चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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रोगों की गणना की है। असंख्य जैसे महारोगाध्याय में रुक्, वर्ण समुत्थान
आदि के कारण असंख्य हो जाते हैं ॥३॥
न च संख्येयाग्रेषु भेदप्रकृत्यन्तगीयेषु विगीतिरित्यतो दोषवती स्या-
दत्र काचित्प्रतिज्ञा, न चाविगीतिरित्यतः स्याद्दोषवती। भेत्ता हि
भेद्यमन्यथा भिनत्ति, अन्यथा पुरुषस्तावद्भिन्नं भेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्द-
न् भेदसंख्याविशेषमापादयत्यनेकधा, नच पूर्वं भेदाप्रमुपहन्ति। स-
मानायामपि खलु भेदप्रकृतौ प्रकृतानुप्रयोगान्तरमपेक्ष्यम्। सन्ति
ह्यर्थान्तराणि समानशब्दाभिहितानि। सन्ति चानर्थान्तराणि पर्याय-
शब्दाभिहितानि। समानो हि रोगशब्दो दोषेषु च व्याधिषु च, दोषा
ह्यपि रोगशब्दमातङ्कशब्दं यक्ष्मशब्दं दोषप्रकृतिशब्दं विकारशब्दं च
लभन्ते। व्याधयश्च रोगशब्दमातङ्कशब्दं यक्ष्मशब्दं दोषप्रकृतिशब्दं
विकारशब्दं च लभन्ते। तत्र दोषेषु चैव व्याधिषु च रोगशब्दः समानः,
शेषेषु तु विशेषवान् ॥४॥
तत्र व्याधयोऽपरिसंख्येया भवन्ति, अतिबहुत्वात्। दोषास्तु खलु
परिसंख्येयाः, अनतिबहुत्वात्। तस्माद्यथाचित्रं विकारा उदाहरणार्थ-
मनवशेषेण च दोषा व्याख्यास्यन्ते।
एक ही रोग में संख्येयत्व और असंख्येयत्व ये दोनों विरुद्ध बातें किस
प्रकार हो सकती हैं ? प्रकृति भेद के कारण (ज्वर, अतिसार आदि भेद से)
गिने जाने योग्य रोगों में एक और अनेक भेद का कथन परस्पर विरुद्ध दोष-
युक्त नहीं है। यदि ऐसा विपरीत भाव न हो तो इतने से कोई कथन दोषरहित
भी नहीं होता।
भेद दर्शाने वाला पुरुष भेद्य रोग के अन्य रूप से भेद करता है। पहिले
अन्य प्रकार (एक दूसरे ही रूप से) से भेद किये होते हैं। पहिले एक ही
भेद-प्रकृति से एक रूप से विभक्त किये हुए रोग को पीछे प्रकृति-भेद से विभाग
करके अनेक (असंख्य) भेद कर लेता है। इस प्रकार असंख्य भेद करने पर
भी वह प्रथम किये हुए भेदों का लोप नहीं करता, वह तो बने ही रहते हैं।
भेद-प्रकृति में समान होने पर भी प्रकृत अर्थात् समान शब्द से कहने के
बाद अन्य रूप से वर्णन करना भी अपेक्षित है। क्योंकि समान शब्द से कहने के
जाने वाले भी अनेक पदार्थ हैं और नाना पर्याय शब्दों से कहे जाने वाले एक
एक पदार्थ भी अनेक हैं। अर्थात् एक शब्द अनेकार्थवाचक है, और भिन्न
भिन्न शब्द एक ही अर्थ को कहते हैं। जैसे-रोग शब्द व्याधि और दोष के
लिये प्रयुक्त होता है। दोषों को रोग, आतंक, यक्ष्म, दोष, प्रकृति, विकार आदि