्त्रोक्त विधि से तीक्ष्ण-उष्ण संशोधन और संशमन, रूक्ष गुण-
वाले कटु, तिक्त, कषाय रस युक्त आहार-द्रव्य प्रयोग करने चाहियें । इसी
प्रकार भागना, उपवास (लंघन), प्लवन (कूदना या पानी में तैरना),
परिसरण (परिक्रमण, चारों ओर घूमना), रात्रि में जागना युद्ध व्यायाम
(शरीर को परिश्रम देने वाला कर्म, कुश्ती आदि), उन्मर्दन (रूक्ष मालिश),
स्नान, उत्सादन (उबटन लगाना), खासकर तीक्ष्ण और पुराने मद्य का
उपयोग, और धूमपान करना, सब प्रकार से उपवास, गरम वस्त्रों का उप-
योग, और सुख (आराम) का परित्याग, दुःख सहना, सुख प्राप्ति के लिये
सेवन करना चाहिये ॥१६॥
भवति चात्र—सर्व्ररोगविशेषज्ञः सर्वकार्यविशेषवित् ।
सर्वभेषजतत्त्वज्ञो राज्ञः प्राणपतिर्भवेत् ॥ १७ ॥
सब रोगों में (दोष, अग्नि, वात आदि को) जानने वाला, सब कार्यों के
अनुष्ठान को भली प्रकार जानने वाला, सब औषधियों के तत्त्व (सार) का
समझने वाला वैद्य राजा का प्राणपति (प्राणों का पालक) होगा ॥ १७ ॥
तत्र श्लोकाः—प्रकृत्यन्तरभेदेन रोगानीकविकल्पनम् ।
परस्पराविरोधश्च सामान्यं रोगदोषयोः ॥ १८ ॥
दोषसंख्याविकाराणामेकदोषप्रकोपणम् ।
ज्वरणं प्रतिचिन्ता च कायाग्नेर्धुक्षणानि च ॥ १९ ॥
नराणां वातलादीनां प्रकृतिस्थापनानि च ।
रोगानीके विमानेऽस्मिन् व्याहृतानि महर्षिणा ॥ २० ॥
प्रकृति (प्रभाव आदि) भेद से, रोगों के भेद, नानाविध संख्या होने पर
भी परस्पर अविरोध, रोग और दोष में समानता, दोषों की संख्या, रोगों का
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४१
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४१
एक देश, दोषों के प्रकोप का कारण, अग्नि का विशेष कथन, शरीरस्थ अग्नि के
चार रूप, वातल आदि तीन पुरुषों को प्रकृति में लाने वाली भेषज, ये सब
बातें इस 'रोगानीक' अध्याय में महर्षि आत्रेय ने कह दी हैं ॥ १६-२० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने रोगानीक-विमानं
नाम षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातो व्याधितरूणीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'व्याधितरूपीय' विमान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
इह खलु द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः । तद्यथा—गुरुव्याधित
एकः सत्त्वबलशरीरसंपदुपेतत्वाल्लघुव्याधित इव दृश्यते, लघुव्याधि-
तोऽपरः सत्त्वादीनामधमत्वाद् गुरुव्याधित इव दृश्यते, तयोरकुशलाः
केवलं चक्षुषैव रूपं दृष्ट्वाऽध्यवस्यन्तो व्याधिगुरुलाघवे विप्रति-
पद्यन्ते ॥ ३ ॥
दो प्रकार के पुरुष रोगी की भाँति दीखते हैं (१) गुरु व्याधि से पीड़ित
एक मनुष्य और सत्त्व, बल, और शरीर इनके उत्कर्ष से गुरु व्याधि वाला होने
