चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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चलाने (मोड़ने माड़ने से) से, वायु वर्धक खान-पान के सेवन से अस्थिवाही
स्रोत दूषित होते हैं।
उत्पेषण (पीसने) से, अभिष्यन्दी पदार्थों के अतिसेवन से, चोट से,
दण्डे की चोट से तथा विरोधी अन्न-पान के सेवन से मज्जावाही स्रोत
दूषित होते हैं।
अकाल (निषिद्ध तिथियों में ऋतुमती आदि से) सम्भोग करने से,
अयोनि (निषिद्ध योनि) में सम्भोग करने से, उपस्थित शुक्र के वेग को रोकने
से, अतिमैथुन से, शस्त्र, क्षार और अग्नि से शुक्रवाही स्रोत दूषित हो जाते हैं।
उपस्थित मूत्र-वेग के समय पानी, भोजन या स्त्री का सेवन करने से,
क्षीण और अतिकृश व्यक्ति के मूत्रवेग को रोकने से मूत्रवाही स्रोत दूषित
हो जाते हैं।
मल के उपस्थित वेग को रोकने से, मन्दाग्नि और निर्बल पुरुष के अति-
भोजन करने से, अजीर्ण में भोजन करने से, अध्यशन से मलवाही स्रोतः
दूषित होते हैं।
व्यायाम से, अति संक्षोभ से, शीत और उष्ण को बिना क्रम के सेवन करने
से, क्रोध, शोक एवं भय से स्वेदवाही स्रोत दूषित होते हैं ॥ १६-२८ ॥
आहारश्च विहारश्च यः स्याद्दोषगुणैः समः।
धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसां स प्रदूषकः ॥ २९ ॥
जो आहार विहार और कर्म वातादि दोषों के पृथक् अथवा समष्टि रूप में
गुणों के समान होता है, वह समान गुण के कारण इन को बढ़ाता है और
जो धातुओं से विपरीत गुणवाला हो वह आहार-विहार स्रोतों को दूषित
करता है ॥ २९ ॥
अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा।
विमार्गगमनं वापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ॥ ३० ॥
स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण—स्रोतों से रस आदि की अधिक
प्रवृत्ति अर्थात् अधिक निकलना अथवा एकदम से रुक जाना, सिराओं में
गांठ पड़ जाना, विमार्ग अर्थात् विपरीत, उल्टे मार्ग से जाने लगना, ये सब
स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण हैं ॥ ३० ॥
स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च।
स्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ॥ ३१ ॥
स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप—अपने धातु के समान रंग वाले (रक्तवाही
स्रोत रक्त के समान और मांसवाही स्रोत मांस के समान), वृत्त (गोल),