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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 422 of 639

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Page 422

४०४ चरकसंहिता [ अ० ३०
प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषयों का निरूपण संग्रह रूप से प्रत्येक अध्याय
के अन्त में दे दिया है और जो मुख्य विषय आया है, उसको स्थान २ पर
संक्षिप्त रूप से फिर कह दिया है। इसलिये एक अध्याय का वर्णन जो यत्र
तत्र आया है, वह सब वर्णन उसी एक अध्याय का समझना चाहिये ॥ ६७ ॥
पृच्छा तन्त्राद्यथाङ्गानां विधिना प्रश्न उच्यते ।
प्रश्नार्थे युक्तिमांस्तत्र तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ ६८ ॥
निरुक्तं तन्त्रणातन्त्रं स्थानमर्थप्रतिष्ठया ।
अधिकृत्यार्थमध्यायानामसंज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६९॥
इति सर्वं यथाप्रश्नमष्टकं संप्रकाशितम् ।
कात्स्न्येन चोक्तस्तन्त्रस्य संग्रहः सुविनिश्चितः ॥ ७० ॥
ग्रन्थ के प्रारम्भ करने में सामान्य विशेष रूप से अथवा पूर्वापरविरोध से
रहित जो विचार करना है उसका नाम 'प्रश्न' और विचार पूर्वक किये हुए
प्रश्न का शास्त्र के आधार से युक्तिपूर्वक जो निर्णय है उसका नाम 'प्रश्नार्थ'
है। जिसमें अनेक विषय एक साथ में एकत्र किये गये हों उसका नाम 'तन्त्र'
है। तन्त्र अर्थात् शास्त्र में मुख्य मुख्य विषयों में से एक एक भाग को जो
पृथक् पृथक् लेकर प्रतिपादन किया है उसका नाम 'अध्याय' है (जैसे-दीर्घे-
जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय इत्यादि प्रत्येक विषय के अनुक्रम में निर्दिष्ट भाग
का नाम अध्याय है)। इस प्रकार तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान स्थानार्थ आदि जो
आठ प्रश्न किये उनका उत्तर दे दिया है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ का
संक्षेप है ॥ ६८-७० ॥
सन्ति पाङ्गविकोत्पाताः संक्षोभं जनयन्ति ये ।
वर्तकानामिबोत्पाताः सहसैवाविभाविताः ॥ ७१ ॥
तस्मात्तान् पूर्वसंजल्पे सर्वत्राष्टकमादिशेत् ।
परावरपरीक्षार्थं तत्र शास्त्रविदां बलम् ॥ ७२ ॥
शब्दमात्रेण तन्त्रस्य केवलस्यैकदेशिकाः ।
भ्रमन्त्यल्पबलास्तन्त्रे ज्याशब्देनैव वर्तकाः ॥ ७३ ॥
पशुः पशूनां दौर्बल्यात्कश्चिन्मध्ये वृकायते ।
ससत्त्वं वृकमासाद्य प्रकृतिं भजते पशुः ॥ ७४ ॥
तद्वदज्ञोऽज्ञमध्यस्थः कश्चिन्मौखर्यसाधनः ।
स्थापयत्याप्तमात्मानमाप्तं त्वासाद्य भिद्यते ॥ ७५ ॥
वस्त्रमूर्ढ इवोर्णाभिरबुद्धिरबहुश्रुतः ।
किं व वक्ष्यति संजल्पे कुण्डभेदी जडो यथा ॥ ७६ ॥