पर भी लघुव्याधि से पीड़ित सा दिखाई देता है। दूसरा सत्त्व, बल, शरीर
इनके न्यून होने से लघु व्याधि होने पर भी गुरु व्याधि से पीड़ित दिखाई देता
है। इनमें अकुशल वैद्य केवल आंख से ही देखकर गुरु व्याधि और लघु
व्याधि के ज्ञान में मोह या धोखे में पड़ जाते हैं। वे गुरु व्याधि को लघु-व्याधि
और लघु-व्याधि को गुरु-व्याधि समझ लेते हैं ॥ ३ ॥
न हि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमुपपद्यते; विप्रतिपन्नास्तु खलु
रोगज्ञाने, उपक्रमयुक्तिज्ञाने चापि विप्रतिपद्यन्ते । ते यदा गुरुव्याधितं
लघुव्याधितरूपमासादयन्ति, तदा तमल्पदोषं मत्वा संशोधनकालेऽस्मै
मृदुसंशोधनं प्रयच्छन्तो भूय एवास्य दोषानुदीरयन्ति । यदा तु लघु-
व्याधितं गुरुव्याधितरूपमासादयन्ति, तं महादोषं मत्वा संशोधन-
कालेऽस्मै तीक्ष्णं संशोधनं प्रयच्छन्तो दोषानतिनिर्हृत्यव शरीरमस्य
क्षिण्वन्ति; एवमवयवेन ज्ञानस्य कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमिति मन्यमानाः
५४० चरकसंहिता [ अ० ७
परिस्र्वलन्ति, विदितवेदितव्यास्तु भिषजः सर्वं सर्वथा यथासंभवं
परीक्ष्य परीक्ष्याध्यवस्यन्तो न कचिदपि विप्रतिपद्यन्ते, यथेष्टमर्थमभि-
निर्वर्तयन्ति चेति ॥ ४ ॥
क्योंकि ज्ञान के एक देश (भाग) से सम्पूर्ण ज्ञेयवस्तु का ज्ञान नहीं हो
सकता। इस प्रकार से रोग-ज्ञान में धोखा खाने पर चिकित्सा-युक्ति ज्ञान में
भी धोखा खाजाते हैं। जिस समय ये अकुशल वैद्य गुरु-व्याधि से पीड़ित
मनुष्य को लघु-व्याधि से पीड़ित अर्थात् अल्प-दोषयुक्त समझ कर इस रोगी को
संशोधन के लिये मृदु संशोधन देते हैं, उस समय इसके दोषों को वे और भी
अधिक बढ़ा देते हैं और जब लघु-व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को महादोषयुक्त,
गुरु-व्याधि वाला समझकर संशोधन के लिये तीक्ष्ण संशोधन देते हैं, तब दोषों
को बहुत अधिक मात्रा में बाहर निकाल कर इस रोगी के शरीर को निर्बल
करते हैं। इस प्रकार से ज्ञान के एक ही भाग से सम्पूर्ण ज्ञेय वस्तु का ज्ञान
करके काम करने पर ये सब स्थानों पर धोखा खाते हैं। इसके विपरीत
तीनों प्रमाणों द्वारा परीक्षा करने वाले, सर्व प्रमाण-कुशल वैद्य सत्त्व आदि सब
बातों की परीक्षा करके कार्य करते हैं, इसलिये चिकित्सा कार्य में वे कहीं भी
धोखा नहीं खाते। इससे इनको मनोवाञ्छित प्रयोजन (आरोग्य) मिल जाता है।४।
भवन्ति चात्र— सत्त्वादीनां विकल्पेन व्याधीनां रूपमातुरे ।
दृष्ट्वा विप्रतिपद्यन्ते बाला व्याधिबलाबले ॥ ५ ॥
ते भेषजमयोगेन कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः ।
व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ ६ ॥
प्राज्ञास्तु सर्वमाज्ञाय परीक्ष्यमिह सर्वथा ।
न स्खलन्ति प्रयोगेषु भेषजानां कदाचन ॥ ७ ॥
मूर्ख वैद्य गुरु-व्याधित पुरुष में सत्त्व आदि के उत्कर्ष और अपकर्षको न
समझ कर रोग के बल और अबल (गुरु-लाघव ज्ञान) में धोखा खा जाते हैं।
इस प्रकार अज्ञान के कारण रोग-ज्ञान में धोखा खाये हुए रोगियों के नाश या
बड़े भारी कष्ट के लिये, अयुक्ति से (दोष-दूष्य की अपेक्षा न करके) चिकित्सा
कर्म करते हैं। बुद्धिमान् वैद्य सब (सत्त्व आदि) की परीक्षा तीनों प्रमाणों
द्वारा करके औषध का प्रयोग करते हैं, इसलिये वे चिकित्सा कर्म में कभी भूल
नहीं करते ॥ ५-७ ॥
इति व्याधितरूपाधिकारे श्रुत्वा व्याधितरूपसंख्याप्रसंभवं व्या-
धितरूपहेतुं विप्रतिपत्तौ च कारणं सापवादं संप्रतिपत्तिकारणं चान-
पवादं, भगवन्तमात्रेयमग्निवेशोऽतः परं सर्वकृमीणां पुरुषसंश्रयाणां
अ० ७] विमानस्थानम् ५४३
अ० ७] विमानस्थानम् ५४३
समुत्थान-स्थान-संस्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषान् पप्रच्छो-
पसंगृह्य पादौ ॥ ८ ॥
इस प्रकार से इस व्याधित रूपाधिकार में रोगी के रूप, संख्या, परिमाण,
गुरु व्याधित, लघु व्याधित, संख्या गुरु-व्याधित और लघु-व्याधित में कारण
( सत्त्वादि का उत्कर्ष और अपकर्ष ), रोग के बलाबल ज्ञान में प्रमाद ( मोह ),
इस प्रमाद के कारण ( एक प्रत्यक्ष प्रमाण से ही ज्ञान करना ), सापवाद
( दोष सहित, ) सम्प्रतिपत्ति ( सम्यक् ज्ञान तीनों प्रमाणों से परीक्षा करने का
ज्ञान ), और अनपवाद ( निर्दोष ), इनको सम्पूर्ण रूप में सुनकर अग्निवेश
ने भगवान् आत्रेय के चरणों में नमस्कार कर, सब प्रकार के कृमियों के समु-
त्थान ( निदान ), स्थान संस्थान ( लक्षण ), वर्ण, नाम, प्रभाव और चि-
कित्सा को पूछा ॥ ८ ॥
अथास्मै प्रोवाच भगवानात्रेयः—इह खल्वग्निवेश ! विंशतिविधाः
कृमयः पूर्वमुद्दिष्टा नानाविधेन प्रविभागेनान्यत्र सहजेभ्यः, ते पुनः
प्रकृतिभिर्भिद्यमानाश्चतुर्विधा भवन्ति । तद्यथा—पुरीषजाः श्लेष्मजाः
शोणितजा मलजाश्चेति ॥ ९ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा, हे अग्निवेश ! पीछे अष्टोदरीय
अध्याय में सहज ( सहजन्म ) कृमियों को छोड़ कर नाना प्रकार के विभाग
से बीस प्रकार के ( मलजन्य दो प्रकार के, रक्तजन्य छः प्रकार के, कफजन्य
सात प्रकार के और पुरीषजन्य पांच प्रकार के ) कृमि कहे हैं। ये बीस प्रकार
के कृमि प्रकृति की भिन्नता के कारण चार प्रकार के हैं। यथा—पुरीषजन्य,
श्लेष्मजन्य, रक्तजन्य और मलजन्य ॥ ६ ॥
तत्र मलो बाह्यश्चाऽऽभ्यन्तरश्च । तत्र बाह्ये मले जातान्मलजांस्-
चक्ष्महे । तेषां समुत्थानं—मृजावर्जनम् । स्थान—केश-श्मश्रु-लोम-
पक्ष्म-वासांसि । संस्थानं-अणवस्तिलाकृतयो बहुपादाः । वर्णः कृष्णः
शुक्लश्च । नामानि-यूकाः पिपीलिकाश्च । प्रभावः कण्डूजननं कोठपिड-
काभिनिर्वर्तनं च । चिकित्सितं त्वेषामपकर्षणं मलोपघातो मलकराणां
च भावानामनुपसेवनमिति ॥ १० ॥
इनमें मल दो प्रकार का है—( १ ) बाह्य और ( २ ) आभ्यन्तर । इनमें
शरीर के बाह्यमल ( पसीना आदि से ) उत्पन्न होने वाले कृमियो को
मलजन्य कृमि कहते हैं । इनकी उत्पत्ति का कारण शरीर शुद्धि का न
करना है। इनका स्थान केश ( शिर के बाल ), दाढ़ी मूंछ, शरीर के लोम,
आंखों की पलकों के बाल और वस्त्र हैं।
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इनका संस्थान अर्थात् (रूप या आकृति) ये अणु (सूक्ष्म), तिल के
समान आकृति और बहुत पांव वाले होते हैं। इनका वर्ण (रंग) काला और
श्वेत है। इनके नाम यूक (जूं) और पिपीलिका (लिक्खा), लीख है।
इनका प्रभाव—खाज उत्पन्न करना और कोठ, पिडका आदि फुन्सियों को
शरीर पर उत्पन्न करना है।
इनकी चिकित्सा—इनको चिमटी से पकड़ कर खींचना, मल का नाश
करना और मलोत्पादक वस्तुओं का परित्याग करना है ॥१०॥
शोणितजानां तु खलु कुष्ठैः समानं समुत्थानम्, स्थानं रक्तवाहिन्यो
धमन्यः। संस्थानं अणवो वृत्ताश्चापादाश्च सूक्ष्मत्वाच्चैके भवन्त्यदृश्याः।
वर्णस्ताम्रः। नामानि केशादा लोमादा लोमद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा
जन्तुमातरश्चेति। प्रभावः केश-श्मश्रु-नख-लोम-पक्ष्मपापध्वंसो व्रणगतानां
च हर्ष-कण्डू-तोद-संसर्पणान्यतिवृद्धानां च त्वक्-शिरा-स्नायु-मांस-तरु-
णास्थि-भक्षणमिति, चिकित्सितमप्येषां कुष्ठैः समानं तदुत्तरकालमुपदे-
क्ष्यामः ॥ ११ ॥
रक्तजन्य कृमियों का निदान कुष्ठ रोग के निदान के समान ही है। कृमियों
का स्थान—रक्तवाहिनी धमनियां (शिरायें भी) हैं। इनका रूप सूक्ष्म होने से
कुछ कृमि अदृश्य होते हैं। वे आंख से नहीं देखे जाते, इनका रंग ताम्र वर्ण है;
इनके नाम केशाद (केशों को खाने वाला), लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदु-
म्बर और जन्तुमाता हैं। इनका प्रभाव केश श्मश्रु, लोम और पलक के बालों
को नाश करना है, व्रण में प्रवेश करके ये हर्ष ✳, खाज, तोद (चुनचुना) और
संसर्पण की सी प्रतीति कराते हैं। बहुत बढ़के ये त्वचा सिरा, स्नायु, मांस
और तरुण अस्थि को भी खाने लगते हैं। इनकी चिकित्सा भी कुष्ठ-रोग के
समान है, इसका वर्णन आगे कुष्ठ-चिकित्सा में करेंगे ॥ ११ ॥
श्लेष्मजाः क्षीर-गुड-तिल-मत्स्याानूपमांस-पिष्टान्न-परमान्न-कुसुम्भ-
स्नेहाजीर्ण-पूति-क्लिन्न-संकीर्ण-विरुद्ध्रासात्म्य-भोजनसमुत्थानाः। तेषामा-
माशयः स्थानं। ते प्रवर्धमानास्तूष्र्ध्वमधो वा बिसर्पन्त्युभयतो वा।
संस्थानवर्ण-विशेषास्तु श्वेताः पृथुब्रध्नसंस्थानाः केचित्, केचिद्वृत्तपरि-
णाहा गण्डूपदाकृतयश्च श्वेतास्ताम्रावभासाः, केचिदणवो दीर्घास्तन्तवा-
कृतयः श्वेताः। *तेषां त्रिविधानां श्लेष्मनिमित्तानां कृमीणां नामानि—
✳ हर्ष—जिस प्रकार दाद में खुजाने से आनन्द, हर्ष वा रोमाञ्च होता है।
इस को भी कृमि उत्पन्न करते हैं।
अ० ७ ] ३२ विमानस्थानम् ५४५
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अन्त्रादाः, उदारादाः, हृदयचराः, चुरवः, दर्भपुष्पाः, सौगन्धिकाः,
महागुदाश्चेति । प्रभावो हृल्लासास्यसंस्रवणमरोचकाविपाको ज्वरो
मूर्च्छा जम्भा क्षवथुरानाहोऽङ्गमर्दश्छर्दिः कार्श्यं पारुष्यमिति ॥ १२ ॥
कफजन्य कृमि—क्षीर-भोजन, गुड़, तिल मछली, जलचर प्राणियों के मांस
पिष्टान्न और परमान्न (खीर आदि) का भोजन, कुसुम्भ का तेल, अजीर्ण में
भोजन, पूति (सड़े), क्लिन्न (क्लेदकारक द्रव्यों के) संकीर्ण (हित और अहित
बेमेल मिले भोजन) और विरुद्ध एवं असात्म्य भोजनों से उत्पन्न होते हैं।
इनका स्थान आमाशय है। ये आमाशय से बढ़ कर यहीं से ही ऊपर या नीचे
अथवा दोनों तरफ फैल जाते हैं। इनका रूप और वर्ण श्वेत तथा कुछ बड़ी
मासपेशी के से, बद के आकार के, कुछ गोल आकार वाले, (वेष्टन) वाले,
गिंडोये की आकृति के, श्वेत और लाल रंग की आभा वाले होते हैं। कुछ अणु
(पतले), लम्बे और सूत के समान आकृति वाले, श्वेत होते हैं। इन तीनों
प्रकार के कफजन्य कृमियों के नाम ये हैं। जैसे—अन्त्राद, उदराद, हृदयचर,
चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद । इन का प्रभाव—हृल्लास वमनकी रुचि
होना, मुख से लार का बहना, अरुचि, अविपाक, ज्वर, मूर्च्छा, जम्भाई का आना,
छींकें आना, अफरा, शरीर के अंगों का टूटना, वमन, कृशता और शरीर में
रूक्षता वा कठोरता होना है ॥ १२ ॥
पुरीषजास्तुल्यसमुत्थानाः श्लेष्मजैस्तेषां स्थानं पक्वाशयः । प्रवर्धमा-
नास्त्वधो विसर्पन्ति, यस्य पुनरामाशयाभिमुखाः स्युर्यदन्तरम्; तद-
न्तरं तस्योद्गारनिश्वासाः पुरीषगन्धिनः स्युः; संस्थानवर्णविशेषास्तु
सूक्ष्मवृत्तपरीणाहाः श्वेता दीर्घा ऊर्णाशुकसंकाशाः केचित्, केचित्पुनः
स्थूलवृत्तपरीणाहाः श्यावनीलहरितपीताः । तेषां नामानि ककेरुका
मकेरुका लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति । प्रभावः पुरीषभेदः
कार्श्यं पारुष्यं लोमहर्षोऽभिनिर्वर्तनं च, त एवास्य गुदमुखं परितुदन्तः
कण्डूं चोपजनयन्तो गुदमुखं पर्यासते, त एव जातहर्षा गुदनिष्क्रमण-
मतिवेलं कुर्वन्ति-इत्येष श्लेष्मजानां पुरीषजानां च कृमीणां समुत्थाना-
दिविशेषः ॥ १३ ॥
पुरीषजन्य (मल से उत्पन्न) कृमियों का निदान कफजन्य कृमियों के
समान है। इन कृमियों का स्थान पक्वाशय है। ये कृमि बढ़कर नीचे को ओर
फैलते हैं। जिस पुरुष में ये कृमि आमाशय की ओर जाने लगते हैं, उस पुरुष
के उद्गार (डकार) और श्वास में मल की गन्ध आती है। इनका रूप
वर्ण—सूक्ष्म, गोल वेष्टन वाले तथा श्वेत और भेड़ के लम्बे बालो के समान